भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
विषय सूची
पुस्तक प्रवेश
लेखक की कठिनाइयां
इतिहास कला—इतिहास लेखक की कठिनाइयां—सरकारी काग़ज़ों
में झूठ—इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें—भारतीय नरेशों पर झूठे
कलंक—किराए के लेखक—हमारे इतिहास के भ्रम । पृष्ठ १-२३
वे और हम
१७वीं सदी का इंगलिस्तान—उस समय के भारत से तुलना—
इंगलिस्तान को सभ्य बनाने की कोशिशें—इंगलिस्तान और भारत की
टक्कर—अंगरेज़ी राज क़ायम होने के तरीक़े—स्पेन्सर के विचार—पुस्तक
का सार । पृष्ठ २३-४४
पुराने हमले
भारत पर अंगरेज़ों से पहले के हमले—आर्यों का हमला—भारत की
उत्तर पश्चिमी सीमा—सिकन्दर से पहले के हमले—सिकन्दर का हमला—
यूनानियों का भारत में बस जाना—शक और हूण क़ौमों के हमले—इन
क़ौमों का इस देश में बस जाना—इनके अन्य देशों पर हमले—यूरोप
पर एशियाई जातियों के हमले—इन हमलों से यूरोप की बरबादी ।
पृष्ठ ४४-६३
( २ )
इस्लाम और भारत
भारत पर मुसलमानों के हमले—मोहम्मद साहब—मुसलमानों की
हुकूमत—सन् ६३६ ईसवी की एक घटना—भारत पर पहला हमला—
सिन्ध पर मुसलिम हुकूमत—प्राचीन अरब और भारत का सम्बन्ध—
आठवीं सदी का भारत—भारत में इस्लाम धर्म—कालीकट के राजा का
मुसलमान होना—मुसलमान फ़क़ीर और प्रचारक—भारत में इस्लाम
का प्रचार । पृष्ठ ६३-८४
जिज्ञासु अरब
अरबों के अन्दर नई धार्मिक लहरें—बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थ अरबी
में—इस्लाम में अद्वैतवाद—दक्षिण भारत में धर्म सुधार की लहरें—
इस्लाम का प्रभाव—शंकराचार्य—रामानुज—लिंगायत सम्प्रदाय—सिद्धर
सम्प्रदाय । पृष्ठ ८४-६५
मुसलमानों का यहां बस जाना
महमूद ग़ज़नवी—मोहम्मद ग़ोरी—विदेशी और स्वदेशी की
परिभाषा । पृष्ठ ६५-१००
मानव धर्म
रामानन्द—तुलसीदास—कबीर—नानक—अन्य हिन्दू सन्त—दादू—
मलूक दास—सत्तनामियों के बारह हुकुम—दाराशिकोह का गुरु बाबालाल
—प्राणनाथ—अन्य प्रयत्न—रामसनेही सम्प्रदाय—पलटूदास—सत्य पीर
की पूजा—चैतन्य—कर्ता बाबा—बौद्ध ग्रन्थों में मुसलमान—महाराष्ट्र
सन्त—नामादेव—खेचर—चोखमेला और बहिराम—शेख़ मोहम्मद—
तुकाराम । पृष्ठ १००-१३४
( ३ )
भारतीय कला और मुसलमान
निर्माण कला—दो कलाओं का आलिंगन—मुग़लों के समय में
भारतीय चित्रकला की उन्नति । पृष्ठ १३४-१३६
मुग़लों का समय
यूरोप पर मुग़लों के हमले—भारत पर मुग़लों के हमले—भारत
में एक केन्द्रीय सत्ता की ज़रूरत—मुग़लों द्वारा उसका निर्माण—
एक भाषा—एक शासन पद्धति—एक से सिक्के--इतिहास कला—दूसरे
देशों से सम्बन्ध—धार्मिक और सामाजिक एकता—ग्राम पंचायतें—
किसानों की अवस्था—मुग़लों की प्रजा पालकता—न्याय शासन—धार्मिक
उदारता—औरंगज़ेब के दस्तख़ती परवाने—शराब बन्दी—ग्राम पंचायतें—
उस समय का ईसाई यूरोप—भारत और यूरोप की तुलना—देशी भाषाओं
की उन्नति—साहित्य और विज्ञान की उन्नति—सम्राट अकबर—उस समय
की हिन्दू मुस्लिम संकीर्णता—दारा शिकोह और औरंगज़ेब—औरंगज़ेब
के बाद । पृष्ठ १३६-१८२
अंगरेज़ों का आना
उस समय के अंगरेज़ व्यापारी—उनकी सफलता के कारण—हमारी
पराजय के तीन कारण—दोनों के चरित्र में अन्तर—भारतवासियों के
चरित्र का नाश ! पृष्ठ १८४-१९८
हमारा कर्तव्य
भारतवासियों के लिये उपाय—अंगरेज़ी राज कब से—स्वाधीनता के
प्रयत्न—ब्रिटिश साम्राज्य की हालत—हमारे नैतिक आदर्श—एक मानव धर्म
की आवश्यकता—सत्याग्रह और असहयोग—हमारा भविष्य । पृष्ठ १९८-२०८
भारत में अंगरेज़ी राज
पहला अध्याय
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश
चार सौ साल पहले भारत और यूरोप का सम्बन्ध—उस समय का
भारत—भारत के जलमार्ग की खोज—भारत की खोज में कोलम्बस—
भारत में पुर्तगालियों का प्रवेश—पुर्तगालियों के अत्याचार—पुर्तगालियों
की सत्ता का अन्त—भारत में डच जाति—भारत में अंगरेज़ों का प्रवेश—
ईस्ट इण्डिया कम्पनी—जहाँगीर और अंगरेज़—शाहजहाँ और अंगरेज़—
अंगरेज़ व्यापारियों का चरित्र—औरंगज़ेब और अंगरेज़—फ़्रान्सीसियों का
प्रवेश—फ़्रान्सीसी और अंगरेज़—दक्खिन भारत में अंगरेज़ों और फ़्रान्सीसियों
के मोरचे—अंगरेज़ी राज की नींव। पृष्ठ १-३०
दूसरा अध्याय
सिराजुद्दौला
नवाब अलीवर्दी ख़ाँ—उस समय का बंगाल—सिराजुद्दौला को
अलीवर्दी की आख़िरी नसीहत—सिराजुद्दौला और बंगाल की मसनद—
( ५ )
सिराजुद्दौला के साथ अंगरेज़ों का व्यवहार—सिराजुद्दौला की अंगरेज़ों पर
चढ़ाई—विजयी सिराजुद्दौला का कलकत्ता प्रवेश—बंगाल से अंगरेज़ों
का निर्वासन—सिराजुद्दौला की उदारता—ब्लैक होल का क़िस्सा—
सिराजुद्दौला की कलकत्ते से वापसी—सिराजुद्दौला के साथ छल—सिराजु-
दौला की दयालुता—बंगाल में अंगरेज़ों का फिर से प्रवेश—साज़िशों का
जाल—कलकत्ते पर अंगरेज़ों का फिर से क़ब्ज़ा—हुगली की लूट और क़त्ले
आम—सिराजुद्दौला और अंगरेज़ों में पत्र व्यवहार—छल से सिराजुद्दौला
का कलकत्ते बुलाया जाना—विश्वासघात—अलीनगर की सन्धि—
अंगरेज़ों की ओर से सन्धि का उल्लंघन—सिराजुद्दौला और वाटसन में पत्र
व्यवहार—दिल्ली सम्राट और सिराजुद्दौला—विश्वासघात द्वारा चन्दरनगर
पर अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा—सिराजुद्दौला को धमकी—अंगरेज़ी सेना के
अत्याचार—मीरजाफ़र के साथ गुप्त सन्धि—प्लासी की लड़ाई—मीरमदन
की वफ़ादारी—मीरजाफ़र का पाप—मुर्शिदाबाद की लूट—अमीचन्द के
साथ दग़ा—सिराजुद्दौला की हत्या—सिराजुद्दौला का चरित्र।
पृष्ठ ३१-१०४
——————
तीसरा अध्याय
मीर जाफ़र
हिन्दू मुसलिम पक्षपात का प्रारम्भ—पुराने घरानों के नाश की
योजना—बिहार के राजा रामनारायण पर हमला—उड़ीसा के राजा राम
र्मसिंह पर हमला—पूर्णिया के राजा युगलसिंह पर हमला—राजा दुर्लभ-
( ६ )
राम पर हमला—मीर जाफ़र से धन की वसूली—राजा रामनारायन से
समझौता—दिल्ली के शहज़ादे अलीगौहर की बिहार यात्रा—क्लाइव को
इनाम में जागीर—भारत में अंगरेज़ी राज क़ायम करने की क्लाइव की
योजना—मीरजाफ़र के पुत्र मीरन की दूरदर्शिता—सम्राट शाहआलम—
सम्राट के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों की बग़ावत—शाहआलम की अनिश्चितता—
मीरन की हत्या—बंगाल की दर्दनाक हालत—कम्पनी की व्यापार सम्बन्धी
ज़्यादती—बंगाल में दूसरी बग़ावत की योजना—मीरजाफ़र से नई मांगे—
मीर क़ासिम के साथ गुप्त सन्धि—मीरजाफ़र का मसनद से हटाया जाना—
मीरजाफ़र पर इलज़ाम—कम्पनी को लाभ—कम्पनी की टकसाल ।
पृष्ठ १०६-१४६
चौथा अध्याय
मीर क़ासिम
बंगाल की हालत—कम्पनी के खोटे सिक्के—कम्पनी के अत्याचार—
महसूल की माफ़ी और उसका दुरुपयोग—व्यापार सम्बन्धी अत्याचार—
तिजारत के बहाने लूट—मीर क़ासिम की शिकायतें—नन्दकुमार का
देश प्रेम—मुग़लसाम्राज्य की निर्बलता—पानीपत की तीसरी लड़ाई
और भारत की स्वाधीनता—शाहआलम की बिहार पर चढ़ाई—राजा
रामनारायन से अंगरेज़ों का विश्वासघात—मीर क़ासिम का चरित्र और
शासन प्रबन्ध—मीर क़ासिम के सुधार—मीर क़ासिम के ख़िलाफ़
अंगरेज़ों की साज़िश—मीर क़ासिम पर झूठे इलज़ाम—अंगरेज़ों की लूट
( ७ )
खसोट—मुंगेर की सन्धि —मीर क़ासिम का चुंगी उठवा देना—बंगाल में
फिर से खुशहाली—दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़—मीर क़ासिम
से नई नई मांगें—मीर क़ासिम की प्रजा के साथ ज़ुल्म और ज़्यादतियां—
मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश—उदवानाला की लड़ाई—मीरक़ासिम
के ईसाई अफ़सरों की नमक हरामी—मीर क़ासिम की पराजय—मीर
क़ासिम के शासन का अन्त—मीर क़ासिम के शासन पर एक दृष्टि ।
पृष्ठ १४७-१६६
पाँचवाँ अध्याय
फिर मीर जाफ़र
मीर जाफ़र के साथ नई सन्धि—बंगाल की और बुरी हालत—मीर
जाफ़र की शिकायतें—मीर क़ासिम के अन्तिम प्रयत्न—अंग्रेज़ों के नाम
शुजाउद्दौला का प्रयत्न—शुजाउद्दौला और शाहआलम में फूट डालने की
कोशिश—शुजाउद्दौला की सेना में विश्वासघातक—बक्सर की लड़ाई—
मीर क़ासिम की मृत्यु—कम्पनी और शुजाउद्दौला में सन्धि—मीर जाफ़र
का करुणाजनक अन्त । पृष्ठ १६७-२१६
छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
नवाब नजमुद्दौला के साथ कम्पनी की नई सन्धि—नन्दकुमार की
गिरफ़्तारी—क्लाइव का दोबारा भारत आना—क्लाइव की योजना—
( ८ )
क्लाइव का इलाहाबाद आना—शुजाउद्दौला के साथ नई सन्धि—कम्पनी
को दीवानी के अधिकार—नजमुद्दौला की हत्या—भयंकर लूट और दो
अमली—खुले डाके—नमक पर महसूल—क्लाइव का व्यक्तिगत चरित्र—दो
अमली द्वारा बंगाल का नाश—दरिद्रता, दुष्काल और महामारी—खून के
आंसू । पृष्ठ २१७-२३७
सातवाँ अध्याय
वारन हेस्टिंग्स
दो अमली का अन्त—निरपराध रईसों का संहार—महाराजा नन्द
कुमार को फाँसी—बनारस की लूट और बरबादी—अवध की बेगमों पर
अत्याचार—भारत से हेस्टिंग्स की कमाई—कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा
देशव्यापी लूट—गोरखपुर के किसानों और ज़मीदारों पर जुल्म—लगान
का बढ़ाया जाना—वारन हेस्टिंग्स पर मुक़दमा—क्षमा और इनाम ।
पृष्ठ २३८-२६३
आठवाँ अध्याय
पहला मराठा युद्ध
मराठा साम्राज्य की पराकाष्ठा—मराठा मण्डल—मराठा साम्राज्य की
अवनति—दक्खिन में कम्पनी की नीति—साष्टी और बसईं पर अंगरेज़ों के
दांत—मराठों, हैदर और निज़ाम में फूट डालने के प्रयत्न—नाना फड़नवीस
की दूरदर्शिता—अंगरेज़ दूत मास्टिन की करतूतें—पेशवा नारायन राव
( ६ )
की हत्या—विद्रोही राघोबा और अंगरेज़—पूना में दूसरे पेशवा की नियुक्ति
—पहले मराठा युद्ध की जड़—अंगरेज़ों की पहली हार—अंगरेज़ों और
गायकवाड़ में सन्धि—वारन हेस्टिंग्स की दोरुख़ी चालें—मराठों को सन्देह
—हेस्टिंग्स की युद्ध की तय्यारी—पुरन्धर की सन्धि—अंगरेज़ों की सन्धि
तोड़ने की कोशिशें—कलकत्ते से अंगरेज़ी सेना का कूच—बरार के राजा
को फोड़ने के प्रयत्न—बम्बई से कम्पनी की सेना—ताले गाँव की लड़ाई—
अंगरेज़ों की दोबारा हार और दूसरी सन्धि—दूसरी सन्धि का उल्लंघन—
महारानी अहल्याबाई—अंगरेज़ों का सींधिया से झूठा वादा—सींधिया
और राघोबा के साथ गुप्त सन्धि—सींधिया के साथ विश्वासघात—समस्त
भारतीय नरेशों को मिलाने की नाना की कोशिशें—दिल्ली सम्राट के नाम
नाना का पत्र—तीसरी बार अंगरेज़ों की हार—राना गोहद, मूदा जी
भोंसले और निज़ाम का अंगरेज़ों का साथ देना—हैदरअली के अंगरेज़ों पर
हमले—अंगरेज़ों की ओर से हैदर से सन्धि की कोशिशें—सालबाई में
मराठों से सन्धि—पहले मराठा युद्ध का अन्त । पृष्ठ २६४-३०७
नवाँ अध्याय
हैदरअली
हैदरअली का जन्म—मैसूर की सेना में उसका भरती होना—हैदर
का दैव नियुक्त होना—सम्राट की ओर से सीरा का सूबेदार—शासन प्रबन्ध
और सुधार—अंगरेज़ों के साथ हैदर की पहली लड़ाई—हैदर की विजय—
उदारता—अंगरेज़ों के व्यवहार के साथ तुलना—टीपू का मद्रास पर
( १० )
हमला—हैदर के साथ निज़ाम का विश्वासघात—हैदर की माँ—वनियम
बाड़ी और आम्बूर में हैदर की विजय—अंग्रेज़ों की हार पर हार—
मंगलोर में टीपू की विजय—हैदरअली मद्रास के फाटक पर—हैदर और
बादशाह तीसरे जार्ज में सन्धि—हैदर और नवाब अरकाट में सन्धि—
मद्रास क़िले के फाटक पर हैदर की विजय के उपलक्ष में एक सन्धि—
अंग्रेज़ों का सन्धि तोड़ना—हैदर और नाना में सन्धि—हैदर का कर्नाटक
विजय करना—पूरिमपाक की लड़ाई—अरकाट की विजय—हैदर की
उदारता—हैदर की लगातार जीत—अंग्रेज़ों का भय—हैदरअली की अचानक
मृत्यु—युद्ध का अन्त—हैदर का चरित्र—उसका पद—उसकी जलसेना—
उसकी धार्मिक उदारता—हैदरअली और शङ्कराचार्य—हैदरअली का न्याय
—उसकी वीरता—सादगी—प्रजापालकता—खुशहाली। पृष्ठ ३०८-३६३
दसवाँ अध्याय
सर जॉन मैकफ़रसन
करनाटक के नवाब मोहम्मदअली और अंगरेज़ों में सम्बन्ध—मोहम्मद अली
के साथ कम्पनी की ज़्यादती—मैक्फ़रसन के कृत्य और चरित्र। पृष्ठ ३६४-३६८
ग्यारहवाँ अध्याय
लॉर्ड कॉर्नवालिस
गवरनर जनरल के नए अधिकार—टीपू सुलतान से अंगरेज़ों को भय—
टीपू के साथ युद्ध की तय्यारी—उस पर हमला—अंगरेज़ों की लगातार हार—
( ११ )
निज़ाम और मराठों का अंगरेज़ों को मदद देना—टीपू की सेना में विश्वास
घातक—श्रीरङ्गपट्टन पर अंगरेज़ों की चढ़ाई—मीडोज़ की हार—श्रीरङ्गपट्टन
की सन्धि—टीपू की प्रतिज्ञा—कार्नवालिस और दिल्ली सम्राट—कार्नवालिस
और नवाब अवध—कार्नवालिस और निज़ाम—भारत की ग्राम पंचायतें—
उनका नाश—नई अंगरेज़ी अदालतें—वकालत की नई प्रथा—इस्तमरारी
बन्दोबस्त—उस समय की देश की शोचनीय अवस्था । पृष्ठ ३६६-३९७
बारवाँ अध्याय
सर जॉन शोर
माधोजी सींधिया के नाश की तदबीरें—मराठा मण्डल की अव्यवस्था—
माधोजी सींधिया की हत्या—माधोजी की हत्या से अंगरेज़ों को लाभ—
पेशवा माधोराव नारायण की मृत्यु—अन्तिम पेशवा बाजीराव—सर जॉन
शोर और निज़ाम—सर जॉन शोर और नवाब करनाटक—रुहेलखण्ड—
सर जॉन शोर और अवध—अवध की मसनद का नीलाम—भारत के ख़र्च
पर अन्य देशों की विजय । पृष्ठ ३९८-४२४
तेरवाँ अध्याय
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा
मार्किस वेल्सली—यूरोप में आज़ादी की लहर—मैज़िनी के विचार—
अंगरेज़ों और फ़्रान्सीसियों के चरित्र में अन्तर—आयरलैण्ड की स्वाधीनता।
( १२ )
का अपहरण—भारत में मार्किस वेल्सली का उद्देश—सब्सिडीयरी
एलायन्स—ईसाई धर्म प्रचार । पृष्ठ ४२५-४३५
चौदवाँ अध्याय
वेल्सली और निज़ाम
इङ्गलिस्तान के मन्त्री के नाम वेल्सली का पत्र—निज़ाम को
सब्सिडीयरी एलायन्स के जाल में फाँसने की तजवीज़—हैदराबाद के दरबार
में दो अंगरेज़ दूत—अज़ीमुल उमरा के साथ गुप्त साज़िश—वेल्सली की
तजवीज़—अज़ीमुलउमरा की घबराहट—कम्पनी और निज़ाम में सब्सी-
डीयरी सन्धि—वेल्सली और उसके साथियों को कम्पनी की ओर से इनाम—
हैदराबाद और पूना में अन्तर । पृष्ठ ४३६-४४८
चित्र सूची
पहली जिल्द
पुस्तक प्रवेश
नाम पृष्ठ
१. कबीर साहब ( चार रंगों में ) मुख चित्र
२. तुलसीदास ( तिरंगा ) ... १०१
३. गुरु नानक ( चार रंगों में ) ... ... ... ११५
४. सन्त तुकाराम ( तिरंगा ) .. ... ... १३४
५. दरबार नौ रतन अकबरी ( चार रंगों में ) ... ... १७४
६. दारा शिकोह ( चार रंगों में ) ... ... ... १८८
मूल पुस्तक
७. सम्राट जहांगीर से सर टामस रो की
भेंट ( चार रंगों में ) ... ... १
८. काली कट-नरेश सामुरी से वास्को
दे गामा की भेंट ... ... ... ५
९. अली वर्दी खाँ ... ... ... ... ३८
१०. सिराजुद्दौला ... ... ... ... ४८
११. मीर जाफ़र और मीरन ... ... ... १२६
( २ )
१२. मीर क़ासिम ( चार रंगों में ) ... ... १८४
१३. नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला ( चार रंगों में ) ... २०४
१४. सम्राट् शाहआलम क्लाइव को बङ्गाल, बिहार
और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर रहा है ... २२१
१५. नजमुद्दौला ... ... ... ... २२३
१६. काशी नरेश चेतसिंह ... ... ... २४६
१७. छत्रपति शिवाजी ( दोरुखा ) ... ... ... २६४
१८. पेशवा नारायन राव ( तिरछा ) ... ... २७४
१९. पेशवा नारायन राव की हत्या ... ... २७६
२०. महारानी अहल्या बाई होलकर ( तिरछा ) ... २९४
२१. हैदर अली ( तिरछा ) ... ... ३३४
२२. पूरिम पाक संग्राम के लिये टीपू की सैन्य
यात्रा ( तिरछा ) ... ... ... ३४२
२३. लार्ड कार्नवालिस टीपू सुलतान के दो बेटों
को बतौर बन्धक ले रहा है ... ... ३८२
२४. पेशवा माधोराव नारायन ( दोरुखा ) ... ... ४१०
२५. ⎧ करनल बेली के मुक़ाबले के लिये ⎫
२६. ⎩ टीपू की सैन्य यात्रा ⎪ जिल्द के लिफ़ाफ़े में
२७. ⎧ पूरिम पाक का संग्राम, अंगरेज़ी ⎬
२८. ⎩ तोप खाने में आग ⎭
———
पुस्तक प्रवेश
अंग्रेज़ी राज से पहले
लेखक की कठिनाइयां
इतिहास कला
इस समय की इतिहास कला बहुत दर्जे तक आजकल की यूरोपीय
सभ्यता की पैदा की हुई है । प्राचीन चीन, भारत, ईरान, मिस्र इत्यादि में भी
यह कला थोड़ी बहुत मौजूद थी । इनमें से हर देश में उस देश की पुरानी
सभ्यता का थोड़ा बहुत लिखा हुआ इतिहास मिलता है । प्राचीन यूनान और
रोम में इस कला ने और उन्नति की । अनेक यूनानी और रोमन विद्वानों
के उस समय के लिखे हुए इतिहास आज तक प्रमाण माने जाते हैं ।
इसके बाद अरबों का समय आया और, जहाँ तक इस कला को वैज्ञानिक
ढंग से उन्नति देने और इतिहास की सच्चाई को क़ायम रखने का प्रश्न है,
२ पुस्तक प्रवेश
शायद किसी भी प्राचीन क़ौम ने इस विषय में इतना अधिक परिश्रम नहीं
किया जितना अरबों ने। ईसा की ११ वीं सदी में प्रसिद्ध मुसलमान इतिहास
लेखक अलबेरूनी ने इतिहास कला पर बड़ी सुन्दर वैज्ञानिक विवेचना की है
और इतिहास के विद्यार्थियों को सावधान किया है कि हर इतिहास लेखक
की स्वाभाविक प्रवृत्तियों से कितनी तरह की भ्रान्तियाँ पैदा हो सकती हैं
जिनसे बच सकना उसके लिए अत्यन्त कठिन है। और भी अनेक प्रामाणिक
इतिहास लेखकों और इतिहास कला विशारदों के नाम उस समय के अरबों.
में मिलते हैं। किन्तु फिर भी हमें यह स्वीकार करना होगा कि विस्तृत
इतिहास लिखने का जो रिवाज आजकल के समय में प्रचलित है वह
प्राचीन देशों में कहीं न था। प्राचीन संसार में, और ख़ास कर प्राचीन
भारत में, आजकल के अर्थों में अपने अपने देशों या जातियों के इतिहास
लिखने का काम न इतना ज़रूरी समझा जाता था और न उसे इतना
महत्व दिया जाता था। यही वजह है कि प्राचीन भारत का कोई सिलसिले-
वार इतिहास नहीं मिलता, और अधिकांश पुरानी सभ्यताओं के इतिहास
का पता लगाने के लिए हमें पौराणिक कथाओं, तरह तरह के साहित्य,
परम्परागत गाथाओं और उस समय के शिला लेखों, खुदे हुए अवशेषों,
सिक्कों इत्यादि की ही मदद लेनी पड़ती है।
वास्तव में इतिहास लिखने की कला को जो इतना ज़्यादा महत्व आजकल
दिया जाता है उसकी ख़ास वजह आजकल की मुख़्तलिफ़ क़ौमों की मानसिक
स्थिति है, और शायद मानव जाति की वास्तविक उन्नति की दृष्टि से यह कला
इतने अधिक महत्व की नहीं है जितनी समझी जाती है। आजकल किसी
समय के इतिहास का अधिकतर सम्बन्ध उस समय की राजनैतिक अवस्था
[Header]
लेखक की कठिनाइयां ३
[Body]
से होता है। शायद कोई भी मनुष्य अपने समय की राजनैतिक अवस्था की
ओर से पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकता। जाने या अनजाने हर लेखक
के विचार किसी न किसी ओर अधिक झुकते ही हैं। कोई दो लेखक ऐसे
भी नहीं मिल सकते जो अपने समय की किसी एक घटना को या किसी
ख़ास तरह की घटनाओं को एकसा महत्व देते हों। व्यक्तिगत पक्षपात या
व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के अलावा हर मनुष्य के चित्त में सामाजिक, जातीय
या साम्प्रदायिक प्रवृत्तियाँ भी अपनी जगह रखती ही हैं, और उस मनुष्य
की लेखनी पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं। इसलिए आम
तौर पर पूरी तरह निष्पक्ष इतिहास का मिल सकना यदि बिल्कुल असम्भव
नहीं तो क़रीब क़रीब असम्भव ज़रूर है। इस तरह के पक्षपात से रँगे हुए
इतिहास पाठकों में भी उसी तरह के पक्षपात को बनाए रखने का एक
अनन्त ज़रिया होते हैं। इस सब के अलावा मनुष्य की परिमित मानसिक
शक्तियों पर अनन्त तिथियों और व्यक्तियों के हालात या चरित्रों का भार
डालने की भी ख़ास ज़रूरत नहीं है। अपने या दूसरों के दोषों को याद
रखने की निस्बत मनुष्य जाति के संचित पुण्य विचारों पर दृष्टि रखना ही
मनुष्य के लिए अधिक श्रेयस्कर है। ख़ास कर राजनीति में जहाँ कि मानव
प्रेम और आत्मोत्सर्ग की जगह द्वेष और स्वार्थ ही हमारे कृत्यों को अधिक
प्रभावित करते हों। यही वजह है कि पुराने ज़माने के विद्वान अपनी अपनी
क़ौमों के विस्तृत और पूरे पूरे इतिहास लिखने के बजाय कल्पित या अर्ध-
ऐतिहासिक कथाओं के ज़रिये अपने समय के उच्च से उच्च नैतिक, सामाजिक
और धार्मिक आदर्शों को चित्रित कर देना ज़्यादा अच्छा समझते थे।
यही वजह है कि अनेक उच्च से उच्च कोटि के प्राचीन ग्रन्थों में लेखक का
४ पुस्तक प्रवेश
नाम तक नहीं मिलता। यही वजह है कि भारत के प्राचीन साहित्य से
तिथियों का ठीक ठीक पता नहीं चलता। इसी बात में मामूली इतिहास के
ऊपर रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों की श्रेष्ठता और कहीं बढ़ कर
उपयोगिता है।
इतिहास लेखक की कठिनाइयाँ
जो कठिनाइयाँ मनुष्य को अपने समय का इतिहास लिखने में होती
हैं उससे ज़्यादा कठिनाइयाँ पुराने समय के इतिहास के लिखने में होती
हैं। पिछले समय का इतिहास लिखने वाले को भी इन्हीं पक्षपात से रँगे हुए
उल्लेखों के आधार पर अपनी रचना करनी पड़ती है। काल और वस्तुस्थिति
की दूरी के कारण उसे और भी अधिक अँधेरे में टटोलना पड़ता है। भारत
का और ख़ास कर अंगरेज़ी काल के भारत का इतिहास लिखने वाले के
लिए ये कठिनाइयाँ कई गुनी अधिक बढ़ जाती हैं। ब्रिटिश भारत का
इतिहास लिखने वाले को अधिकतर अंगरेज़ों के लिखे ग्रन्थों का सहारा
लेना पड़ता है। भारतवासियों के हाथ का लिखा कोई सिलसिलेवार
इतिहास इस समय का नहीं मिलता। जो अधूरे वृत्तान्त किसी किसी
भारतवासी के हाथ के लिखे मिलते हैं, उनमें से भी अनेक के लेखक
अंगरेज़ों के धनक्रीत थे, यह बात उन्हीं के लेखों से साबित है।
संसार के इतिहास में जब जब और जहाँ जहाँ एक क़ौम दूसरी क़ौम
के शासन में आई है, वहाँ वहाँ क़ुदरती तौर पर शासक क़ौम के लेखकों की
ग़रज़ अपनी रचनाओं द्वारा यही रही है कि अपनी क़ौम के लोगों में देश-
भक्ति, आत्मविस्वास, स्वाभिमान और साहस को जाग्रत किया जावे और
शासित क़ौम वालों में इन्हीं गुणों को कम किया जावे या पैदा न होने
लेखक की कठिनाइयां ५
दिख जावे। अंगरेज़ों के लिखे हुए भारतीय इतिहास क़रीब क़रीब शुरू से
आख़ीर तक इसी दोष से रंगे होते हैं। वास्तव में शायद संसार के किसी
भी देश का इतिहास इस क़ुदरती दोष द्वारा इतना अधिक विकृत नहीं किया
गया जितना हिन्दोस्तान का। हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का सम्बन्ध ही
इस तरह का है कि इस सम्बन्ध के एक बार शुरू हो जाने के बाद निष्पक्ष
भारतीय इतिहास का लिखा जाना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो गया। एक
ओर अंगरेज़ लेखकों की साम्राज्य प्रिय दृष्टि और दूसरी ओर अंगरेज़ी काल
के ज़्याद़ातर भारतीय लेखकों की विदेशी शिक्षा, मानसिक दासता और
आजीविका की विकट परिस्थिति। नतीजा यह है कि भारतीय इतिहास की
जो पुस्तकें आजकल हमें मिलती हैं, उनमें से अधिकांश में निरर्थक तुच्छ
बातों पर ज़ोर दिया जाता है और इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं की
अवहेलना की जाती है, उन्हें दबाया जाता है, ऐतिहासिक घटनाओं के
सिलसिले के सिलसिले ग़लत बयान किए जाते हैं और अनेक व्यक्तियों के
चरित्र को सफ़ेद की जगह काला और काले की जगह सफ़ेद रंग कर हमारे
सामने पेश किया जाता है, अनेक सच्ची घटनाओं का इतिहास में पता तक नहीं
चलता और अनेक कल्पित घटनाएँ सच्ची कह कर बयान की जाती हैं। इसी
लिए इक्का दुक्का बिरले अपवादों को छोड़कर हिन्दोस्तानियों और ख़ास कर सर-
कारी विश्वविद्यालयों के हिन्दोस्तानी प्रोफ़ेसरों के लिखे इतिहास इस विषय
में और भी अधिक दूषित और लज्जास्पद दिखाई देते हैं। यह सब हिन्दोस्तान
की इस समय की ख़िलाफ़ क़ुदरत परिस्थिति का क़ुदरती नतीजा है।
इन सब विचारों के समर्थन में हम केवल थोड़े से यूरोपीय विद्वानों की
सम्मति नक़ल करते हैं।
पुस्तक प्रवेश
प्रसिद्ध फ्रान्सीसी विद्वान हरवे लिखता है—
“सब तरह के साहित्य में अभी तक इतिहास ही मनुष्य
को सब से अधिक दुराचार की ओर ले जाने वाला और उसके
चरित्र को सब से अधिक भ्रष्ट करने वाला साहित्य रहा है। जब
कभी क़ौमों के नाम पर धन लोलुपता और रक्त पिपासा को शान्त
किया जाता है, इतिहास इस तरह की लोलुपता और सार्वजनिक
हत्या को सराहनीय ठहराता है। इतिहास के पृष्ठों में छल और
कपट को चतुर राजनैतिकता का सबूत माना जाता है। जो चीज़
मामूली मनुष्यों में पाप समझी जाती है वह राज दरबारों में और
सिंहासनों पर प्रशंसनीय मानी जाती है।”*
प्रसिद्ध इतिहास लेखक लैकी लिखता है—
“राजनीतिज्ञों की ग़रज़ सदा अपना काम निकालना रहती
है । X X X सत्य से निस्वार्थ प्रेम और ज़ोरों की राजनैतिक
भावना ये दोनों साथ साथ नहीं चल सकतीं। उन तमाम देशों
में, जहाँ कि लोगों के विचार और उनके सोचने के तरीक़े
अधिकतर राजनैतिक जीवन के आधार पर बने हों, हमें यह
दिखाई देता है कि लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि को ही सत्य की
कसौटी बना बैठते हैं।”†
- "History, so far, has been the most immoral and perverting branch
of literature. It exalts greed and wholesale murder when greedy and murder-
ous lusts are satisfied in the names of nations. Fraud is taken as evidence of
clever diplomacy. What is counted immoral down low is held admirable
in Courts and on Thrones.”—M. Herve.
† “The object of the politician is expediency . . . a disinterested