भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 521, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंवारन हेस्टिंग्स २५६
लिखा है कि—"हैनेवे ने कोई लगान नियत न कर रक्खा था, बल्कि
जिस समय जिस ज़मींदार या रय्यत से जितना चाहता था, अपने
कलक्टरों द्वारा वसूल कर लेता था । इलाक़े भर के अन्दर जो लोग
अदा करने में असमर्थ होते थे उन्हें आम तौर पर क़ैद और कोड़ों
की सज़ा दी जाती थी। लोग अपने घर बार और गाँव छोड़ छोड़
कर निकल गए । बहुतों को इतना दिक़ किया गया कि उन्हें अपने
बच्चे तक बेच देने पड़े।"*
मिल लिखता है कि कम्पनी का एक मुलाज़िम कप्तान एडवर्ड्स
सन् १७८० में इस इलाक़े को देखने के लिए गया । उसने देखा कि
देश के बहुत कम हिस्से में खेती की गई थी, आबादी बहुत कम
रह गई थी और जो इने गिने आदमी उस इलाक़े में रह गए थे वे
अत्यन्त दुखी दिखाई देते थे। मिल यह भी लिखता है कि जिस
समय कर्नल हैनेवे ने नवाब के यहाँ जाकर नौकरी की, उस समय
हैनेवे के ज़िम्मे क़र्ज़ा था, किन्तु तीन साल के अन्दर क़र्ज़ा
अदा करने के बाद उसके पास क़रीब ४५,००,००० रुपए नक़द
मौजूद थे।
नवाब ने इन अत्याचारों की ख़बर सुनकर सन् १७८१ में
- ". . . . . the country, from a very flourishing state . . . had
been reduced to misery and desolation; that taxes were levied, not according
to any fixed rule, but according to the pleasure of the Collector; that
imprisonments and scourgings, for enforcing payment, were common in
every part of the country; that emigrations of the people were frequent;
and that many of them were so distressed as to be under the necessity of
selling their children."—Mill, Book v, Chapter 8.