बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहगोचराध्यायः ५७५
नार्धगणेनार्याणां पथ्यादिकानां पूर्वमर्धं प्रथमदलं भवति। नात्रास्यामार्यायामयुजि प्रथमतृतीय-
पञ्चमसप्तमगणस्थानेषु जो गणश्च भवति। षष्ठोऽयं तु जकारो भवति। अथ वा षष्ठो गणो
नलघुको यो नलघू भजते जकाराभावात्। अन्यदप्याह—
ले लात् पदं द्वितीयात् प्रथमात् परकेऽथ विषमयुजि चरमे।
षष्ठो लोऽग्रेऽन्त्ये त्रिषु पादो भवति भवति तु पथ्या।।
ले सर्वलघौ षष्ठे गणे सति द्वितीयाल्लात् पदं कार्यम्। प्रथमात् परक इति। षष्ठात्
परके सप्तमगणे सर्वलघौ प्रथमाल्लात् पदं कार्यम्। षष्ठस्थानान्ते यतिः कार्येत्यर्थः।
अथ विषमयुजि चरमे। पश्चार्धे विषमयुजि पञ्चमस्थानभाजि ले सति प्रथमाक्षरमारभ्य
पदं विधेयम्। षष्ठो ल इति पश्चिमेऽर्धे षष्ठो गण एकलघुरेव कार्यः। अग्रेऽन्त्ये च त्रिषु
गणेषु यदि पादो यतिर्भवेत् तदा पथ्यानाम्यार्या भवतीत्यार्याद्वयस्यार्थः। द्व्यान्तान्तरादि-
गुरुभिरित्यस्य न्यासः। ले लात् पदमित्यस्य पथ्याया न्यासश्च प्रसिद्धः।
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एवमादयः।
अथ विपुलाचपलयोर्लक्षणम्—
विपुला तु याऽन्यथा पादभाग् जकारौ द्वितीयकचतुर्थौ।
गुरुमध्यगौ भवेतां भवेत् तदा सर्वतश्चपला।।
पथ्यातो याऽन्यथा पादं भजते त्रिषु गणेषु यस्या यतिर्नास्तीत्यर्थः, सा विपुला, यत्र
तु जकारौ मध्यगुरुगणौ द्वितीयकचतुर्थौ द्वितीयस्थाने चतुर्थे च स्थितौ तौ च गुरुमध्यगौ
गुर्वोर्मध्यगौ भवेतां स्याताम्। सर्वतोऽर्धद्वयेऽपि तदा चपला भवति।
न्यासः— ज ज
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