भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 747, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिधारने वाले एक युवक के प्रति यह वाक्य कहना विस्मयजनक मालूम हुए बिना
न रहे, पर एक बात दरअसल ऐसी ही थी। यदि उन्हें अन्य प्रसिद्ध योद्धाओं की
तरह पूर्ण रूप से शिक्षण का अवसर मिला होता, यदि उन्हें भी अनुकूल स्थितियों
में रखकर पूर्ण रूप से शिक्षा दी जाती तो निश्चय ही वे संसार के किसी भी योद्धा
तथा सेनापति से कम न रहते।
मुझे बहुत दिनों तक उनकी मृत्यु का समाचार बताया न गया। मैं अन्धविश्वासी
नहीं हूँ। मैं अलौकिक बातों में विश्वास नहीं रखता। परन्तु सच कहता हूँ, मुझे उसी
दिन पता चल गया था कि मेरे प्यारे ट्रीसी अब इस संसार में नहीं रहे। वे मुझे अपने
पैताने खड़े मुस्कुराते हुए दिखायी दिये थे। उसी दिन सायंकाल मिक कोलिन्स मेरी
ख़बर लेने को आये। उत्सुकतावश मैंने पहला प्रश्न यही पूछा – ट्रीसी कहाँ हैं?
सजल नेत्रों को दूसरी ओर फेरकर छिपाने का प्रयत्न करते हुए रुँधे गले से वे इतना
ही कह पाये, कि ‘वे कहीं बहुत दूर गये हैं।’ दस दिन बाद मुझे ठीक समाचार
मिला। शिपस्ट्रीट बेरेक से श्री ट्रीसी का शव ट्रिप्रेरी ले जाया गया। वहाँ उनका जो
सत्कार हुआ, वह शायद किसी नरेश को भी नसीब न हुआ होगा। सोलोहैडबेग चर्च
से – जहाँ कि वे बाल्यावस्था में प्रार्थनाएँ किया करते थे-चलकर उनका शव
किल फीकल नगर से गुज़रा। शोकग्रस्त लोगों का यह जुलूस मीलों लम्बा था।
ट्रिप्रेरी का ऐसा कौन-सा व्यक्ति था जिसके हृदय में उस दिन देशभक्ति के भाव
हिण्डौले न ले रहे हों और जो उस दिन उस जुलूस के साथ शुष्क नेत्रों से गया
हो? वह समाचार उस समय प्रदेश के लिए बड़ा शोकजनक समाचार था। उनकी
क़ब्र आज तीर्थ बन गयी है।
अगले शुक्र के दिन मैं मेटर अस्पताल में ले जाया गया। यहाँ पर खूब
ख़ातिरदारी होने से शीघ्र ही आरोग्य लाभ करने लगा। एक दिन एकाएक क्या देखता
हूँ कि मकान घिर गया है। सैनिक लोग तलाशी लेने की तैयारी कर रहे हैं। एकदम
ऊपर वाली छत पर जाने के विचार से उधर जो लपका, तो ख़ाकी वर्दी वालों को
खड़ा पाया। मृत्यु निश्चय समझ लौटकर वहीं आ बैठा। दर्शकों के जमघट में जो
दृष्टि गयी तो मिक कोलिंज को खड़ा पाया। पता चला कि मेरे गिरफ़्तार होने पर
मुझे छुड़ाने के विचार से ही वे अपने दल सहित आये थे। पर सब स्थानों की
तलाशी लेकर, केवल मेरा ही कमरा छोड़कर पुलिस वाले क्यों लौट गये, मैं कभी
भी नहीं समझ पाया। वहाँ से डन लेघायर के घर पर ले जाया गया। वहाँ भी पुलिस
ने तलाशी ली, परन्तु मेरे कमरे की नहीं। इस रहस्य का भी कुछ पता न चला।
मैं हैरान रह गया।
21 नवम्बर 1920 का ख़ूनी रविवार मैं कभी न भूल सकूँगा। उस दिन प्रातः
ही नगरभर में सनसनी फैल गयी। नगरभर में 14 जासूस अपने अपने घरों में ही
मार डाले गये थे। हमारे और तो सभी व्यक्ति बच गये, परन्तु फ्रैंकटीलिंग पकड़े
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 741