भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 710, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाले भयंकर जन्तु, सिनफिनर, समझने लगी। बाद में उन्होंने अपार कृपा कर मुझे
'हत्यारों के राजा' की बहुत ऊँची पदवी प्रदान कर दी थी। हम लोग सप्ताह में
एक-दो बार जंगल में एकत्रित होकर कवायद तथा रिवाल्वर चलाने आदि का
अभ्यास करते और अवसर पाते ही जहाँ कहीं से बन पड़ता रिवाल्वर उड़ाने में भी
न चूकते थे।
1916 के ईस्टर विद्रोह की निष्फलता का हमारे कार्यक्रम पर बहुत प्रभाव
पड़ा। देशभर का संगठन छिन्न-भिन्न हो गया और सरकार ने उसे गैर-क़ानूनी
घोषित कर दिया। परन्तु जो लोग उस समय पुलिस की क्रूर दृष्टि से बच
निकले, उन्होंने शीघ्र ही डबलिन में दो गुप्त समितियाँ स्थापित कर लीं और
संगठन कार्य प्रारम्भ कर दिया। हमें भी अपना कार्य गुप्त रूप से ही करना पड़ा।
हमारी संख्या भी बहुत कम हो गयी। एक बार तो यहाँ तक नौबत आयी कि
केवल हम तीन ही व्यक्ति शेष रह गये। तो भी मैं और मेरे सहकारी श्री
सीनट्रीसी (Sean Treasy) बड़ी तत्परता से कार्य करते रहे। धीरे-धीरे हमारी
संख्या तेरह तक पहुँच गयी। वे सभी बड़े दृढ़-प्रतिज्ञ, अदम्य साहसी तथा
निर्भीक देशभक्त थे। हम चुपचाप उनका शिक्षण करते रहे। उनको ड्रिल तथा
रिवाल्वर आदि का अभ्यास कराया जाता। साधारणतया हम अंग्रेज़ सैनिकों की
पुस्तकों के आधार पर ही सब अभ्यास किया करते, कभी-कभी एकदम भोले
दर्शक बनकर अंग्रेज़ सैनिकों का ड्रिल और परेड आदि देखा करते और बड़ी
भूलें कर जाते। परन्तु हमारी तत्परता उन सब असुविधाओं पर विजय पाती। 1917
तक इसी तरह कार्य चलता गया। सन् 1917 के अगस्त में फिर हमने
खुल्लमखुल्ला परेड कर दी। श्री एमन डी. वैलरा (Emon de Valera) का जोकि
अभी-अभी लुईस जेल से छूट कर आये थे, टिपेरी नगर की एक सार्वजनिक
सभा में भाषण हुआ। उस समय हम यूनीफार्म (वर्दी) पहनकर, रायफ़लों के
स्थान पर लाठियाँ उठाकर उनके शरीर-रक्षक बने थे। हमारे साहस को देखकर
शत्रु शायद इतने चकित न होंगे जितने कि हमारे मित्र। जनसाधारण की दृष्टि में
उस दिन हमने तीन प्रकार से सरकारी आज्ञाओं का उल्लंघन किया। पहले तो
वर्दी पहनना मना था। दूसरे मार्चिंग करते हुए चलना भी बन्द किया जा चुका था
और अभी कुछ दिन पहले लोगों का लाठी उठाना भी निषेध कर दिया गया था।
इसलिए उस दिन नियमानुसार समिति की सभा न बुलाकर, एक लम्बा-चौड़ा
प्रस्ताव पास किये बिना ही, जो हमने ऐसा कर दिया था, यह मित्र-मण्डली के
लिए असह्य हो उठा। सिनफिन लोगों के सार्वजनिक विभाग ने हमें जी भरकर
कोसा, परन्तु चुपचाप सब सहन करते रहे और अपने कार्य में जुटे रहे।
उधर शत्रुओं ने भी कोई कसर उठा न रखी। मेरे तथा श्री ट्रीसी के वारण्ट
निकाले गये। पर हमें सम्राट का आतिथ्य एकदम अस्वीकार था, अतः हम
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