भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
नोट किया कि “दासता को बाइबिल के पुराने और नये धर्मग्रन्थों में मान्यता प्राप्त
है और ईश्वर की सत्ता उसकी निन्दा नहीं करती।” भगतसिंह आगे लिखते हैं कि
उसी वर्ष चार्ल्सटन बैपटिस्ट एसोसिएशन ने “अपने दासों के समय का उपयोग
करने के मालिकों के अधिकार” की पुष्टि की। इस सिलसिले में भगतसिंह ने इस
बात पर ज़ोर दिया कि धर्म ने “पूँजीवाद का समर्थन” किया है।
धर्म की उत्पत्ति के कारणों और उसके मर्म को समझने की चेष्टा में वह मार्क्स
की ओर उन्मुख हुए। पृष्ठ 40 पर हम मार्क्स की रचना ‘हेगेल के न्याय-दर्शन
की समालोचना का प्रयास’ से ‘धर्म के बारे में मार्क्स के विचार’ शीर्षक का
एक उद्धरण पाते हैं : “...मनुष्य धर्म की रचना करता है, धर्म मनुष्य की रचना नहीं
करता।...मनुष्य का अर्थ है मनुष्य का संसार, राज्य, समाज। यह राज्य, यह समाज
धर्म को, एक विकृत विश्वदृष्टिकोण को जन्म देते हैं, क्योंकि वे स्वयं एक विकृत
संसार हैं। धर्म इस संसार का सामान्य सिद्धान्त, उसका सार-संग्रह, सुबोध रूप में
उसका तर्क है।...धर्म के विरुद्ध संघर्ष परोक्ष रूप से उस संसार के विरुद्ध संघर्ष
है, जिसका आध्यात्मिक सन्तोष धर्म है।.. धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
उल्लेखनीय है कि पृष्ठ 192 पर भगतसिंह ने अन्तिम वाक्य दोहराया है।
सो, अपने नोटों में भगतसिंह ने पूँजीवाद के उन्मूलन के पक्ष में ठोस तर्क पेश
किये। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के संस्थापकों की भाँति वह भी यही मानते थे कि
भावी समाज केवल समाजवादी समाज ही हो सकता है। उनके नोटों में भावी समाज
का कोई विस्तृत विवरण तो नहीं है, किन्तु कुछ विचार यह दिखाते हैं कि वह
समाजवाद की धारणा का वैज्ञानिक अर्थ लगाते थे। उन्होंने भावी समाज के
दक्षिणपन्थी सामाजिक-जनवादियों के आदर्श को अस्वीकार किया तथा पूँजीवाद
के स्थान पर समाजवाद लाने की समस्या के प्रति सामाजिक-सुधारवादी रुख को
भी। उन्होंने पश्चिम के दक्षिणपन्थी समाजवादियों की भर्त्सना की और आर.
मैकडोनाल्ड को “ब्रिटिश लेबर पार्टी का साम्राज्यवादी नेता” कहा (पृष्ठ 13)।
पृष्ठ 52 पर दूसरे इण्टरनेशनल के नेताओं द्वारा मज़दूर वर्ग के ध्येय से की गयी
ग़द्दारी के बारे में हिलक्विट की पुस्तक से एक उद्धरण है।
जेल में वह पूरी तरह पूँजीवादी व्यवस्था का तख़्ता पलटने तथा सारी
मानवजाति के हित में अर्थव्यवस्था और सारी प्राकृतिक सम्पदा पर नियन्त्रण
स्थापित करने की ओर लक्षित विश्व समाजवादी क्रान्ति के विचार में तल्लीन रहे।
पृष्ठ 190 पर उन्होंने लिखा : “समाजवादी व्यवस्था : प्रत्येक से उसकी योग्यता
के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।” भगतसिंह समाजवाद में
संक्रमण को सर्वहारा के संघर्ष के साथ जोड़ते थे, जो भावी समाज में शासक वर्ग
बनेगा। पृष्ठ 69 पर ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र’ का एक उद्धरण है :
“...मज़दूर वर्ग की क्रान्ति का पहला क़दम सर्वहारा वर्ग को उठाकर शासक वर्ग
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के आसन पर बैठाना और जनवाद के लिए होने वाली लड़ाई को जीतना है।
“सर्वहारा वर्ग अपना राजनीतिक प्रभुत्व पूँजीपति वर्ग से धीरे-धीरे कर सारी
पूँजी छीनने के लिए, उत्पादन के सारे औज़ारों को राज्य, अर्थात शासक वर्ग के रूप
में संगठित सर्वहारा वर्ग, के हाथों में केन्द्रीकृत करने के लिए तथा समग्र उत्पादक
शक्तियों में यथाशीघ्र वृद्धि के लिए इस्तेमाल करेगा।”¹⁰
भगतसिंह ने यह भी इंगित किया कि यदि सर्वहारा का पथप्रदर्शन उसका
हरावल दस्ता, उसकी पार्टी, जो सर्वहारा क्रान्ति का अनिवार्य उपकरण है, न कर
रही हो, तो कोई क्रान्ति नहीं हो सकती। उन्होंने सर्वहारा गीत ‘इण्टरनेशनल’ के
शब्द अपनी डायरी में उतारे।
यह तर्कसंगत ही था कि भगतसिंह क्रान्ति के आरम्भ के नाते सशस्त्र विद्रोह
के प्रश्न पर पहुँचे। ऐसा विद्रोह भारतीय क्रान्तिकारियों की अनेक पीढ़ियों का लक्ष्य
रहा था, परन्तु वे इसे ला पाने में सफल नहीं रहे थे। यही कारण है कि भगतसिंह
ने इस विषय पर मार्क्सवादी रचनाओं में ख़ास दिलचस्पी ली। उन्होंने एंगेल्स की
रचना ‘जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति’ से लम्बे उद्धरण उतारे, हालाँकि ऐसा
उन्होंने मूल रचना से नहीं, बल्कि एक अन्य पुस्तक से किया था और इसीलिए
वह इस भ्रम में रहे कि वह मार्क्स को उद्धृत कर रहे हैं : “पहली चीज़ – विद्रोह
से तब तक खिलवाड़ न करें, जब तक आप उस खेल के परिणामों का सामना
करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते। विद्रोह तो एक ऐसा कलन है, जिसके
परिमाण सर्वथा अनिश्चित होते हैं, जिनका मूल्य रोज़ बदल सकता है। मुक़ाबले
में खड़ी शक्तियों को संगठन, अनुशासन तथा परम्परागत प्रतिष्ठा के सारे लाभ
उपलब्ध होते हैं। यदि विद्रोही अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ और बड़ी ताक़त मैदान
में नहीं उतारेंगे, तो वे हार जायेंगे और बरबाद हो जायेंगे। दूसरी चीज़ – एक बार
विद्रोह शुरू होने पर अधिकतम दृढ़संकल्प के साथ काम करने तथा प्रहार करने
की ज़रूरत होती है। प्रतिरक्षा की स्थिति प्रत्येक सशस्त्र विद्रोह की मौत हुआ करती
है; अपने शत्रु से मुक़ाबला होने से पहले ही मैदान हाथ से निकल जाता है।” ¹¹
इस उद्धरण में प्रत्येक शब्द विद्रोह के प्रश्न पर भगतसिंह के साथियों के सतही
रुख़ के ख़िलाफ़ तथा कुछ हद तक क्रान्तिकारी गतिविधियों के आरम्भ में स्वयं
भगतसिंह के दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ चेतावनी देता है।
काफ़ी लम्बे समय तक भारतीय क्रान्तिकारियों ने न तो भावी स्वतन्त्र भारत
में सत्ता के स्वरूप पर और न ही उसकी सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीति के
प्रश्न पर विचार किया। वे यह सोचते थे कि स्वतन्त्रता ही एक “रामबाण” होगी।
मार्क्सवादी साहित्य से प्रभावित होकर भगतसिंह ने इन सभी प्रश्नों में गहरी
दिलचस्पी ली। उनके कुछ नोट यह दिखाते हैं कि उन्होंने सर्वहारा अधिनायकत्व
के विचार को स्वीकार कर लिया था। शुरू में उन्होंने एंगेल्स का यह कथन नोट
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किया कि विजयी सर्वहारा को वर्ग-शत्रु को कुचलने के लिए अधिनायकत्व की
ज़रूरत है और इसलिए एक “स्वतन्त्र लोक राज्य” की बात करना बेतुका है (पृष्ठ
62)। इसके आगे उन्होंने लेनिन की परिभाषा जोड़ी : “अधिनायकत्व प्रत्यक्ष रूप
से हिंसा पर आधारित और किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।
“सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी अधिनायकत्व सर्वहारा वर्ग द्वारा बुर्जुआ वर्ग के
विरुद्ध हिंसा द्वारा हासिल की जाने वाली और बरक़रार रखी जाने वाली सत्ता है,
किसी भी क़ानून से न बँधी हुई सत्ता है।” 12
भगतसिंह के नोटों में सर्वहारा अधिनायकत्व के सार पर संशोधनवादी रुखों की
आलोचना हम पाते हैं। उन्होंने लेनिन की रचना ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार
काउट्स्की’ से लम्बे उद्धरण उतारे और लेनिन के इस विचार पर ख़ास ध्यान दिया
कि बुर्जुआ निन्दक “शुद्ध लोकतन्त्र” के नारे का सहारा लेकर सोवियत सरकार
पर अत्याचार का आरोप लगाते हैं : “परन्तु अब चूँकि श्रमिक तथा शोषित वर्गों
ने साम्राज्यवादी युद्ध के कारण विदेशों के अपने भाइयों से कटे रहकर भी इतिहास
में पहली बार स्वयं अपनी सोवियतों की स्थापना कर ली है, उन जन समूहों को
राजनीतिक निर्माण के काम में जुटा दिया है, जिनका बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़न करता
था, जिन्हें वह कुचलता था और जिन्हें मतिमूढ़ बनाता था, अब चूँकि उन्होंने स्वयं
एक नये, सर्वहारा राज्य का निर्माण करना आरम्भ कर दिया है, भीषण संघर्ष की
ज्वाला के बीच, गृहयुद्ध की ज्वाला के बीच शोषकों से मुक्त राज्य के बुनियादी
सिद्धान्तों की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है – इसलिए सारे लुच्चे बुर्जुआ
जन, ख़ून चूसने वालों का पूरा गिरोह ‘मनमानेपन’ का शोर मचाने लगा है और
काउट्स्की भी उन्हीं के स्वर को प्रतिध्वनित कर रहे हैं!” 13
सर्वहारा अधिनायकत्व को नये समाज के निर्माण का उपकरण मानते हुए
भगतसिंह ने ऐसे समाज की स्थापना के पथों की ओर बहुत ध्यान दिया। इस
सिलसिले में वह सोवियत रूस के अनुभव और वहाँ कुछ समय पहले हुए
क्रान्तिकारी पुनर्गठन की ओर निरन्तर उन्मुख होने लगे। डायरी के पृष्ठ 36 पर
पहली बार “बोल्शेविक रूस” का ज़िक्र आया है। इसके आगे हाशियों पर विभिन्न
लेखकों द्वारा रूस पर लिखी गयी पुस्तकों की सूची है : रेने फुलोप-मिलर की
‘बोल्शेविज़्म का चेहरा और दिमाग़’, एम. ओ'हारा की ‘रशिया’, लैंसलो लोटन
की ‘रूसी क्रान्ति’, एण्टन कार्लग्रीन की ‘बोल्शेविक रूस’ और ‘मार्क्स, लेनिन
तथा क्रान्ति का विज्ञान’ (पृष्ठ 191)। इस सूची में रूस पर वे सभी पुस्तकें नहीं
हैं, जिनमें भगतसिंह ने जेल में दिलचस्पी दिखायी थी। जे. सान्याल के अनुसार
भगतसिंह ने जॉन रीड की ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’, गोर्की की ‘माँ’
और स. स्तेप्याक-क्राव्चींस्की की ‘रूसी लोकतन्त्र का जन्म' भी पढ़ी थीं। 14
जे. सान्याल आगे लिखते हैं : “हालाँकि समाजवाद उनका विशेष विषय था,
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 691
तथापि उन्होंने 19वीं सदी के आरम्भ में रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन की उत्पत्ति
से लेकर 1917 की अक्टूबर क्रान्ति तक उसके इतिहास का गहराई से अध्ययन
किया। यह माना जाता है कि भारत में बहुत कम लोग ऐसे थे, जिनके इस विषय
पर ज्ञान की तुलना भगतसिंह के ज्ञान की जा सकती है। बोल्शेविक शासन में रूस
में हो रहे आर्थिक प्रयोग में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। "¹⁵
भगतसिंह यह समझते थे कि समाजवादी क्रान्ति के सम्मुख विराट सृजनात्मक
कार्यभार हैं जो इसे बुर्जुआ क्रान्ति से अलग करते हैं। निम्न उद्धरण में इस भेद पर
ज़ोर दिया गया है : "बुर्जुआ क्रान्ति आमतौर पर सत्ता पाने के साथ समाप्त हो जाती
है। सर्वहारा क्रान्ति के लिए सत्ता पाना एक शुरुआत ही है; सत्ता पा लेने पर उसका
उपयोग पुरानी अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने और नयी अर्थव्यवस्था गठित
करने के लिए किया जाता है।” (पृष्ठ 120)
क्रान्ति के मार्क्सवादी सिद्धान्त का स्वयं ही स्वतन्त्र रूप में अध्ययन करते हुए
भगतसिंह ने उसके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व पहचाने। उन्होंने पुरानी राजकीय
मशीनरी को तोड़ने और नयी मशीनरी बनाने की आवश्यकता पर लेनिन के विचार
नोट किये और यह इंगित किया कि आन्तरिक कार्यों के अलावा समाजवादी क्रान्ति
के सामने अन्तरराष्ट्रीय कार्यभार भी होते हैं, क्योंकि विश्व क्रान्ति के बिना किसी
एक देश में कम्युनिस्ट शासन ख़तरे से मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय
पूँजीवादी हस्तक्षेप का ख़तरा उसके सिर पर सदा मँडराता रहेगा (पृष्ठ 120)।
भारतीय क्रान्तिकारी हरावल के, जिसका जनसाधारण के साथ पहले कोई
सम्पर्क नहीं रहा, प्रतिनिधि के नाते भगतसिंह द्वारा लेनिन के इस विचार को
स्वीकार किया जाना एक बहुत बड़ी बात थी कि जनता पर पार्टी का प्रभाव बहुत
महत्त्वपूर्ण है। पृष्ठ 121 पर उनके नोट लेनिन के इस विचार को प्रतिबिम्बित करते
हैं कि सर्वहारा को आबादी के बड़े भाग को अपने पक्ष में लाना होता है और साथ
ही वर्ग-सहयोग की वकालत करने वाले बुर्जुआ और टुटपुँजिया तत्त्वों के श्रमिकों
पर प्रभाव को मिटाना होता है।
इस तरह हम देखते हैं कि जेल में थोड़े समय में ही भगतसिंह ने मार्क्सवादी
शिक्षा के प्रमुख सिद्धान्तों को समझ लिया और आत्मसात कर लिया। उनके जीवन
का ऐसे क्षण में त्रासद अन्त हो गया, जबकि वह मार्क्सवाद के ज्ञान का उपयोग
करने के लिए तैयार हो गये थे।
परन्तु जेल में उन्होंने जो भगीरथ परिश्रम किया, वह निरर्थक नहीं था।
भगतसिंह ने स्वयं जो कुछ जाना-समझा, उसे उन्होंने अपने मित्रों और साथियों तक
पहुँचाने की कोशिश की, यह समझते हुए कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के
विकास के लिए मार्क्सवादी सिद्धान्त कितना महत्त्वपूर्ण है। यह कोई संयोग की बात
नहीं कि अपने एक पत्र में उन्होंने अपने को एक स्वतन्त्रता सेनानी नहीं, समाजवादी
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विचारों का प्रचारक कहा।<sup>16</sup>
जेल में भगतसिंह ने अपने क्रान्तिकारी साथियों के साथ ही नहीं, बल्कि ग़दर
पार्टी के बहुत से सदस्यों के साथ भी सम्पर्क स्थापित किये, जो प्रथम विश्वयुद्ध
के दिनों से जेल में बन्द थे। राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की समस्याओं पर उन्होंने ग़दर
पार्टी वालों से लम्बी बातें कीं। जी. देवल ने ग़दर पार्टी के सदस्यों के साथ
भगतसिंह के सम्बन्धों के बारे में एक लेख लिखा है।<sup>17</sup> जेल में वह ग़दर पार्टी के
एक नेता सोहन सिंह भकना से मिले, जो कालान्तर में भारत में कम्युनिस्ट
आन्दोलन के एक प्रमुख नेता बने।<sup>18</sup>
भगतसिंह अपने साथियों को सलाह देते थे कि वे मार्क्सवाद का अध्ययन करें।
उदाहरण के लिए, उन्होंने मार्क्स की ‘पूँजी’ के अध्ययन की आवश्यकता पर ज़ोर
दिया। जयदेव प्रसाद गुप्त को 24 जुलाई, 1930 को लिखे पत्र में उन्होंने अपने लिए
किताबें मँगवायी थीं और कहा था कि अपने साथियों के लिए किताबों की सूची
पहले भेज चुके हैं और विनती की थी कि उनका यह अनुरोध जल्दी पूरा किया
जाये, क्योंकि उन्हें किताबों की सख्त तंगी है।<sup>19</sup>
इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि जो साथी सौभाग्यवश जेल जाने से बच
गये, उनके साथ भी भगतसिंह ने सम्पर्क बनाये रखे। अपनी कालकोठरी से भी वह
1929 में लाहौर में हुई नौजवान भारत सभा की कांग्रेस को एक महत्त्वपूर्ण सन्देश
भेजने में सफल रहे। अपनी क्रान्तिकारी पुस्तिकाओं की, जिनमें ‘बम का दर्शन’
भी था, पाण्डुलिपियाँ उन्होंने जेल से बाहर भिजवा दीं। फाँसी पर चढ़ने से कुछ
दिन पहले ही उन्होंने युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम अपनी घोषणा
लिखी और बाहर भिजवायी, जिसे उनकी अन्तिम इच्छा और वसीयतनामा कहा जा
सकता है।<sup>20*</sup>
जेल में उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं : ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद का आदर्श’
और ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’। दुर्भाग्यवश, इन पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ
नहीं बची रहीं, हालाँकि उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक पत्र बचे रहे। इन पत्रों
से भगतसिंह के इस आत्ममूल्यांकन की पुष्टि होती है कि वह समाजवादी विचारों
का प्रचारक हैं और इस बात की भी कि उन्होंने अपने साथियों की मार्क्सवादी रुख
अपनाने में मदद करने की कोशिश की।
सुखदेव को, जिन्हें भगतसिंह के साथ ही फाँसी दी गयी, उनका एक पत्र
प्रकाशित हुआ है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि भगतसिंह इस सच्चाई को
समझने लगे थे कि भारत में व्याप्त परिस्थितियों में समाजवाद एक तर्कसंगत रास्ता
है। इससे यह भी पता चलता है कि भगतसिंह भारत के सामाजिक जीवन पर अपने
प्रभाव को समझते थे।
उन्होंने लिखा कि अपने साथियों के साथ उन्होंने (राजनीतिक) वातावरण को
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काफ़ी बदला और वे अपने समय की पैदाइश थे। मार्क्स का हवाला देते हुए,
जिन्होंने, भगतसिंह के शब्दों में, औद्योगिक क्रान्ति से जन्मी विचारधारा को निरूपित
किया, उन्होंने लिखा कि उन्होंने और उनके साथियों ने भारत में समाजवादी और
कम्युनिस्ट विचारों की रचना नहीं की है, वे तो काल और परिस्थितियों के प्रभाव
का परिणाम हैं। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने यथाशक्ति इन विचारों का
प्रचार करने में मदद की है।²¹
भगतसिंह अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक मार्क्सवादी विचारों का प्रचार करते
रहे। 'बम का दर्शन' पुस्तिका में उन्होंने वर्ग रहित समाज और सर्वहारा
अधिनायकत्व का समर्थन किया।²² फाँसी की सज़ा सुनायी जा चुकने के बाद
पंजाब के गवर्नर को भेजे एक पत्र में भगतसिंह ने लिखा कि भारत में मेहनतकश
जनसाधारण और उनके उत्पीड़कों के बीच लम्बा संघर्ष चल रहा है, कि यह संघर्ष
दुगने उत्साह, साहस और अटूट संकल्प के साथ तब तक चलता रहेगा, जब तक
कि एक समाजवादी गणतन्त्र की स्थापना नहीं हो जाती, वर्तमान व्यवस्था का स्थान
एक नयी व्यवस्था नहीं ले लेती, जिसका उद्देश्य जन कल्याण होगा और जिसमें
हर तरह के शोषण का अन्त हो जायेगा और मानवजाति सच्ची और विश्वव्यापी
शान्ति के युग में पदार्पण करेगी। (इस पत्र की एक नक़ल मुझे भगतसिंह के साथी
विजय कुमार सिन्हा ने दी।)
भारत की स्वतन्त्रता के अदम्य सेनानी भगतसिंह ने अपना तन-मन देश की
आज़ादी के संघर्ष की समस्याओं में तथा राष्ट्रीय क्रान्तिकारी संगठनों को सुदृढ़
करने में लगाया। व्यक्तिगत आतंक की नीति से उन्होंने पूरी तरह इन्कार कर दिया।
उन्होंने सारी पेचीदगियों, अप्रत्याशित मोड़ों और उतार-चढ़ावों के साथ राजनीतिक
संघर्ष के महत्त्व को स्वीकार किया और वह इस बात के लिए उत्सुक थे कि उनके
जो साथी जेल जाने से बच गये हैं, वे ठीक ऐसे संघर्ष में जुटें। 2 फ़रवरी, 1931
के अपने पत्र में साथियों को यह सलाह देते हुए उन्होंने लेनिन के अनुभव को ध्यान
में रखा। इससे पता चलता है कि उन्होंने तत्कालीन भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए
लाक्षणिक बहुत से “वामपन्थी” दृष्टिकोणों से छुटकारा पा लिया था। उन्हें इस बात
का क़ायल करने के लिए कि संघर्ष की कुछ मंज़िलों में शत्रु के साथ बातचीत
की जा सकती है, उन्होंने लिखा कि समझौता अपनेआप में कोई बुरी बात नहीं है
और अपना उद्देश्य पाने में आरम्भ में उसका उपयोग किया जा सकता है।
1905-1907 में दूमा के प्रति लेनिन की नीति का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा
कि “समझौता” एक ऐसा हथियार है, जिसका राजनीतिक संघर्ष में इस्तेमाल किया
जाना चाहिए, ताकि राष्ट्र को थोड़ी देर के लिए आराम मिल सके और वह अपने
को आगे के संघर्ष के लिए तैयार कर सके। भगतसिंह ने क्रान्तिकारियों का आह्वान
किया कि वे अपने अन्तिम लक्ष्य को कभी न भूलें।
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मई, 1931 में यह पत्र भारतीय प्रेस में छप गया था। इसे प्रकाशित करने वालों
में इलाहाबाद का साप्ताहिक 'अभ्युदय' और पंजाब का 'केसरी' था।²³ इस तरह
भारतीय जनता इससे अवगत हो पायी और इसने वह प्रयोजन पूरा किया, जिसके
लिए लेखक ने इसे लिखा था।
भगतसिंह की अप्रकाशित रचनाओं में वह भूमिका ध्यान देने योग्य है, जो
उन्होंने ग़दर पार्टी के लाला रामशरण की यूटोपियाई रचना 'स्वप्नलोक'
(ड्रीमलैण्ड) के लिए 15 जनवरी, 1931 को लिखी थी। यह पुस्तक तो नहीं छपी,
लेकिन इसकी भूमिका भगतसिंह के परिवारवालों ने सँभालकर रखी हुई है।²⁴ इस
भूमिका की अन्तर्वस्तु पुस्तक के विषय से कहीं अधिक व्यापक है : भगतसिंह
ने घनीभूत रूप में अपने विचार व्यक्त करने के लिए तथा अपने साथियों को सलाह
देने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया।
भूमिका इस कथन से आरम्भ होती है कि भारत के राजनीतिक आन्दोलन का
कोई सुस्पष्ट आदर्श नहीं है और इस दृष्टि से क्रान्तिकारी आन्दोलन भी कोई
अपवाद नहीं है। केवल ग़दर पार्टी ने ही अपना आदर्श स्पष्टतः निरूपित किया था
: शासन के गणतन्त्रीय रूप का समर्थन किया था। भगतसिंह ने लिखा कि यह
साफ़-साफ़ समझना चाहिए कि क्रान्ति का अर्थ उथल-पुथल या खूनी युद्धमात्र
नहीं है। क्रान्ति का आशय अनिवार्यतः एक ऐसे कार्यक्रम को लागू करना है, जो
नये तथा अधिक अच्छे आधार पर समाज का पुनर्गठन करे। उन्होंने कहा कि न
केवल वामपन्थी कांग्रेसी, बल्कि राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रतिनिधि भी
“क्रान्तिकारी” कहलाने के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि संघर्ष के उग्र उपायों को
मानना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं है।
लाला रामशरण की पुस्तक की चर्चा करते हुए भगतसिंह ने लिखा कि लेखक
उस दर्शन के विवेचन से शुरू करता है, जिसे वह बंगाल और पंजाब के सारे
क्रान्तिकारी आन्दोलन का आधार मानता है। उन्होंने कहा कि वह लेखक से सहमत
नहीं है, क्योंकि लेखक संसार की प्रयोजनपरक और अधिभूतवादी व्याख्या करता
है, जबकि वह स्वयं भौतिकवादी हैं। उन्होंने ईश्वर में विश्वास और रहस्यवाद के
लिए लेखक की आलोचना की, अलग-अलग धर्मों में सामंजस्य बिठाने के लेखक
के प्रयासों को अस्वीकार किया और इस प्रश्न पर अपना रुख मार्क्स के शब्दों में
व्यक्त किया : “धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
लेखक द्वारा चित्रित भावी समाज का विश्लेषण करते हुए भगतसिंह ने
सामाजिक प्रगति में यूटोपियाई सिद्धान्तों की उपयोगी भूमिका को स्वीकार किया
: “सेंट-सिमों, फूरिये और राबर्ट ओवेन और उनके सिद्धान्तों के बिना मार्क्स का
वैज्ञानिक समाजवाद निरूपित नहीं हो सकता था।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया
कि भावी समाज कम्युनिस्ट समाज होगा, जिसके निर्माण के लिए वह और उनके
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साथी प्रयत्नशील हैं। एकाधिक बार वह सोवियत रूस के इतिहास की ओर उन्मुख
हुए, शारीरिक और बौद्धिक श्रम के लिए समान पारिश्रमिक तथा जन शिक्षा के क्षेत्र
में उसकी नीति का उदाहरण दिया। भावी समाज में युद्धों के उन्मूलन की
भविष्यवाणी करते हुए उन्होंने लिखा कि सोवियत रूस को सर्वहारा अधिनायकत्व
का देश होने के कारण पूँजीवादी समाज से अपनी रक्षा के लिए फ़ौज रखनी पड़
रही है।
भगतसिंह की जेल की डायरी और दूसरी सामग्रियाँ, जिन पर यहाँ गौर किया
गया है, इस युवा क्रान्तिकारी के दृष्टिकोण का विकास दिखाती हैं। साथ ही वे इस
लिहाज़ से भी अमूल्य हैं कि इनमें हमें भगतसिंह की विचारधारात्मक खोजों का पता
चलता है, हम देखते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय क्रान्तिकारियों का मार्क्सवाद की ओर
रुझान था और वे लेनिन तथा अक्टूबर क्रान्ति के विचारों से प्रभावित हुए थे।
भगतसिंह तत्कालीन मध्यवर्गीय नौजवानों की, जो कांग्रेस के बुर्जुआ नेताओं
से निराश थे, भावनाओं का मूर्त रूप हैं। इन नौजवानों को भगतसिंह ने यह दिखाया
कि उन्हें कौन-सा रास्ता पकड़ना चाहिए। जब इस क्रान्तिकारी को फाँसी दे दी
गयी, तो उनके उदाहरण का अनुसरण करते हुए क्रान्तिकारी दलों ने जेल में ही
मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए पाठ्यक्रमों का प्रबन्ध किया।
सोवियत संघ में हो रहे क्रान्तिकारी कायाकल्प तथा पार्टी कार्यकर्ताओं को
शिक्षित करने की उसकी विचारधारात्मक और राजनीतिक प्रणाली से भगतसिंह
बहुत आकर्षित हुए। वह अक्टूबर क्रान्ति के अनुभव का प्रत्यक्ष अध्ययन करना
चाहते थे और उन्होंने अपने साथियों से ऐसे योग्य उम्मीदवार चुनने को भी कहा,
जिन्हें इस उद्देश्य से मास्को भेजा जा सके।
सुविख्यात स्वतन्त्रता सेनानी बाबा पृथ्वी सिंह आज़ाद ने ‘लेनिन की धरती
में’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है :
“उन दिनों भगतसिंह जेल में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का अध्ययन कर रहे थे
और उनकी क्रान्तिकारी दृष्टि को एक नया, अधिक परिपक्व आयाम प्राप्त हो रहा
था। वह भारत की स्वतन्त्रता तथा जनसाधारण की शोषण से मुक्ति की समस्या
पर अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में पुनर्विचार कर रहे थे। वह भली भाँति जानते थे कि
उन्हें फाँसी होगी। परन्तु शहीद होने से पहले वह आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि
भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन उस नयी अवस्था में पदार्पण कर ले, जिसकी
कल्पना उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धान्तों और सोवियत क्रान्ति के अध्ययन के आधार
पर की थी।”
आगे वह लिखते हैं : “चन्द्रशेखर और धन्वन्तरि ने मुझसे कहा : सरदार
भगतसिंह जेल में मार्क्स और लेनिन के कम्युनिस्ट दर्शन का गहरा अध्ययन करते
रहे थे और अपने साथियों को भी इसकी प्रेरणा देते रहे थे।...उन्होंने ही तुमसे मिलने
696 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
और तुम्हें इण्डियन सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सदस्य बनाकर सोवियत संघ
में अध्ययन के लिए भेजने को कहा था।” 25
गिरफ़्तारी से पहले भगतसिंह खुद भी सोवियत संघ जाकर समाजवाद के देश
को अपनी आँखों से देखना चाहते थे। ‘सोवियत संघ में नव मानव’ पुस्तक में
विजय कुमार सिन्हा लिखते हैं :
“उन दिनों ही शौक़त उस्मानी, जो कुछ दूसरे लोगों के साथ तीसरे कम्युनिस्ट
इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस में भाग लेने के लिए चोरी-छिपे मास्को जा रहे थे,
कानपुर में मुझसे मिले और अपने साथ चलने को कहा।...मैंने भगतसिंह से बात की
: हमें लगा कि यह उचित समय नहीं है। हमने तय किया कि हम दोनों कुछ समय
बाद मास्को जायेंगे।” 26 दुर्भाग्यवश, यह योजना कभी साकार नहीं हो पायी।
कुलबीर सिंह ने, जिनकी कृपा से मैं उनके बड़े भाई भगतसिंह की जेल
डायरी का अध्ययन कर और उसकी नक़ल उतार सका, उनके जीवन तथा
कार्यकलाप पर अद्वितीय सामग्री जमा की है, जिसका बारीक़ी से अध्ययन किया
जाना चाहिए। उनके विचार में भगतसिंह जेल में कूट भाषा में भी एक डायरी रखते
थे, जो अभी तक नहीं मिल पायी है।
भगतसिंह के दूसरे भाई, कुलतार सिंह भी बड़े सौहार्द से मुझसे मिले। उनकी
सुपुत्री वीरेन्द्र सिंधू ने उपरोक्त पुस्तक लिखी है। इसमें वह बताती हैं कि जुलाई,
1929 में दिल्ली में मुक़दमे की सुनवाई में भगतसिंह ने कहा था : हम उस
ऐतिहासिक निष्कर्ष पर ज़ोर देते हैं, जिस पर हम पहुँचे हैं।...जिस तरह फाँसी के
तख़्ते और साइबेरिया की ख़ानों के डर से रूस में क्रान्ति की ज्वाला नहीं बुझी,
उसी तरह सरकार के आदेश और “असाधारण” क़ानून भारत में स्वतन्त्रता संग्राम
की ज्वाला नहीं बुझा सकते।
21 जनवरी, 1930 को लेनिन की पुण्य तिथि पर भगतसिंह और उनके साथी
लाल रूमाल गले में बाँधकर अदालत में आये। कटघरे में पहुँचते ही उन्होंने नारे
लगाये : “समाजवादी क्रान्ति ज़िन्दाबाद”, “कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल ज़िन्दाबाद”,
“लेनिन का नाम अमर है”, “जनता ज़िन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद”।
इसके बाद भगतसिंह ने वह तार पढ़ा, जो उन्होंने और उनके साथियों ने तीसरे
इण्टरनेशनल को भेजने के लिए अदालत को दिया था। इसमें कहा गया था : लेनिन
दिवस पर हम उन सब लोगों का हार्दिक अभिवादन करते हैं, जो महान लेनिन के
विचारों को आगे ले जाने के लिए प्रयत्नशील हैं। रूस जो महान प्रयोग कर रहा
है, उसमें सफलता की कामना हम करते हैं। हम अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन की
आवाज़ में आवाज़ मिलाते हैं। सर्वहारा की जीत होकर रहेगी, पूँजीवाद की हार
होगी। साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।
भारत में एक ऐसे व्यक्ति से भी मेरी मुलाक़ात हुई, जो भगतसिंह को फाँसी
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 697
दिये जाने से कुछ घण्टे पहले ही उनसे मिले थे। यह थे प्राणनाथ मेहता, भगतसिंह
के मित्र और वकील। उन्होंने मुझे बताया :
“उन दिनों मैं डायरी रखता था (अपने काम के लिए भी मुझे इसकी ज़रूरत
होती थी)। बदक़िस्मती से 1947 में पार्टिशन के वक़्त मुझे लाहौर छोड़ना पड़ा,
मेरे काग़ज़ात वहीं रह गये, कुछ पता नहीं उनका क्या हुआ।
“बहरहाल डायरियाँ तो खो गयी हैं, मगर उन दिनों की घटनाओं ने मेरे दिमाग़
पर इतनी गहरी छाप छोड़ी है कि उसे न वक़्त मिटा सका है, न कोई दूसरी
घटनाएँ...
“23 मार्च, 1931 को मुझे वह किताब मिल गयी, जो भगतसिंह ने मँगवायी
थी। मैं उससे मिलने गया। जेल के गेट पर मुझे बताया गया कि भगतसिंह और
उसके दोस्तों ने किसी से भी मिलने से इन्कार कर दिया है। वजह यह थी कि
जेल के अधिकारियों ने क़रीबी रिश्तेदारों को छोड़कर और किसी से मिलने पर
पाबन्दी लगा दी थी। इसके विरोध में भगतसिंह और उसके साथियों ने कहा कि
वे किसी से भी नहीं मिलेंगे।
“कुछ करना चाहिए था। मैं जेल के अधिकारियों से मिलने गया। उनमें एक
मि. पुरी नेक इन्सान निकला। उसने मुझे सलाह दी कि तीन क़ैदियों के वकील
के नाते मैं अर्जी दूँ कि मुझे उनकी आख़िरी इच्छा लिखने के लिए उनसे मिलना
है। फिर उसने मुझे भगतसिंह की कालकोठरी में ही उससे मिलने की इजाज़त दे
दी। थोड़ी देर बाद राजगुरू और सुखदेव को भी वहाँ लाया गया।
“उस वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि लाहौर जेल के इन तीन क़ैदियों से यह
मेरी आख़िरी मुलाक़ात है, कि दो घण्टे बाद इन्हें फाँसी दे दी जायेगी।
“भगतसिंह ने मुझसे पूछा कि मैं किताब लाया हूँ या नहीं। मैंने उसे किताब
दी, तो वह बड़ा खुश हुआ। किताब लेते हुए बोला : ‘आज रात को ही इसे ख़त्म
कर दूँगा, इससे पहले कि वे...’ उस बेचारे को क्या पता था कि वह किताब आख़िर
तक कभी नहीं पढ़ पायेगा।”
मैंने प्राणनाथ मेहता से पूछा कि उन्हें उस किताब का नाम याद है, जो वह
भगतसिंह के लिए ले गये थे। उनका जवाब था : “सच पूछें, तो मुझे याद नहीं
कि यह लेनिन के बारे में किताब थी, या लेनिन की। एक छोटी-सी किताब थी।
..अगले दिन जेल के सन्तरी ने मुझे बताया कि जब भगतसिंह को लिवाने आये थे,
तो वह यह किताब पढ़ रहा था। बाद में भगतसिंह मेरे लिए जो चीज़ें छोड़ गये
थे, उनके साथ मुझे वह किताब भी मिली।”
“शायद उसी सन्तरी ने,” मेहता ने आगे कहा, “भगतसिंह के रिश्तेदारों को
उनके अन्तिम क्षणों के बारे में बताया।”
वीरेन्द्र सिन्धू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतसिंह प्राणनाथ मेहता की
698 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लायी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, जब दरवाज़ा खुला। दहलीज पर अफ़सर खड़ा
था।
“‘सरदार जी,’ उसने कहा। ‘फाँसी लगाने का हुक्म आ गया है। तैयार हो
जाइये।’
“भगतसिंह के दायें हाथ में किताब थी, उससे नज़रें उठाये बिना ही उन्होंने
बायाँ हाथ उठाकर कहा : ‘ठहरिये। यहाँ एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल
रहा है।’
“कुछ पंक्तियाँ और पढ़कर उन्होंने किताब एक तरफ़ रख दी और उठ खड़े
हुए बोले : ‘चलिए!’”
भगतसिंह के क्रान्तिकारी दल में से एक और कर्मठ क्रान्तिकारी निकला, जो
आगे चलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना। यह थे अजय कुमार
घोष।
‘भगतसिंह और उनके साथी’ नामक पुस्तक में अजय घोष ने लिखा कि
भगतसिंह भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अल्पांश के लिए एक उल्का पिण्ड की
तरह चमके और लुप्त होने से पहले वह लाखों लोगों के लिए एक नये भारत की
आत्मा और आशाओं का प्रतीक बन गये, उन लोगों के लिए, जिन्हें मृत्यु का डर
नहीं था, जो साम्राज्यवादी अंकुश को उतार फेंकने और अपने महान देश में एक
स्वतन्त्र राज्य का भवन खड़ा करने के लिए कृतसंकल्प थे।
भगतसिंह और उनके साथियों जैसे निडर क्रान्तिकारियों का बलिदान व्यर्थ नहीं
था। उनके दल के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मुट्ठीभर नौजवान
क्रान्ति नहीं ला सकते, कि बड़े धीरज और परिश्रम के साथ जनसाधारण के बीच
काम करना चाहिए, लोगों को संघर्ष के लिए संगठित करना चाहिए, ठोस
कार्यनीतियाँ तैयार करना, उन पर अमल करना तथा लोगों को सत्ता के अन्तिम
संघर्ष की ओर ले जाना चाहिए।
(1981)
टिप्पणियाँ
- अ. व. राइकोव, ‘भगतसिंह और उनकी विचारधारात्मक धरोहर’, ‘नरोदी आज़ीइ ई
आफ्रीकी’ (‘एशिया और अफ्रीका के जनगण’), अंक 1, 1971 (रूसी में) - ल.व. मित्रोखिन, ‘लेनिन के बारे में भारत’, ‘नाऊका’ (‘विज्ञान’) प्रकाशन, मास्को, 1971,
पृष्ठ 124-130 (रूसी में) - M. Windmiller and G.D. Overstreet, Communism in India, Berkley, 1959, p. 240
- पूरा पत्र परिशिष्ट में देखें
- J. Sanyal, Sardar Bhagat Singh, Lahore, 1930, p. 104
सान्याल की पुस्तक पर औपनिवेशिक अधिकारियों ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। उल्लेखनीय है
शहीदएआज़म की जेल नोटबुक / 699
कि भगतसिंह और उनके साथियों के बारे में पुस्तकों, कविताओं और उनकी रक्षा की अपीलों
का निषिद्ध साहित्य की सूची में विशेष स्थान था। अमेरिकी शोधकर्ता एन. जेरल्ड बैरियर
की पुस्तक में सोलह ऐसे प्रकाशन गिनाये गये हैं (देखें : N. Gerald Barrier, Banned
Controversial Literature and Political Control in British India, 1907-1947, pps.
224-225 )
6. टॉमस जैफ़रसन (1743-1828) – अमेरिकी राजनेता, 1801-1809 में संयुक्त राज्य
अमेरिका के राष्ट्रपति
7. ज्याँ जाक रूसो (1712-1778) – फ्रांसीसी दार्शनिक और प्रबोधक
8. टॉमस पेन (1737-1809) – अमेरिकी और ब्रिटिश सामाजिक एवं राजनीतिक नेता,
प्रबोधकों के क्रान्तिकारी पक्ष के प्रतिनिधि
9. पैट्रिक हेनरी (1736-1799) – अमेरिकी राजनीतिज्ञ और वक्ता
10. कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स, ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र’, 1847-1848 (का.
मार्क्स, फ़्रे. एंगेल्स, संकलित रचनाएँ, तीन खण्डों में, हिन्दी संस्करण, मास्को, प्रगति प्रकाशन,
खण्ड 1, भाग 1, 1978, पृष्ठ 152-153)
11. फ्रे. एंगेल्स, ‘जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति’, 1851-1852 (का. मार्क्स, फ्रे. एंगेल्स,
संकलित रचनाएँ, तीन खण्डों में, खण्ड 1, भाग 2, 1978, पृष्ठ 103)
12. व्ला. इ. लेनिन, ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार काउट्स्की’, 1918 (व्ला. इ. लेनिन, संकलित
रचनाएँ, दस खण्डों में, खण्ड 8, 1984, पृष्ठ 88
13. व्ला. इ. लेनिन, ‘सर्वहारा क्रान्ति और गद्दार काउट्स्की’, 1918 (व्ला. इ. लेनिन, संकलित
रचनाएँ, दस खण्डों में, खण्ड 8, 1984, पृष्ठ 137)
14. J. Sanyal, Sardar Bhagat Singh, Lahore, 1930, p. 104
15. Ibid., p. 103. वीरेन्द्र सिन्धू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतसिंह रूसी क्रान्ति को,
उसने जो रास्ते तय किये थे और जो नतीजे हासिल किये थे, उनको समझ पाने के लिए रात
दिन प्रयास करते रहे
16. N. K. Singh, The impact of the Marxist ideas on Indian Revolutionary
Movement after the October Revolution, Mitteilgen des Institus fur
Orientforschung, BD. XVII, H. 2, 1971, S. 248
17. G. Deol, The Ghadarites and Shaheed Bhagat Singh, Peoples Path, March 1968
18. S.S. Josh, Baba Sohan Singh Bhakna, New Delhi, 1970, pp. 61 and 62
19. Peoples Path, June 1968, p. 17
20. N. K. Singh, The Impact of the Marxist Ideas on Indian Revolutionary
Movement after the October Revolution., p. 247
21. Ibid., p. 71
22. B. Hardas, Armed Struggle for Freedom, Poona, 1958. pp. 383-389
23. M. N. Gupta, History of the Indion Revolutionary Movement, Bombay-New
Delhi, 1972, p. 132
24. इस भूमिका का सारांश ‘लिंक’ ने 24 अगस्त, 1969 के अंक में छापा था।
25. Baba Prithvi Singh Azad, In Lenin's Land, New Delhi, 1978, pp. 29, 32 and 35
26. Bejoy Kumar Sinha, the New Man in The Soviet Union, Peoples Publishing
House, New Delhi, 1971, p. 2
700 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
खण्ड तीन
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम
(आयरलैण्ड के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी डॉन ब्रीन की आत्मकथा
‘माई फ़ाइट फ़ॉर आयरिश फ़्रीडम’ का हिन्दी अनुवाद)
अनुवादक
भगतसिंह
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प्रथम परिच्छेद
पूर्वेतिहास
उस समय ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में ‘आयरिश-होम रूल-बिल’ पास हो चुका था।
उसे क्रियात्मक रूप देने में अंग्रेज़ तो आनाकानी करते ही थे, उत्तर-आयरिश
निवासी औरेंज वालों ने भी घोषणा कर दी कि उस बिल का व्यवहार किया गया
और डबलिन में आयरिश पार्लियामेण्ट खड़ी कर दी गयी तो वे उसका हर तरह
से विरोध करेंगे, यहाँ तक कि शस्त्रों के प्रयोग से भी न झेंपेंगे। अंग्रेज़ टोरी दल
की सहायता से उन लोगों ने, इसी उद्देश्य से, अपने स्वेच्छा-सेवकों को पूर्णरूप से
संगठित तथा शस्त्रों से सुसज्जित करना भी शुरू कर दिया। उनको देखते ही
आयरिश देशभक्तों के हृदय में भी अपना स्वेच्छा-सेवक संघ बनाने की प्रबल इच्छा
जागृत हो उठी। उन्होंने इसके लिए देशवासियों से अपील की और आयरिश लोगों
ने भी पूरी तत्परता दिखायी।
गत महायुद्ध के छिड़ते समय आयरलैण्ड में तीन सैनिक-संघ विद्यमान थे।
एक तो पूर्वोक्त उत्तर निवासी औरेंज वालों का, दूसरा आयरिश देशभक्तों का
आयरिश रिपब्लिकन (प्रजातन्त्र) स्वेच्छा-सेवक-संघ और तीसरा ब्रिटिश सेना
(British Party of Occupation); आयरिश लोगों का नेतृत्व तथा प्रतिनिधित्व
पार्लियामेण्ट के सदस्य जॉन रैडमाण्ड तथा उनके अनुयायियों के हाथ में था। यह
कट्टर देशभक्त तो थे परन्तु महायुद्ध के छिड़ते ही उन्होंने अंग्रेज़ों का पक्ष ले लिया।
औरेंज वालों ने भी अंग्रेज़ों की पूर्ण रूप से सहायता की और उधर आयरिश
स्वेच्छा-सेवक-संघ में मतभेद हो गया। बहुत से लोग जाकर ब्रिटिश सेना में भरती
हो गये। उस समय बहुत थोड़े ऐसे बचे जिन्हें कि अंग्रेज़ों के ‘छोटी जातियों के
स्वत्वों तथा सन्धिपत्रों की पवित्रता की रक्षा के लिए युद्ध में सम्मिलित होना’ आदि
मधुर वाक्य पथभ्रष्ट न कर सके। वे ऐसे वीर थे जिनका एकमात्र आदर्श, अविचल
विश्वास और अटल आशा केवल स्वतन्त्रता-प्राप्ति थी।
मैं 1914 में टिप्रेरी नगर से चार मील की दूरी पर स्थित डोनोहिल गाँव के
स्वेच्छा-सेवकों में सम्मिलित हुआ था। उन थोड़े लोगों में, जिन्होंने उस समय भी
आयरलैण्ड माता का अंचल छोड़ना स्वीकार न किया था, हमारा छोटा-सा दल भी
था। सैनिक-फण्ड में सहायता देने तथा भरती के विरोध करने के कारण पुलिस
की दया-दृष्टि मुझ पर पड़ी और मुझे भी वह उस समय कहीं-कहीं पाये जाने
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 703
वाले भयंकर जन्तु, सिनफिनर, समझने लगी। बाद में उन्होंने अपार कृपा कर मुझे
'हत्यारों के राजा' की बहुत ऊँची पदवी प्रदान कर दी थी। हम लोग सप्ताह में
एक-दो बार जंगल में एकत्रित होकर कवायद तथा रिवाल्वर चलाने आदि का
अभ्यास करते और अवसर पाते ही जहाँ कहीं से बन पड़ता रिवाल्वर उड़ाने में भी
न चूकते थे।
1916 के ईस्टर विद्रोह की निष्फलता का हमारे कार्यक्रम पर बहुत प्रभाव
पड़ा। देशभर का संगठन छिन्न-भिन्न हो गया और सरकार ने उसे गैर-क़ानूनी
घोषित कर दिया। परन्तु जो लोग उस समय पुलिस की क्रूर दृष्टि से बच
निकले, उन्होंने शीघ्र ही डबलिन में दो गुप्त समितियाँ स्थापित कर लीं और
संगठन कार्य प्रारम्भ कर दिया। हमें भी अपना कार्य गुप्त रूप से ही करना पड़ा।
हमारी संख्या भी बहुत कम हो गयी। एक बार तो यहाँ तक नौबत आयी कि
केवल हम तीन ही व्यक्ति शेष रह गये। तो भी मैं और मेरे सहकारी श्री
सीनट्रीसी (Sean Treasy) बड़ी तत्परता से कार्य करते रहे। धीरे-धीरे हमारी
संख्या तेरह तक पहुँच गयी। वे सभी बड़े दृढ़-प्रतिज्ञ, अदम्य साहसी तथा
निर्भीक देशभक्त थे। हम चुपचाप उनका शिक्षण करते रहे। उनको ड्रिल तथा
रिवाल्वर आदि का अभ्यास कराया जाता। साधारणतया हम अंग्रेज़ सैनिकों की
पुस्तकों के आधार पर ही सब अभ्यास किया करते, कभी-कभी एकदम भोले
दर्शक बनकर अंग्रेज़ सैनिकों का ड्रिल और परेड आदि देखा करते और बड़ी
भूलें कर जाते। परन्तु हमारी तत्परता उन सब असुविधाओं पर विजय पाती। 1917
तक इसी तरह कार्य चलता गया। सन् 1917 के अगस्त में फिर हमने
खुल्लमखुल्ला परेड कर दी। श्री एमन डी. वैलरा (Emon de Valera) का जोकि
अभी-अभी लुईस जेल से छूट कर आये थे, टिपेरी नगर की एक सार्वजनिक
सभा में भाषण हुआ। उस समय हम यूनीफार्म (वर्दी) पहनकर, रायफ़लों के
स्थान पर लाठियाँ उठाकर उनके शरीर-रक्षक बने थे। हमारे साहस को देखकर
शत्रु शायद इतने चकित न होंगे जितने कि हमारे मित्र। जनसाधारण की दृष्टि में
उस दिन हमने तीन प्रकार से सरकारी आज्ञाओं का उल्लंघन किया। पहले तो
वर्दी पहनना मना था। दूसरे मार्चिंग करते हुए चलना भी बन्द किया जा चुका था
और अभी कुछ दिन पहले लोगों का लाठी उठाना भी निषेध कर दिया गया था।
इसलिए उस दिन नियमानुसार समिति की सभा न बुलाकर, एक लम्बा-चौड़ा
प्रस्ताव पास किये बिना ही, जो हमने ऐसा कर दिया था, यह मित्र-मण्डली के
लिए असह्य हो उठा। सिनफिन लोगों के सार्वजनिक विभाग ने हमें जी भरकर
कोसा, परन्तु चुपचाप सब सहन करते रहे और अपने कार्य में जुटे रहे।
उधर शत्रुओं ने भी कोई कसर उठा न रखी। मेरे तथा श्री ट्रीसी के वारण्ट
निकाले गये। पर हमें सम्राट का आतिथ्य एकदम अस्वीकार था, अतः हम
704 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
इधर-उधर मित्रों के घरों में दिन बिताने लगे। यदि उस समय के जेलों को
विद्रोह-विश्वविद्यालय (University of the Rebels) कहें तो अनुचित न होगा।
बहुत-से लोग वहीं से ड्रिल तथा बम बनाने की शिक्षा पाकर आते थे। श्री ट्रीसी
को उस समय दो वर्ष कारागार मिला, जिसमें से बाद में सोलह महीने घटा दिये
गये थे। उन दिनों कोर्ट में भी खूब दिल्लगी रहती। अभियुक्त गवाहियों के समय
या तो समाचारपत्र पढ़ने में इस तरह जुट जाते मानो किसी क्लब में बैठे हैं, अथवा
मधुर संगीत अलापते हुए उसे संगीत विद्यालय बना देते। जेल में कैदियों के साथ
किये जाने वाले दुर्व्यवहार के कारण श्री ट्रीसी तथा अन्य राजनीतिक कैदियों ने
अनशन शुरू कर दिया। परन्तु सरकार के दिल पर तब तक कोई प्रभाव न हुआ,
जब तक कि एक कैदी कमाण्डेण्ट टाम आशि, बलपूर्वक भोजन खिलाने के प्रयत्न
में परलोक न सिधार गये, और समस्त देश में क्रोध की आग न भड़क उठी। इस
तरह के बलिदानों से जब लोगों में बहुत उत्तेजना फैली तब कहीं सरकार समझौते
पर राजी हुई और तभी हमारे राजनीतिक कैदियों को सांग्रामिक बन्दी (War
Prisoners) माना गया। आदत से मजबूर ब्रिटिश सरकार ने सन्धि की शर्तें फिर
तोड़ डालीं और श्री ट्रीसी को फिर अनशन शुरू करना पड़ा। परन्तु बाद में वे शीघ्र
ही छोड़ दिये गये।
इधर परिस्थिति अनुकूल होने के कारण हमारा सैनिक संगठन 1916 से भी
अधिक सुदृढ़ तथा सुविस्तृत हो गया। श्री सीन ट्रीसी ने आते ही इस बात पर ज़ोर
देना शुरू किया कि अब हमें सब कार्य खुल्लम-खुल्ला करना चाहिए। यह ध्यान
में रखना चाहिए कि शस्त्रों आदि के रखने का बहुत प्रबल निषेध किया गया था,
अतः हमें गुप्त उपायों से ही शस्त्र-संग्रह करना पड़ता था। बल्कि ड्रिल तथा
संगठन-कार्य भी गुप्त ही रूप से करना पड़ता था, परन्तु ट्रीसी महोदय के आग्रह
से जब हमारा काम खुल्लम-खुल्ला शुरू हुआ, तो वे बेचारे फिर पकड़े गये। यह
1918 की बात है। महायुद्ध में अंग्रेज़ मुँह की खा रहे थे। जर्मनों का सबसे बड़ा
आक्रमण तथा अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी पराजय उसी समय हुई थी। उस समय अंग्रेज़ों
ने आयरलैण्ड में ज़बरदस्ती सेना भरती करने की बात पर ज़ोर दिया। उनकी
चिल्ल-पों सुनकर और तैयारियाँ देखकर समस्त देश में हो-हल्ला मच गया।
स्वेच्छा-सेवक-संघ के सदस्यों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ने लगी। हमारे पास कमी
केवल शस्त्रों की थी। उसके लिए हमारे कार्यकर्ताओं ने उन लोगों की सूची तैयार
कर ली जिनके पास शस्त्र रहते थे। हम रात्रि में उन लोगों के घरों में चले जाते,
और वे चुपचाप अपने शस्त्र हमारे सुपुर्द कर देते। कुछ एक ने तो हमें निमन्त्रण देकर
बुला भेजा। हमें इस कार्य में किसी भी विशेष रुकावट व बाधा का सामना नहीं
करना पड़ा। पीछे अंग्रेज़ों ने सभी लोगों से शस्त्र लौटाने शुरू कर दिये, परन्तु हमने
बड़ी तत्परता से अपना कार्य जारी रखा।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 705
ज़बरदस्ती की जाने वाली भरती के विरोध में हम युद्ध की तैयारियाँ करने
लगे। उधर स्त्रियों तथा बालकों के भी संघ स्थापित हो गये, जो हर समय हमें
सहायता देने को तैयार रहते थे। हमने नक़ली लड़ाइयाँ लड़नी भी शुरू कर दीं।
हमने कई बार टिप्रेरी नगर पर आक्रमण करने तथा उसकी रक्षा करने का अभिनय
किया और फिर कई सड़कों तथा बाज़ारों को फ़ौजी क्षेत्र (Military Area) घोषित
कर दिया, जहाँ पर कि अंग्रेज़ों के जाने का भी निषेध कर दिया जाता था। ऐसे
अवसरों पर हम रायफ़लें आदि नहीं ले जाते थे क्योंकि उनके छिन जाने की
आशंका थी। परन्तु मेरे जैसे कई व्यक्ति विशेष कारणों से अपना रिवाल्वर हर समय
अपने पास रखते थे। सरकार को अपनी बात पर व्यवहार करने का साहस ही न
हुआ और धीरे-धीरे उसका यह विचार ढीला होने लगा। उसके इस विचार के ढीला
होते ही हमारा संगठन भी ढीला होने लगा। वे लोग, जो युद्ध क्षेत्र की भीषणता तथा
मोर्चों की भयंकरता से त्रस्त हो उठे थे, और वहाँ से बचने मात्र के विचार से ही
हमारे संघ में आ मिले थे, अब हमें छोड़कर चलते बने। पीछे थोड़े ही व्यक्ति बच
रहे परन्तु वे बड़े दृढ़ थे।
उधर बेचारे सीन ट्रीसी डन्डल्क जेल में अनशन का मज़ा लूट रहे थे। पर
हमारी दयालु सरकार को उनकी किंचित मात्र भी चिन्ता न हुई। हम समझ गये कि
सरकार उन्हें भूखों मरने देना चाहती है। हमें शीघ्र ही कुछ न कुछ करने की
आवश्यकता महसूस हुई। मुझे बड़ी दूर की सूझी। क्यों न एक सिपाही को धर
पकड़ें और उसे अनशन व्रत का मज़ा उठाने को विवश करें? सभी साथियों ने मेरे
दिमाग़ की खूब दाद दी और इसे क्रियात्मक रूप देने की चिन्ता करने लगे परन्तु
आयरिश प्रजातन्त्र भ्रातृमण्डल (Irish Republican Brotherhood) के लोगों ने
हमारी योजना को सफल न होने दिया। हमने भी उनसे अपना सम्बन्ध तोड़ लिया।
जुलाई 1918 में ट्रीसी छूट आये। प्रजा तथा संगठन के सम्बन्ध में इस बार वे
बड़ी-बड़ी योजनाएँ सोचकर आये। परन्तु मुझे प्रचार तथा संगठन का पूरा अनुभव
हो चुका था। मैं इन शुष्क कार्यों में सिर फोड़ने की बजाय युद्ध छेड़ने की चिन्ता
में था। मैंने अपना यह मन्तव्य उसके सामने रखा। पर उन्होंने ज़िद की और इस
कारण हम अपने ही मतानुसार अलग कार्य करने लगे।
दूसरा परिच्छेद
विद्रोह-भवन (कुटी)
श्री सीन ट्रीसी अपने संगठन कार्य में जुट गये और मैंने श्री पैट्रिकक्योह के साथ
बम फ़ैक्टरी बना ली। हम दोनों में आवश्यक तथा अनावश्यक बातों पर खींचातानी
706 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हो जाती और श्री ट्रीसी आकर हमारी सुलह करवाया करते थे। फ़ैक्टरी शब्द बहुत
बड़ा है। 'बम फ़ैक्टरी' सुनते ही पाठक क्रुप (Krupp) आदि किसी भारी कारख़ाने
की कल्पना न करने लगें। वह एक साधारण ग्रामीण कुटिया थी। हमारा सामान भी
मामूली ही था। साधारण गन पाउडर (बारूद) बनाना तो आसान काम है ही, हम
बम भी ऐसे सादा-से ही बना लेते थे, जिन्हें फेंकने से पहले पलीता लगाने की
आवश्यकता हुआ करती। हमें जहाँ से भी जिस किसी तरह के कारतूस मिल जाते;
ले लेते और फिर उन्हें स्वेच्छानुसार भर लेते। मेरा और पैट्रिक का झगड़ा इस बात
पर भी हो जाता कि उसमें सिक्के की चार अथवा आठ गोलियाँ डाली जायें।
शस्त्र-संग्रह का हमारा कार्य भी उसी तरह जारी रहा। शत्रु से मेरी पहले मुठभेड़
तभी हुई, जब एक रात को हम अपने शस्त्र-संग्रह सम्बन्धी एक छापे से लौट रहे
थे। हम लोग टिपेरी से घर जा रहे थे कि मेरी साइकिल की हवा निकल गयी।
मैं अपने साथियों को आगे चलने को कह स्वयं उसे पम्प से भरने लगा। सामने
ही पुलिस की बैरक थी। जब मैं उठा तो मैंने अनुभव किया कि कोई व्यक्ति मुझे
पकड़कर खींच रहा है। मुड़ा तो एक पुलिसमैन को खड़ा पाया। मेरे हाथ में ताला
तोड़ने की एक सलाख थी। उसकी शक्ति की आज़माइश उस दिन उसी के सिर
पर की। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और फिर मैंने अपना रिवाल्वर सँभालकर शेष
सिपाहियों के सामने तान दिया और बोल उठा – “हाथ उठा लो, वरना अभी
ठिकाने लगाता हूँ।” (हाथ उठा दो के मायने अधीनता स्वीकार करना होता था)
स्वाभाविक निर्भीकता के कारण वे लोग वहीं खड़े रह गये और मैं लौटकर दूसरे
रास्ते से फ़ैक्टरी में जा पहुँचा।
एक दिन मैं कुएँ पर पानी खींच रहा था, कि एकाएक धमाके का शब्द सुनायी
दिया। देखा तो हमारी फ़ैक्टरी (कारख़ाना) की छत आकाश में उड़ी जा रही थी
और कुटिया में आग लग रही थी। मैं घबराया कि बेचारे क्योह का क्या हुआ
होगा,और उन्हें बेसुध पड़ा पाया। उन्हें उठाकर निकटवर्ती नदी के तट पर ले गया
और डोल से उनके मुँह पर पानी डालने लगा। थोड़ी ही देर बाद उन्हें सामने खड़ा
पाया, “बेवक़ूफ़, गधे, नालायक, क्या तुम मुझे इस तरह डुबो डालोगे?”
आदि-आदि न जाने क्या-क्या मधुर वाक्य उच्चारण करते हुए वे मुझ पर घूँसा तानने
लगे। तब फ़ैक्टरी की चिन्ता न कर हम ख़ूब हँसे। पर यह हम पर एक वज्रपात
ही हुआ था। कई दिन बाद तक बड़ी चिन्ता रही। हम दोनों एकदम दरिद्र हो गये
थे। हमारे पास एक भी पैसा न था। घर वाले का घर तैयार करा देने की अलग
चिन्ता थी। सभी साथियों ने मिलकर उसकी छत बना डाली और फिर तो वह
कुटिया बड़ी अच्छी दिखने लगी। कुछ देर बाद पुलिस ने भी इस बेचारी कुटिया
पर मनमाना अत्याचार कर हमारा बदला निकालने की चेष्टा की थी। कुछ दिनों
बाद हमने घर बदल लिया। दूसरे घर में हमारी दशा पहले से भी बड़ी शोचनीय
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 707
रही। हमें दो कम्बल भी माँगकर उधार लेने पड़े और नीचे के लिए घास ही काफ़ी
समझी गयी। कई कई दिन तक अल्पाहार का अभ्यास भी करना पड़ा। साधारणतया
उबले हुए चावलों पर ही गुज़ारा करना पड़ता। सबसे बड़ी मुश्किल तो चूहों के
कारण थी। वे कम्बख़्त आफ़त के परकाले थे। कभी-कभी रात को आँख खुलती
तो क्या देखते कि सिर के बालों में चूहा फँसा हुआ है। जब कभी मैं उन्हें भगाने
पर उतारू होता, तो झट 'विश्व प्रेमी' ट्रीसी महोदय अत्यन्त गम्भीरता से उपदेश
झाड़ने लगते, “देखो भाई, तुम्हें तो सुख मिलेगा नहीं, इन्हें तो मन की मौज़ करने
दो। ज़रा कष्ट भी हो तो शान्ति से सहन करो।” हमें भी कहना पड़ता, “अरे भाई!
सिपाहियों ने ही नाकों दम कर रखा है। यदि ये भले हों जो हमें अपने हाल पर
छोड़ दें।” इसी तरह दिन कट रहे थे।
बाद में क्योह महाशय भी चले गये। उनके स्थान पर एक तरुण श्री सीन हागन
आ गये। फिर उनका और मेरा बहुत घनिष्ट सम्बन्ध रहा। उपरोक्त दोनों सीन और
मैं, एक दूसरे को इतना प्यार करते थे कि विभिन्न शरीरों के रहने पर भी हम में
एक ही आत्मा का अस्तित्व मान लिया जाता जो अनुचित न होता। बाद में श्री
राबिन्सन भी आ मिले। वे भी हम तीनों के साथ घुल-मिलकर एक हो गये। हमारी
आशाएँ, हमारा आदर्श, हमारे जीवनों का उद्देश्य वही एकमात्र आयरिश स्वतन्त्रता
की प्राप्ति थी। हम केवल आयरलैण्ड के लिए जीते थे। हम बैठे-बैठे घण्टों भावी
स्वातन्त्र्य युद्ध की कल्पनाएँ किया करते थे। भावी महान स्वतन्त्र आयरलैण्ड की
बातें सोच-सोचकर हमें कितना आनन्द होता, हम उसकी कल्पना मात्र से पुलकित
हो उठते थे।
कुछ दिनों बाद हमें उपरोक्त घर ख़ाली कर देने का नोटिस दे दिया गया। क्या
करते; साधारण किरायेदारों के अधिकार भी तो हमें प्राप्त न थे। चुपचाप घर छोड़
देना पड़ा। हम लोग श्री हागन के एक बन्धु के फार्म में जा टिके पुलिस की नज़र
से हम यहाँ भी न बच पाये। उन्होंने उसे कलई खाना का नाम दे दिया था। हमारी
आर्थिक दशा बड़ी शोचनीय थी। वैयक्तिक आवश्यकताएँ तो हम जैसे बन पड़ती,
पूरी कर ही लेते परन्तु बाहर आने-जाने में बड़ी असुविधा होती। एक बार मुझे और
श्री ट्रीसी को डबलिन तक (110 मील) बाइसिकलों पर ही जाना पड़ा। हमारे पास
भाड़ा नहीं था। रविवार सायंकाल के 6 बजे अपनी एक सभा में बुलाये गये थे और
सोमवार को प्रातः 8 बजे हमें डबलिन पहुँचना ज़रूरी था। तो भी हम डबलिन ठीक
समय पर पहुँच गये। आगामी शनिवार तक हमें वहीं ठहरना पड़ा। उधर शनिवार
को सायंकाल अध्यक्ष समिति की एक बैठक उसी दिन होने वाली थी, वहाँ पर
भी हमारा पहुँचना बहुत ज़रूरी था। अतः 6 रिवाल्वर, 500 कारतूस और एक दर्जन
बम लेकर हम दोनों वहाँ से चल दिये और ठीक समय पर टिप्रेरी आ पहुँचे।
महायुद्ध का अन्त हो गया था। शस्त्र छोड़ दिये जा चुके थे। एक सप्ताह बाद
708 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़