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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 700, कुल 788 में से

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पृष्ठ 700

काफ़ी बदला और वे अपने समय की पैदाइश थे। मार्क्स का हवाला देते हुए,
जिन्होंने, भगतसिंह के शब्दों में, औद्योगिक क्रान्ति से जन्मी विचारधारा को निरूपित
किया, उन्होंने लिखा कि उन्होंने और उनके साथियों ने भारत में समाजवादी और
कम्युनिस्ट विचारों की रचना नहीं की है, वे तो काल और परिस्थितियों के प्रभाव
का परिणाम हैं। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने यथाशक्ति इन विचारों का
प्रचार करने में मदद की है।²¹
भगतसिंह अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक मार्क्सवादी विचारों का प्रचार करते
रहे। 'बम का दर्शन' पुस्तिका में उन्होंने वर्ग रहित समाज और सर्वहारा
अधिनायकत्व का समर्थन किया।²² फाँसी की सज़ा सुनायी जा चुकने के बाद
पंजाब के गवर्नर को भेजे एक पत्र में भगतसिंह ने लिखा कि भारत में मेहनतकश
जनसाधारण और उनके उत्पीड़कों के बीच लम्बा संघर्ष चल रहा है, कि यह संघर्ष
दुगने उत्साह, साहस और अटूट संकल्प के साथ तब तक चलता रहेगा, जब तक
कि एक समाजवादी गणतन्त्र की स्थापना नहीं हो जाती, वर्तमान व्यवस्था का स्थान
एक नयी व्यवस्था नहीं ले लेती, जिसका उद्देश्य जन कल्याण होगा और जिसमें
हर तरह के शोषण का अन्त हो जायेगा और मानवजाति सच्ची और विश्वव्यापी
शान्ति के युग में पदार्पण करेगी। (इस पत्र की एक नक़ल मुझे भगतसिंह के साथी
विजय कुमार सिन्हा ने दी।)
भारत की स्वतन्त्रता के अदम्य सेनानी भगतसिंह ने अपना तन-मन देश की
आज़ादी के संघर्ष की समस्याओं में तथा राष्ट्रीय क्रान्तिकारी संगठनों को सुदृढ़
करने में लगाया। व्यक्तिगत आतंक की नीति से उन्होंने पूरी तरह इन्कार कर दिया।
उन्होंने सारी पेचीदगियों, अप्रत्याशित मोड़ों और उतार-चढ़ावों के साथ राजनीतिक
संघर्ष के महत्त्व को स्वीकार किया और वह इस बात के लिए उत्सुक थे कि उनके
जो साथी जेल जाने से बच गये हैं, वे ठीक ऐसे संघर्ष में जुटें। 2 फ़रवरी, 1931
के अपने पत्र में साथियों को यह सलाह देते हुए उन्होंने लेनिन के अनुभव को ध्यान
में रखा। इससे पता चलता है कि उन्होंने तत्कालीन भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए
लाक्षणिक बहुत से “वामपन्थी” दृष्टिकोणों से छुटकारा पा लिया था। उन्हें इस बात
का क़ायल करने के लिए कि संघर्ष की कुछ मंज़िलों में शत्रु के साथ बातचीत
की जा सकती है, उन्होंने लिखा कि समझौता अपनेआप में कोई बुरी बात नहीं है
और अपना उद्देश्य पाने में आरम्भ में उसका उपयोग किया जा सकता है।
1905-1907 में दूमा के प्रति लेनिन की नीति का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा
कि “समझौता” एक ऐसा हथियार है, जिसका राजनीतिक संघर्ष में इस्तेमाल किया
जाना चाहिए, ताकि राष्ट्र को थोड़ी देर के लिए आराम मिल सके और वह अपने
को आगे के संघर्ष के लिए तैयार कर सके। भगतसिंह ने क्रान्तिकारियों का आह्वान
किया कि वे अपने अन्तिम लक्ष्य को कभी न भूलें।
694 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़