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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 788 में से

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पृष्ठ 739

उधर नित्य प्रति डाक लुट जाने के कारण सरकार ने लिम्मर्क नगर से लिम्मर्क
जंक्शन तक सैनिक लारियाँ भेजने का प्रबन्ध कर दिया था। हमने इस पार्टी पर
आक्रमण करने के लिए 30 जुलाई का दिन निश्चित किया। उधर लूकस महाशय
कहीं दौड़ते-भागते इन मोटरवालों से जा मिले। उन्होंने आपको मोटर में बिठा लिया।
इसी लारी पर हमने आक्रमण किया। लड़ाई में सिपाहियों के दो साथी मारे गये।
दूसरे दिन संवाद-पत्रों में ‘जनरल लूकस को पुनः गिरफ़्तार करने का निष्फल
उद्योग’ शीर्षक देखकर ही हमें मालूम हुआ कि लूकस महाशय भाग निकले थे।
जो भी हो, इस प्रकार की घटनाओं की संख्या नित्य प्रति अधिक होती जा
रही थी और उधर पुलिस के अत्याचार भी बढ़ते चले जा रहे थे।
नवाँ परिच्छेद
उड़ाऊ जत्था
मैंने अपने दल के सामने एक नया प्रस्ताव रखा। यदि प्रत्येक काउण्टी में एक-एक
उड़ाऊ जत्था स्थापित किया जाये तो बहुत सुविधा हो। अर्थात अब तक तो हमारे
सारे आक्रमण उन लोगों पर निर्भर रहे, जो रातभर हमारे साथ रहते और प्रातः होते
ही अपने घरों को लौट जाते। उनकी पारिवारिक परिस्थितियाँ कई बार उनके कार्य
में विघ्नकारी सिद्ध होती थीं। अतः मेरा तो यही अनुभव था कि युद्ध में भरोसा उन्हीं
लोगों पर किया जा सकता है जोकि हर समय साथ रहें। ट्रिप्रेरी के स्वेच्छा-सेवकों
की सहायता पाने की आशा से नाकलांग वाली घटना के समय हमें बड़ी असुविधा
हुई थी! फिर वे लोग रातभर तो लड़ते, दिन को उन्हें घर लौट आना आवश्यक
हो जाता। और यदि 20-30 मील की दूरी पर युद्ध करने की ठनती तो और भी
कठिनाई का सामना होता। अब सहस्रों युवक हमारे इर्द-गिर्द एकत्र होने लगे। उन्हें
भी संगठित तथा शिक्षित करने के लिए बहुत से कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी।
उन जत्थों को सुप्तप्रायः देशों में भेजकर वहाँ भी उथल-पुथल मचायी जा सकती
थी। अन्त में मेरा प्रस्ताव स्वीकार हो गया।
अंग्रेज़ लोग भी बड़ा उग्र रूप धारण कर रहे थे। उन्होंने पुलिस वालों को
असीम अधिकार दे डाले! वे लोग कभी भी किसी भी व्यक्ति को बाज़ार में घेर
कर उसकी तलाशी ले डालते। जब, जहाँ जी में आता, जिसे बन पड़ता, क़िले में
ले जाते, तथा उन्हें हमारे सम्बन्ध में सूचनाएँ देने के लिए उत्पीड़ित किया करते।
वे लोग इच्छानुसार किसी नगर में किसी भी भाग को घेर लेते और कई कई दिनों
तक छोटे छोटे कमरों से लेकर अट्टालिकाओं तक हमारी तलाश किया करते।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 733