भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंहमारा कर्तव्य २०३
ओर अग्रसर होना होगा। हमें यह पूरी तरह ध्यान में रखना होगा कि
जिन सदाचार शून्य स्वार्थमय नीवों पर यूरोप ने अपनी आजकल की
सभ्यता को क़ायम करना चाहा और जिनके बल उसने भारतीय जीवन को
इतनी भयंकर हानि पहुँचाई, उनका नतीजा अन्त में क्या हुआ। आजकल
की सारी यूरोपियन सभ्यता अपने अद्भुत विज्ञान, विशाल पुतलीघरों,
विचित्र साम्राज्यवाद और नवीन भयंकर पूँजीवाद को लेकर दो सौ साल
भी सुख चैन से न जी सकी। आज यूरोप मनुष्य मनुष्य के बीच कलह,
श्रेणी श्रेणी के बीच कलह, और देश देश के बीच कलह का मक़तब बना
हुआ है। यूरोप ही के हर देश की ६० फ़ीसदी आबादी के लिए यह
अन्तर्वर्गीय और अन्तर्राष्ट्रिय कलह और प्रतिस्पर्धा, दुख, विपत्तियों और
सार्वजनिक नाश का कारण साबित हो रही है। पिछले यूरोपियन महायुद्ध
ने यूरोप के कुछ विचारवान लोगों की आँखें इस विषय में खोल दी हैं।
वे अपने नैतिक आदर्शों को बदलने या यूँ कहना चाहिए कि अपने यहाँ
के जीवन में नैतिक आदर्श उत्पन्न करने की आवश्यकता को अनुभव करने
लगे हैं। रूस जैसे देशों के पैर उस ओर को थोड़े बहुत बढ़ते हुए भी
दिखाई दे रहे हैं। किन्तु विविध यूरोपियन देशों के जिन शासकों को पूँजी
वाद और नवीन साम्राज्यवाद के नशे ने उन्मत्त कर रक्खा है वे अभी तक
अपनी इस घातक प्रवृत्ति से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं, और न
शायद वे अभी तक उसे घातक अनुभव करते हैं। नतीजा यह है कि पिछले
महायुद्ध से एक कहीं अधिक भयंकर और विकराल नया महायुद्ध इस समय
संसार की आँखों के सामने फिर रहा है, जो सम्भव है, वर्त्तमान यूरोपियन
सभ्यता के लिए मौत का ताण्डव नृत्य साबित हो। वास्तव में समस्त