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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 760 में से

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पृष्ठ 592

अथ राशिविभागाध्यायः
अथ राशिविभागो व्याख्यायते। तत्रादावेव मेषवृषयोर्नक्षत्रजातप्रविभागमाह--
अश्विन्योऽथ भरण्यो बहुलापादश्च कीर्त्यते मेषः।
वृषभो बहुलाशेषं रोहिण्योऽर्धं च मृगशिरसः ॥१॥
अश्विनी का चार पाद, भरणी का चार पाद और कृत्तिका का आद्य पाद मेष राशि
का तथा कृत्तिका का शेष तीन पाद, रोहिणी का चार पाद और मृगशिरा का प्रथम दो
पाद वृष राशि होता है॥१॥
अश्विन्यः सकलाः पादचतुष्टयम्। अथशब्दश्चार्थे। भरण्यः सकला एव पादचतुष्टयम्।
बहुला कृत्तिका। तस्याश्चतुर्थमंशम्। एष मेष इति मेषराशिः कीर्त्यते कथ्यते। अत्र नक्षत्रं
चतुष्पादम्। पादमृक्षद्वयं राशिर्भवति। एवं नक्षत्रे नवपादाः प्रत्येकस्य राशेः प्रमाणम्।
उक्तं च—
मेषाश्विप्रथमा नवर्क्षचरणाश्चक्रस्थिता राशयः। इति।
बहुलाशेषं कृत्तिकापादत्रयम्। रोहिणी सकला। अर्धं च मृगशिरसो मृगशिरसः पादद्वयं
वृषभो राशिः कीर्त्यते॥१॥
अथ मिथुनकर्कटयोर्नक्षत्रविभागमाह—
मृगशिरसोऽर्धं रौद्रं पुनर्वसोरंशकत्रयं मिथुनः।
पादश्च पुनर्वसुतस्तिष्यः श्लेषा च कर्कटकः ॥२॥
मृगशिरा का शेष दो पाद, आर्द्रा का चार पाद और पुनर्वसु का प्रथम तीन पाद
मिथुन राशि का तथा पुनर्वसु का शेष एक पाद, पुष्य का चार पाद और अश्लेषा का
चार पाद कर्कट राशि का होता है॥२॥
मृगशिरसोऽर्धं पादद्वयम्। रौद्रमार्द्रा सकला। पुनर्वसोरंशकत्रयम्। एष मिथुनराशिः।
पादश्चेति। पुनर्वसुतः पुनर्वसोः पादः तिष्यः सकलः। श्लेषा च सकला। एष कर्कट-
राशिः॥२॥
सिंहकन्ययोर्नक्षत्रविभागमाह—
सिंहोऽथ मघा पूर्वा च फल्गुनीपाद उत्तरायाश्च।
तत्परिशेषं हस्तश्चित्राद्यर्धं च कन्याख्यः ॥३॥
मघा का चार पाद, पूर्वफाल्गुनी का चार पाद और उत्तरफाल्गुनी का प्रथम एक
पाद सिंह राशि का तथा उत्तरफाल्गुनी का शेष तीन पाद, हस्त का चार पाद और चित्रा
का आद्य दो पाद कन्या राशि का होता है॥३॥
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