भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
सुनाई हुई । राजा नन्दकुमार ने अपने बयान में लिखा है कि इन
दोनों से कई कई लाख रुपए रिश्वत लेकर अन्त में वारन हेस्टिंग्स
ने दोनों को निर्दोष कह कर छोड़ दिया, किन्तु उन दोनों का काफ़ी
अपमान किया जा चुका था। उनके अधिकार छीन कर कम्पनी
को दे दिए गए । मुर्शिदाबाद के नवाब के सालाना ख़र्च की रक़म
को वारन हेस्टिंग्स ने और अधिक कम कर दिया और दीवानी तथा
फ़ौजदारी दोनों की सदर अदालतों को मुर्शिदाबाद से कलकत्ते हटा
लिया। इस प्रकार दो-अमली का भी अब अन्त हो चला और तीनों
प्रान्तों के ऊपर कम्पनी की राज्य-सत्ता और साफ़ साफ़ चमकने
लगी । मुक़दमा समाप्त होने के बाद नन्दकुमार को मालूम हुआ
कि मुझे बंगाल की नायबी का झूठा लालच केवल काम निकालने
के लिए ही दिया गया था ।
अभी तक क्लाइव के समय की सन्धि के अनुसार कम्पनी
सम्राट् शाहआलम को २६ लाख रुपए वार्षिक ख़िराज भेजती थी ।
सन् १७७१ में सम्राट् शाहआलम इलाहाबाद से दिल्ली चला गया ।
वारन हेस्टिंग्स ने गवरनर नियुक्त होते ही सम्राट् को ख़िराज भेजना
बन्द कर दिया । इलाहाबाद और कड़ा का इलाक़ा क्लाइव ने शुजा-
उद्दौला से सम्राट् के लिए कह कर लिया था । अब हेस्टिंग्स ने यह
इलाक़ा पचास लाख रुपए के बदले में फिर शुजाउद्दौला के हाथ
बेच दिया । किन्तु इलाहाबाद के क़िले में सेना बराबर कम्पनी ही
की रहती रही ।
वारन हेस्टिंग्स के इन समस्त कार्यों को "सुधार" का नाम
१६
२४२ भारत में अंगरेज़ी राज
दिया जाता है। इनका उद्देश था बंगाल के राज शासन से धीरे
धीरे भारतीय अंश को मिटा देना।
कम्पनी के डायरेक्टर अब वारन हेस्टिंग्स पर बार बार ज़ोर दे
[निरपराध रुहेलों] रहे थे कि जिस तरह हो सके अधिक से अधिक
[का संहार] धन भारत से वसूल करके इंगलिस्तान भेजा जावे।
वारन हेस्टिंग्स ने भी, लार्ड मैकॉले के शब्दों में
—"चाहे ईमानदारी से हो और चाहे बेईमानी से, जिस तरह हो
सके, धन बटोरने का निश्चय कर लिया।"* देश की स्थिति का
उसे पूरा ज्ञान था और सूझ की भी उसमें कमी न थी।
सब से पहले वारन हेस्टिंग्स की नज़र रुहेलखण्ड की ओर
गई। अवध की उत्तर-पश्चिम सरहद पर रुहेले पठानों का स्वतन्त्र
राज था। इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
"एशिया भर में जिन देशों का शासन सबसे अच्छा था, उनमें से एक
रुहेलखण्ड का इलाक़ा था। वहाँ की प्रजा सुरक्षित थी, उनके उद्योग धन्धों
को राज की ओर से सहायता दी जाती थी और देश में बराबर खुशहाली
बढ़ती जाती थी। इन उपायों द्वारा और अपने पड़ोसियों का देश विजय
करने के स्थान पर यत्नपूर्वक सबके साथ मेल जोल बनाए रख कर उन
लोगों ने अपनी स्वाधीनता को क़ायम रक्खा था।"†
- "The object of Mr. Hastings' diplomacy was at this time simply to
get money . . . by some means, fair or foul."—Critical and Historical
Essays by Lord Macaulay, vol. iii, p. 244.
† "Their territory was one of the best governed in Asia; the people
were protected, their industry encouraged, and the country flourished steadily.
वारन हेस्टिंग्स २४३
अवध के नवाब के साथ रुहेलों की सन्धि हो चुकी थी, जिसका
ये लोग सदा ईमानदारी के साथ पालन करते थे। अंगरेज़ों के
साथ रुहेलों का कोई किसी तरह का झगड़ा न था और न "झगड़े
का कोई छोटे से छोटा बहाना ही अंगरेज़ों को मिल सकता था।"*
फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने सन् १७७३ ई० में रुहेलों के विरुद्ध
नवाब शुजाउद्दौला के साथ एक गुप्त सन्धि कर डाली। इस सन्धि
में यह तय हो गया कि कोई मुनासिब बहाना मिलते ही कम्पनी
और नवाब की सेनाएँ मिलकर रुहेलखंड पर चढ़ाई करेंगी। रुहेला
जाति को "निर्मूल" † कर उनका देश शुजाउद्दौला के हवाले कर
दिया जावेगा। और इस उपकार के बदले में शुजाउद्दौला चालीस
लाख रुपए नक़द और युद्ध का सारा ख़र्च कम्पनी को अदा करेगा।
मिल के इतिहास से मालूम होता है कि शुजाउद्दौला ने अपनी इच्छा
के विरुद्ध विवश होकर इस सन्धि को स्वीकार किया। इतिहास
लेखक टॉरेन्स लिखता है कि—"१७ अप्रैल सन् १७७४ को इस
ज़बरदस्त अन्याय में एक दूसरे को मदद देने वाली दोनों सेनाओं
ने रुहेलखंड में प्रवेश किया। रुहेले वीर थे, किन्तु उनकी संख्या
बहुत कम थी। उन्होंने रहम की प्रार्थना की, किन्तु व्यर्थ।" मजबूर
होकर उन्होंने वीरता के साथ मुक़ाबला किया, किन्तु क्या हो
By these cares, and by cultivating diligently the arts of neutrality, and not
by conquering from their neigbours, they provided for their independence."—
Mill's History of India, Book v. Chap. i.
- "We had not the slightest pretence of quarrel with the Rohillas." -
Torrens' Empire in Asia, p. 111.
† "The Rohillas should be exterminated." — Warren Hastings' letters.
२४४ भारत में अंगरेज़ी राज
सकता था। अन्त में २३ अप्रैल को रामपुर की मशहूर लड़ाई में
उनकी क़िस्मत का फ़ैसला हो गया। उनका नेता नवाब फ़ैजुल्ला
ख़ाँ पहाड़ों की ओर भाग गया। "एक एक आदमी जो रुहेला
कहलाता था या तो अपना देश छोड़कर भाग गया या चुन चुन
कर मार डाला गया।"* सारा हरा भरा देश लूट खसोट कर
उजाड़ कर दिया गया। रुहेलखंड की लूट से चालीस लाख रुपए
नक़द कम्पनी को मिले और दो लाख नक़द वारन हेस्टिंग्स की
जेब में गए।
रामपुर और उसके आस पास का थोड़ा सा इलाक़ा बतौर
जागीर नवाब फ़ैजुल्ला ख़ाँ को वापस दे दिया गया। रुहेलखंड का
बाक़ी इलाक़ा शुजाउद्दौला को मिल गया। किन्तु वीर रुहेला जाति
और उसकी स्वाधीनता का सदा के लिए अन्त हो गया।
इससे पहले वारन हेस्टिंग्स केवल फ़ोर्ट विलियम क़िले और
बंगाल के इलाक़ों का गवर्नर कहलाता था।
वारन हेस्टिंग्स को मद्रास और बम्बई, दोनों प्रान्तों के अंगरेज़ी
इनाम इलाक़ों का प्रबन्ध दो अलग गवर्नरों के सुपुर्द
था, जिनकी दो अलग अलग कौन्सिलें थीं। रुहेला युद्ध के अगले
साल मद्रास और बम्बई के गवर्नर और उनकी कौन्सिलें बंगाल
* "On the 17th April the allies in iniquity entered Rohilkhund. In
vain the brave but out-numbered people sued for mercy . . . Seldom,
if ever, have what are calculated the rights of victory been more inhumanly
abused. Every man who bore the name of Rohilla was either put to death
or forced to seek safety in exile."—Torrens' Empire in Asia, p. 110.
वारन हेस्टिंग्स २४५
के गवरनर के अधीन कर दी गई और वारन हेस्टिंग्स कम्पनी के
समूचे भारतीय राज का पहला 'गवरनर-जनरल' नियुक्त हुआ ।
ऊपर लिखा जा चुका है कि मोहम्मद रज़ा ख़ाँ के विरुद्ध काम
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स पर इलज़ाम] निकालने के लिए वारन हेस्टिंग्स ने महाराजा
नन्दकुमार से बंगाल की नायबी का झूठा वादा
कर दिया था। किन्तु नन्दकुमार भी एक अर्से
से अंगरेज़ों की आँखों में खटक रहा था। उस झगड़े के बाद
नन्दकुमार ने एक लम्बी अर्ज़ी लिखकर कलकत्ते की कौन्सिल के
सामने पेश की, जिसमें उसने वारन हेस्टिंग्स पर बंगाल के रईसों
और ज़मींदारों से रिश्वतें लेने, ज़बरदस्ती धन वसूल करने, यहाँ
तक कि मुर्शिदाबाद के नवाब की माँ मुन्नी बेगम से रक़में वसूल
करने, लोगों को धोखा देने इत्यादि के अनेक इलज़ाम लगाए।
नन्दकुमार की अर्ज़ी में ठीक ठीक रक़में और पूरे नाम और पते
मौजूद थे। उसने शहादतें पेश करके अपने तमाम दावों को सच्चा
साबित कर दिया।
कौन्सिल के मेम्बरों ने नन्दकुमार के इलज़ामों को सच्चा
[हाशिया: महाराजा नन्दकुमार को फाँसी] स्वीकार किया।* किन्तु हेस्टिंग्स को कोई दंड
न मिल सका। उसने इस बात से ही इनकार
किया कि कौन्सिल को गवरनर के विरुद्ध
शिकायत सुनने का अधिकार है। हेस्टिंग्स ने नन्दकुमार के इलज़ामों
का जवाब देने के बजाय उलटा नन्दकुमार पर अब यह जुर्म लगाया
- Minute of Council, 11th April, 1775.
२४६ भारत में अंग्रेज़ी राज
कि पाँच साल पहले यानी सन् १७७० ई० में नन्दकुमार ने किसी
काग़ज़ पर जाली दस्तख़त किए थे। सन् १७७३ ई० में कम्पनी की
ओर से कलकत्ते में एक नई अदालत 'सुप्रीम कोर्ट' के नाम से
क़ायम हुई थी। वारन हेस्टिंग्स का एक लड़कपन का दोस्त सर
एलाइजाह इम्पे उसका चीफ़ जस्टिस था। सर एलाइजाह इम्पे के
सामने महाराजा नन्दकुमार पर जालसाज़ी का मुक़दमा चलाया
गया। मिल की पुस्तक और उस समय के अन्य इतिहासों से
साफ़ ज़ाहिर है कि नन्दकुमार पर जालसाज़ी का इलज़ाम बिलकुल
झूठा था। फिर भी कई झूठे गवाह खड़े कर दिए गए। दूसरे पक्ष
की सफ़ाई के सबूत की ख़ाक परवा नहीं की गई। भारत में उस
समय देशी या अंग्रेज़ी कोई क़ानून भी इस तरह का न था जिससे
जालसाज़ी के जुर्म में मौत की सज़ा दी जा सके। किन्तु हेस्टिंग्स
के दोस्त सर एलाइजाह इम्पे ने फ़ौरन महाराजा नन्दकुमार को
मुजरिम क़रार देकर हज़ारों भारतवासियों की आँखों के सामने
५ अगस्त सन् १७७६ को कलकत्ते में फाँसी पर चढ़वा दिया।
मिल लिखता है कि महाराजा नन्दकुमार ने अपूर्व शान्ति और धैर्य
के साथ मौत का सामना किया और अपने हज़ारों देशवासियों
को फाँसी के चारों ओर ज़ार ज़ार रोता और चीख़ता छोड़कर
इस दुनिया से कूच किया।
जालसाज़ी ही के ऊपर क्लाइव ने भारत के अन्दर ब्रिटिश राज
की नींव रक्खी। और खुले शब्दों में उसने अपनी इस जालसाज़ी
को स्वीकार किया। किन्तु उस जालसाज़ी के इनाम में क्लाइव को
वारन हेस्टिंग्स २४७
“लॉर्ड” की उपाधि दी गई। उसी क्लाइव के उत्तराधिकारी के समय
में एक स्वतन्त्र भारतीय शासक को जालसाज़ी के झूठे इलज़ाम में
फाँसी पर लटका दिया गया !
वारन हेस्टिंग्स ३ साल गवरनर और १० साल गवरनर जनरल
रहा। उसका सारा शासन काल भारतीय प्रजा और भारतीय
नरेशों के साथ घोरतम अन्यायों से भरा हुआ था। मराठों और
हैदरअली के साथ उसकी लड़ाइयों का ज़िक्र दूसरे अध्यायों में
किया जायगा। बंगाल और उत्तरीय भारत के उसके समस्त
अत्याचारों को बयान कर सकना भी इस पुस्तक में असम्भव है।
इसलिए उसके उत्तरीय भारत के केवल दो और ज्वलन्त कृत्यों को
यहाँ पर संक्षेप में बयान किया जाता है।
इनमें पहली घटना बनारस की है। बनारस की समृद्ध रियासत
बनारस की समृद्ध उस समय अवध के नवाब के अधीन थी, किन्तु
रियासत अवध के नवाब बनारस के महाराजा से अपना
मामूली वार्षिक ख़िराज वसूल कर लेने के अलावा
और किसी तरह का हस्तक्षेप उस रियासत के आंतरिक शासन में
न करते थे।
इतिहास लेखक टॉरेन्स लिखता है—“बनारस का महाराजा
बलवन्तसिंह बड़ा अच्छा शासक था। × × × उसकी प्रजा सुखी
थी और देश ख़ुशहाल था। × × × किसानों को न बेजा माँग का
डर रहता था और न किसी तरह की ज़बरदस्ती का। वे अपने
खेतों को बाग़ों की तरह जोतते थे और अपने अथक परिश्रम की
२४८ भारत में अंग्रेज़ी राज
पैदावार पर फूलते फलते थे। उनकी संख्या पाँच लाख से ऊपर
अनुमान की जाती थी।"*
किन्तु महाराजा बनारस आस पास के राजाओं में सब से
अधिक धनवान मशहूर था।
सन् १७७६ में अवध के नवाब ने बनारस का इलाक़ा कम्पनी
के नाम कर दिया। कम्पनी ने अपनी ओर से एक नई सनद जारी
करके बलवन्तसिंह के पुत्र चेतसिंह को पिता के तमाम अधिकार दे
दिए। एक अंग्रेज़ रेज़ीडेन्ट बनारस के दरबार में रहने लगा
और महाराजा चेतसिंह की शुमार अंग्रेज़ कम्पनी के मित्रों में
होने लगी।
अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों में लड़ाई छिड़ी। वारन हेस्टिंग्स ने
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की] महाराजा चेतसिंह को पाँच लाख रुपए सालाना
[हाशिया: महाराजा बनारस] खर्च पर अपने यहाँ तीन पलटनें रखने का हुकुम
[हाशिया: से छेड़ छाड़] दिया। चेतसिंह की प्रजा उससे सन्तुष्ट थी।
उसे इस सेना की कोई ज़रूरत न थी। पाँच
लाख सालाना का ख़र्च भी उसके लिए बहुत अधिक था। उसने
एतराज़ किया, किन्तु कोई सुनाई न हुई। अन्त में उसे वारन
हेस्टिंग्स की आज्ञा माननी पड़ी। तारीफ़ यह कि इन पलटनों के
- "Bulwant Singh was an excellent ruler; . . . his people were
happy, and the country prosperous, . . . the peasantry fearless of unjust
exaction or personal wrong, cultivated their fields like gardens, and throve
on the fruits of their unwearied industry. Their numbers were estimated at
more than half a million, . . ."—Torrens' Empire in Asia, p. 124.
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काशी नरेश राजा चेतसिंह
[ By the courtesy of the curator, Victoria Memorial, Calcutta. ]
वारन हेस्टिंग्स २४६
अफ़सरों का अंगरेज़ होना और कम्पनी का उन पर अधिकार
रहना ज़रूरी था।
दो साल बाद महाराजा चेतसिंह को हुकुम मिला कि इसी
प्रकार एक पलटन सवारों की भी अपने यहाँ रक्खो। इस बार
उसने इनकार कर दिया। वारन हेस्टिंग्स केवल बहाना ढूंढ रहा
था। उसने फ़ौरन सेना सहित बनारस पर चढ़ाई की। चेतसिंह
ने आगे बढ़ कर बक्सर में वारन हेस्टिंग्स से भेंट की और
अपनी अधीनता प्रकट करने के लिए अपनी पगड़ी उतार कर
वारन हेस्टिंग्स के पैरों पर रख दी। फिर भी वारन हेस्टिंग्स
न रुका। उसने सीधे बनारस पहुँच कर चेतसिंह के महल को
घेर लिया और रेजिडेन्ट को आज्ञा दी कि चेतसिंह को क़ैद कर
लिया जावे।
बनारस की प्रजा इस अंधेर को देख कर भड़क उठी। वहाँ के
लोगों में अभी जान बाक़ी थी। वे कम्पनी की सेना पर टूट पड़े।
तुरन्त तमाम अंगरेज़ सिपाही एक एक कर क़त्ल कर डाले गए।
बदला लेने के लिए अब और अधिक सेना भेजी गई। ख़ूब घमासान
युद्ध हुआ।
रात को चेतसिंह के कुछ नौकरों ने जब यह देखा कि बनारस
का क़िला शत्रु के हाथों में पड़ने वाला है तो अपनी पगड़ियों की
रस्सी बना कर उसके ज़रिए महाराजा चेतसिंह को महल की एक
खिड़की से नीचे उतार दिया। गंगा के उस पार रामनगर के क़िले
में चेतसिंह का मुख्य ख़ज़ाना था। चेतसिंह अपनी माता और
२५० भारत में अंगरेज़ी राज
रानी समेत भाग कर वहाँ पहुँचा। अन्त में रामनगर का क़िला
भी जीत लिया गया और चेतसिंह ने एक गृहविहीन बटोही
की तरह वहाँ से भागकर ग्वालियर की रियासत में अपने शेष
दिन बिताए।
हेस्टिंग्स ने फ़ौरन उसकी जगह उसी कुल के एक १६ साल के
लड़के को बनारस की गद्दी पर बैठा दिया।
[बनारस की लूट] कम्पनी का ख़िराज बढ़ा कर बीस लाख रुपए
[और बरबादी] सालाना कर दिया गया। नए महाराजा के
अनेक अधिकार छीन कर रेजिडेण्ट को दे दिए गए। शासन प्रणाली
और राज कर्मचारियों में अनेक उलट फेर हुए। प्रजा पर अब नित्य
नए अत्याचार होने लगे। दुखित और बे सरदार की प्रजा ने नए
अमलदारों और उनके अत्याचारों के विरुद्ध बार बार विद्रोह किया
और सत्याग्रह किए, किन्तु अन्त को 'जिसकी लाठी उसकी भैंस।'
लूट खसोट और नई अमलदारी का नतीजा यह हुआ कि "थोड़े
दिन पहले जहाँ सुख और शान्ति विराजमान थी वहाँ अब दुख
और असन्तोष ने उसकी जगह ले ली।" दो साल बाद जब वारन
हेस्टिंग्स फिर बनारस गया तो उसे तमाम नगर उजड़ा हुआ
दिखाई दिया।* आबादी घटते घटते सन् १८२२ में केवल दो लाख
रह गई।
- "Misery and distraction took the place which had recently been
occupied by comfort and content . . . two years later, when Hastings
revisited the scene . . . he found it one of desolation."—Torrens'
Empire in Asia. p. 125.
वारन हेस्टिंग्स २५१
किन्तु इंगलिस्तान से धन की माँग बढ़ती गई। वारन हेस्टिंग्स
की व्यक्तिगत धन पिपासा भी बनारस की लूट
अवध की बेगमों से शान्त न हो सकी। बनारस से लौटते ही उसने
पर अत्याचार अवध की ओर दृष्टि डाली। बनारस का हाल
हमने इंगलिस्तान की पार्लिमेट के मेम्बर, इतिहास लेखक टॉरेन्स
की पुस्तक “इम्पायर इन एशिया” से लिया है। अवध की कहीं
अधिक दुखमय कहानी भी ठीक टॉरेन्स ही के शब्दों में नीचे बयान
की जाती है। अनेक बार ही कम्पनी की ओर से बड़ी बड़ी रक़में
बिना किसी कारण अवध के नवाब से माँगी जा चुकी थीं और
जबरन् वसूल की जा चुकी थीं, किन्तु इस बार—
“नवाब आसफ़ुद्दौला ने अपनी निर्धनता की बिना पर माफ़ी चाही और
इस निर्धनता का एक कारण यह बताया कि मुझे अपने यहाँ की 'सब्सिडीयरी'
सेना के खर्च के लिए एक बड़ी रक़म हर साल कम्पनी को देनी पड़ती है।
निस्सन्देह यह कारण सच्चा था। इसके बाद इस डर से कि कहीं (बनारस
की तरह) गवर्नर जनरल लखनऊ न आ धमके, आसफ़ुद्दौला स्वयं
हेस्टिंग्स से मिलने और अपनी स्थिति समझाने के लिए आगे बढ़ा। चुनार
के क़िले के अन्दर दोनों में बातचीत हुई। वहाँ एक ऐसी याद रखने योग्य
तदबीर निकाली गई, जिससे कलकत्ते का ख़ज़ाना भर जावे और लखनऊ
का ख़ज़ाना ख़ाली भी न करना पड़े। लॉर्ड मैकॉले ने लिखा है—'तदबीर
केवल यह थी कि गवर्नर जनरल और नवाब वज़ीर दोनों मिलकर एक तीसरे
शख़्स को लूटें, और जिस तीसरे शख़्स को लूटने का उन्होंने निश्चय किया,
वह इन दोनों लूटने वालों में से एक की माँ थी।' समझा जाता था कि
२५२ भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब शुजाउद्दौला मरते समय अपनी माँ और अपनी विधवा बेगम दोनों
को बड़े बड़े ख़ज़ाने दे गया है। फ़ैज़ाबाद के महल भी वह उन्हीं के नाम
कर गया था, और ये दोनों बेगमें अपने अनेक सम्बन्धियों, बाँदियों और
नौकरों के साथ अपने इन्हीं प्यारे महलों में रहती थीं। इस धूर्तता की राय
देने वाला माननीय गवरनर जनरल था । आसफ़ुद्दौला सुनकर शर्म से काँप
उठा । x x x अन्त को x x x सौदा पक्का हो गया और दोनों अलग
अलग अपनी अपनी ओर से इस दग़ाबाज़ी की ज़ाब्तापूरी में लग गए । तय
हुआ कि x x x फ़ैज़ाबाद में रहने वाली कुम्हलाई हुई औरतों के सर यह
इलज़ाम मढ़ा जावे कि तुम अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ चेतसिंह के साथ साज़िश
कर रही हो । यदि किसी तरह यह साज़िश साबित की जा सके तो फिर
बेगमों को हर तरह का दण्ड देना या उनके धन की ज़ब्ती जायज़ ठहराई जा
सकेगी; इसलिए साबित करना ज़रूरी था और साबित भी बाज़ाब्ता तरीक़े
से करना । जब लोगों को पता चला कि अंगरेज़ क्या चाहते हैं, तो झूठे
गवाह खड़े हो गए x x x बेगमों की तरफ़ से न कोई जवाबदेही करने वाला
था और न कोई वकालत करने वाला x x x । अब पेश्तर इसके कि बेगमों
के महल के फाटकों को तोड़कर अंगरेज़ी सेना भीतर घुस सके, केवल एक
कठिनाई और बाक़ी थी—लोकाचार और शिष्टता के एक रेशमी बन्धन को
तोड़ना ज़रूरी था। वह बन्धन यह था कि शुजाउद्दौला मरते समय अपने
इन सम्बन्धियों को अंगरेज़ सरकार की ख़ास संरक्षता में छोड़ गया था,
और गो कि अब स्थिति बदल चुकी थी, किन्तु उस समय अंगरेज़ सरकार
ने यह ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी । x x x सर एल्लाहजाह इम्पे पहले
भी कई ऐसी कठिनाइयों के मौक़े पर काम दे चुका था । इस संकट के समय
वारन हेस्टिंग्स २५३
वह फिर वारन हेस्टिंग्स का दोस्त साबित हुआ । x x x अपनी पालकी में
बैठकर ग़ैर ईसाई कहारों की डॉक लगवाकर उनके कन्धों पर सर एलाइज़ाह
इम्पे कलकत्ते से लखनऊ रवाना हुआ; x x x एक माननीय वाइसराय की
आज्ञा पर उस वाइसराय को डकैती में मदद देने के लिए ईसाई चीफ़ जस्टिस
को पूरी तेज़ी के साथ अपने कन्धों पर ले जाने में ग़ैर-ईसाई हिन्दुओं का
उपयोग किया गया । रूहानी अन्धकार में डूबी हुई जनता को यूरोपियन
व्यवहार और यूरोपियन सदाचार की श्रेष्ठता का इससे बढ़कर और क्या सबूत
मिल सकता था ? अवध की राजधानी में पहुँच कर चीफ़ जस्टिस ने बहुत से
हलफ़नामे लिए, जिनमें बेगमों पर यह इलज़ाम लगाया गया कि वे चेतसिंह
के न्याय्य मालिकों यानी कम्पनी के विरुद्ध उस फ़रज़ी साज़िश में चेतसिंह
से मिली हुई थीं । सर एलाइज़ाह ने न हलफ़नामे पढ़े, न किसी से पढ़वाकर
सुने । वे एक ऐसी ज़बान में थे जिसे इम्पे समझता तक न था और न उसके
पास इतना समय था कि किसी दूसरे से तरजुमा करवाने का इन्तज़ार
करता । एशिया के अन्दर इंगलिस्तान के प्रधान न्यायाधीश की हैसियत से
उसने हलफ़नामे लिए और 'अपने उच्च अधिकार के इस घृणित दुरुपयोग'
को पूरा कर फिर पालकी में बैठ कलकत्ते लौट आया । x x x फ़ैज़ाबाद के
महलों को अंगरेज़ी सेना ने घेर लिया । बेगमों से कहा गया कि आप क़ैदी
हैं और अपने तमाम ज़ेवर, सोना, चाँदी और जवाहरात दे दीजिए । जब
बेगमों ने इनकार किया तो महल की शरीफ़ औरतों को भूखों मारा गया और
उनके नौकरों को बड़ी बड़ी यातनाएँ दी गईं । बेगमें जब इन लोगों के रोने
चीख़ने की आवाज़ों को न सह सकीं तो उन्होंने पिटारों पर पिटारे और
ख़ज़ानों पर ख़ज़ाने देना शुरू किया, यहाँ तक कि कुल लूट की क़ीमत का
२५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अन्दाज़ा एक करोड़ बीस लाख किया गया। जब तक यह रक़म पूरी न हुई
तब तक उन अभागे नौकरों और बाँदियों को रिहा न किया गया। उस
भयंकर काण्ड का यह सब केवल एक ढाँचा है। जिन जिन बातों से इस चित्र
(ढाँचे) में सच्चे रंग भरे जा सकते हैं उन सब पर आज विस्मृति (काल)
ने परदा डाल दिया है, जो अब किसी तरह हटाया नहीं जा सकता।” ꕤ
- " Asafuddoula pleaded poverty, and named, with some truth.. that
amongst its causes was the annual contribution he was obliged to pay for
the maintenance of the subsidiary force. Dreading a visit from the Viceroy,
he went to meet him; and at the fortress of Chunar the negotiations took
place which resulted in the memorable device for replenishing the exchequer
of Calcutta without exhausting that of Lucknow. 'It was,' says Lord
Macaulay, 'simply this, that the Governor-General and the Nawab-Vizier
should join to rob a third party, and the third party whom they determined to
rob was the parent of one of the robbers.' The mother and the widow of the
late Vizier were supposed to have derived, under his will, vast treasures.
They dwelt with a numerous retinue at the favourite palace of Fyzabad, which
he had bequeathed to them. Asafuddoula shrank in shame from the villainy
suggested by his Right Honourable Accomplice. . . The confederates, having
ratified the bargain, parted, and each went his way to prepare the formalities
of fraud. A conspiracy to aid Chait Singh in his resistance to intolerable
exaction was to be imputed to the withered women who dwelt at Fyzabad.
If such a breach of friendship could be proved, it would justify any penalty
or forfeiture; therefore it must be proved and proved in a regular respectable
way. When it was known what was wanted, false witnesses rose up. . . .
against the undefended Princesses of Oudh, . . . no advocate . . . .
Still there was a difficulty: a silken cord of conventional decency had to
be snapped before the palace gates of the Begums could be forced open by
English troops. The dying Vizier had placed these members of his family
under the special protection of the British Government, and for reasons
apparently good at the time, but good no longer, that Government had
accepted the trust . . . . Not for the first time Sir Elijah Impey proved
वारन हेस्टिंग्स २५५
इसके बाद टोरेन्स बयान करता है कि किस प्रकार इन समस्त
अत्याचारों ने, अवध के नवाब पर कम्पनी की आए दिन की माँगों
ने, और वहाँ के राजशासन में अंगरेज़ों के नित्य हस्तक्षेप ने मिलकर
आसफुद्दौला को मिटा डाला, अवध निवासियों की हिम्मतों को
कुचल कर ख़ाक कर दिया और उत्तरीय भारत के उस हरे भरे
बाग़ को थोड़े ही दिनों में इधर से उधर तक वीरान कर डाला।
himself to be a friend in need. . . . Sir Elijah got into palanquin, and
posted to Lucknow, by relays of pagan bearers;--for were not pagans made
to bear Christian Chief Justice on their shoulders, when at full speed to aid
in the Commission of robbery at the command of a Right Honourable
Viceroy? What could more clearly prove to a soul-darkened population
the superiority of European manners and morals? Arrived in the capital
of Oudh, the Chief Justice took a number of affidavits which accused the
Begums of complicity with Chait Singh, in his supposed conspiracy against
his lawful masters, the Company. Sir Elijah did not read the affidavits, or
hear them read. They were in a dilect he did not understand, and he had
not time to wait for an interpreter. So he took them as Chief Magistrate
of England in the East; and this "scandalous prostitution of his high
authority" being completed, he got into his palanquin again, and returned to
Calcutta. . . . The farce concluded, tragic scenes began. The palace
of Fyzabad was surrounded by English troops. The princesses were told
that they were captives, and required to deliver up their gold and jewels.
On their refusal, their ladies were subjected to semi-starvation and their
servants to torture. Unable to endure their groans and tears, the Begums
gave up casket after casket, and store after store, until the sum of spoil was
reckoned at £s 12,00,000. Then, and not till then, their wretched menials
were let go. Such are the bare outlines of the dreadful tale. Over
all that could furnish forth the true coloring of the picture, the veil of
oblivion has fallen, and it can not now be raised. . . Asafuddoula
. . . lost influence and power. . . . the desolation that overspread
the country, . . ."--Torren's Empire in Asia, pp. 126-128.
२५६ भारत में अंगरेज़ी राज
उन दिनों कम्पनी के प्रायः सब अंगरेज़ मुलाज़िम कम्पनी
भारत से हेस्टिंग्स के लाभ के साथ साथ अपने व्यक्तिगत लाभ का
की कमाई भी ख़ासा ख़याल रखते थे। वारन हेस्टिंग्स को
भी अपनी हर राजनैतिक चाल में इस बात का
पूरा पूरा विचार रहता था। नज़रानौं और रिश्वतों का बाज़ार
चारों ओर गरम था। इतिहास लेखक जे० टालबॉयज़ व्हीलर
लिखता है :—
“हेस्टिंग्स ने क़बूल किया कि उसने सन् १७८२ में आसफ़ुद्दौला से
१० लाख रुपए लिए। इससे अनुमान होता है कि सन् १७७३ में उसने
इतनी ही रक़म शुजाउद्दौला से लेकर चुपके से जेब में डाल ली थी। जिन
कर्मचारियों को कुछ भी राजनैतिक तजरुबा है, उन्हें इसमें कोई शक नहीं हो
सकता कि यदि इससे पहले आसफ़ुद्दौला के बाप शुजाउद्दौला ने इतनी ही
रक़म हेस्टिंग्स को न दी होती और हेस्टिंग्स ने मंज़ूर न कर ली होती तो
आसफ़ुद्दौला हरगिज़ दस लाख रुपए हेस्टिंग्स की नज़र न करता।”*
कलकत्ता कौन्सिल की ११ अप्रैल सन् १७७५ की काररवाई की
रिपोर्ट में दर्ज है कि अपनी गवर्नरी के केवल पहले तीन साल के
अन्दर वारन हेस्टिंग्स इन ज़रियों से “चालीस लाख रुपए से
- “ Hastings acknowledged to having taken a hundred thousand pounds
from Asafuddoula in 1782. The inference follows that in 1773 he received
a like sum from Shujauddoula and silently pocketed the money. Officers of
any political experiences would be satisfied that Asafuddoula would never
have offered the hundred thousad pounds to Hastings, unless a like sum had
been previously offered by his father, Shujauddoula, and accepted by
Hastings.”—J. Talboys Wheeler in his Short History of India, etc.
ऊपर” कमा चुका था। वास्तव में हेस्टिंग्स के ख़िलाफ़ नन्दकुमार
की शिकायतें झूठी न थीं। हमें यह भी याद रखना चाहिये कि डेढ़
सौ साल पहले भारत के अन्दर चालीस लाख रुपए की उतनी
क़ीमत थी जितनी आज आठ करोड़ की, और ‘चालीस लाख’ के
आदमी उन दिनों इंगलिस्तान में इतने ही कम थे जितने आठ
करोड़ के आज दिन भारत में।
वारन हेस्टिंग्स जिस तरह रिश्वतें लेता था उसी तरह देता
[हाशिया: कम्पनी के] और दिलवाता भी था। उसके अनेक छोटे और
[हाशिया: कर्मचारियों द्वारा] बड़े काले और गोरे दलाल कम्पनी की अमलदारी
[हाशिया: देश व्यापी लूट] भर में तमाम महकमों के अन्दर फैले हुए थे, जो
देशी नरेशों और भारतीय प्रजा दोनों को तरह
तरह से लूटते थे और उन पर तरह तरह के अत्याचार करते थे।
कोलब्रुक नामक अंगरेज़ ने २८ जुलाई सन् १७८८ को एक
पत्र भारत से इंगलिस्तान अपने पिता के नाम भेजा, जिसमें उसने
लिखा :—
“मिस्टर हेस्टिंग्स ने इस देश को ऐसे कलक्टरों और जजों से भर दिया
है, जिनके सामने एक मात्र लक्ष्य धन कमाना है। ज्योंही ये गिद्ध मुल्क
के ऊपर छोड़े गए, उन्होंने कहीं कोई बहाना निकाल कर और कहीं बिना
किसी बहाने के देशवासियों को लूटना शुरू कर दिया। × × × जज लोग
मुक़दमे का फ़ैसला उसके हक़ में करते हैं जो उन्हें सबसे ज़्यादा रुपए देता
है। और चोर निर्विघ्न डाके डालने के बदले में बाज़ाब्ता सालियाना अदा
करते हैं।”
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२५८ भारत में अंगरेज़ी राज
आगे चलकर कोलब्रुक लिखता है :—
“वारन हेस्टिंग्स की कूटनीति और उसके निर्लज्ज
गोरखपुर के विश्वासघात का प्रभाव केवल राजाओं और बड़े लोगों
अत्याचार पर ही नहीं पड़ा । ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ छीन लेना,
बेगमों को लूटना, रुहेलों को निर्वंश कर डालना, ये सब भूले जा सकते हैं,
किन्तु जो अत्याचार उसने गोरखपुर में किए वे सदा के लिए ब्रिटिश जाति
के नाम पर एक कलङ्क रहेंगे ।”*
गोरखपुर के इन अत्याचारों के विषय में जेम्स मिल लिखता है
कि सन् १७७८ में वारन हेस्टिंग्स ने अपने एक अफ़सर करनल
हैनेवे को कम्पनी की नौकरी से निकाल कर अवध के नवाब के यहाँ
भेज दिया। नवाब पर ज़ोर देकर बहराइच और गोरखपुर के
ज़िलों का दीवानी और फ़ौजी शासन करनल हैनेवे को दिलवा
दिया गया । मिल लिखता है कि—“यह तमाम इलाक़ा नवाब के
शासन में खूब खुशहाल था, किन्तु करनल हैनेवे के अत्याचारों के
कारण तीन साल के अन्दर यह तमाम इलाक़ा वीरान हो गया ।”
- "It was Mr. Hastings who filled the country with collectors and
judges who adopted one pursuit- a fortune. These harpies were no sooner
let loose upon the country, than they plundered the inhabitants with or
without pretences. . . . Justice was dealt out to the highest bidders by
the Judges, and thieves paid a regular revenue to rob with impunity. . . .
"Nor did his crooked politics and shamless breach of faith affect none
but the princes and great men; the deposition of zemindars, the plundering
of Begums, the extermination of the Rohillas may be forgotten, but the
cruelties acted in Gorukhpore will for ever be quoted to the dishonor of the
British name."—Colebrooke in a private letter to his father, dated 28th
July, 1788.