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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

यार्ड¹ के जासूस आयरलैण्ड में बहुत संख्या में आ पहुँचे थे। उन लोगों का हौसला
बहुत बढ़ गया था। वे तो सिनफिन लोगों (क्रान्तिकारी) की सभाओं तक में पहुँचते
और तलाशी में अंग्रेजी सेना की सहायता करते। बहुत से निर्दोष व्यक्ति, जिन्होंने
कि शायद शस्त्र कभी छुए भी न होंगे, उनकी कोप-दृष्टि से न बच सके। वे ‘जी’
कहलाते थे। उस वक़्त बहुत से ‘जी’ मारे भी गये और मारने वाले सदा बचते ही
रहे। आख़िर तंग आकर उन लोगों ने घरों से बाहर निकलना ही बन्द कर दिया।
एक-एक दिन जासूसों की हत्या पर ख़ूब वाद-विवाद हुआ। मेरी अनोखी सूझ! मैंने
कहा कि जासूसों की हत्या की बजाय, ब्रिटिश सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि
वायसराय महोदय पर हाथ साफ़ करने से बहुत प्रभाव होगा। बात अच्छी थी। सभी
ने इसे स्वीकार कर लिया।
छठा परिच्छेद
लाट साहब पर हमला
निश्चय होते ही हमने सभी मित्रों से परामर्श लिया। सभी सुदृढ़ तथा निर्भीक साथी
हमारा साथ देने के लिए तैयार हो गये। तीन मास तो तैयारी में ही लग गये।
वायसराय महोदय की प्रतीक्षा में कितनी ही बार बड़ी निराशा भी हुई। उनका प्रोग्राम
विशेष तौर से गुप्त रखा जाता। कई स्थानों पर जहाँ कि उनका जाना आवश्यक होता,
वे न जाते। कितनी ही बार कुछेक क्षण के हेर-फेर से बच गये थे। आते आते
एकदम एक मोड़ पर मुड़ जाने से ही, कई बार उनके प्राण बच गये। इन तीन मास
में हम 12 दफे आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर वायसराय महोदय की प्रतीक्षा
ही करते रह गये। परन्तु हर बार उनका न आना, या आते-आते मुड़ जाना ही कारण
हुआ। 11 नवम्बर के दिन महायुद्ध की सन्धि होने के उपलक्ष्य में होने वाले उत्सव
में सम्मिलित होने के लिए उन्हें जाना था। ग्रेटीन ब्रिज पर से गुज़रते समय उन पर
बम गिरा दिये जायें, यही हमने सोचा। ठीक समय पर हमारे सभी साथियों ने बम
तैयार कर लिए। पिन खोले, कितनी ही देर तक वे प्रतीक्षा करते रहे। परन्तु
वायसराय महोदय न पधारे। उस दिन बर्फ़ गिर रही थी : तो भी हम पुल पर डटे
रहे। इतने में हमारे एक परिचित मित्र उधर से गुज़रे : उन्होंने समझ लिया, और
व्यंग्य मिश्रित स्वर में इतना ही कहा, ‘क्या खूब। बर्फ़ से बचने के लिए यह स्थान
तो खूब ढूँढ़ा।' हम चौंक पड़े। हमारी ओर देखकर कोई भी व्यक्ति सन्देह कर
सकता था। हम एकाएक वहाँ से चल दिये। कुछ ही क्षण बाद सैनिक लारियों ने

  1. स्कॉटलैण्ड यार्ड इंग्लैण्ड के जासूस विभाग का नाम है।
    आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 723

पुल को घेर लिया और आने जाने वाले की तलाशी ली जाने लगी। हम बाल-बाल
बच गये। बात यह हुई थी कि हमें पहचान कर अथवा सन्देहवश किसी जासूस
ने तुरन्त गवर्नमेण्ट हाउस को टेलीफ़ोन कर दिया था। इसी कारण वायसराय महोदय
नहीं आये।
इससे हम बहुत निराश हो गये। कुछ आत्मग्लानि-सी भी मालूम होने लगी।
सोचने लगे – क्या हम उतना भी नहीं कर पायेंगे? परन्तु यह अवस्था कुछ अधिक
देर नहीं रही। शीघ्र ही हमें पता चल गया कि वायसराय महोदय उत्तर की ओर से
डबलिन आ रहे हैं। संवाद-पत्रों में तो प्रकाशित हो चुका था कि वे विदेश गये हैं।
सम्पादकों को शायद यह विश्वास भी था, परन्तु हमें तो ख़ूब मालूम था कि वे
‘फ़्रेंच पार्क को रास्कामन’ में अपने मित्रों के साथ आनन्द विहार में निमग्न थे। वहाँ
पर वे बिल्कुल आरक्षित थे। बहुत थोड़ी-सी सेना वहाँ रहती थी। ‘लौज’ भी कोई
बड़ी मज़बूत न थी। हम वहाँ पर बड़ी सुगमता से उन पर आक्रमण कर सफल
हो सकते थे, परन्तु हमने जान-बूझकर वैसा नहीं किया। हम उस जगत प्रसिद्ध
व्यक्ति पर, जगत प्रसिद्ध फोनिक्स पार्क आयलैण्ड में अंग्रेज़ी शक्ति का मुख्य केन्द्र
के ठीक द्वार पर आक्रमण करके समस्त संसार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित
करना चाहते थे। ज़रा सोचिये तो जिस दिन संवाद-पत्रों में यह समाचार निकलेगा,
“आयरलैण्ड-स्थित अंग्रेज़ों के सर्वोपरि प्रतिनिधि, ब्रिटिश सेना के फ़ील्ड मार्शल,
फोनिक्स पार्क के ठीक सामने, जहाँ पर कि कुछ ही मिनट में बीस हज़ार से
अधिक सब प्रकार के आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित सैनिक आ एकत्र हो सकते
हैं, क्रान्तिकारियों के द्वारा मार दिये गये।” – उस दिन कैसा लुत्फ़ आयेगा? क्या
यह समाचार पढ़कर संसारभर के लोग यह न कहने लगेंगे कि वे वीर क्रान्तिकारी
सच्चे देशभक्त हैं। वे भीरु नहीं, कायर नहीं, बोदे नहीं, स्वार्थी नहीं हैं! उन्हें कुछ
न कुछ शिकायत ज़रूर है। परन्तु वह है क्या? उसे जानने के लिए लोग अधीर न
हो उठेंगे?...हाँ वही तो!
हमें विश्वस्त सूत्र से पता चल गया कि वायसराय महोदय 19 दिसम्बर
1919 के दिन वायसरीगल लौज फोनिक्स पार्क में पहुँचेंगे। बड़े-बड़े अफ़सर –
यहाँ तक कि लौज के प्रबन्धक इस समाचार से अनभिज्ञ रखे गये थे। परन्तु हमें
तो तिथि के साथ समय भी मालूम था। हम तो यह भी जान गये थे कि 11
बजकर 40 मिनट पर उनकी गाड़ी टर्मिनस न जाकर ऐशटाउन स्टेशन पर ही
खड़ी हो जायेगी। कैसे पता चला, यह बताने का अभी समय नहीं आया।
ऐशटाउन डबलिन नगर के केन्द्र से 4 मील की दूरी पर मीथ की ओर जाने
वाली सुन्दर रमणीक सड़क के निकट है। उसे बड़ी सड़क से सम्बन्धित करने
के लिए एक छोटी-सी सड़क जाती है जोकि 200 गज लम्बी है। दोनों सड़कों
के संगम पर एक सराय भी है। आयरिश भाषा में ऐसे ही सार्वजनिक स्थान को
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ऐशटाउन कहते हैं। स्टेशन की सड़क बड़ी सड़क से गुज़रकर सीधी फोनिक्स
पार्क को चली जाती है। फोनिक्स पार्क बड़ी सड़क से 100 गज की दूरी पर है,
उसके निकट और कोई बस्ती नहीं है, परन्तु घुड़दौड़ के घोड़ों को उतारने और
चढ़ाने के लिए ही यह स्टेशन बनाया गया था।
हम आध घण्टा पहले दो-दो की गिनती में साइकिल लेकर वहाँ पहुँचे और
अपरिचित लोगों की भाँति वहाँ जाकर बैठ गये, और कृषि या पशु-पालन सम्बन्धी
विषयों की बातचीत करने लगे, परन्तु हमें उसमें भी बहुत असुविधा हुई। हमारे कई
व्यक्ति तो इन दोनों विषयों से एकदम अनभिज्ञ थे। ज्यों-ज्यों समय निकट आने
लगा, त्यों-त्यों हमारी उत्सुकता भी बढ़ने लगी। हम ग्यारह व्यक्ति थे। चार तो वे
ही, तथा मिक मैक्डानल्ड (Mick Macdonald), टाम क्योह (Tom Keogh), मार्टिन
सैबेज आदि सात व्यक्ति और थे। हममें से केवल सात के पास रिवाल्वर थे। मार्टिन
तो उसी दिन वीरगति को प्राप्त हुए। समय पूरा होते न होते डबलिन मेट्रोपोलिटन
पुलिस के सिपाही आ धमके। वे सड़क पर खड़े हो गये। अन्दर बैठे हुए एक
सिपाही पहरे पर खड़ा नज़र आया। उसकी बाँकी टोपी, अभी-अभी पालिश किये
हुए बूट, चमकती हुई बेल और भड़कीले बदन देखकर मालूम होता था कि वे
महाशय सजधज में कोई कसर छोड़कर नहीं आये थे। उसके पास रिवाल्वर भी
था। बाद में सैनिकों की मोटर लारियाँ भी आ गईं। स्टेशन के पास सड़क में पुलिस
ही पुलिस भर गयी। यह हमें पहले भी मालूम था। हमने सभी लोगों के स्थान भी
पहले से ही निश्चित कर रखे थे।
सीटी सुनायी दी, सभी चौंक पड़े। एक ने दूसरे की ओर देखा परन्तु हिले नहीं।
एक क्षणभर की तेज़ी से बना-बनाया खेल बिगड़ सकता था। फिर हमने स्टेशन
से मोटरों के चलने का स्वर भी सुना। बाहर निकलकर खड़े हुए। कार्य की स्कीम
यह थी कि वायसराय महोदय दूसरी मोटर में आयेंगे। अतः जिस समय पहली मोटर
गुज़र जाये, उस समय मैं, श्री क्योह तथा श्री मार्टिन सैबेज वहाँ खड़े छकड़े को
ढकेलकर दूसरी मोटर के सामने खड़ा कर दें, ताकि वह मोटर वहीं रुक जाये।
हमने छकड़े को खींचना शुरू किया, परन्तु - ओह। यह तो बहुत भारी था। उस
अभिनय का पहले रिहर्सल भी तो न किया था, ख़ैर उस समय उसे ज्यों-त्यों
खींचा। परन्तु क्या देखता हूँ कि वही डबलिन मेट्रोपोलिटन पुलिस का सिपाही मेरे
सामने खड़ा, मुझे आगे जाने से मना कर रहा है। उसने मुझे बड़े यत्न से यह समझाने
की चेष्टा की कि अभी यहाँ से वायसराय गुज़रने वाले हैं, परन्तु मैं भला उसे किन
शब्दों में समझाता कि उन्हीं से तो अभी हमारी विशेष मुलाक़ात होने को है। मैंने
पहले तो चाहा कि उसकी कुछ परवाह ही न करूँ; परन्तु वह मूर्ख तो अपनी ही
हाँके जा रहा था। रिवाल्वर का प्रयोग करना भी अनुचित था। गोली के शब्द से
यदि सारी सैनिक शक्ति चौकन्नी हो गयी, तो भी सारा काम बिगड़ जायेगा। करें
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 725

तो क्या? इधर समय व्यर्थ नष्ट हो रहा था। आख़िर लोहे का सींखचा उसके सिर
पर दे मारा। वह वहीं लोट-पोट हो गया।
उधर हमारी असुविधा को देख हमारे एक साथी ने बम भी फेंक दिया था।
परन्तु उसने पिन निकाल दिया था। बम फटा। हमारे घाव तो नहीं आये, परन्तु धमक
से एक बार तो सभी धराशायी हो गये। उठे तो पहली मोटर आ पहुँची थी। उसके
गुज़रते ही हमने छकड़ा ज़रा और आगे धकेलकर उस पर गोली छोड़ दी। पहली
मोटर तो हवा हो गयी और दूसरी वहीं रुक गयी। मोटर पर हमारे साथी बमों की
वर्षा करने लगे। शत्रु की गोली के निशाने के साथ-साथ उनके बिल्कुल पास रहने
के कारण अपने साथियों द्वारा फेंके गये बमों की जद में भी हम थे। और दूसरी
ओर से एक और सैनिक लारी गोलियाँ बरसाती हुई आ धमकी। मेरी बाई टाँग में
गोली लगी। देखभाल करने का तो अवसर नहीं था, परन्तु इतना ज़रूर अनुभव हुआ
कि गोली उस पार निकल गयी है। उस समय सिपाही लोग बहुत घबरा गये थे।
वरना हम लोगों के लिए वहाँ अधिक देर तक ज़िन्दा बचे रहना एकदम असम्भव
था।...परन्तु आह! एक निर्दयी गोली बेचारे मार्टिन सैबेज के आ ही लगी। आह!
बेचारा मेरी गोद में आ रहा। भोला-सा यह सुन्दर बालक, कितने चाव और उत्साह
से अभी एक घण्टा पहले आयरिश स्वतन्त्रता तथा आत्मोत्सर्ग के वीरतापूर्ण गीत
गाता आ रहा था और अब...अब वह उन्हीं को क्रियात्मक रूप दे रहा था। मैंने उसे
पृथ्वी पर लिटा दिया। होंठ हिलते देख, झुका तो उसके मन्द क्षीण स्वर में यह
सुन पाया। 'डेन। मैं जाता हूँ, परन्तु संग्राम जारी रखो।' वह करुणाजनक दृश्य मुझे
कभी नहीं भूलेगा। मानो तरुण आयरलैण्ड अपने रक्त से स्वतन्त्रता की पुस्तक की
भूमिका लिखने की तैयारी में था। आह! वह दृश्य कभी नहीं भूल सकूँगा। मैं उस
ग़रीब का सिर गोद में लिए बैठा उसका अन्तिम सन्देश सुन रहा था, और चारों
ओर से गोलियों की वर्षा हो रही थी। अपने वीर साथी की वीरगति पर, उनकी
शोकजनक मृत्यु पर आँसू बहाने का अवसर कहाँ था? जिस वीर ने 1916 में पहली
बार अपने देश के लिए शस्त्र उठाया था, वही आज, अपने देश के लिए ही लड़ते
हुए स्वर्ग-धाम सिधार गया। वह आयरिश माता की सेवा के लिए जीता रहा और
अन्त में उसी के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर गया। बम ख़त्म हो गये, पिस्तौल
ख़ाली हो गयी, एक साथी मारा गया, कुछ देर बाद गोली चलनी भी बन्द हो गयी।
हम उस सराय में जा पहुँचे। वहाँ से गोली चलाने की सोचने लगा तो खाकी वर्दी
वाला कोई भी न दीख पड़ा। सब रफ़ू-चक्कर हो चुके थे। वहाँ पर मोटर का ज़ख़्मी
ड्राइवर, जिससे बाद में एक बार और मेरा वास्ता, बिल्कुल विपरीत अवस्था में
पड़ा, तथा ज़ख़्मी श्री मार्टिन का शव पड़ा था। श्री मार्टिन का शव सराय में छोड़कर
हम लोग साइकिलों पर नगर की ओर चल दिये।
726 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सातवाँ परिच्छेद
वायसराय बाल-बाल बच गया
जिस दुकान या सराय पर पहले आकर बैठे थे, वहीं पर श्री सैबेज का सिर रखकर
हम लोगों ने सांग्रामिक मन्त्रणा की। हम बड़े हर्ष और चाव से अपनी सफलता की
आलोचना कर रहे थे, यह सोचकर कि सैनिक लारी वायसराय महोदय का शव
मात्र ही ले जा पायी है, हम फूल उठते। ख़ैर! शेष नौ साथियों को किंचित मात्र
खरोंच तक नहीं आयी। केवल मैं ही बुरी तरह घायल हो गया था। मेरे घाव से रक्त
की धारा बह रही थी। अपने वीर साथी के शव पर अन्तिम प्रार्थना पढ़कर, हम
लोग अपनी-अपनी साइकिलों पर डबलिन नगर की ओर चल दिये। अभी कुछ
अधिक दूर नहीं गये थे कि सीमस राबिन्सन की साइकिल ख़राब हो गयी। वे झट
कूदकर श्री ट्रीसी के पीछे जा खड़े हुए, परन्तु दो को लेकर चलना कितना कठिन
है, और इस स्थिति में कितना हानिकारक, यह कोई भी अनुमान कर सकता है।
परन्तु यह असुविधा अधिक देर तक नहीं रही। सामने से एक महाशय अपनी
साइकिल लिए पैदल चले आ रहे थे। सांग्रामिक नियमों और कर्त्तव्यों तथा शान्ति
परिस्थितियों के नियमों के कर्त्तव्यों में बहुत अन्तर होता है। इसी विश्वास के कारण
झट राबिन्सन महोदय ने अपनी पिस्तौल के बल पर साइकिल माँग ली, जो तुरन्त
मिल गयी। परन्तु उन महाशय से यह भी कह दिया गया कि वे संध्या समय ग्रैशम
होटल के द्वार पर पड़ी हुई अपनी इस साइकिल को ले आवें।
नगर में हम शान्तिपूर्वक पहुँच गये। फिब्स बीरी सड़क पर स्थित श्रीमती
टूमी (Tomei) के घर पर ठहराया गया। मेरे रक्त के छींटों के चिह्न से पुलिस
नगर तक तो आ गयी, परन्तु फिर उसे आगे कुछ पता न चल पाया, यहाँ पर
अच्छे-अच्छे डॉक्टर लोग मेरा इलाज करने लगे। श्रीमती टूमी का व्यवहार बहुत
ही प्रशंसनीय था।
उसी दिन सायंकाल नगरभर में हो-हल्ला मच गया। अख़बार बेचने वालों ने
इतना कोलाहल मचाया कि बस तौबा भली। मैंने सुना, वे चिल्ला रहे थे, 'लॉर्ड
लेफ़्टीनेण्ट पर भीषण आक्रमण! एक्स टाऊन पर भयंकर युद्ध!! एक आक्रमणकारी
की मृत्यु!!!' परन्तु यह क्या? वह तो यह भी कह रहा है – 'लॉर्ड महोदय साफ़
बच निकले?' निश्चय ही हमारा सब प्रयत्न निष्फल हो गया। आज ही पहली बार
लॉर्ड महोदय दूसरी मोटर पर न बैठकर, पहली मोटर में चढ़ बैठे थे। आह। तभी
तो...! जिस गाड़ी को भयभीत कर भगा देने में ही हम सन्तुष्ट हो गये थे, वही हमारे
उद्देश्य की अपूर्णता-उद्योग की निष्फलता का कारण हो गयी। यह समाचार हमारे
लिए वज्रपात से कुछ कम न था। मेरे घावों की पीड़ा बहुत बढ़ गयी। मुझे बहुत
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 727

दुख हुआ। परन्तु हर समय प्रसन्न रहने वाले श्री ट्रीसी ने इस बार हँसी में कह ही
तो दिया, “डेन। हर बार तो तुम्हें नाकलांग नहीं मिल सकते। सफलता का आनन्द
उठाया है, तो ज़रा असफलता का भी मज़ा चखो।” लॉर्ड महोदय पर फिर कभी
आक्रमण करने का अवसर हमें नहीं मिला। अब तो प्रसन्न हैं कि लॉर्ड महोदय उस
दिन बच गये थे। वैयक्तिक रूप से तो उनके प्रति हमें कोई द्वेष नहीं था। हम तो
अपने एकमात्र शत्रु – इंग्लैण्ड के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे।
जो भी हो, पादरी लोगों तथा संवाद-पत्रों ने हमें जी भरके कोसा। परन्तु
जनसाधारण की सहानुभूति हमारे ही प्रति थी। वे जानते थे कि हमारा यह युद्ध
स्वतन्त्रता के लिए लड़ा जा रहा है, और यह तब तक जारी रहेगा जब तक कि
या तो इंग्लैण्ड घुटनों के बल न झुक जाये, या फिर हम ही क़ब्ज़ों में न जा रहें।
परन्तु लोगों के धन से चलने वाले ‘आयरिश इण्डिपेण्डेण्ट’ (Irish Independent)
ने एक अग्र-लेख द्वारा हमें जी भरकर कोसा। नीचतापूर्ण मूर्खता, घृणित हत्या
आदि-आदि शब्दों से वह लेख भरा पड़ा था। जिस पत्र ने आयरिश प्रजातन्त्र की
स्थापना के लिए चिल्ल-पों मचाया था, वही आज चैन से न बैठ सका। वही,
सरकारी कमीशन द्वारा की जाने वाली खोज अथवा अनुसन्धान की परीक्षा न कर
हमारे मृत वीर पर घृणित और नीच आक्षेप करने पर तुल पड़ा। यह हम लोगों के
लिए एकदम असह्य हो उठा। मैं तो घायल हो चुका था परन्तु श्री पोडर क्लेंसी
अपने साथ 20-25 युवकों को लेकर उक्त समाचारपत्र के कार्यालय में जा
धमके। सम्पादक महोदय को यह जताकर कि आज आपका कार्यालय व प्रेस
स्वर्गारोहण कर जायेगा, अपने इन शब्दों की सार्थकता का प्रमाण देने लगे। मशीनें
आदि तोड़-फोड़कर सभी कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर, वे लोग यह समझकर कि अब
कुछ दिन सम्पादकगण विश्राम कर पायेंगे, लौट आये। परन्तु अगले ही दिन अन्य
मुद्रणालयों की सहायता से पत्र नियमित रूप से प्रकाशित होने लगा। यह भी
अच्छा ही हुआ, क्योंकि हमारे कई आयरिश प्रजातन्त्रवादी सैनिक वहाँ पर काम
करते थे, उन्हें बेकार नहीं होना पड़ा। इस घटना से समाचारपत्रों की लेखन शैली
में महान अन्तर आ गया। सरकार ने क्षतिपूर्ति के लिए उक्त संवाद-पत्र को
16,000 पाउण्ड प्रदान किये थे, परन्तु अब वह संवाद-पत्र अंग्रेज़ों के विरुद्ध
बहुत ज़ोर से लिखने लगा।
श्री मार्टिन सैबेज का शव पुलिस ले गयी और जाँच के बाद शव उनके
सम्बन्धियों को दे दिया गया। डबलिन के पादरियों ने तो उन्हें क़ब्रिस्तान में स्थान
देने से भी साफ़ इन्कार कर दिया। श्री मार्टिन के शव का जुलूस निकला और वह
जुलूस इतना विस्तृत हो गया था कि शायद ही कभी पश्चिम आयरलैण्ड में ऐसा
जुलूस देखने में आया होगा। मीलों तक शोकग्रस्त लोग अश्रुपात करते हुए पीछे-पीछे
चले आ रहे थे। बिशप ने प्रार्थना आदि की परन्तु सैनिक अन्त तक सबको रायफ़लों
728 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

से घेरे खड़े रहे। वह वीर, धीर और निर्भीक सैनिक सर्वथा इस सब सम्मान का
पात्र था।
संवाद-पत्रों में अपने आक्रमण सम्बन्धी विवरण पढ़कर हमें बहुत हँसी आती।
लिखा था, सैनिकों ने लारियों में सवार होकर आक्रमणकारियों का पीछा किया।
परन्तु उसी समय मेरे सामने फोनिक्स पार्क की ओर भाग जाने वाले सैनिकों का
चित्र खिंच गया। अगर सशस्त्र सैनिकों ने मोटरों में बैठकर हमारा पीछा किया होता,
तो हम बच कैसे जाते?
बाद में मुझे डबलिन के दक्षिण भाग में श्रीमती मैलोन के घर भेज दिया गया,
इनसे पहले से भी हमारा परिचय था। उनका एक पुत्र 1916 के विद्रोह में मारा
गया था। वहाँ पर मेरी चिकित्सा ख़ूब अच्छी तरह हुई। इसके कुछ ही दिन पहले
उनकी बड़ी लड़की ब्रिघिड मैलोन से मैंने हँसी में कहा था, कि अगर मैं घायल
हो गया, तो सुश्रूषा का भार आप ही पर पड़ेगा, सो सच ही निकला। उनका सहवास
मेरे लिए अत्यन्त सुखकर था और इससे मेरे घाव भी शीघ्र ही ठीक हो गये। इस
सहवास से ही श्रीमती ब्रिघिड मैलोन से मेरा प्रेम हो गया था और डेढ़ वर्ष बाद
हमारा विवाह भी उनसे ही हुआ। वह घटना किसी प्रकार की औपन्यासिक
रोमांचकारी घटनाओं से कम नहीं। उसका विवरण हम फिर लिखेंगे।
1920 के प्रारम्भ में 1919 की घटनाओं का सिंहावलोकन करने का मुझे ख़ूब
अवसर मिल गया। सोलोहैडबेग की घटना के बाद अपराधों, हत्याओं आदि की
संख्या उत्तरोत्तर बढ़ने लगी। कई स्थानों पर उनके शस्त्र छीन लिए गये थे। सरकारी
रिपोर्ट में यह घटनाएँ ख़ास ज़ोरदार शब्दों में लिखी गयी थीं। परन्तु हमारा तो जी
चाहता था कि आगामी वर्ष में इन 'अपराधों' की संख्या बहुत बढ़ चढ़ जाये।
सरकार ने इनका वर्णन करते हुए अपने अत्याचारों की ओर निर्देश मात्र भी न करने
में बहुत बुद्धिमता का परिचय दिया था। आयरिश प्रजातन्त्र को गैर-क़ानूनी घोषित
कर देना, स्त्रियों तथा बालकों के संघों को ख़िलाफ़-क़ानून क़रार देना,
स्वेच्छा-सेवक संघ को तहस-नहस करने का पूर्ण प्रयत्न करना, उसके लिए
मामूली बातें थीं। श्री आर्थर ग्रिफिथ ने तो लिखा है कि 'समस्त आयरिश जाति'
गैर-क़ानूनी घोषित कर दी गयी थी। अभी (उस समय) तो सरकार ने रात्रि के
घण्टे¹ (Curfew) नहीं लटकाये थे, अभी तो उसने बिस्तरों में सोये हुए निर्दोष
व्यक्तियों को मार डालने का उद्योग भी शुरू नहीं किया था। गाँव के गाँव जला
देना, भागने का प्रयत्न करने के अपराध में कैदियों को गोली से मार देना, पादरियों

  1. इस घण्टे के बजने के बाद अपने घर से निकलने की सख्त मुमानियत रहती है और
    निकलने वाले अमूमन पुलिस की गोलियों के शिकार होते हैं।
    आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 729

तथा बालकों की हत्याएँ, आयरिश महिलाओं की लांछना — यह सब बातें तो अभी
तक नहीं हुई थीं। मैं यह सब क्यों कहता हूँ, केवल इसलिए कि सरकार ने जब
अपने इन आरम्भ के ही अत्याचारों का उल्लेख तक न किया था, तो बाद को ये
सब अत्याचार प्रदोष का घण्टा बजने पर पुलिस की गोलियों की बौछार से नित्य
बीसों स्त्री-पुरुषों को सदा सर्वदा के लिए अनन्त निद्रा में सुला देना आदि...लोगों
के सामने कैसे आ सकता है?
1920 की वसन्त ऋतु में, मैं उस अति सुन्दर तथा रमणीक ग्रेन्थम स्ट्रीट के
घर को छोड़ तारा पर्वत के पास ‘रायलमीथ’ में जा रहा। यह ऐतिहासिक स्थान
है, वहाँ पर रहते हुए आयरलैण्ड के उज्ज्वल भूत तथा भविष्य के न जाने क्या क्या
विचार मेरे दिल में आ-आकर मुझे रोमांचित कर गये। 1099 के विद्रोही वीर भी
इसी स्थान पर धराशायी होकर वीरगति को प्राप्त हुए थे। वहीं पर झुककर न जाने
कितनी बार हमने यह प्रार्थना की “उनकी इच्छा, उत्कटेच्छा — जिसके लिए
उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था आज हमारे ही युग में पूर्ण हो जाये।”
यहाँ पर हमारा बहुत से मित्रों से परिचय हुआ।
कुछ दिन बाद अकर्मण्यता चुभने लगी, उधर कार्क लार्डमेयर श्री टायरमैक
कर्टन घर से सोये हुए परिवार के सामने पुलिस द्वारा मार दिये गये। और भी
बहुत-सी ऐसी ही अत्याचारपूर्ण हत्याएँ हुईं। तुरन्त डबलिन पहुँचा। सभी मित्रों से
मन्त्रणा की ओर फिर मैं तथा श्री ट्रीसी साइकिल ले टिप्रेरी को चल दिये। उस
दिन वहाँ 12 मास के पश्चात प्रवेश किया था। 1920 के ईस्टर सप्ताह में श्री
राबिन्सन तथा मैंने, डबलिन में ईस्टर के उत्सव में सम्मिलित होने का दृढ़ निश्चय
कर लिया। श्री विनसैण्ट के साथ हम भी मोटरों में बैठकर उधर चल दिये। 1916
के विद्रोह के बाद से अंग्रेज़ी सेना इन दिनों में विशेष तैयारी करती, नगर से
कई-कई मील बाहर तक मोर्चेबन्दी की जाती तथा प्रत्येक आने जाने वाली मोटर
की तलाशी ली जाती। परन्तु हमें इस बात का ध्यान ही न था। हाइड हॉल ट्राम्बे
टरमिनस के पास पहुँचने पर एक मोड़ पर मुड़ते ही हमारी एक सैनिक लारी से
भेंट हो गयी। वे हमारी तलाशी लेने के लिए रुक गये। परन्तु हमारी भोली आकृति
से प्रभावित होकर सैनिकों के अध्यक्षों ने हमारी तलाशी लिए बिना ही, सैनिकों को
चलने की आज्ञा दे दी। हम बहुत प्रसन्न हुए। खूब जी खोलकर हँस ही रहे थे कि
‘ठहरो’ का शब्द सुनकर चौंक पड़े। क्या देखा, मोर्चा-सा बना हुआ है और क़रीब
20 सैनिक रायफ़लें लिये वहाँ खड़े हैं। हँसी तो गयी ही, साथ ही अब विपत्ति की
आशंका से कुछ घबराये भी। खैर! सामने से एक अफ़सर हाथ में रिवाल्वर लिए
आगे बढ़ा और उसने कहा कि मुझे आपकी मोटर की तलाशी लेनी है। मैंने अत्यन्त
सहज भाव से कहा, आप निःसंकोच ही तलाशी ले लीजिये परन्तु हमें ज़रा जल्दी
है। कार्य बहुत ज़रूरी है किंचित मात्र की देरी होने से हमारी भारी हानि हो सकती
730 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

है। क्षणभर सोचकर उन्होंने हमें चले जाने की आज्ञा दे दी।
हम मोटर की तलाशी लेने की आज्ञा न दे सकते थे, क्योंकि उसमें तो बहुत
कुछ रायफ़लें, रिवाल्वर आदि भरे पड़े थे। पर यदि उनमें से किसी ने तलाशी लेने
का प्रयत्न भी किया होता जो यही प्रयत्न उनका अन्तिम प्रयत्न होता। जो भी हो
उन दिनों में सिवाय हमारी मोटर के कोई भी मोटर ऐसी न जा पायी जिनकी उन
लोगों ने तलाशी न ली हो! सौभाग्य!
आठवाँ परिच्छेद
जनरल लूकसा को क़ैद,
पुलिस बैरकों पर आक्रमण
पुलिस वालों ने बैरकों से निकलना बन्द कर दिया। छोटे-छोटे बैरकों के नित्य प्रति
जलाये जाने के समाचार आ रहे थे। सरकार ने भी अब बड़ी चौकियाँ बनवानी शुरू
कर दीं। उनके मकान बड़े सुदृढ़ तथा सुरक्षित होते और पुलिस वाले अधिकतर
उन्हीं में छिपे पड़े रहते। हमने सोचा, यदि पर्वत हजरत मुहम्मद के पास नहीं जाते,
जो हजरत मुहम्मद को ही उनके पास जाना होगा। अगर पुलिस वाले बाहर नहीं आते
तो हमें ही वहाँ जाना होगा। उस समय उनके अत्याचारों के कारण जनसाधारण में
भी उनके विरुद्ध बहुत घृणा बढ़ चुकी थी। दूसरी ओर सरकार बदमाशों को
उत्साहित कर, अपराधों के लिए उत्तेजित करने लगी। यहाँ तक कि हत्या के
अपराधी भी निर्दोष कहकर मुक्त कर दिये जाते। इसी अवसर पर आयरिश स्वेच्छा
सेवक लोगों की रक्षा का कार्य करने लगे, जिससे प्रजा की उनके प्रति सहानुभूति
और भी बढ़ गयी।
इन्हीं दिनों में निश्चय किया गया कि अब पुलिस चौकियों पर आक्रमण करना
चाहिए। सबसे पहला आक्रमण आईरागलैन में हुआ। इस आक्रमण का नेतृत्व श्री
लियमलिंच के हाथ में था। आप आयरिश रिपब्लिकन (प्रजातन्त्र) सेना के प्रमुख
कार्यकर्ता थे। उनसे मेरा परिचय 1919 की शरद ऋतु में हुआ था। उस समय वे
भी मेरी तरह दौरे पर ही थे। उन्होंने फर्माये के गिरजे में जाते हुए 12 सिपाहियों
की रायफ़लें छीन ली थीं। लड़ाई में एक सिपाही मारा गया था और लियम महाशय
घायल हो गये थे। उसके प्रतिकार में उस समय पुलिस वालों ने बहुत-सी दुकानें
लूट ली थीं। उन्हीं लियमलिंच के नेतृत्व में आईरागलैन का यह सफल आक्रमण
हुआ था। इसके बाद ऐसी ही दूसरी घटना क्लेयर में श्री माईकेल ब्रेनन के नेतृत्व
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 731

में हुई। उन्होंने वहाँ के सारे शस्त्र तथा बारूद आदि छीन लिए। तीसरा आक्रमण
लैण्डर्स की चौकी पर हुआ। यहाँ पर तीन सिपाही घायल हो गये और चौकी जला
दी गयी। एक बार सीनमैलोन नायक थे।
इधर हमने टिप्रेरी पहुँचकर यही कार्य शुरू कर दिया। एक बार तो रातभर
लड़ाई होती रही। हम सड़कों पर बड़े-बड़े वृक्ष काट कर डाल देते, ताकि सैनिक
लारियाँ धड़ाधड़ न चल पायें। टेलीफ़ोन आदि के तार काट डालते, मकान के
आमने-सामने जहाँ कहीं स्थान मिलता, बैठकर छोटी मोटी खान में बारूद भर कर
उसे एकाएक उड़ा देते और फिर उन लोगों को आत्मसमर्पण करने का आदेश देते।
उपरोक्त घटना के समय पुलिस वाले भी डट गये। उन्होंने आज्ञा का पालन नहीं
किया। खूब लड़ाई हुई। आख़िर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें 'मार्च' की
आज्ञा दे बाहर निकाला। उनके शस्त्रादि छीन लिए और उन्हें छोड़ दिया। उस समय
प्रातःकाल हो चुका था।
यह 4 जून 1920 की घटना है। ठीक उसी दिन कैपव्हाइट पर भी आक्रमण
हुआ था। इन सब आक्रमणों में हमारे 30-40 व्यक्ति हुआ करते थे। हमारे तीनों
आक्रमणों में किसी भी व्यक्ति को कोई घाव नहीं लगा था। इन्हीं दिनों, 27 जून
1920 के दिन सीन मैलोन महाशय ने किलमैलौक पुलिस स्टेशन पर जोकि नगर
के ठीक मध्य में स्थापित था, आक्रमण कर दिया, खूब लड़ाई हुई, मकान में आग
लगा दी गयी। परन्तु आक्रमणकारियों में से श्री स्कल्ली मारे गये। अतः युद्ध रोक
देना पड़ा। विपक्षी दल के 2 मरे, 6 घायल हुए और जो 2 आत्मसमर्पण की मन्त्रणा
देने के अपराध में एक कमरे में बन्द किये गये थे, वे वहीं जल मरे।
आयरिश-स्वेच्छा-सेवक संघ के एक प्रमुख कार्यकर्ता बॉब बार्टन राजद्रोह के
अपराध में दस वर्ष के लिए कारागार में बन्द कर दिये गये। सरकार का एकदम
ऐसा अनुचित व्यवहार देखकर निश्चय किया गया कि ब्रिगेड जनरल लूकस को
पकड़ लिया जाये। वे उन दिनों फर्माय में मछलियों का शिकार खेलने गये हुए थे।
उन्हें तथा उनके दो साथियों को लिंच महोदय कैद कर लाये। वे लोग मोटर में
बैठे-बैठे अरबी भाषा में बातचीत करने लगे। इसका सारांश तो कुछ मिनट बाद
स्वतः ही स्पष्ट हो गया, जब उन्होंने एकदम आक्रमण कर दिया। उनमें से एक
व्यक्ति घायल हो गया। लूकस को तो लिंच महोदय साथ ले आये, परन्तु शेष दोनों
को उन्होंने फर्माय की पुलिस चौकी में पहुँचा दिया। परिणामस्वरूप सरकार ने
फर्माय नगर को जला डाला। जो भी हो, लूकस महाशय को क़ैद रखा गया। वे
एक वीर सैनिक थे। उनके साथ बहुत सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा। इस
बात को बाद में उन्होंने भी स्वीकार किया। उन्हें पूर्व लिम्मर्क के एक मकान में
कैद किया गया। वहीं से वे 29 जुलाई को भाग निकले।
732 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

उधर नित्य प्रति डाक लुट जाने के कारण सरकार ने लिम्मर्क नगर से लिम्मर्क
जंक्शन तक सैनिक लारियाँ भेजने का प्रबन्ध कर दिया था। हमने इस पार्टी पर
आक्रमण करने के लिए 30 जुलाई का दिन निश्चित किया। उधर लूकस महाशय
कहीं दौड़ते-भागते इन मोटरवालों से जा मिले। उन्होंने आपको मोटर में बिठा लिया।
इसी लारी पर हमने आक्रमण किया। लड़ाई में सिपाहियों के दो साथी मारे गये।
दूसरे दिन संवाद-पत्रों में ‘जनरल लूकस को पुनः गिरफ़्तार करने का निष्फल
उद्योग’ शीर्षक देखकर ही हमें मालूम हुआ कि लूकस महाशय भाग निकले थे।
जो भी हो, इस प्रकार की घटनाओं की संख्या नित्य प्रति अधिक होती जा
रही थी और उधर पुलिस के अत्याचार भी बढ़ते चले जा रहे थे।
नवाँ परिच्छेद
उड़ाऊ जत्था
मैंने अपने दल के सामने एक नया प्रस्ताव रखा। यदि प्रत्येक काउण्टी में एक-एक
उड़ाऊ जत्था स्थापित किया जाये तो बहुत सुविधा हो। अर्थात अब तक तो हमारे
सारे आक्रमण उन लोगों पर निर्भर रहे, जो रातभर हमारे साथ रहते और प्रातः होते
ही अपने घरों को लौट जाते। उनकी पारिवारिक परिस्थितियाँ कई बार उनके कार्य
में विघ्नकारी सिद्ध होती थीं। अतः मेरा तो यही अनुभव था कि युद्ध में भरोसा उन्हीं
लोगों पर किया जा सकता है जोकि हर समय साथ रहें। ट्रिप्रेरी के स्वेच्छा-सेवकों
की सहायता पाने की आशा से नाकलांग वाली घटना के समय हमें बड़ी असुविधा
हुई थी! फिर वे लोग रातभर तो लड़ते, दिन को उन्हें घर लौट आना आवश्यक
हो जाता। और यदि 20-30 मील की दूरी पर युद्ध करने की ठनती तो और भी
कठिनाई का सामना होता। अब सहस्रों युवक हमारे इर्द-गिर्द एकत्र होने लगे। उन्हें
भी संगठित तथा शिक्षित करने के लिए बहुत से कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी।
उन जत्थों को सुप्तप्रायः देशों में भेजकर वहाँ भी उथल-पुथल मचायी जा सकती
थी। अन्त में मेरा प्रस्ताव स्वीकार हो गया।
अंग्रेज़ लोग भी बड़ा उग्र रूप धारण कर रहे थे। उन्होंने पुलिस वालों को
असीम अधिकार दे डाले! वे लोग कभी भी किसी भी व्यक्ति को बाज़ार में घेर
कर उसकी तलाशी ले डालते। जब, जहाँ जी में आता, जिसे बन पड़ता, क़िले में
ले जाते, तथा उन्हें हमारे सम्बन्ध में सूचनाएँ देने के लिए उत्पीड़ित किया करते।
वे लोग इच्छानुसार किसी नगर में किसी भी भाग को घेर लेते और कई कई दिनों
तक छोटे छोटे कमरों से लेकर अट्टालिकाओं तक हमारी तलाश किया करते।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 733

सबसे मुख्य बात तो थी ‘हत्यारे दल’ की स्थापना। उसमें भूतपूर्व सैनिक तथा
साधारण अपराधों के कैदी आदि ही थे। उन लोगों को भारी वेतन दिये जाते और
यह विश्वास दिलाया जाता कि उनके किसी भी कार्य का उत्तरदायित्व उन पर न
डाला जायेगा। उनका कर्त्तव्य था कि वे क्रान्तिकारियों को जहाँ कहीं पावें,
निस्संकोच मार डालें। उसके लिए भी उन्हें विशेष प्रमाणों की आवश्यकता न होती।
जिस किसी पर उन्हें किंचित मात्र भी सन्देह हो उसे ही वे मार डालते थे। ऐसी
दशा में हमें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ा। ऐसी भयंकर दशा में भी
उक्त जत्थे का अस्तित्व साधारण सिपाहियों तथा सैनिकों से गुप्त रखा गया था।
परन्तु हम लोगों को तो उन लोगों के बारे में बहुत कुछ ज्ञात हो चुका था। किस
व्यक्ति ने किस हत्या में भाग लिया है, यह भी हमसे छिपा न था। कौन किस
ड्यूटी पर लगाया गया है, हम खूब जान गये थे। उनके प्रमुख कार्यकर्ताओं के चित्र
भी हमारे पास विद्यमान थे, जोकि हमने अपने सभी मित्रों में बाँट दिये थे।
एक दिन मैं भी इन लोगों के फन्दे में फँस गया। रात के ग्यारह बज चुके थे।
12 बजे के बाद घरों से बाहर रह, निर्दयी अंग्रेज़ सैनिकों की गोलियों की निरन्तर
बौछार से मरना सभी को नापसन्द था और हमें तो वह विशेष तौर से! शीघ्र ही
‘केरोलेन’ के घर पहुँचने के विचार से एक कार पर चढ़ गया। मैं उस समय नैलसन
पिल्लर के पास था। मेरे साथ ही पाँच व्यक्ति और चढ़े। मैंने उन्हें पहचान लिया।
वे सभी उसी ‘हत्यारा दल’ के सदस्य थे। उनमें दो तो मेरे साथ ही एक बैंच पर
मेरे दायें बायें बैठ गये। करूँ तो क्या? शान्ति के अतिरिक्त कोई उपाय न था।
सिगरेट निकालकर सुलगा लिया। कुछ देर तक वे भी बिल्कुल शान्त होकर बैठे
रहे। सोचा, शायद किसी अन्य कार्य के लिए किसी ओर जा रहे होंगे। मेरा तो उन्हें
ध्यान भी नहीं होगा। ऐसी बात सोचकर हृदय की उद्विग्नता को शान्त करने की
चेष्टा कर ही रहा था कि एकाएक उन दोनों व्यक्तियों को जोकि मेरे दाहिने बायें
बैठे थे, हाथ एकाएक जेबों में घुसे, और वे कुछ निकालने लगे। मुझे यह सब समझ
जाने में कुछ देरी नहीं लगी। मैंने तुरन्त अपना रिवाल्वर निकाल लिया। मेरी इस
तेज़ी से वे घबरा उठे। मैंने अपना रिवाल्वर उनके सामने तान दिया। वे तीनों नीचे
उतर गये और मैं भी। परन्तु अब क्या होगा? गोली चलेगी तो अभी बहुत से सैनिक
आ एकत्र होंगे। थोड़ी देर बाद रात्रि का घण्टा बज उठेगा। सभी लोग घरों में घुस
जायेंगे और शिकारी सैनिक गोलियों की वर्षा शुरू कर देंगे। वहाँ पर क्षणभर ठहर
कर मैं सेण्ट जोसेफ टेरिस की ओर भाग निकला। तीन ही चार क़दम जाकर वहीं
खड़ा थपथप करता रहा। वे समझे बहुत तेज़ी से भाग रहा हूँ। वे गिरजे के पास
वाली सड़क से मुझे मेरे रास्ते में आगे से रोकने के विचार से दौड़े, पर मैं आगे
न बढ़ लौट आया। इतने में अन्तिम ट्राम-कार आयी और मैं झट से कूदकर उसी
में चढ़ बैठा। मैं यह न समझ पाया कि उनके शेष दो साथी क्यों शान्त भाव से
734 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

वहीं बैठे रहे। विपत्ति के समय अपने सहकारियों का साथ देना शायद उनके कर्त्तव्यों
में से न था। अस्तु, उस दिन मैं ड्रम कोण्ड्रा के फ़्लेमिंग के परिवार में जा ठहरा।
परन्तु उस दिन से दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब कभी भी अकेले बाहर नहीं
जाऊँगा।
दसवाँ परिच्छेद
स्थान-स्थान पर युद्ध
इस बार हमें बहुत दिनों तक डबलिन में ही ठहरे रहना पड़ा। कारण यह था अब
तक तो हमारे मुख्य केन्द्र वाले सदैव हमारा विरोध ही करते रहे थे। किन्तु अब
हमारी सफलता से प्रभावित होकर वे लोग हमारी ओर झुकने लगे। उन्होंने कुछ
उत्साह बढ़ाया और कुछ कार्यक्रम भी निश्चित करने की बात सोचने लगे। इन दिनों
निकम्मे रहना पड़ता। समय बिताने के विचार से अधिकतर गैलिक मल्लशाला में
चले जाया करते। पर वहाँ भी उस दिन एक भारी विपत्ति आ पड़ी! कैसे? यह सोच
लेना कल्पना शक्ति से बाहर है। हम ग़रीब तो थे ही। कहीं कुछ धनादि देख पाते
तो मुँह में पानी भर आता। उस दिन ताश के साथ कुछ जुआ भी हुआ और
सौभाग्यवश कुछ जीत भी लिया। परन्तु अब एक बड़ी भारी चिन्ता ने आ घेरा।
जितनी जल्दी हो सके, उसे खर्च कर देना चाहिए। क्योंकि क्या जाने कब लड़ाई
में मारे जायें और फिर किसी साहसी सिपाही को हमारी जेब में से निकालने का
मौक़ा मिल जाये और वह हमारा जामे-सेहत ही पीता फिरे। वहाँ से हम घुड़दौड़
में अपने भाग्य की आज़माइश करने गये, वहाँ भी बहुत कुछ जीत लिया। जो भी
जीता उस सभी पर केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सभी लोगों का समान अधिकार
था। हमारे छोटे से दल से अधिक व्यावहारिक साम्यवादी और कहाँ मिलते?
हम सिनेमा देखने गये। दशा यह थी कि पुलिस आदि भी पूरी शक्ति के साथ
हम लोगों को शीघ्रातिशीघ्र अनन्त निद्रा में सुला देने की चेष्टा कर रही थी। एक
दिन टालवेट स्ट्रीट में हत्यारे दल से भेंट हो गयी। दोनों ओर से रिवाल्वर निकाल
लिए गये। किसी ने भी उन्हें दाग क्यों नहीं दिया, यह नहीं कहा जा सकता। इसी
प्रकार एक दिन श्री सीमसकर्मान के घर विश्राम करने के विचार से गये थे कि
वहाँ घुसने पर एक अपरिचित व्यक्ति अन्दर प्रविष्ट हुआ। और सीमस महोदय को
सूचित कर गया कि इन नवागन्तुकों के पीछे एक खुफ़िया भी था। सुनते ही हम
बाहर निकल पड़े। हमें लौटते देख वह खुफ़िया भी सिर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह
हो गया। इस प्रकार जासूस बराबर हमाने पीछे बहुत ही बुरी तरह से लगे रहते थे।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 735

उस दिन सिनेमा देखने गया, तो वहाँ फ़्लेमिंग परिवार की दो लड़कियों तथा श्रीमती
ओब्रीन से भेंट हुई। श्रीयुत ओब्रीन नाकलांग के युद्ध में हमारे साथ थे। इस समय
स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण अमेरिका गये हुए थे। वे सभी मुझे सिनेमा में देखकर
एकदम स्तम्भित रह गईं। एक व्यक्ति जिसको देखते ही गोली से मार देने की आज्ञा
पुलिस वालों को दी जा चुकी हो, वही सिनेमा आदि सार्वजनिक स्थानों में
निस्संकोच भाव से आनन्द विहार में निमग्न फिर रहा हो। अब तक मैं भी नित्य
विपत्ति सहन करने में अभ्यस्त हो गया था। इसी से इतना लापरवाह रहता था।
सिनेमा देखकर मैं बाहर निकला, तो देखता क्या हूँ कि उसी रात्रि की घटना वाले
उन्हीं तीन हत्यारों में से एक खड़ा है। परन्तु मेरे लिए उसका मनोभाव ताड़ लेना
कुछ भी कठिन न था। जी में तो आया, ज़रा रिवाल्वर की भूख को शान्त करने
के लिए, इसे भी एक गोली का ग्रास बनाऊँ, परन्तु अपने दायें-बायें चली जाने
वाली कोमलांगी बालिकाओं को एकाएक चकित कर देना मुझे वांछनीय न जँचा
इसलिए चुपचाप चला गया। हमारे थोड़ी दूर जाने पर एक लड़की ने कहा, 'एक
मित्र पीछे चले आ रहे हैं।' सभी को ट्राम कार पर चढ़ा, मैं स्वयं भी चढ़ा। ट्राम
चल दी। वह जासूस भी ट्राम पर चढ़ने के विचार से आगे बढ़ा, परन्तु मैंने द्वार में
बाजू फैला, खड़ा होकर उसकी तरफ़ ज़रा घूरकर देखा। मेरा मनोभाव ताड़कर वह
चुपचाप वहीं रह गया।
फ़्लेमिंग के परिवार के घर में इस सब बात पर वादविवाद हुआ और अन्त में
यही निश्चय हुआ कि हमें उस दिन वहाँ नहीं ठहरना चाहिए, ग्यारह बजे घर के
पिछले द्वार से मैं और श्री ट्रीसी निकल पड़े। कहाँ जायें – इस बात पर कुछ क्षण
तक विचार हुआ। अन्त में यह निश्चय कर कि बेल्टफास्ट रोड स्थित प्रोफ़ेसर
केरोलेन के 'फर्न साइड' नामक घर में – जिसकी कि एक चाबी हमें इन्हीं
अवसरों के लिए दी गयी थी – ही जाना चाहिए। हम चल दिये। वहाँ के सभी
व्यक्ति सो रहे थे : चुपचाप अपने निर्दिष्ट चले गये और वहाँ जाकर लेट गये। नींद
नहीं आयी। हृदय में जाने कैसी अव्यक्त वेदना, उत्सुकता और भयमिश्रित भाव
उठने लगे। ऐसी ही कुछ दशा श्री ट्रीसी की भी थी, मैं उन पर यही भाव व्यक्त
करने के लिए वाक्य बनाने की चिन्ता ही में था, कि वे बोल उठे, “भैया, डेन!
क्या तुम सो रहे हो? मुझे नींद नहीं आती, हृदय में न जाने क्या हो रहा है? क्यों?”
मैंने भी अपनी वही दशा बताई। फिर हँसी में कहा, “कोई आश्चर्य नहीं कोई
जासूस हमारे पीछे यहाँ तक आ पहुँचा हो, और अभी पुलिस वालों के साथ यहाँ
आ धमके।” सीनट्रीसी महोदय ने सहज भाव से इतना ही कहा, “अब तो कोई
चिन्ता की बात नहीं। अगर हमारी मृत्यु भी हो जाये, तो भी यह युद्ध जारी रहेगा
ही। परन्तु अब क्या हम दोनों को इकट्ठा ही मरना होगा।”
एक ऊँघ आ गयी फिर एकाएक उठकर बैठ गये। सीढ़ियों पर से किसी के
736 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आने की पदध्वनि सुनायी दी। कुछ फुसफुसाहट का शब्द सुनायी दिया। फिर
सीढ़ियों पर जल्दी जल्दी चढ़ने वालों की आवाज़ सुनायी दी। हम दोनों एकाएक
आकर अपने रिवाल्वर सँभालने लगे। द्वार खुल गया। सीनट्रीसी महोदय ने मुझे इतना
ही कहा, "डेन भैया, विदा! अब आकाश में ही पुनर्मिलन होगा।"
बेंग-बेंग करती हुई गोलियाँ अन्दर आने लगीं। क्रेक-क्रेक करते हुए, मेरे जर्मन
माउज़र पिस्तौल ने प्रत्युत्तर में गोलियों की वर्षा कर दी। एक अंग्रेज़ अध्यक्ष उस
समय पुकार पुकार कर कह रहा था, "रीयन कहाँ है? रीयन कहाँ है?" मेरे दाहिने
हाथ पर एक गोली आ लगी। परन्तु मैं इसकी कोई परवाह न कर निरन्तर गोलियों
की वर्षा करता रहा। इस बीच धड़ाम का शब्द हुआ और सभी सिपाही लौट पड़े।
परन्तु उन्हें कार्यक्षेत्र में डटे रहने को बाध्य करने के लिए पीछे से रायफ़लें चलने
लगीं, मैंने सीढ़ियों की ओर लपककर देखा कि एक दर्जन सैनिक फिर अनिच्छुक
भाव से ऊपर चढ़े आ रहे हैं। परन्तु मेरी पिस्तौल की कृपा से वे फिर लौटने को
बाध्य हो गये। मैं उनका पीछा करने लगा। वे भाग खड़े हुए। परन्तु फिर भी पीछे
से कोई न कोई रायफ़ल की गोली चलती और किसी का आर्तनाद तथा धड़ाम
से गिरने का स्वर सुनायी देता। मैं निचली छत पर आ गया था। उस छत में छेद
कर गर्डर से लटककर नीचे खड़े हुए सिपाहियों पर गोलियाँ चलाने की बात सोच
ही रहा था कि वे लोग वहाँ से भी भाग गये। अब मुझे बेचारे ट्रीसी की चिन्ता होने
लगी। मैंने वहीं लेटकर धीमे स्वर में पुकारना शुरू किया, "सीन कहाँ हो? सीन!
सीन!" परन्तु कोई उत्तर न मिला। चिन्ता और भय से मैं कुछ व्याकुल-सा होने
लगा। इधर मेरे घावों से रक्त की धारा बह रही थी और मैं प्रति क्षण दुर्बल हुआ
जा रहा था। खैर यह सोचकर कि श्री ट्रीसी येनकेन प्रकारेण बच ही निकले होंगे,
मैं भी उठा। एकाएक नीचे से कई बम फटने के धमाके से सारा घर प्रतिध्वनित
हो उठा। जब मैं पहले पहले इस घर में आया था तब मुझे इस घर की छोटी-सी
दीवार ऐसे ही अवसरों के लिए ख़ास तौर से दिखायी गयी थी। मैं वाटिका में से
लपककर उस दीवार की ओर बढ़ा। सामने दीवार पर से एक सिपाही ने सिर
उठाकर गोली छोड़ते हुए मुझे ठहरने को कहा। उसे मौक़ा न दे, मैंने उस पर गोली
छोड़ी तो वह कराहता हुआ धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा। इतने में सिपाहियों के
एक गुट ने मुझ पर गोली चलानी शुरू कर दी। मैं भी गोली चलाता हुआ निर्दिष्ट
स्थान की ओर चलता गया। फिर कैसे क्या हुआ, कब दीवार फाँदकर बाहर निकल
आया, आदि मैं कुछ नहीं जानता। बाद में मैंने अपनेआप को ड्रमकोण्ड्रा पुल तथा
उस गृह के बीच में सड़क पर खड़ा पाया। वहाँ पर अधिक देर तक ठहरना बड़ी
मूर्खता होती। एक सशस्त्र लारी से मैं टकराया। और तो कुछ न सूझ पड़ा पर गोली
चलाकर उनमें से एक व्यक्ति को मार डाला। उधर से भी गोलियों की वर्षा होने
लगी। मैं नगर की ओर भाग खड़ा हुआ। दायें हाथ ट्रेनिंग कॉलेज की 18 फुट ऊँची
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 737

दीवार थी। यदि उस पर से कूद जाऊँ तो बस बिल्कुल सुरक्षित हो जाऊँ। घायल
रहने की हालत में ऐसी 18 फुट दीवार पर चढ़ना कोई आसान कार्य नहीं। परन्तु
प्राणों की बाज़ी लगाते ही मनुष्य में असीम शक्ति का संचार हो उठता है यही मेरा
अनुभव है। इस बार भी निश्चय किया और दीवार पर चढ़ गया! कैसे? सो नहीं
कह सकता। बाद में स्वयं भी बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखा करता!
अब के कुछ चेतना हुई तो अपने को नदी तट पर खड़ा पाया। किधर जाऊँ,
कुछ समझ में न आया। नदी पार करनी होगी, परन्तु पुल पर से नहीं। फिर नदी
ही में घुस गया। सौभाग्यवश पानी अधिक गहरा नहीं था। परन्तु मेरे शरीर के अनेक
घावों में वह एकदम ठण्डा जल प्रवेश कर एक विचित्र झनझनाहट-सी पैदा करने
लगा। तिस पर भी मुझे कोई विशेष तकलीफ़ तथा ठण्ड अनुभव नहीं हुई। मैं
समझता हूँ, किन्हीं विशेष अवसरों पर परिस्थितियाँ मनुष्य में प्रकृति के विरुद्ध
ऐसी-ऐसी कठिनाइयों को अनुभव तक न करने की शक्ति प्रस्फुटित कर देती हैं।
नदी के उस पार कुछ घर देखे। अधिक परिश्रम करना अब मेरे लिए असम्भव
था, अतः उन्हीं घरों में विश्राम करने का निश्चय कर उधर बढ़ा। न जाने कौन-सी
अज्ञात शक्ति मुझे उनमें एक घर विशेष की ओर धकेले जा रही थी। उसी घर का
द्वार क्यों खटखटाऊँगा, वहीं आश्रय पाने की आशा से जाऊँगा, कुछ नहीं समझ
सका। परन्तु वही द्वार खटखटाने पर एक वृद्ध को सामने खड़ा पाया। रक्तरंजित
शरीर को देखकर सहज में ही मेरी स्थिति समझ गया। उसने बिना कोई प्रश्न पूछे
इतना कहा, “आइये, यथाशक्ति आपकी सहायता तथा सेवा करेंगे।” भीतर ले
जाकर एक चारपाई पर लिटा दिया और श्रीमती लांग नामक नर्स को बुलाकर मेरी
मरहम-पट्टी की। बाद में पता चला कि मेरे मेहरबान श्री फेड मोम्स थे जिनकी
पूर्ण सहानुभूति विपक्ष में थी, तथापि उन्होंने मेरी सुश्रूषा तथा देखभाल ठीक उसी
प्रकार से की जैसेकि कोई पुत्र अपने पिता से आशा कर सकता हो। प्रातः समय
मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। प्रातः होते ही 20 अक्तूबर, 1920 श्रीमती मोम्स के
द्वारा फिल्सानहन के घर पत्र भेजा कि मुझे शीघ्र कहीं सुरक्षित स्थान पर ले जाने
का प्रबन्ध किया जाये। यह पत्र भेजने के बाद मालूम हुआ कि इस घर के दोनों
ओर के घरों में पुलिस रहती है। अनजाने में इसी द्वार विशेष को खटखटाने मात्र
से ही मैं कितना बाल-बाल बच गया था!
मोटर आने पर हम मेटर अस्पताल की ओर चल दिये। रास्ते में एक पुलिस
मैन द्वारा रोक दिये जाने पर कुछ अधीर हुए। परन्तु उसने केवल यही कहा
“महाशय! मोटर ज़रा मन्द गति से चलाइए, उधर से सैनिक लारियाँ जा रही हैं।”
अस्पताल के द्वार पर श्री डिकमैकली को खड़ा पाया। उन्हें गिरफ़्तार करवाने वालों
के लिए भी भारी पुरस्कार घोषित किया जा चुका था। उन्हें वहाँ देख बहुत आश्चर्य
हुआ, परन्तु उन्होंने हमें अस्पताल से आगे गुज़र जाने का संकेत किया। हम माउण्ट
738 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जाम स्क्वायर में चले गये। वहाँ पर एक अस्तबल में घुसे। मेरी पीड़ा उस समय
बहुत असह्य हो उठी थी। पर श्री ट्रीसी को सामने देख मेरी प्रसन्नता की हद न
रही। उनको ज़रा भी चोट नहीं आयी थी। उस दिन उन्होंने भी भाग्य पर विश्वास
करके कोई एक द्वार खटखटाया था जहाँ से कि उनके चचेरे भाई श्री फिलरिपन
बाहर निकले। यह घर उन्हीं का था।
सबसे अधिक वेदनाजनक समाचार था हमारे मित्र प्रो. केरोलेन के घायल किये
जाने का। हमारे वहाँ से बच निकलने पर उन्हें दीवार की ओर मुँह कर खड़ा होने
को विवश किया गया और गोली मार दी गयी क्योंकि वे हमारे सम्बन्ध में कुछ
भी सूचना देने को तैयार न थे। उनकी मेटर अस्पताल में ही कुछ रोज़ बाद मृत्यु
हो गयी। उस वीर ने हमारी ख़ातिर प्राण तक न्योछावर कर दिये। निश्चय ही वे
सच्चे वीर थे! आदर्श देशभक्त थे!!
अस्पताल में आये तीन दिन ही हुए थे : बाज़ार में गोलियाँ चलने की आवाज़
सुनी। सोचने लगा, अब यह युद्ध बन्द न होगा। इसी विचार से मुझे असीम आनन्द
भी अनुभव होता। कुछ देर बाद एक नर्स हड़बड़ाती हुई मेरे कमरे में दाख़िल हुई।
कुछ अशुभ समाचार है, यह समझ लेने में मुझे देर न लगी। उसने कहा, 'सैनिकों
ने अस्पताल को घेर लिया है। तलाशी हो रही है कि हम वहीं हैं।' उचककर
खिड़की में से देखा, सैनिक अस्पताल को घेरे खड़े थे। यह सोचकर कि अब बचना
असम्भव है, मैं मुस्कुराने लगा। परन्तु सौभाग्य देखिये। कुछ ही घण्टे पहले बम से
घायल हुआ एक स्वेच्छा-सेवक जिसकी शक्ल मुझसे बिल्कुल मिलती-जुलती थी
वहाँ लाया गया था। पुलिस वालों के तलाशी लेते न लेते उसके प्राण पखेरू उड़
गये। पुलिस वाले यह समझकर कि डेन ब्रीन मर गया, बहुत प्रसन्न हुए और वहाँ
से लौट गये। प्रातःकाल जो गोलियाँ सुनी थीं, उनका ब्यौरा यह है कि कुछ
स्वेच्छा-सेवकों ने एक सशस्त्र लारी छीनने के विचार से उस पर आक्रमण कर
दिया था। परन्तु थोड़ी देर युद्ध करने के बाद उन्हें असफल लौटना पड़ा।


ग्यारहवाँ परिच्छेद
श्री ट्रीसी आदि को वीरगति
अस्पताल में लाने से पहले अस्तबल में जो कुछ क्षण ठहरना पड़ा था, वही मेरा
और श्री ट्रीसी का अन्तिम मिलन था। जिस समय मुझे स्ट्रेचर पर डाल कर वे लोग
ले जाने के लिए उठाने लगे थे, उस समय ही श्री ट्रीसी से मैंने अन्तिम बार हाथ
मिलाया था। उस समय तो यह सोचने का शायद साहस भी न होता था कि यह
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 739

हमारा अन्तिम मिलन है। उस दिन तो मेरे हृदय के भीतर यह भाव बिल्कुल नहीं
उठा था कि वह मेरा सहोदर से भी अधिक प्रिय ट्रीसी मुझसे फिर कभी नहीं मिल
पायेगा। ट्रीसी! प्यारे ट्रीसी!! जीवन का एक बड़ा भाग हमने एक साथ विपत्तियाँ
सहन करने में बिता दिया था। घोर अन्धकार में भी हमने एक दूसरे को उत्साहित
कर किसी की आशा डिगने न दी थी। आह! आज तुम मुझे छोड़-छाड़कर यों ही
चले गये! तुम्हारी यह आमोद भरी मंजुल मूर्ति आँखों के सामने उसी तरह नाच रही
है।
अस्पताल में जाने के तीसरे दिन – 14 अक्टूबर 1920 को जब पुलिस वहाँ
आ पहुँची तब श्री ट्रीसी विह्वल हो उठे थे। उन्होंने तुरन्त हेडक्वार्टर में जाकर प्रस्ताव
किया कि पकड़े जाने की दशा में मुझे पुलिस से छुड़ा ले जाने के लिए एक दल
अश्वयमेव भेजा जाये उनकी बात मान ली गयी। वे अपने साथ कुछ स्वेच्छा-सेवकों
को लेकर चल दिये। वे निर्भीक देशभक्त तथा साहसी सैनिक! तुम्हें एक साथी
की विपत्ति ने इतना विह्वल कर दिया कि तुम अपनी स्थिति बिल्कुल भूल ही गये।
जासूस ने उन्हें पहचान लिया और पीछा किया।
सारा प्रबन्ध कर चुकने के बाद ट्रीसी महोदय टालबोट स्ट्रीट के रिपब्लिकन
आउट फिटर्ज नामक दुकान में अन्तिम स्कीम का निश्चय करने के लिए गये थे!
प्रजातन्त्रवादी सैनिक अधिकतर हम वहीं पर मिला-जुला करते थे। कुछ ही क्षण
बाद सैनिक लारियों ने दुकान घेर ली। श्री ट्रीसी सबसे आगे खड़े थे, पुलिस वालों
का हाथ उन्हीं पर पड़ता परन्तु एक व्यक्ति एक तरफ़ भागा। सिपाही उधर लपके
इसी क्षण में सुअवसर पाकर, साइकिल ले चुपचाप श्री ट्रीसी खिसकने ही लगे थे
कि एक साधारण वेशधारी व्यक्ति मोटर में से उन पर झपट पड़ा और बोला, “जिसे
हम गिरफ़्तार करना चाहते हैं वह तो यह व्यक्ति है।” श्री ट्रीसी ने अन्तिम समय
निकट देखकर रिवाल्वर निकाल लिया उधर से मशीनगन धाँय-धाँय कर चलने
लगी। आख़िर में ट्रीसी वहाँ पर घायल और धराशाई होकर वीरगति को प्राप्त हुए।
अन्तिम श्वास तक उनके बदन पर प्रसन्नता की झलक विद्यमान थी। उस वीर ने
अपनी जननी जन्मभूमि के चरणों पर अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया।
राजनीतिक संसार ने यह निस्संकोच भाव से माना कि आयरिश गनीमी युद्ध
का नेतृत्व बड़े-बड़े युद्ध विद्या-विशारदों तथा बुद्धिमान व्यक्तियों के हाथ में था।
अतः उनकी सांग्रामिक चालें बड़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुईं। आज मैं दावे से कहता हूँ
कि मेरे ट्रीसी उन युद्ध विद्या विशारदों के सर्वोपरि नेता थे। उस वीर के दिमाग़ ने
जो बताया उस निर्भीक योद्धा की अलौकिक बुद्धि ने जो सुझाव दिया, वही
स्वेच्छा-सेवकों ने निभाया और विजय लाभ किया। आज मैं दावे से कह सकता
हूँ कि श्री ट्रीसी हमारे युग के कट्टर, निर्भीक तथा साहसी देशभक्त ही न थे,
बल्कि वे चोटी के योग्य सेनापतियों में से भी थे। 28 वर्ष की आयु में ही स्वर्गलोक
740 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सिधारने वाले एक युवक के प्रति यह वाक्य कहना विस्मयजनक मालूम हुए बिना
न रहे, पर एक बात दरअसल ऐसी ही थी। यदि उन्हें अन्य प्रसिद्ध योद्धाओं की
तरह पूर्ण रूप से शिक्षण का अवसर मिला होता, यदि उन्हें भी अनुकूल स्थितियों
में रखकर पूर्ण रूप से शिक्षा दी जाती तो निश्चय ही वे संसार के किसी भी योद्धा
तथा सेनापति से कम न रहते।
मुझे बहुत दिनों तक उनकी मृत्यु का समाचार बताया न गया। मैं अन्धविश्वासी
नहीं हूँ। मैं अलौकिक बातों में विश्वास नहीं रखता। परन्तु सच कहता हूँ, मुझे उसी
दिन पता चल गया था कि मेरे प्यारे ट्रीसी अब इस संसार में नहीं रहे। वे मुझे अपने
पैताने खड़े मुस्कुराते हुए दिखायी दिये थे। उसी दिन सायंकाल मिक कोलिन्स मेरी
ख़बर लेने को आये। उत्सुकतावश मैंने पहला प्रश्न यही पूछा – ट्रीसी कहाँ हैं?
सजल नेत्रों को दूसरी ओर फेरकर छिपाने का प्रयत्न करते हुए रुँधे गले से वे इतना
ही कह पाये, कि ‘वे कहीं बहुत दूर गये हैं।’ दस दिन बाद मुझे ठीक समाचार
मिला। शिपस्ट्रीट बेरेक से श्री ट्रीसी का शव ट्रिप्रेरी ले जाया गया। वहाँ उनका जो
सत्कार हुआ, वह शायद किसी नरेश को भी नसीब न हुआ होगा। सोलोहैडबेग चर्च
से – जहाँ कि वे बाल्यावस्था में प्रार्थनाएँ किया करते थे-चलकर उनका शव
किल फीकल नगर से गुज़रा। शोकग्रस्त लोगों का यह जुलूस मीलों लम्बा था।
ट्रिप्रेरी का ऐसा कौन-सा व्यक्ति था जिसके हृदय में उस दिन देशभक्ति के भाव
हिण्डौले न ले रहे हों और जो उस दिन उस जुलूस के साथ शुष्क नेत्रों से गया
हो? वह समाचार उस समय प्रदेश के लिए बड़ा शोकजनक समाचार था। उनकी
क़ब्र आज तीर्थ बन गयी है।
अगले शुक्र के दिन मैं मेटर अस्पताल में ले जाया गया। यहाँ पर खूब
ख़ातिरदारी होने से शीघ्र ही आरोग्य लाभ करने लगा। एक दिन एकाएक क्या देखता
हूँ कि मकान घिर गया है। सैनिक लोग तलाशी लेने की तैयारी कर रहे हैं। एकदम
ऊपर वाली छत पर जाने के विचार से उधर जो लपका, तो ख़ाकी वर्दी वालों को
खड़ा पाया। मृत्यु निश्चय समझ लौटकर वहीं आ बैठा। दर्शकों के जमघट में जो
दृष्टि गयी तो मिक कोलिंज को खड़ा पाया। पता चला कि मेरे गिरफ़्तार होने पर
मुझे छुड़ाने के विचार से ही वे अपने दल सहित आये थे। पर सब स्थानों की
तलाशी लेकर, केवल मेरा ही कमरा छोड़कर पुलिस वाले क्यों लौट गये, मैं कभी
भी नहीं समझ पाया। वहाँ से डन लेघायर के घर पर ले जाया गया। वहाँ भी पुलिस
ने तलाशी ली, परन्तु मेरे कमरे की नहीं। इस रहस्य का भी कुछ पता न चला।
मैं हैरान रह गया।
21 नवम्बर 1920 का ख़ूनी रविवार मैं कभी न भूल सकूँगा। उस दिन प्रातः
ही नगरभर में सनसनी फैल गयी। नगरभर में 14 जासूस अपने अपने घरों में ही
मार डाले गये थे। हमारे और तो सभी व्यक्ति बच गये, परन्तु फ्रैंकटीलिंग पकड़े
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 741

गये। उन्हें फाँसी का दण्ड सुना दिया गया। परन्तु आप वहीं से रफूचक्कर हो गये।
बाद में पेड़ीमोर को पकड़कर फाँसी पर लटका दिया गया। हालाँकि वे उस दिन
वहाँ थे ही नहीं। वे एक बड़े वीर सैनिक थे।
उस दिन सरकार ने प्रतिहिंसा के भाव से प्रेरित होकर दो बड़े भीषण और क्रूर
कार्य कर डाले। सायंकाल के समय पुलिस ने ‘कार्क पार्क’ को घेर लिया। उस
समय वहाँ 10,000 व्यक्ति फुटबाल का मैच देख रहे थे। उन पर पुलिस ने गोलियों
की वर्षा कर अपनी बर्बरता, क्षुद्रता तथा नृशंसता का परिचय देने में कुछ कसर
उठा न रखी। 17 व्यक्ति परलोक सिधार गये, 50 बुरी तरह घायल हुए।
दूसरा अत्यन्त वेदनाजनक समाचार था श्री पीडरक्लैंसी तथा डिक मैक की
हत्या का। उन्हें पकड़कर और यह दोष बताकर कि उन्होंने फ्रेंच पार्क के पहरेदारों
पर आक्रमण किया था, तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया। इस अभियोग के प्रत्युत्तर
में केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उन स्वेच्छा-सेवकों के बारे में –
जिन्होंने कि अपने रणचातुर्य से अंग्रेजों को नाकों चने चबवाये थे, बिना अन्य
साथियों को लिए फ्रेंच पार्क के प्रहरियों पर आक्रमण करने की बात कहना सर्वदा
हास्यास्पद है। जो भी हो, पुलिस उन वीरों से जली बैठी थी। अवसर पाते ही उसने
अपनी प्रतिहिंसा की भभकती हुई आग को शान्त करने के लिए उन पर मनमाने
अत्याचार कर उन्हें मार डाला।
बेचारे पीडर और डिक! दोनों कैसे साहसी वीर, कितने मृदुल, कितने कट्टर
देशभक्त और कैसे सुचतुर सेनापति थे! उन्हें श्री ट्रीसी की तरह दो-दो हाथ दिखाने
तक का सुअवसर न मिल सका! अफ़सोस!!
बारहवाँ परिच्छेद
ज़िला इंस्पेक्टर की हत्या और मेरा विवाह
मैं खूब स्वस्थ होकर टिप्रेरी लौट आया। इस समय युद्ध ने खूब ज़ोर पकड़ लिया
था। रणचण्डी का ताण्डव नृत्य हो रहा था। देशभर में खूब चहल-पहल थी।
आयरिश लोग बड़े हर्ष और चाव से अपने आदर्श के लिए, अपने देश के लिए,
अपनी मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग कर रहे थे। मानो आयरिश जाति स्वतन्त्रता देवी
के मन्दिर में निज रक्त मांस की भेंट से उस देवी को प्रसन्न करने का दृढ़ निश्चय
कर वहीं डट गयी थी।
अंग्रेज़ी न्यायालय एकदम ख़ाली हो गये थे। ‘मृत्युदण्ड’ घोषित किये रहने पर
भी प्रजातान्त्रिक न्यायालय खचाखच भरे रहते थे। देशवासियों का झुकाव प्रजातन्त्र
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