भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 713, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो जाती और श्री ट्रीसी आकर हमारी सुलह करवाया करते थे। फ़ैक्टरी शब्द बहुत
बड़ा है। 'बम फ़ैक्टरी' सुनते ही पाठक क्रुप (Krupp) आदि किसी भारी कारख़ाने
की कल्पना न करने लगें। वह एक साधारण ग्रामीण कुटिया थी। हमारा सामान भी
मामूली ही था। साधारण गन पाउडर (बारूद) बनाना तो आसान काम है ही, हम
बम भी ऐसे सादा-से ही बना लेते थे, जिन्हें फेंकने से पहले पलीता लगाने की
आवश्यकता हुआ करती। हमें जहाँ से भी जिस किसी तरह के कारतूस मिल जाते;
ले लेते और फिर उन्हें स्वेच्छानुसार भर लेते। मेरा और पैट्रिक का झगड़ा इस बात
पर भी हो जाता कि उसमें सिक्के की चार अथवा आठ गोलियाँ डाली जायें।
शस्त्र-संग्रह का हमारा कार्य भी उसी तरह जारी रहा। शत्रु से मेरी पहले मुठभेड़
तभी हुई, जब एक रात को हम अपने शस्त्र-संग्रह सम्बन्धी एक छापे से लौट रहे
थे। हम लोग टिपेरी से घर जा रहे थे कि मेरी साइकिल की हवा निकल गयी।
मैं अपने साथियों को आगे चलने को कह स्वयं उसे पम्प से भरने लगा। सामने
ही पुलिस की बैरक थी। जब मैं उठा तो मैंने अनुभव किया कि कोई व्यक्ति मुझे
पकड़कर खींच रहा है। मुड़ा तो एक पुलिसमैन को खड़ा पाया। मेरे हाथ में ताला
तोड़ने की एक सलाख थी। उसकी शक्ति की आज़माइश उस दिन उसी के सिर
पर की। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और फिर मैंने अपना रिवाल्वर सँभालकर शेष
सिपाहियों के सामने तान दिया और बोल उठा – “हाथ उठा लो, वरना अभी
ठिकाने लगाता हूँ।” (हाथ उठा दो के मायने अधीनता स्वीकार करना होता था)
स्वाभाविक निर्भीकता के कारण वे लोग वहीं खड़े रह गये और मैं लौटकर दूसरे
रास्ते से फ़ैक्टरी में जा पहुँचा।
एक दिन मैं कुएँ पर पानी खींच रहा था, कि एकाएक धमाके का शब्द सुनायी
दिया। देखा तो हमारी फ़ैक्टरी (कारख़ाना) की छत आकाश में उड़ी जा रही थी
और कुटिया में आग लग रही थी। मैं घबराया कि बेचारे क्योह का क्या हुआ
होगा,और उन्हें बेसुध पड़ा पाया। उन्हें उठाकर निकटवर्ती नदी के तट पर ले गया
और डोल से उनके मुँह पर पानी डालने लगा। थोड़ी ही देर बाद उन्हें सामने खड़ा
पाया, “बेवक़ूफ़, गधे, नालायक, क्या तुम मुझे इस तरह डुबो डालोगे?”
आदि-आदि न जाने क्या-क्या मधुर वाक्य उच्चारण करते हुए वे मुझ पर घूँसा तानने
लगे। तब फ़ैक्टरी की चिन्ता न कर हम ख़ूब हँसे। पर यह हम पर एक वज्रपात
ही हुआ था। कई दिन बाद तक बड़ी चिन्ता रही। हम दोनों एकदम दरिद्र हो गये
थे। हमारे पास एक भी पैसा न था। घर वाले का घर तैयार करा देने की अलग
चिन्ता थी। सभी साथियों ने मिलकर उसकी छत बना डाली और फिर तो वह
कुटिया बड़ी अच्छी दिखने लगी। कुछ देर बाद पुलिस ने भी इस बेचारी कुटिया
पर मनमाना अत्याचार कर हमारा बदला निकालने की चेष्टा की थी। कुछ दिनों
बाद हमने घर बदल लिया। दूसरे घर में हमारी दशा पहले से भी बड़ी शोचनीय
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 707