भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 741, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहीं बैठे रहे। विपत्ति के समय अपने सहकारियों का साथ देना शायद उनके कर्त्तव्यों
में से न था। अस्तु, उस दिन मैं ड्रम कोण्ड्रा के फ़्लेमिंग के परिवार में जा ठहरा।
परन्तु उस दिन से दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब कभी भी अकेले बाहर नहीं
जाऊँगा।
दसवाँ परिच्छेद
स्थान-स्थान पर युद्ध
इस बार हमें बहुत दिनों तक डबलिन में ही ठहरे रहना पड़ा। कारण यह था अब
तक तो हमारे मुख्य केन्द्र वाले सदैव हमारा विरोध ही करते रहे थे। किन्तु अब
हमारी सफलता से प्रभावित होकर वे लोग हमारी ओर झुकने लगे। उन्होंने कुछ
उत्साह बढ़ाया और कुछ कार्यक्रम भी निश्चित करने की बात सोचने लगे। इन दिनों
निकम्मे रहना पड़ता। समय बिताने के विचार से अधिकतर गैलिक मल्लशाला में
चले जाया करते। पर वहाँ भी उस दिन एक भारी विपत्ति आ पड़ी! कैसे? यह सोच
लेना कल्पना शक्ति से बाहर है। हम ग़रीब तो थे ही। कहीं कुछ धनादि देख पाते
तो मुँह में पानी भर आता। उस दिन ताश के साथ कुछ जुआ भी हुआ और
सौभाग्यवश कुछ जीत भी लिया। परन्तु अब एक बड़ी भारी चिन्ता ने आ घेरा।
जितनी जल्दी हो सके, उसे खर्च कर देना चाहिए। क्योंकि क्या जाने कब लड़ाई
में मारे जायें और फिर किसी साहसी सिपाही को हमारी जेब में से निकालने का
मौक़ा मिल जाये और वह हमारा जामे-सेहत ही पीता फिरे। वहाँ से हम घुड़दौड़
में अपने भाग्य की आज़माइश करने गये, वहाँ भी बहुत कुछ जीत लिया। जो भी
जीता उस सभी पर केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सभी लोगों का समान अधिकार
था। हमारे छोटे से दल से अधिक व्यावहारिक साम्यवादी और कहाँ मिलते?
हम सिनेमा देखने गये। दशा यह थी कि पुलिस आदि भी पूरी शक्ति के साथ
हम लोगों को शीघ्रातिशीघ्र अनन्त निद्रा में सुला देने की चेष्टा कर रही थी। एक
दिन टालवेट स्ट्रीट में हत्यारे दल से भेंट हो गयी। दोनों ओर से रिवाल्वर निकाल
लिए गये। किसी ने भी उन्हें दाग क्यों नहीं दिया, यह नहीं कहा जा सकता। इसी
प्रकार एक दिन श्री सीमसकर्मान के घर विश्राम करने के विचार से गये थे कि
वहाँ घुसने पर एक अपरिचित व्यक्ति अन्दर प्रविष्ट हुआ। और सीमस महोदय को
सूचित कर गया कि इन नवागन्तुकों के पीछे एक खुफ़िया भी था। सुनते ही हम
बाहर निकल पड़े। हमें लौटते देख वह खुफ़िया भी सिर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह
हो गया। इस प्रकार जासूस बराबर हमाने पीछे बहुत ही बुरी तरह से लगे रहते थे।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 735