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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

वारन हेस्टिंग्स २५५
इसके बाद टोरेन्स बयान करता है कि किस प्रकार इन समस्त
अत्याचारों ने, अवध के नवाब पर कम्पनी की आए दिन की माँगों
ने, और वहाँ के राजशासन में अंगरेज़ों के नित्य हस्तक्षेप ने मिलकर
आसफुद्दौला को मिटा डाला, अवध निवासियों की हिम्मतों को
कुचल कर ख़ाक कर दिया और उत्तरीय भारत के उस हरे भरे
बाग़ को थोड़े ही दिनों में इधर से उधर तक वीरान कर डाला।
himself to be a friend in need. . . . Sir Elijah got into palanquin, and
posted to Lucknow, by relays of pagan bearers;--for were not pagans made
to bear Christian Chief Justice on their shoulders, when at full speed to aid
in the Commission of robbery at the command of a Right Honourable
Viceroy? What could more clearly prove to a soul-darkened population
the superiority of European manners and morals? Arrived in the capital
of Oudh, the Chief Justice took a number of affidavits which accused the
Begums of complicity with Chait Singh, in his supposed conspiracy against
his lawful masters, the Company. Sir Elijah did not read the affidavits, or
hear them read. They were in a dilect he did not understand, and he had
not time to wait for an interpreter. So he took them as Chief Magistrate
of England in the East; and this "scandalous prostitution of his high
authority" being completed, he got into his palanquin again, and returned to
Calcutta. . . . The farce concluded, tragic scenes began. The palace
of Fyzabad was surrounded by English troops. The princesses were told
that they were captives, and required to deliver up their gold and jewels.
On their refusal, their ladies were subjected to semi-starvation and their
servants to torture. Unable to endure their groans and tears, the Begums
gave up casket after casket, and store after store, until the sum of spoil was
reckoned at £s 12,00,000. Then, and not till then, their wretched menials
were let go. Such are the bare outlines of the dreadful tale. Over
all that could furnish forth the true coloring of the picture, the veil of
oblivion has fallen, and it can not now be raised. . . Asafuddoula
. . . lost influence and power. . . . the desolation that overspread
the country, . . ."--Torren's Empire in Asia, pp. 126-128.

२५६ भारत में अंगरेज़ी राज
उन दिनों कम्पनी के प्रायः सब अंगरेज़ मुलाज़िम कम्पनी
भारत से हेस्टिंग्स के लाभ के साथ साथ अपने व्यक्तिगत लाभ का
की कमाई भी ख़ासा ख़याल रखते थे। वारन हेस्टिंग्स को
भी अपनी हर राजनैतिक चाल में इस बात का
पूरा पूरा विचार रहता था। नज़रानौं और रिश्वतों का बाज़ार
चारों ओर गरम था। इतिहास लेखक जे० टालबॉयज़ व्हीलर
लिखता है :—
“हेस्टिंग्स ने क़बूल किया कि उसने सन् १७८२ में आसफ़ुद्दौला से
१० लाख रुपए लिए। इससे अनुमान होता है कि सन् १७७३ में उसने
इतनी ही रक़म शुजाउद्दौला से लेकर चुपके से जेब में डाल ली थी। जिन
कर्मचारियों को कुछ भी राजनैतिक तजरुबा है, उन्हें इसमें कोई शक नहीं हो
सकता कि यदि इससे पहले आसफ़ुद्दौला के बाप शुजाउद्दौला ने इतनी ही
रक़म हेस्टिंग्स को न दी होती और हेस्टिंग्स ने मंज़ूर न कर ली होती तो
आसफ़ुद्दौला हरगिज़ दस लाख रुपए हेस्टिंग्स की नज़र न करता।”*
कलकत्ता कौन्सिल की ११ अप्रैल सन् १७७५ की काररवाई की
रिपोर्ट में दर्ज है कि अपनी गवर्नरी के केवल पहले तीन साल के
अन्दर वारन हेस्टिंग्स इन ज़रियों से “चालीस लाख रुपए से

  • “ Hastings acknowledged to having taken a hundred thousand pounds
    from Asafuddoula in 1782. The inference follows that in 1773 he received
    a like sum from Shujauddoula and silently pocketed the money. Officers of
    any political experiences would be satisfied that Asafuddoula would never
    have offered the hundred thousad pounds to Hastings, unless a like sum had
    been previously offered by his father, Shujauddoula, and accepted by
    Hastings.”—J. Talboys Wheeler in his Short History of India, etc.

ऊपर” कमा चुका था। वास्तव में हेस्टिंग्स के ख़िलाफ़ नन्दकुमार
की शिकायतें झूठी न थीं। हमें यह भी याद रखना चाहिये कि डेढ़
सौ साल पहले भारत के अन्दर चालीस लाख रुपए की उतनी
क़ीमत थी जितनी आज आठ करोड़ की, और ‘चालीस लाख’ के
आदमी उन दिनों इंगलिस्तान में इतने ही कम थे जितने आठ
करोड़ के आज दिन भारत में।
वारन हेस्टिंग्स जिस तरह रिश्वतें लेता था उसी तरह देता
[हाशिया: कम्पनी के] और दिलवाता भी था। उसके अनेक छोटे और
[हाशिया: कर्मचारियों द्वारा] बड़े काले और गोरे दलाल कम्पनी की अमलदारी
[हाशिया: देश व्यापी लूट] भर में तमाम महकमों के अन्दर फैले हुए थे, जो
देशी नरेशों और भारतीय प्रजा दोनों को तरह
तरह से लूटते थे और उन पर तरह तरह के अत्याचार करते थे।
कोलब्रुक नामक अंगरेज़ ने २८ जुलाई सन् १७८८ को एक
पत्र भारत से इंगलिस्तान अपने पिता के नाम भेजा, जिसमें उसने
लिखा :—
“मिस्टर हेस्टिंग्स ने इस देश को ऐसे कलक्टरों और जजों से भर दिया
है, जिनके सामने एक मात्र लक्ष्य धन कमाना है। ज्योंही ये गिद्ध मुल्क
के ऊपर छोड़े गए, उन्होंने कहीं कोई बहाना निकाल कर और कहीं बिना
किसी बहाने के देशवासियों को लूटना शुरू कर दिया। × × × जज लोग
मुक़दमे का फ़ैसला उसके हक़ में करते हैं जो उन्हें सबसे ज़्यादा रुपए देता
है। और चोर निर्विघ्न डाके डालने के बदले में बाज़ाब्ता सालियाना अदा
करते हैं।”
१७

२५८ भारत में अंगरेज़ी राज
आगे चलकर कोलब्रुक लिखता है :—
“वारन हेस्टिंग्स की कूटनीति और उसके निर्लज्ज
गोरखपुर के विश्वासघात का प्रभाव केवल राजाओं और बड़े लोगों
अत्याचार पर ही नहीं पड़ा । ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ छीन लेना,
बेगमों को लूटना, रुहेलों को निर्वंश कर डालना, ये सब भूले जा सकते हैं,
किन्तु जो अत्याचार उसने गोरखपुर में किए वे सदा के लिए ब्रिटिश जाति
के नाम पर एक कलङ्क रहेंगे ।”*
गोरखपुर के इन अत्याचारों के विषय में जेम्स मिल लिखता है
कि सन् १७७८ में वारन हेस्टिंग्स ने अपने एक अफ़सर करनल
हैनेवे को कम्पनी की नौकरी से निकाल कर अवध के नवाब के यहाँ
भेज दिया। नवाब पर ज़ोर देकर बहराइच और गोरखपुर के
ज़िलों का दीवानी और फ़ौजी शासन करनल हैनेवे को दिलवा
दिया गया । मिल लिखता है कि—“यह तमाम इलाक़ा नवाब के
शासन में खूब खुशहाल था, किन्तु करनल हैनेवे के अत्याचारों के
कारण तीन साल के अन्दर यह तमाम इलाक़ा वीरान हो गया ।”

  • "It was Mr. Hastings who filled the country with collectors and
    judges who adopted one pursuit- a fortune. These harpies were no sooner
    let loose upon the country, than they plundered the inhabitants with or
    without pretences. . . . Justice was dealt out to the highest bidders by
    the Judges, and thieves paid a regular revenue to rob with impunity. . . .
    "Nor did his crooked politics and shamless breach of faith affect none
    but the princes and great men; the deposition of zemindars, the plundering
    of Begums, the extermination of the Rohillas may be forgotten, but the
    cruelties acted in Gorukhpore will for ever be quoted to the dishonor of the
    British name."—Colebrooke in a private letter to his father, dated 28th
    July, 1788.

वारन हेस्टिंग्स २५६
लिखा है कि—"हैनेवे ने कोई लगान नियत न कर रक्खा था, बल्कि
जिस समय जिस ज़मींदार या रय्यत से जितना चाहता था, अपने
कलक्टरों द्वारा वसूल कर लेता था । इलाक़े भर के अन्दर जो लोग
अदा करने में असमर्थ होते थे उन्हें आम तौर पर क़ैद और कोड़ों
की सज़ा दी जाती थी। लोग अपने घर बार और गाँव छोड़ छोड़
कर निकल गए । बहुतों को इतना दिक़ किया गया कि उन्हें अपने
बच्चे तक बेच देने पड़े।"*
मिल लिखता है कि कम्पनी का एक मुलाज़िम कप्तान एडवर्ड्स
सन् १७८० में इस इलाक़े को देखने के लिए गया । उसने देखा कि
देश के बहुत कम हिस्से में खेती की गई थी, आबादी बहुत कम
रह गई थी और जो इने गिने आदमी उस इलाक़े में रह गए थे वे
अत्यन्त दुखी दिखाई देते थे। मिल यह भी लिखता है कि जिस
समय कर्नल हैनेवे ने नवाब के यहाँ जाकर नौकरी की, उस समय
हैनेवे के ज़िम्मे क़र्ज़ा था, किन्तु तीन साल के अन्दर क़र्ज़ा
अदा करने के बाद उसके पास क़रीब ४५,००,००० रुपए नक़द
मौजूद थे।
नवाब ने इन अत्याचारों की ख़बर सुनकर सन् १७८१ में

  • ". . . . . the country, from a very flourishing state . . . had
    been reduced to misery and desolation; that taxes were levied, not according
    to any fixed rule, but according to the pleasure of the Collector; that
    imprisonments and scourgings, for enforcing payment, were common in
    every part of the country; that emigrations of the people were frequent;
    and that many of them were so distressed as to be under the necessity of
    selling their children."—Mill, Book v, Chapter 8.

२६० भारत में अंगरेज़ी राज
कर्नल हैनेवे को बरख़ास्त कर दिया। इसके बाद जब नवाब को
मालूम हुआ कि हेस्टिंग्स फिर कर्नल हैनेवे को मेरे सिर मढ़ने
की तजवीज़ कर रहा है तो नवाब ने हेस्टिंग्स को लिख दिया
कि—"मैं हज़रत मोहम्मद की क़सम खाता हूँ कि यदि आपने
मेरे यहाँ किसी काम पर भी कर्नल हैनेवे को नियुक्त किया तो मैं
सल्तनत छोड़कर निकल जाऊँगा।”*
दुर्भाग्यवश उस समय के कम्पनी के शासन का कोई सच्चा और
विस्तृत इतिहास किसी भारतवासी के हाथ का लिखा हुआ मौजूद
नहीं है।
अब हम फिर कोलब्रुक के पत्र की ओर आते हैं। हमें
[लगान का बढ़ाया] याद रखना चाहिए कि कम्पनी ही इस समय
[जाना] सारे बंगाल, बिहार और उड़ीसा की प्रजा से
लगान वसूल करती थी। यह लगान जिस
हिसाब से वसूल किया जाता था, उसके विषय में कोलब्रुक
लिखता है :—
"जिस पद्धति के अनुसार इस देश के अन्दर अंगरेज़ी इलाक़ों का शासन
किया जा रहा है उससे प्रजा की खुशहाली पर बुरा असर पड़ा है। × × ×
नमक और अफ़ीम के ठेक़ों का या उन तरीक़ों का जिनसे कम्पनी की
तिजारती पूँजी जमा की जाती है ज़िक्र छोड़कर, मैं केवल ज़मीन के लगान
का ज़िक्र करता हूँ। ज़मीन का लगान जहाँ तक बढ़ाया जा सकता था, बढ़ा
दिया गया है। मुग़ल सरकार के अधीन कोई ज़मींदार अपनी ज़मींदारी की


  • Mill, Book v, Chapter, 8.

वारन हेस्टिंग्स २६१
आमदनी का आधा भी सरकार को न देता था और छोटी ज़मींदारियों से तो
इससे भी कहीं कम लिया जाता था। इसके अलावा ज़मींदारों को कुछ रक़म
बतौर पेनशन के अपने हिसाब में जमा कर लेने की इजाज़त थी, या उसकी
जगह उन्हें कुछ ज़मीनें माफ़़ी में मिल जाती थीं। इसके विपरीत कम्पनी के
अधीन ज़मींदार के पास अपने यहाँ की आमदनी का केवल दस फ़ी सदी रहने
दिया जाता है। × × × प्रजा के साथ जिस तरह का बर्ताव किया जा रहा
है, उससे वे सदा याद रक्खेंगे कि कभी किसी भी विजेता ने अपनी किसी
पराजित जाति के कन्धों पर इससे भारी जुआ नहीं रक्खा।”*
वारन हेस्टिंग्स के अत्याचारों की अनेक संगीन शिकायतें
[वारन हेस्टिंग्स पर] इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के कुछ मेम्बरों के पास
[मुक़दमा] पहुँचीं। पार्लिमेण्ट में कुछ न्यायप्रेमी मेम्बर भी
मौजूद थे। इनकी ओर से पार्लिमेण्ट के सामने
वारन हेस्टिंग्स पर रिश्वतख़ोरी और अनेक अन्य घोर अन्यायों के


* "The system upon which the British dominions have been governed
in the East, has affected the happiness of the people . . . . not to mention
monopolies of salt and opium, or the principles upon which the Company's
investment has been provided, I may confine myself to the stretching the
land rents to the utmost sum they can produce. A proprietor of an estate
under the Mogul Government, seldom paid half of the produce of his estate,
and in small properties much less ; he was further allowed to take credit for
a certain sum by way of pension or held rent-free lands in lieu there of.
Under the Company, a landholder is allowed ten per cent of net produce
as his share. . . . .
"The treatment of the people has been such as will make them remem-
ber the yoke as the heaviest that ever conquerors put upon the necks of
conquered nations."—Colebrooke in the above letter.

२६२ भारत में अंगरेज़ी राज
विषय में मुक़दमा चलाया गया। सुप्रसिद्ध विद्वान एडमएड बर्क
ने अपनी अमर वक्तृताओं में कम्पनी और वारन हेस्टिंग्स के उन
दिनों के कलुषित कृत्यों की ख़ूब पोल खोली। इन वक्तृताओं का
पढ़ना ब्रिटिश भारतीय इतिहास के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए आवश्यक
है। सात साल तक मुक़दमा चलता रहा, किन्तु वास्तव में
इंगलिस्तान के सामने प्रश्न न्याय अन्याय का न था। प्रश्न था अंग-
रेज़ क़ौम के हित और अंगरेज़ क़ौम के राज का। वारन हेस्टिंग्स ने
जो कुछ किया था, अपनी क़ौम के हित के लिए और भारत में
अंगरेज़ी राज को मज़बूत करने के लिए किया था। इसलिए अन्त
में ब्रिटिश पार्लिमेण्ट ने उसे सब इलज़ामों से साफ़ बरी कर दिया।
इस तमाम मुक़दमे में वारन हेस्टिंग्स के क़रीब १० लाख रुपए
ख़र्च हुए, जो निस्सन्देह उसकी भारत की कमाई का केवल एक
हिस्सा था। कम्पनी के मालिकों ने फ़ौरन हरजाने के तौर पर
आइन्दा २८ साल तक के लिए चालीस हज़ार रुपए सालाना वारन
हेस्टिंग्स को देने का वादा किया, जिसमें से अधिकांश उन्होंने उसी
समय पेशगी अदा कर दिया। हेस्टिंग्स इससे कई गुना अधिक
कम्पनी को लाभ पहुँचा चुका था।
सर एलाइजाह इम्पे पर भी “रिश्वतें लेने, अन्याय करने, झूठी
गवाहियाँ बनाने, झूठे हलफ़नामे तसदीक़ करने”* इत्यादि का
* "Gross corruption, positive injustice, . . . . intentional violation
of the Acts under which he held his powers, . . . . having suborned
evidence and given to falsehood the sanctity of an affidavit"—Impeachment
of Sir Elijah Impey, December 12th, 1787

वारन हेस्टिंग्स २६३
मुक़दमा चलाया गया । किन्तु अन्त में इंगलिस्तान के शासकों ने
यह कहकर कि “उसके जुर्मों का केवल प्रगट हो जाना ही काफ़ी
है” उसे साफ़ छोड़ दिया ।
भारत में श्रंगरेज़ी राज की जड़ें इस प्रकार पक्की की गईं ।

आठवाँ अध्याय
पहला मराठा युद्ध
छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के क़रीब ७५ साल के अन्दर १८वीं
सदी के मध्य में मराठों की सत्ता अपनो शिखर
मराठा मण्डल को पहुँच चुकी थी । मुग़ल साम्राज्य उस समय
अत्यन्त जर्जर हालत में था और दो सौ साल से ऊपर के उस
पुराने साम्राज्य के खंडहरों में से उत्पन्न होकर मराठों का साम्राज्य
एक बार समस्त भारत पर फैलता हुआ मालूम होता था । स्वयं
दिल्ली और दिल्ली का सम्राट दोनों मराठों के हाथों में थे । रघुनाथ
राव की मराठा सेना राजधानी से आगे बढ़ कर लाहौर विजय कर
चुकी थी और पराजित अफ़ग़ान सेना को अटक के पार भगा कर
पंजाब का सूबा मराठा साम्राज्य में शामिल कर चुकी थी ।
बालाजी बाजीराव पेशवा की मसनद पर था । शिवाजी के

छत्रपति शिवाजी
old painting in the Bibliotheque Nationale, Pari
"Rise of the Christian Power in India"

(This page is blank / contains no text.)

पहला मराठा युद्ध २६५
अयोग्य वंशज सतारा के क़िले के अन्दर पेशवा की सेना की
हिफ़ाज़त में अभी तक अपनी नाम मात्र की गद्दी क़ायम रक्खे हुए
थे। किन्तु सारा शासन प्रबन्ध पेशवा के योग्य और प्रबल हाथों में
था। पेशवा के अलावा मराठा साम्राज्य के चार मुख्य स्तम्भ यानी
'महाराष्ट्र मण्डल' के चार मुख्य सदस्य, सींधिया, होलकर, गाय-
कवाड़ और भोंसला थे। ये चारों चार बड़े बड़े राज्यों के स्वतंत्र
शासक थे, किन्तु सब पेशवा को अपना अधिराज मानते थे। उसे
बराबर ख़िराज देते थे और हर लड़ाई में आज्ञा मिलने पर अपनी
सेनाओं सहित पेशवा की सहायता के लिए हाज़िर हो जाते थे।
पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने दिल्ली सम्राट फ़र्रुख़सीयर के
दरबार में हाज़िर होकर प्रसिद्ध देशहितैषी भाइयों सय्यद अब्दुल्ला
और सय्यद हुसेनअली की मदद से सम्राट से मराठा राज के लिए
'स्वराज' का परवाना हासिल किया। सम्राट ने फ़रमान जारी कर
दिया कि इस मराठा 'स्वराज' के अलावा दक्खिन के सूबेदार के बाक़ी
तमाम इलाक़ों पर भी मराठों को 'चौथ' मिला करे। पेशवा ने सम्राट
की वफ़ादारी की क़सम खाई और अपनी सेना द्वारा साम्राज्य की
रक्षा करते रहने का वादा किया। वास्तव में यह 'चौथ' इसी उद्देश
से दी गई थी कि उससे पेशवा मुग़ल साम्राज्य के तमाम दक्खिनी
इलाक़े की हिफ़ाजत के लिए सेना रख सके। इसके बाद हर पेशवा
और उसके मातहत समस्त मराठा नरेश कम से कम नाम के लिए
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का सम्राट और अपना महाराजा-
धिराज मानते थे। रघुनाथ राव ने दिल्ली सम्राट ही के नाम पर

२६६ भारत में अंग्रेज़ी राज
अफ़ग़ानों से पंजाब विजय किया और जिस मराठा सरदार को
वहाँ की हुकूमत सौंपी उसे 'दिल्ली' सम्राट का एक सूबेदार कहकर
नियुक्त किया। फिर भी दिल्ली दरबार की निर्बलता के सबब
मराठों की उस समय की सत्ता वास्तव में स्वाधीन सत्ता थी। और
पेशवा ही हिन्दोस्तान के उत्तर से दक्खिन और पूरब से पश्चिम
तक यानी अटक से करनाटक और बंगाल की सरहद से खम्भात
की खाड़ी तक फैले हुए इस विशाल मराठा साम्राज्य का क्रियात्मक
सम्राट था।
किन्तु यह मराठा साम्राज्य चन्द रोज़ भी अपने पूरे वैभव को
क़ायम न रख सका। मालूम होता है कि साम्राज्य
मराठा साम्राज्य के साथ ही साथ मराठा सरदारों में एक दूसरे
की अवनति से ईर्षा और प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। वे श्रीहीन
किन्तु निरपराध और राष्ट्रोपयोगी दिल्ली सम्राट को भी तख़्त से
उतार कर उसकी जगह लेने के चक्कर में पड़ गए। उनमें से कुछ
अपने या अपने कुलों के लाभ के लिए अपने देशवासियों, यहाँ तक
कि स्वयं पेशवा के ख़िलाफ़ विदेशियों से मेल करने में भी न झिझके।
एक पिछले अध्याय में लिखा जा चुका है कि इस तरह के भीतरी
दोषों के कारण ही मराठों की सत्ता को पहला धक्का सन् १७६१ में
पहुँचा, जबकि पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में अहमदशाह
अब्दाली की सेना ने मराठों की संयुक्त सेना को हरा कर उन्हें उत्तरीय
भारत से सदा के लिए निकाल बाहर किया। उसी समय
से दिल्ली के सम्राट पर से मराठों का प्रभाव उठ गया और उस

पहला मराठा युद्ध २६७
समय से ही धीरे धीरे गायकवाड़, भोंसला, होलकर और
सींधिया एक एक कर पेशवा की अधीनता से अपने तईं स्वाधीन
समझने लगे ।
पानीपत के कुछ सप्ताह बाद बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई।
बालाजी का नाबालिग बेटा माधोराव पेशवा की मसनद पर बैठा
और माधोराव का चाचा रघुनाथ राव, जिसे इतिहास में अधिकतर
राघोबा कहा जाता है और जिनकी सेना ने अफ़ग़ानों से पंजाब
विजय किया था, अपने भतीजे पेशवा का संरक्षक नियुक्त हुआ।
राघोबा अत्यन्त वीर, किन्तु अदूरदर्शी था। वह महत्वाकांक्षी भी
था और महत्वाकांक्षा ने उसकी नीतिज्ञता पर और भी परदा डाल
दिया था। इसीलिए जब अंगरेज़ों ने अपने मतलब के लिए मराठों
की सत्ता को नष्ट करने का विचार किया, तो राघोबा आसानी से
उनके हाथों में खेल गया।
कम्पनी की सत्ता उन दिनों भारत में बढ़ती जा रही थी।
[हाशिया: दक्खिन में कम्पनी] मराठों जैसी प्रबल भारतीय शक्ति के अस्तित्व को
[हाशिया: की नीति] अंगरेज़ अपनी उन्नति के लिए हितकर न समझ
सकते थे। एक न एक दिन इन दोनों शक्तियों का
एक दूसरे से टकरा जाना अनिवार्य था।
प्रसिद्ध इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ लिखता है कि उस
समय—
“कम्पनी के डाइरेक्टर इस बात के लिए इच्छुक थे कि मराठों की बढ़ती
हुई सत्ता को किसी तरह धक्का पहुँचे, और यदि देश की दूसरी शक्तियाँ

२६८ भारत में अंगरेज़ी राज
मिलकर मराठों पर हमला करतीं तो यह देखकर उन्हें बहुत बड़ा सन्तोष
होता।"*
इसी इच्छा को पूरा करने के लिए अंगरेज़ों ने राघोबा को
बहकाना शुरू किया कि दक्खिन का सूबेदार निज़ामुलमुल्क मराठों
पर हमला करने वाला है।
राघोबा की अदूरदर्शिता से पेशवा माधोराव और बम्बई के
अंगरेज़ गवरनर इन दोनों के बीच यह सन्धि हो गई कि यदि
निज़ाम मराठों पर हमला करे, तो अंगरेज़ सेना और सामान से
मराठों की मदद करेंगे और इस मदद के बदले में पच्छिमी तट पर
साष्टी (Salsette) का टापू और बसईं (Bassein) का क़िला
दोनों पेशवा की ओर से अंगरेज़ों को दे दिए जावेंगे।
न निज़ाम ने मराठों पर हमला किया, न मराठों को अंगरेज़ों
की मदद की ज़रूरत हुई, और न साष्टी और बसईं उस समय
अंगरेज़ों के हवाले किए गए, फिर भी इस सन्धि के समय से ही
अंगरेज़ों की पेशवा दरबार के अन्दर पहुँच हो गई। उन्हें मराठों की
भीतरी कमज़ोरियों का पता लगने लगा और मराठा साम्राज्य के
अन्दर अपनी साज़िशों के फैलाने का मौक़ा मिलने लगा।
दक्खिनी भारत के सम्बन्ध में इस समय कम्पनी की नीति के
तीन मुख्य पहलू थे, दूसरे शब्दों में उनकी तीन मुख्य इच्छाएँ थीं,

  • "The Court of Directors, were desirous of seeing the Marhattas
    checked in their progress, and would have beheld combinations of the other
    native powers against them with abundant satisfaction."--History of the
    Marhattas, by Grant Duff.

पहला मराठा युद्ध २६६
जो डाइरेक्टरों और गवरनर जनरल के पत्रों से बिलकुल
साफ़ हैं—
(१) अंग्रेज़ जानते थे कि यदि दक्खिन की तीन मुख्य
शक्तियाँ निज़ाम, हैदरअली और पेशवा आपस में मिल गईं तो
दक्खिनी भारत से अंग्रेज़ों के अस्तित्व को आसानी से मिटा देंगी,
इसलिए जिस तरह हो इन तीनों को एक दूसरे से लड़ाए रखना
ज़रुरी था।
(२) इनमें मराठे सब से अधिक महत्वाकांक्षी और साम्राज्य-
प्रेमी थे। इसलिए उन्हें घरेलू झगड़ों में इस तरह फँसाए रखना
ज़रूरी था कि जिससे बंगाल और उत्तरीय भारत के अन्दर
अंग्रेज़ों के बढ़ते हुए प्रभाव में हस्तक्षेप करने का उन्हें अवकाश न
मिल सके।
(३) भारत के पच्छिमी तट पर आहिस्ता आहिस्ता अपने
पैर फैलाने के लिए साष्टी का टापू, बसईं का इलाक़ा और कुछ
थोड़ा सा गुजरात प्रान्त का भाग कम्पनी को अपने अधीन कर
लेना ज़रूरी था।
कम्पनी के डाइरेक्टरों ने बम्बई के गवरनर और वहाँ की
कौंसिल के नाम १८ मार्च सन् १७६८ के एक
[हाशिया: साष्टी और बसईं] पत्र में लिखा कि—"हम आप से जितने ज़ोर
[हाशिया: पर अंग्रेज़ों] के साथ हो सकता है उतने ज़ोर के साथ
[हाशिया: के दांत] सिफ़ारिश करते हैं कि आपको जब जब मौक़ा
मिल सके, आप इन स्थानों (साष्टी और बसईं) को प्राप्त करने के

२७० भारत में अंगरेज़ी राज
यत्न करते रहें। इसमें हम अपना बहुत बड़ा लाभ समझते हैं।'*
इसके बाद ३१ मार्च सन् १७६६ के डाइरेक्टरों के पत्र में फिर यह
वाक्य आता है—"साष्टी और बसई और उनके साथ के इलाक़े,
सूरत प्रान्त का मराठा भाग × × × ये चीज़ें हैं, जिन्हें आपको
अपनी तमाम सन्धियों में, पत्र व्यवहार में और लड़ाइयों में अपनी
नज़र के सामने रखना चाहिए, जिन्हें प्राप करने के लिए हमेशा
मौक़े की ताक में रहना चाहिए।"†
इतिहास लेखक मिल लिखता है कि—"इसी मनोरथ को
अधिक लगन के साथ सिद्ध करने और पेशवा माधोराव से बातचीत
करने के लिए डाइरेक्टरों ने हिदायतें देकर मिस्टर मॉस्टिन को
भारत भेजा।"‡
सन् १७७२ में डाइरेक्टरों का विशेष दूत मॉस्टिन भारत पहुँचा

  • "We recommend to you, in the strongest manner, to use your
    endeavours, upon every occasion that may offer, to obtain these places,
    which we should esteem a valuable acquisition."—Directors' letter to the
    President and Council of Bombay, dated 18th March, 1768.
    † "Salsette and Bassein, with their dependencies, and the Marhatta's
    portion of the Surat Provinces . . . . These are the objects you are to
    have in view, in all treaties, negotiations, and military operations,--and that
    you must be ever watchful, to obtain." -Directors' letter, dated 31st March,

‡ "In more earnest prosecution of the same design, Mr. Mostyn arrived
from England, in 1772, with instructions from the Court of Directors, that
he should be sent immediately to negotiate with Madho Rao the Peshwa
. . . . for the cession of the island and peninsula of Salsette and Bassein.
. . . ."-Mill, vol. iii, pp. 423, 24.

पहला मराठा युद्ध २७१
और तुरन्त उसे बम्बई की कौन्सिल का वक़ील बनाकर पेशवा के
दरबार में भेज दिया गया ।
मराठों, हैदर और इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ स्पष्ट शब्दों में
निज़ाम में फूट लिखता है—"बम्बई की गवरमेण्ट ने मि०
डालने के प्रयत्न मॉस्टिन को इस उद्देश से पूना भेजा कि वह
× × × मराठों को घर ही घर में एक दूसरे से लड़ा कर या जिस
तरीक़े से हो सके इस बात की कोशिश करे कि मराठे हैदर के
साथ या निज़ाम के साथ मिलने न पावें ।"*
गंगा के उत्तर में कुछ इलाक़ों पर उस समय तक मराठों का
क़ब्ज़ा हो चुका था और मिल के इतिहास से पता चलता है कि
सन् १७७३ में यदि आपसी घरेलू झगड़े मराठों को बाहर जाने से
न रोकते, तो वे इलाहाबाद, कड़ा, अवध और रुहेलखण्ड पर हमला
करने वाले थे ।†
इस तरह कम्पनी की उस समय की नीति के तीनों पहलू महत्व
पूर्ण और साफ़ थे ।
मॉस्टिन ने पूना पहुँच कर बड़ी होशियारी के साथ अपना
काम शुरू किया । स्वार्थान्ध राघोबा से उसे इस
नाना फडनवीस काम में पूरी मदद मिली । किन्तु पेशवा दरबार
की दूरदर्शिता में उस समय एक और दूरदर्शी नीतिज्ञ मौजूद था,

  • "Mr. Mostyn was sent to Poona by the Bombay Government, for the
    purpose of . . . using every endeavour, by fomenting domestic dissen-
    sions or otherwise, to prevent the Marhattas from joining Hyder or Nizam
    Ally."—Grant Duff's History of the Marhattas, p. 340.
    † Mill's History of British India, p. 221.

२७२ भारत में अंगरेज़ी राज
जो राघोबा की स्वार्थपरता और अंगरेज़ों की चालों दोनों को ख़ूब
समझता था। यह नीतिज्ञ सुप्रसिद्ध नाना फड़नवीस था। सन् १८५०
में नाना की मृत्यु के बरसों बाद उसकी योग्यता को स्वीकार करते
हुए जे० सलीवन नामक अंगरेज़ ने कर्नल ब्रिग्स के नाम एक पत्र
में लिखा कि—"नाना फड़नवीस और उस जैसे आदमी हमें
दीजिये। उस योग्यता के भारतवासियों के मुक़ाबले में भारत के
शासकों की हैसियत से हम अत्यन्त तुच्छ और बौने मालूम
होते हैं!!!"*
इतिहास लेखक टॉरेन्स अंगरेज़ों की ओर नाना फड़नवीस
की नीति के विषय में लिखता है :—
[पार्श्व-शीर्षक: नाना फड़नवीस और अंगरेज़] "नाना फड़नवीस अंगरेज़ों के प्रति आदर प्रकट
करता था, उनकी तारीफ़ करता था, किन्तु उनके राज-
नैतिक आलिङ्गन से पीछे हटता था और चाहे कोई कैसी भी आपत्ति क्यों न
सामने खड़ी हो, वह अंगरेज़ों से स्थायी सैनिक सहायता स्वीकार करने से
सदा इनकार करता रहा।"†
नाना की यह नीति ही उस समय के भारतीय शासकों के लिए
एक मात्र कुशल नीति हो सकती थी। इसीलिए राघोबा और
अंगरेज़ों के बीच जो सन्धि हो चुकी थी, नाना फड़नवीस उसके
ख़िलाफ़ था। पेशवा माधोराव भी नाना के प्रभाव में था। ऐसी

  • "Give us Nana Fadnavis and such like. What poor pigmies we are
    as Indian Administrators when compared with natives of that stamp!!!"—
    J. Sullivan's letter to colonel Briggs 1850.
    † Torrens' Empire in Asia, p. 221.