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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 788 में से

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पृष्ठ 742

उस दिन सिनेमा देखने गया, तो वहाँ फ़्लेमिंग परिवार की दो लड़कियों तथा श्रीमती
ओब्रीन से भेंट हुई। श्रीयुत ओब्रीन नाकलांग के युद्ध में हमारे साथ थे। इस समय
स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण अमेरिका गये हुए थे। वे सभी मुझे सिनेमा में देखकर
एकदम स्तम्भित रह गईं। एक व्यक्ति जिसको देखते ही गोली से मार देने की आज्ञा
पुलिस वालों को दी जा चुकी हो, वही सिनेमा आदि सार्वजनिक स्थानों में
निस्संकोच भाव से आनन्द विहार में निमग्न फिर रहा हो। अब तक मैं भी नित्य
विपत्ति सहन करने में अभ्यस्त हो गया था। इसी से इतना लापरवाह रहता था।
सिनेमा देखकर मैं बाहर निकला, तो देखता क्या हूँ कि उसी रात्रि की घटना वाले
उन्हीं तीन हत्यारों में से एक खड़ा है। परन्तु मेरे लिए उसका मनोभाव ताड़ लेना
कुछ भी कठिन न था। जी में तो आया, ज़रा रिवाल्वर की भूख को शान्त करने
के लिए, इसे भी एक गोली का ग्रास बनाऊँ, परन्तु अपने दायें-बायें चली जाने
वाली कोमलांगी बालिकाओं को एकाएक चकित कर देना मुझे वांछनीय न जँचा
इसलिए चुपचाप चला गया। हमारे थोड़ी दूर जाने पर एक लड़की ने कहा, 'एक
मित्र पीछे चले आ रहे हैं।' सभी को ट्राम कार पर चढ़ा, मैं स्वयं भी चढ़ा। ट्राम
चल दी। वह जासूस भी ट्राम पर चढ़ने के विचार से आगे बढ़ा, परन्तु मैंने द्वार में
बाजू फैला, खड़ा होकर उसकी तरफ़ ज़रा घूरकर देखा। मेरा मनोभाव ताड़कर वह
चुपचाप वहीं रह गया।
फ़्लेमिंग के परिवार के घर में इस सब बात पर वादविवाद हुआ और अन्त में
यही निश्चय हुआ कि हमें उस दिन वहाँ नहीं ठहरना चाहिए, ग्यारह बजे घर के
पिछले द्वार से मैं और श्री ट्रीसी निकल पड़े। कहाँ जायें – इस बात पर कुछ क्षण
तक विचार हुआ। अन्त में यह निश्चय कर कि बेल्टफास्ट रोड स्थित प्रोफ़ेसर
केरोलेन के 'फर्न साइड' नामक घर में – जिसकी कि एक चाबी हमें इन्हीं
अवसरों के लिए दी गयी थी – ही जाना चाहिए। हम चल दिये। वहाँ के सभी
व्यक्ति सो रहे थे : चुपचाप अपने निर्दिष्ट चले गये और वहाँ जाकर लेट गये। नींद
नहीं आयी। हृदय में जाने कैसी अव्यक्त वेदना, उत्सुकता और भयमिश्रित भाव
उठने लगे। ऐसी ही कुछ दशा श्री ट्रीसी की भी थी, मैं उन पर यही भाव व्यक्त
करने के लिए वाक्य बनाने की चिन्ता ही में था, कि वे बोल उठे, “भैया, डेन!
क्या तुम सो रहे हो? मुझे नींद नहीं आती, हृदय में न जाने क्या हो रहा है? क्यों?”
मैंने भी अपनी वही दशा बताई। फिर हँसी में कहा, “कोई आश्चर्य नहीं कोई
जासूस हमारे पीछे यहाँ तक आ पहुँचा हो, और अभी पुलिस वालों के साथ यहाँ
आ धमके।” सीनट्रीसी महोदय ने सहज भाव से इतना ही कहा, “अब तो कोई
चिन्ता की बात नहीं। अगर हमारी मृत्यु भी हो जाये, तो भी यह युद्ध जारी रहेगा
ही। परन्तु अब क्या हम दोनों को इकट्ठा ही मरना होगा।”
एक ऊँघ आ गयी फिर एकाएक उठकर बैठ गये। सीढ़ियों पर से किसी के
736 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़