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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 760 में से

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पृष्ठ 590

५६२ बृहत्संहिता
तेजस्वी, द्वितीय में शास्त्र का ज्ञाता, तृतीय में शूर और चतुर्थ में सन्तानयुक्त होता है।
रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो सौभाग्य से युक्त, द्वितीय में पीड़ायुक्त,
तृतीय में भययुक्त और चतुर्थ में सत्यवक्ता होता है। मृगशिरा नक्षत्र के प्रथम चरण में
जन्म हो तो राजा, द्वितीय में चोर, तृतीय में भोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो अन्न-धन
से युक्त होता है। आर्द्रा नक्षत्र में प्रथम चरण में जन्म हो तो व्यय करने वाला, द्वितीय
में दरिद्र, तृतीय में अल्पायु और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो चोर होता है। पुनर्वसु नक्षत्र
के प्रथम चरण में जन्म हो तो सुखी, द्वितीय में विद्वान्, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण
में जन्म हो तो मिथ्यावादी होता है। पुष्य नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो दीर्घायु,
द्वितीय में चोर, तृतीय में भोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो धनी होता है। आश्लेषा के
प्रथम चरण में जन्म हो तो सन्तान से रहित, द्वितीय में भृत्यकर्म करने वाला, तृतीय में
रोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो अभागा होता है। मघा के प्रथम चरण में जन्म हो तो पुत्र
से रहित, द्वितीय में पुत्र से युत, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो पण्डित
होता है। पूर्वफाल्गुनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो समर्थ, द्वितीय में धार्मिक,
तृतीय में राजा या राजतुल्य और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो अल्पायु होता है। उत्तर-
फाल्गुनी के प्रथम चरण में जन्म हो तो पण्डित, द्वितीय में राजा, तृतीय में विजयी और
चतुर्थ चरण में जन्म हो तो धर्मात्मा होता है। हस्त नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
शूर, द्वितीय में वक्ता, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो श्रीमान् होता है।
चित्रा के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में चित्र बनाने वाला, तृतीय में परस्त्री
के साथ गमन करने वाला और चतुर्थ में जन्म हो तो पाँव में पीड़ा से युक्त होता है।
स्वाती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में अल्पायु, तृतीय में धर्मात्मा
और चतुर्थ में जन्म हो तो राजा या राजतुल्य होता है। विशाखा नक्षत्र के प्रथम चरण में
जन्म हो तो नीति को जानने वाला, द्वितीय में शास्त्र को जानने वाला, तृतीय में बोलने
वाला और चतुर्थ में जन्म हो तो दीर्घायु होता है। मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो
तो भोगी, द्वितीय में त्याग करने वाला, तृतीय में अच्छे मित्र वाला हौर चतुर्थ जन्म हो
तो राजा या राजतुल्य होता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो श्रेष्ठ
विचार वाला, द्वितीय में राजा या राजतुल्य, तृतीय में सबों का प्रिय और चतुर्थ चरण में
जन्म हो तो बाजा बजाने वाला होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
राजा या राजतुल्य, द्वितीय में खराब मित्र वाला, तृतीय में अभिमानी और चतुर्थ में जन्म
हो तो धर्मात्मा होता है। श्रवण नक्षत्र के सब चरणों का फल शुभ है। पूर्वभाद्रपदा
नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो शूर, द्वितीय में चोर, तृतीय में सन्मति वाला और
चतुर्थ में जन्म हो तो भोगी होता है। उत्तरभाद्रपदा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
राजा या राजतुल्य, द्वितीय में चोर, तृतीय में पुत्रवान एवं चतुर्थ में जन्म हो तो दुःख से
रहित होता है। रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो ज्ञानी, द्वितीय में चोर, तृतीय
में विजयी और चतुर्थ में जन्म हो तो युद्धस्थान में कष्ट पाने वाला होता है। जिस ग्रन्थ