भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
१६४ पुस्तक प्रवेश
का भी यूरोप में सदियों तक साम्राज्य रहा, जिससे इस तरह की सङ्कीर्णता
के बढ़ने को और अधिक मौक़ा मिला। इसके अलावा यूरोप भर में अनेक
छोटे छोटे देश, क़रीब क़रीब हर देश में भोजन और वस्त्र के सामान की
कमी, और इस पर श्रेणी श्रेणी के बीच लगातार आर्थिक कलह और प्रति-
स्पर्द्धा, इन सब कारणों से भी यूरोप के अन्दर मेरे और तेरे देश के भाव
ज़ोर पकड़ते चले गए।
किन्तु भारत के दो हज़ार साल के इतिहास में इस तरह के कोई
भी कारण मौजूद न थे। यदि प्रान्तीय नरेशों में यदा कदा लड़ाइयाँ होती
थीं, या बाहर से चन्द रोज़ के लिए कोई हमला भी होता था तो करोड़ों
जनता के रहन सहन, उनके जीवन, उनके धन्धों और उनकी खुशहाली पर
इन लड़ाइयों का कोई किसी तरह का भी असर न पड़ता था।
निस्सन्देह आजकल की राष्ट्रीयता आजकल के राष्ट्रों के स्वार्थमय जीवन
संग्राम का फल है। हम स्वीकार करते हैं कि यह राष्ट्रीयता का भाव मनुष्य
को एक दरजे तक व्यक्तिगत स्वार्थ के भाव से ऊपर उठा कर राष्ट्र के नाम
पर अपनी आहुति देने के लिए तैयार कर देता है। इस दरजे तक यह भाव
निस्सन्देह मनुष्य को ऊँचा उठाने वाला भी है। किन्तु यदि उच्च मानव प्रेम
और मानव जाति के हित की दृष्टि से देखा जाय तो इसमें कोई सन्देह नहीं
कि आज कल की 'राष्ट्रीयता' का भाव अधिक से अधिक एक अनिवार्य
आपत्ति है और इस समय भी समस्त मानव समाज के विकास में एक बहुत
बड़ी बाधा साबित हो रहा है। जो हो, भारत में इस भाव के पैदा होने
के लिए अंगरेज़ों के आने से पहले कोई गुञ्जाइश ही न थी। यही वजह है
कि भारतवासियों में अपने और पराए का भेदभाव मौजूद न था।
अंगरेज़ों का आना १४५
इसीलिए यदि निष्पक्षता के साथ देखा जाय तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी
के सौ साल के इतिहास में जिन भारतवासियों ने अंगरेज़ों के साथ मिलकर
अपने देश और देशवासियों को हानि पहुँचाई, उनमें से थोड़े सों को
छोड़ कर बाक़ी का पाप केवल इतना ही था जितना किसी भी दो राजाओं
के संग्राम में एक मनुष्य का एक पक्ष से दूसरे पक्ष की ओर चला जाना ।
यही वजह थी कि इनमें से अधिकांश देशघातकों ने विदेशियों के साथ
अपनी प्रतिज्ञाओं का सदा सच्चाई के साथ पालन किया ।
हमें यह लज्जा के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि उन सौ साल के
इतिहास में हमें अपनी ओर कई अक्षम्य देशघातकता और विश्वासघातकता
की मिसालें भी मिलती हैं। किन्तु इस तरह की मिसालें किसी भी देश के
इतिहास में इस तरह की परिस्थिति में थोड़ी बहुत मिलना स्वाभाविक है।
इतिहास से स्पष्ट है कि अन्य अनेक दोषों के होते हुए भी भारतवासियों
में अपने वचन का पालन करना एक सामान्य नियम था जिसके कहीं कहीं
सम्भव है अपवाद मिल सकते हों, दूसरी ओर कम्पनी के अंगरेज़ प्रति-
निधियों में अपनी प्रतिज्ञाओं का निस्सङ्कोच उल्लङ्घन एक सामान्य नियम
था; जिसका शायद एक भी अपवाद मिलना कठिन है। इसीलिए सन्
१७५७ से लेकर १८५७ तक बार बार के प्रतिकूल अनुभवों के होते हुए भी
भारतवासियों ने सदा अंगरेज़ों की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास कर लिया ।
इन सौ साल के इतिहास से यह भी ज़ाहिर है कि वीरता, साहस या
युद्ध कौशल में भारतवासी कहीं भी अंगरेज़ों से पीछे नहीं रहे । अंगरेज़ों के
भारतीय संग्राम अंगरेज़ों ने नहीं जीते, बल्कि भारतवासियों ने अंगरेज़ों के
लिए जीत कर अपनी विजय का फल अंगरेज़ों के हवाले कर दिया ।
१३६ पुस्तक प्रवेश
करनल मालेसन ने अपनी पुस्तक 'दी डिसाइसिव बैटिल्स ऑफ़ इण्डिया' में
स्वीकार किया है कि सन् १७५७ से १८२७ तक जो असंख्य लड़ाइयाँ
अंगरेज़ों और भारतवासियों के बीच लड़ी गईं उनमें एक भी ऐसी नहीं
हुई जिसमें अंगरेज़ी सेना एक ओर रही हो और हिन्दोस्तानी सेना दूसरी
ओर, और फिर अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की हो। इस तरह के संग्राम,
जिनमें अंगरेज़ एक ओर थे और हिन्दोस्तानी दूसरी ओर, अनेक बार
हुए, किन्तु उनमें सदा अंगरेज़ों को ज़िल्लत के साथ हार खानी पड़ी। जहाँ
कहीं किसी संग्राम में अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की है वहाँ सदा हिन्दोस्तानियों
में दो दल दिखाई दिए हैं, एक विदेशियों के विरुद्ध और दूसरा उनके पक्ष
में। यह एक अकाट्य, किन्तु लज्जाजनक सच्चाई है कि अंगरेज़ों ने भारतवर्ष
को तलवार से नहीं जीता, बल्कि भारतवासियों ने अपनी तलवार से
अपने देश को जीत कर विदेशियों के हवाले कर दिया। हमारे इस कथन के
यथेच्छ सबूत पाठकों को इस पुस्तक के क़रीब क़रीब हर अध्याय में मिलेंगे।
हमारा पतन
किन्तु जो हो, अब हमें इस भीषण सच्चाई की ओर ध्यान देना होगा
कि हमारी इन दो सौ साल की लगातार ग़लतियों या कमज़ोरियों ने हमें
कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। केवल दो सौ साल पहले जो देश संसार का
सब से अधिक खुशहाल और सब से अधिक बलवान देश समझा जाता था
वह आज संसार का सब से अधिक दरिद्र और सब से अधिक निर्बल और
असहाय देश माना जाता है। केवल डेढ़ सौ साल पहले जिस देश में एक
भी पुरुष या स्त्री किसी गाँव के अन्दर ऐसा न मिल सकता था जो लिखना
पढ़ना न जानता हो, वहाँ आज ९३ फ़ी सदी आबादी बिल्कुल अनपढ़ है।
अंगरेज़ों का आना १६७
केवल सवा सौ साल पहले यानी १९ वीं सदी के शुरू तक जो देश
अपने उद्योग धन्धों की दृष्टि से शायद केवल एक चीन को छोड़कर
संसार का सब से अधिक उन्नत देश स्वीकार किया जाता था और जो
उस समय तक आधे से अधिक सभ्य संसार की, जिसमें इङ्गलिस्तान और
फ्रांस भी शामिल थे, कपड़े इत्यादि की आवश्यकता को पूरा करता था,
वह आज अपने जीवन की एक एक आवश्यकता के लिए, यहाँ तक कि
अपना तन ढकने के लिए दूसरों का मोहताज है। इन सब बातों के अकाट्य
सबूत इस पुस्तक में उचित स्थान पर दिए जायेंगे।
ऊपर लिखी हानियों से कहीं अधिक भयङ्कर हानि जो दूसरे देश की
राजनैतिक अधीनता किसी भी देश को पहुंचा सकती है, वह उस देश के
चरित्र का नाश है। समाज विज्ञान का प्रसिद्ध अमरीकन विद्वान ई० ए०
रॉस लिखता है।
“किसी भी राष्ट्र के चरित्र के अधःपतन के सबसे प्रबल
कारणों में से एक कारण उस राष्ट्र का किसी विदेशी क़ौम के
अधीन हो जाना है।”*
अपने समय के भारतवासियों के चरित्र को बयान करते हुए यूनानी
इतिहास लेखक एरियन लिखता है कि—
“इन लोगों में अद्भुत वीरता है, युद्ध विद्या में ये
समस्त एशिया निवासियों से बढ़कर हैं। सरलता और सच्चाई के
लिए ये विख्यात हैं। ये इतने समझदार हैं कि इन्हें कभी मुक़दमे-
- "Subjugation to a foreign yoke is one of the most potent causes of
the decay of national character."—Professor E. A. Ross: Principles of
Sociology, pp. 132, 133.
१६८ पुस्तक प्रवेश
बाज़ी की शरण नहीं लेनी पड़ती और इतने ईमानदार हैं कि न
इन्हें अपने दरवाज़ों में ताले लगाने पड़ते हैं और न लेन देन में
इन्हें लिखा पढ़ी की ज़रूरत होती है। कभी भी किसी भारत-
वासी को झूठ बोलते हुए नहीं सुना गया।"*
उस समय के भारतवासियों के चरित्र की इस समय के भारतवासियों
के चरित्र से तुलना करना अत्यन्त दुखकर है। इस तुलना पर टीका करते हुए
और मिश्र यूनान इत्यादि की मिसालें देते हुए ई० ए० रॉस लिखता है—
"भारतवासियों के उच्चतर जीवन के ऊपर विदेशी शासन
का प्रभाव ऐसा ही है जैसा किसी चीज़ को पाला मार गया हो।"†
निस्सन्देह पिछले पौने दो सौ साल से यह प्राचीन देश वेग के साथ
मानसिक, नैतिक और भौतिक सर्वनाश की ओर बढ़ता चला जा रहा है।
हमारा कर्त्तव्य
अंगरेज़ी राज कब से
सब से अन्तिम, किन्तु सब से अधिक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह
है कि इस घातक विपत्ति से निकलने का हमारे लिए अब क्या उपाय हो
- "They are remarkably brave, superior in war to all Asiatics; they
are remarkable for simplicity and integrity; so reasonable as never to have
recourse to a law suit and so honest as neither to require locks to their
doors nor writings to bind their agreement. No Indian was ever known to
tell an untruth."—The Greek Historian Arrian, as quoted in Ibid, pp. 132, 133.
- " . . . the alien dominion has a blighting effect upon the higher
life of the people of India."—Ibid.
हमारा कर्तव्य १६६
सकता है। इस सम्बन्ध में हमें सब से पहले दो बातों की ओर से सावधान
रहना होगा। एक यह कि घबराहट या किसी तरह के आवेश में आकर
हम मानव जीवन के उन उच्च नैतिक सिद्धान्तों से न डिगने पाएँ जिनके
बिना मानव समाज का सुख से रह सकना सर्वथा असम्भव है और जो
मनुष्य के ऐहिक जीवन के आध्यात्मिक आधार स्तम्भ हैं। दूसरे यह कि
नैराश्य या अकर्मण्यता को हमें एक क्षण के लिए भी अपने पास नहीं
फटकने देना चाहिए। इन दोनों बातों में से हम पहले दूसरी के विषय में
कुछ कहना चाहते हैं।
आज से पौने दो सौ साल पहले भारतवर्ष की एक चप्पा ज़मीन पर भी
अंगरेज़ों का किसी तरह का अधिकार न था। आज (१६२६) से ८७ साल
पहले यानी सन् १८४२ तक वे दिल्ली सम्राट को अपना सम्राट स्वीकार
करते थे, अपने तईं उसकी विनम्र आज्ञाकारी प्रजा कहा करते थे,
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सिक्कों में दिल्ली सम्राट का नाम खुदा
होता था और कम्पनी के भारतीय इलाक़ों के अंगरेज़ गवरनर जनरल की
मोहर में 'दिल्ली के बादशाह का फ़िदविए ख़ास' ये शब्द खुदे रहते थे।
निस्सन्देह अनभ्यस्त और भोले भारतवासी विदेशियों की इन चालों से
धोखे में आते रहे। दिल्ली दरबार की निर्बलता ने धीरे धीरे उन्हें और भी
अपाहज कर दिया। किन्तु ज्योंही भारतवासियों ने यह अनुभव करना शुरू
किया कि इस नए राजनैतिक प्रयोग के नतीजे विविध प्रान्तों में देशी
रियासतों और देश के जीवन के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं,
ज्योंही सम्राट शाहआलम की मृत्यु (१८०६) के बाद कम्पनी के प्रति-
निधियों ने सम्राट अकबरशाह और उसके बाद सम्राट बहादुरशाह के पद
२०० पुस्तक प्रवेश
की अवहेलना शुरू की, उनकी आँखें खुल गई । उन्होंने सन् ५७ में विदेशी
सत्ता से अपने तईं आज़ाद करने का वह ज़ोरदार प्रयत्न किया जिसने एक
बार वास्तव में अंगरेज़ी राज की जड़ों को हिला दिया और उसके अस्तित्व
को ख़तरे में डाल दिया। सन् ५७ का स्वाधीनता संग्राम हमारी पराधीनता
के इतिहास की उस समय तक की सब से महत्वपूर्ण घटना थी। उसकी
प्रगति और असफलता के कारणों को हमने इस पुस्तक में विस्तार के साथ
दूसरे स्थान पर बयान किया है।
स्वाधीनता के प्रयत्न
वास्तव में अंगरेज़ी हुकूमत भारतवर्ष में बाज़ाब्ता और पूरी तरह सन्
१८५६ ही से जमी। उस समय ही भारतीय साम्राज्य की बाग विधिवत्
उस व्यापारी कम्पनी के हाथों से नहीं, जो अन्त समय तक दिल्ली सम्राट
की प्रजा होने का बनावटी दावा करती रही, बल्कि स्वयं भारत के अन्तिम
सम्राट बहादुरशाह के हाथों से छीनकर इंगलिस्तान की मलका विक्टोरिया के
हाथों में दी गई। ७० साल का समय या १७० साल का समय भी किसी
देश के इतिहास में और ख़ास कर भारत जैसे प्राचीन और सुसभ्य देश के
इतिहास में कोई लम्बा समय नहीं होता। सन् ५७ के बाद भी भारत ने
अपनी आज़ादी की कोशिशों को एक क्षण के लिए भी ढीला होने नहीं
दिया। सन् ५७ की क्रान्ति और पंजाब के कूका विद्रोह में केवल १५ साल
का अन्तर था, सन् ५७ और काँग्रेस के जन्म में २८ साल का, काँग्रेस के
जन्म और बङ्गभङ्ग के बाद के आन्दोलन में २० साल का, बङ्गभङ्ग और उस
असहयोग आन्दोलन में, जिसने फिर एक बार सन् ५७ की क्रान्ति से भी
अधिक और उससे उच्चतर उपायों द्वारा अंगरेज़ी राज के अस्तित्व को ख़तरे
हमारा कर्त्तव्य २०९
में डाल दिया, और जिसके विषय में उस समय के गवर्नर जनरल को
स्वीकार करना पड़ा कि 'उस आन्दोलन की सफलता में केवल एक इंच
की कसर बाक़ी रह गई थी,' और 'मैं हैरान और परेशान था,' * केवल
१५ साल का ।
ब्रिटिश साम्राज्य की हालत
स्वयं इंगलिस्तान के ऊपर रोमन लोगों की हुकूमत चार सौ साल तक
जारी रही । उसके बाद सदियों नॉर्मेन जाति के लोगों ने इंगलिस्तान को
अपने अधीन रक्खा । इंगलिस्तान निवासियों को रोमन लोगों या नॉर्मेन
लोगों के राजनैतिक चंगुल से अपने को मुक्त करने में, आइरिश जाति को
अंगरेज़ों के पंजे से अपने को आज़ाद करने में, अमरीका को इंगलिस्तान
का जुआ अपने ऊपर से उखाड़ कर फेंकने में, इतालिया को ऑस्ट्रिया की
पराधीनता से छुटकारा पाने में या अपने ही देश में रूस को ज़ार की
अत्याचारी सत्ता का अन्त करने में यदि ध्यान से देखा जाय तो इससे
कम समय नहीं लगा । भारत जैसे प्राचीन और विशाल देश का अपने
प्रियतम आदर्शों के विरुद्ध नई परिस्थिति के अनुसार अपने जीवन को ढाल
सकना और इस नए ढंग के संग्राम के लिए अपने तईं सुसन्नद्ध कर सकना
आसान काम नहीं है । फिर भी इसमें किसी को सन्देह नहीं हो सकता कि
इस विषय में भारत की जनता के अन्दर जागृति और तत्परता दिन प्रति-
दिन वेग के साथ बढ़ती जा रही है । हर नया आन्दोलन पिछले आन्दोलन
की अपेक्षा हमें साफ़ सैकड़ों क़दम आगे पहुँचा देता है । दूसरी ओर जिन
- 'His programme came within an inch of success, ' 'I stood puzzled
and perplexed,'—Lord Reading at Calcutta on the Non-Cooperation Move-
ment of 1921.
२०२ पुस्तक प्रवेश
लोगों ने संसार के विविध साम्राज्यों के बनने और बिगड़ने के इतिहासों को
ध्यान से पढ़ा है और उनके कारणों का अध्ययन किया है, वे पूरी तरह
समझ रहे हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य की अवस्था इस समय बिलकुल उस
विशाल वृक्ष के समान है जिसका तना ऊपर से देखने में मोटा है, जिसकी
शाखें लम्बी हैं, जिस पर कहीं कहीं घने पत्ते भी नज़र आते हैं, किन्तु
जिसकी जड़ों को आन्तरिक दोषों ने दीमक की तरह इधर से उधर तक
खोखला कर रक्खा है, और जिसका किसी समय भी हवा के एक झोंके से
उन्मूल हो जाना असन्दिग्ध है ।
हम केवल अलंकार की भाषा का उपयोग नहीं कर रहे हैं। इतिहास
के एक विनम्र विद्यार्थी की हैसियत से हमारा अनुमान है कि जितने लक्षण
भी किसी साम्राज्य के नाश के समय उसमें पैदा हो जाते हैं और जो उसे
मृत्यु की ओर ले जाए बिना नहीं रह सकते वे इस समय ब्रिटिश साम्राज्य
के अन्दर ज़ोरों के साथ उभर रहे हैं। इंग्लिस्तान के प्रसिद्ध दार्शनिक और
तत्ववेत्ता एडवर्ड कारपेण्टर ने अत्यन्त मर्मस्पर्शी शब्दों में अपने देश की
तुलना एक ऐसे मरणासन्न व्यक्ति के साथ की है जिसकी नाड़ियों में जगह
जगह 'स्वर्ण रज' के अटक जाने के कारण उन नाड़ियों से रक्त का प्रवाह
क़रीब क़रीब बन्द हो चुका ।
हमारे नैतिक आदर्श
दूसरी बात हमने ऊपर यह कही थी कि किसी तरह की घबराहट या
आवेश में आकर हम मानव जीवन के उच्चतर नैतिक सिद्धान्तों से न डिगने
पाएँ । वास्तव में भारतवासियों के लिए सब से पहला काम अपने धार्मिक
और नैतिक आदर्शों को स्थिर करना है । उसके बाद उन्हें अपने कर्तव्य की
हमारा कर्तव्य २०३
ओर अग्रसर होना होगा। हमें यह पूरी तरह ध्यान में रखना होगा कि
जिन सदाचार शून्य स्वार्थमय नीवों पर यूरोप ने अपनी आजकल की
सभ्यता को क़ायम करना चाहा और जिनके बल उसने भारतीय जीवन को
इतनी भयंकर हानि पहुँचाई, उनका नतीजा अन्त में क्या हुआ। आजकल
की सारी यूरोपियन सभ्यता अपने अद्भुत विज्ञान, विशाल पुतलीघरों,
विचित्र साम्राज्यवाद और नवीन भयंकर पूँजीवाद को लेकर दो सौ साल
भी सुख चैन से न जी सकी। आज यूरोप मनुष्य मनुष्य के बीच कलह,
श्रेणी श्रेणी के बीच कलह, और देश देश के बीच कलह का मक़तब बना
हुआ है। यूरोप ही के हर देश की ६० फ़ीसदी आबादी के लिए यह
अन्तर्वर्गीय और अन्तर्राष्ट्रिय कलह और प्रतिस्पर्धा, दुख, विपत्तियों और
सार्वजनिक नाश का कारण साबित हो रही है। पिछले यूरोपियन महायुद्ध
ने यूरोप के कुछ विचारवान लोगों की आँखें इस विषय में खोल दी हैं।
वे अपने नैतिक आदर्शों को बदलने या यूँ कहना चाहिए कि अपने यहाँ
के जीवन में नैतिक आदर्श उत्पन्न करने की आवश्यकता को अनुभव करने
लगे हैं। रूस जैसे देशों के पैर उस ओर को थोड़े बहुत बढ़ते हुए भी
दिखाई दे रहे हैं। किन्तु विविध यूरोपियन देशों के जिन शासकों को पूँजी
वाद और नवीन साम्राज्यवाद के नशे ने उन्मत्त कर रक्खा है वे अभी तक
अपनी इस घातक प्रवृत्ति से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं, और न
शायद वे अभी तक उसे घातक अनुभव करते हैं। नतीजा यह है कि पिछले
महायुद्ध से एक कहीं अधिक भयंकर और विकराल नया महायुद्ध इस समय
संसार की आँखों के सामने फिर रहा है, जो सम्भव है, वर्त्तमान यूरोपियन
सभ्यता के लिए मौत का ताण्डव नृत्य साबित हो। वास्तव में समस्त
२०४ पुस्तक प्रवेश
अर्वाचीन यूरोप इस समय एक कठिन परीक्षा के तसविष्य में से निकल
रहा है।
इसके विपरीत जिन नैतिक आदर्शों पर प्राचीन भारत और प्राचीन
चीन जैसे देशों ने अपने सामाजिक जीवन को कायम किया था उन आदर्शों
के सहारे ये देश हज़ारों साल तक सुख चैन से रह सके और कम या ज़्यादह
अपने से सम्बन्ध रखने वाले संसार के अन्य देशों को भी सुख चैन से
रख सके।
ऐसी हालत में हमें सब से ज़्यादह ध्यान इस बात का रखना होगा
कि हम अपने आज़माए हुए और मानव समाज के लिए कहीं अधिक
कल्याणकर आदर्शों को हाथ से न खो बैठें। जो स्थान भटके हुए यूरोप ने
आज बिजली और कूटनीति को दे रक्खा है वह हमें मानवप्रेम और सत्यता
को देना होगा, और हर मनुष्य के व्यक्तिगत 'अधिकारों' पर ज़ोर देने के
स्थान पर हमें मनुष्यमात्र के लिए 'कर्तव्यपालन' को अधिक महत्व
देना होगा।
एक मानवधर्म की आवश्यकता
इसके बाद हमें अपने राष्ट्रीय रोग के जड़ों की ओर दृष्टि डालनी
होगी और साहस के साथ उन्हें अपने जीवन से उखाड़ कर फेंकना
होगा। असत्य को छोड़ कर हमें फिर से अपने राष्ट्रीय जीवन को सत्य
की नींव पर कायम करने का महान प्रयत्न करना होगा। हमारा पथ
इस विषय में बिलकुल स्पष्ट है। आज से पौने तीन सौ साल पहले जिस
मार्ग से विचलित हो जाने के कारण धीरे धीरे हमारी राष्ट्रीय विपत्तियों का
हमारा कर्त्तव्य २०५
प्रारम्भ हुआ, अपने कल्याण के उसी एक मात्र मार्ग को हमें फिर से ग्रहण
करना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मानव समाज के टुकड़े करने
वाली पृथक पृथक धर्मों और सम्प्रदायों की दीवारें कृत्रिम और हानिकर हैं।
कबीर के शब्दों में हमें यह मानना पड़ेगा कि इस संसार में 'दो जगदीश'
नहीं हो सकते। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी देश, किसी
काल, किसी जाति या किसी भाषा विशेष ने, चाहे वह कितनी भी प्राचीन
क्यों न हो, ईश्वरीय ज्ञान का इजारा नहीं ले रक्खा। वास्तव में इस तरह के
अनुदार विचार ही मानव समाज की आधी से अधिक विपत्तियों की जड़ हैं।
सारांश यह कि जन सामान्य को अपने अपने ढंग से अपने इष्टदेव की
आराधना करने में स्वाधीन छोड़कर भी हमें सब धर्मों की मौलिक एकता
को साक्षात करना होगा। उस मौलिक एकता की रोशनी में ही हमें हिन्दू,
मुसलमान, सिक्ख, जैन, पारसी और ईसाई के भेदों की असत्यता और
हानिकरता को भी अनुभव करना होगा और समस्त समाज को एक सच्चे
सार्वभौम मानवधर्म की ओर लाने का सस्नेह और प्रशान्त प्रयत्न करना
होगा। जात पाँत या छुआछूत जैसी रूढ़ियों की अनर्गलता और
अन्याय्यता को तो आज अधिकांश विचारवान भारतवासी अनुभव करने
लगे हैं। इन समस्त भेदभावों को हमें अपने राष्ट्रीय जीवन से समूल उखाड़
कर फेंक देना होगा। इस सब के स्थान पर हमें मानव समता, मानव
प्रेम, परसेवा, स्वार्थत्याग, न्याय और सत्यता के उस सार्वभौम धर्म को
अपना एक मात्र धर्म स्वीकार करना होगा, जिस तक मनसूर और कबीर
जैसे अनेक सूफ़ियों और महात्माओं ने हमें लाने का प्रयत्न किया।
निस्सन्देह यदि दो सौ साल पहले ही हमने अपने जीवन को इन सच्ची
२०६ पुस्तक प्रवेश
नींवों पर क़ायम कर लिया होता, यदि औरंगज़ेब के समय से पृथक
पृथक धर्मों के झूठे भेदों ने फिर से देशवासियों के विचारों को पथभ्रष्ट
न कर दिया होता, तो आज इस देश की यह दशा होना असम्भव था।
और किसी भी तरह का सुधार, सामाजिक या राजनैतिक, केवल रोग
की जड़ों को छोड़ कर पत्तियों और डालियों के साथ काट छाँट करना है।
इस तरह का कोई सुधार चिरस्थाई नहीं हो सकता। वास्तव में यदि
सत्य है तो यही है और यदि भारत के या संसार के भावी कल्याण का कोई
सच्चा मार्ग है तो यही है।
सत्याग्रह और असहयोग
इसके साथ साथ हमें प्रेम और सत्य के पवित्र सिद्धान्तों से न डिगते
हुए राजनैतिक क्षेत्र में 'सत्याग्रह' की अजेयता को अनुभव करना होगा और
सत्याग्रह के अनन्त बल का अपने अन्दर संचार करना होगा। हमें यह
समझना होगा कि हर अन्याय अन्यायी और अन्याय पीड़ित दोनों की
आत्माओं के एक समान पतन का कारण होता है। कोई सच्चा प्रेमी किसी
अन्याय को अपनी आँखों के सामने देखते हुए निश्चेष्ट नहीं बैठ सकता।
घृणा और द्वेष की अपेक्षा प्रेम, सच्चा और क्रियात्मक प्रेम, एक कहीं अधिक
प्रबल शक्ति है। जो मनुष्य किसी भी अन्याय को दूर करने के लिए सच्चे
प्रेम के साथ अपने स्वार्थ, अपने सर्वस्व और अपने प्राणों की आहुति देने
के लिए प्रस्तुत हो जाता है और हँसते हँसते कर्तव्य के नाम पर अनन्त
कष्टों का सामना करने के लिए मैदान में निकल पड़ता है, उसकी शक्ति
तोपों और बन्दूकों की शक्ति के मुक़ाबले में सर्वथा अजेय होती है। इस
शक्ति का थोड़ा बहुत अनुभव हमें अपने हाल के राष्ट्रीय संग्रामों में मिल
हमारा कर्तव्य २०७
चुका है। इसी एक मात्र अमोघ शक्ति का हमें अपने इस दुखित देश के
उद्धार के लिए आश्रय लेना होगा ।
तीसरी बात हमें यह भी स्पष्ट दिखाई दे रही है कि अपनी पराधीनता
के एक एक विभाग में हमारी ही शक्तियाँ हमारे विरुद्ध काम कर रही हैं।
विदेशी व्यापार के हर मह में, विदेशी शासन के हर मोहकमे में हम स्वयं
ही अपनी बेड़ियों के वास्तविक गढ़ने वाले हैं। बिना भारतवासियों की
सहायता के न विदेशी शासन भारत में क़ायम हो सकता था और न एक
क्षण के लिए इस समय चल सकता है। जाने या अनजाने, हमारा यह
स्वार्थ, हमारा यह पाप ही देश की समस्त वर्त्तमान आपत्तियों की जड़ है
और उसी के द्वारा ये आपत्तियाँ क़ायम हैं। इलाज स्पष्ट है। हमें अपने
विनाश के साधनों से सहयोग करने के इस महापाप से अपने को मुक्त
करना होगा ।
निस्सन्देह मार्ग सर्वथा निष्कण्टक नहीं है। किन्तु संसार का कोई भी
महान कार्य बिना स्वार्थत्याग और कष्टसहन के सिद्ध नहीं हो सकता। कोई
मनुष्य या राष्ट्र बिना अपने पिछले पापों का प्रायश्चित किए धर्म और
कल्याण के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता । भारत के राजनैतिक उद्धार
का इस समय यही एक मात्र मार्ग है। हर भारतवासी के लिए सच्चे कर्त्तव्य
पालन का यही एक मात्र पथ है ।
हमारा भविष्य
जिस तरह हर मनुष्य से उसी तरह हर राष्ट्र से अपने जीवन में भूलों
का होना स्वाभाविक और अनिवार्य है। अपनी इन भूलों के दुष्परिणाम
भी हर व्यक्ति या राष्ट्र को सहने ही पड़ते हैं। किन्तु भविष्य के लिए
२०८ पुस्तक प्रवेश
हमारा हृदय आशा और विश्वास से भरा हुआ है। एक बार अपने
कर्त्तव्य को समझ लेने पर हमें अपने देशवासियों के साहस और उनकी
शक्ति में भी पूरा भरोसा है। हमें विश्वास है कि आजकल का आदर्शशून्य
सन्तप्त संसार इन सब बातों में भारत ही से सच्चे मार्ग प्रदर्शन की बाट
जोह रहा है। अपने देश के सन् १९१९ से अब तक के इतिहास को ध्यान
से देखते हुए हमें निकटवर्ती भविष्य में भारत और फिर स्वाधीन भारत के
पग उस भावी अपूर्व दिग्विजय की ओर साफ़ बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।
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सम्राट जहाँगीर से सर टामसरो की भेंट
By the Courtesy of the curator Victoria Memorial.
भारत में अंगरेज़ी राज
पहला अध्याय
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश
अत्यन्त प्राचीन काल से भारतवर्ष मानव जाति की सभ्यता
[हाशिया: चार सौ साल पहले] और उसकी उन्नति का एक विशेष स्रोत रहा है
[हाशिया: भारत और यूरोप] और पृथ्वी की विविध जातियों के विकास में एक
[हाशिया: का सम्बन्ध] महत्वपूर्ण भाग लेता रहा है। आज से दो तीन
सौ साल पहले तक यह देश हर तरह स्वाधीन
था, और ज्ञान, विज्ञान, विद्या-प्रचार, कला-कौशल, शासन-प्रधान
इत्यादि में संसार के समस्त देशों का शिरोमणि था। उस समय
यूरोप का कोई देश सभ्यता के किसी अङ्ग में भी भारत की बराबरी
न कर सकता था। धनधान्य की दृष्टि से भारतवर्ष उस समय
२ भारत में अंगरेज़ी राज
संसार का सब से अधिक धनवान देश माना जाता था। ईसा की
अठारवीं सदी तक यह देश संसार भर के यात्रियों के लिए एक
अपूर्व चमत्कार की जगह, कवियों के लिए उनकी उच्चतम कल्पनाओं
का एक विषय और धन-लोलुप जातियों के लिए उनकी लालसा का
मुख्यतम पदार्थ बना हुआ था। सैकड़ों और हज़ारों वर्षों तक समस्त
यूरोप, बल्कि समस्त संसार के बाज़ारों और मंडियों में अच्छे से
अच्छे रेशमी और सूती कपड़े, ज़ेवर, बरतन और तरह तरह के अन्य
अद्भुत पदार्थ हिन्दोस्तान के बने हुए ही दिखाई पड़ते थे। संसार
के व्यापारियों को उस समय भारतीय धन और भारतीय वैभव के
ही स्वप्न दिखाई देते थे, और इस भारतीय धन का लालच ही यूरोप
निवासियों को इस प्राचीन देश की ओर खींच कर लाया। वास्तव में
बहुत दरजे तक भारत का यह प्राचीन धन-वैभव ही इस देश की
समस्त आपत्तियों का मूल कारण हुआ।
चार सौ साल पहले तक भारत और यूरोप के बीच का
समस्त व्यापार अरब और ईरान के सौदागरों के ज़रिए होता
था। ये साहसी सौदागर भारत के पच्छिमी तट पर भारत के
क़ीमती माल से अपने जहाज़ लादते थे, फिर अरब और ईरान की
खाड़ियों से होकर उस माल को अपने देशों में ले जाते थे, और फिर
वहाँ से अधिकतर खुश्की के रास्ते ऊँटों और गाड़ियों पर लाद कर
उसे यूरोप और अफ़रीका के तमाम देशों में पहुँचाते थे। यूरोप
में व्यापार की सब से बड़ी मंडियाँ उस समय इतालिया (इटली)
देश के वेनिस, जेनोआ आदि बन्दरगाहों में थीं और वहाँ ही से
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ३
जमा होकर भारत, ईरान आदि एशियाई देशों का बना हुआ माल
यूरोप के सब देशों में पहुँचता था। समुद्र के रास्ते यूरोप से
भारतवर्ष आने जाने का मार्ग उस समय किसी को मालूम न था।
न उस समय कोई यूरोपियन जाति इतनी बलवान या इतनी
धनवान थी और न यूरोप से बाहर का कोई ग़ैर-ईसाई मुल्क उस
समय किसी यूरोपियन ईसाई जाति के अधीन था।
ईसा की पन्द्रवीं सदी में कुछ साहसी यूरोपनिवासियों के
दिलों में भारत का जल-मार्ग ढूंढ़ निकालने की
[भारत के जलमार्ग] उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, इसके दो ख़ास सबब थे।
[की खोज] एक यह कि स्थल-मार्ग से माल के लाने लेजाने
में अनेक असुविधाएँ झेलनी पड़ती थीं। बीच में कई जगह माल
को उतारना और फिर से लादना पड़ता था। कई कई जगह
पुलों पर, सड़कों पर और मंडियों में चुङ्गी देनी होती थी। सड़कें
कहीं अच्छी थीं तो कहीं ख़राब और कहीं बिलकुल न थीं। मार्ग में
डाकुओं और जंगली जानवरों का भय रहता था। देर अधिक
लगती थी और लागत इतनी आ जाती थी कि विशेष कर यूरोप
के उत्तर और पच्छिम के हिस्सों तक पहुँचते पहुँचते माल के दाम
बहुत बढ़ जाते थे। दूसरा यह कि यूरोप के अंदर एशियाई माल
का समस्त व्यापार उन दिनों प्रायः इतालिया के सौदागरों के हाथों
में था, जिनकी कमाई को देख देख कर उत्तर और पच्छिम की यूरो-
पियन जातियों की स्पर्धा और उनको धन-लोलुपता और अधिक
भड़कती थी।