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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 760 में से

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पृष्ठ 589

नक्षत्रजातकाध्यायः ५६१
धनधान्यसञ्चयानामीशः स्यान्नृपतिसत्कृतो यज्वा।
अक्लेशभाग् जितरिपुः श्रविष्ठायाभीष्टतारश्च।। इति।।१२।।
अथ शतभिषक्पूर्वभद्रपदयोर्जातस्य स्वरूपमाह—
स्फुटवाग्व्यसनी रिपुहा साहसिकः शतभिषक्सु दुर्ग्राह्यः ।
भद्रपदासूद्विग्नः स्त्रीजितधनपटुरदाता च ॥१३॥
शतभिषा नक्षत्र में उत्पन्न जातक स्पष्ट बोलने वाला, अनेक व्यसन में आसक्त,
शत्रुओं का नाश करने वाला, साहसी और कष्ट से किसी के वश में आने वाला होता है।
पूर्वभाद्र में उत्पन्न जातक दुःखित चित्त वाला, स्त्री के वश में रहने वाला, धनी, पण्डित
और कृपण होता है।।१३।।
स्फुटवाग् निष्ठुरभाषी। व्यसनी भूषणादिव्यसनोपेतः। रिपुहा शत्रुहर्ता। साहसिकः
असमीक्षितवीर्यवान्। दुर्ग्राह्यो दुराराध्यः। एवंविधः शतभिषक्सु जातो भवति। तथा च
पराशरः—
परदारमद्यसेवी क्लेशसहो वारुणे नरो धीरः।
स्थिरसञ्चयः स्थिरसुहृद्विषक्रियापण्डितो रोगी।।
भद्रपदास्विति। उद्विग्नः दुःखितः। स्त्रीजितधनः स्त्रिया जितं धनं यस्य स्त्रीभिर्वा।
पटुः प्रवक्ता। अदाता च लुब्धः। एवंविधो भद्रपदास जातो भवति। तथा च पराशरः—
दारुणकर्मा क्रोधी निशाचरस्तीक्ष्णविक्रमश्चपलः।
विषमः प्रसह्य हन्ता प्राक्प्रौष्ठपदे भवति जातः।। इति।।१३।।
अथोत्तरभद्रपदारेवत्योर्जातस्य स्वरूपमाह—
वक्ता सुखी प्रजावान् जितशत्रुर्धार्मिको द्वितीयासु ।
सम्पूर्णाङ्गः सुभगः शूरः शुचिरर्थवान् पौष्णे ॥१४॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां नक्षत्रजातकं
नामैकशततमोऽध्यायः ॥१०१॥
उत्तरभाद्रपदा में उत्पन्न जातक वक्ता, सुखी, सन्तति से युक्त, शत्रुओं को जीतने
वाला और धर्माचरण करने वाला होता है। रेवती नक्षत्र में उत्पन्न जातक सम्पूर्ण अंगों से
युक्त, सबका प्रिय, पवित्र और धनवान होता है।
विशेष—अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में थोड़ा काम
करने वाला, तृतीय में सबका प्रिय और चतुर्थ में जन्म हो तो दीर्घायु होता है। भरणी के
प्रथम चरण में जन्म हो तो त्यागी, द्वितीय में भोगी, तृतीय में पाप कर्म करने वाला और
चतुर्थ चरण में जन्म हो तो दरिद्र होता है। कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
बृ० भ० द्वि०-३६
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