भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 701, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमई, 1931 में यह पत्र भारतीय प्रेस में छप गया था। इसे प्रकाशित करने वालों
में इलाहाबाद का साप्ताहिक 'अभ्युदय' और पंजाब का 'केसरी' था।²³ इस तरह
भारतीय जनता इससे अवगत हो पायी और इसने वह प्रयोजन पूरा किया, जिसके
लिए लेखक ने इसे लिखा था।
भगतसिंह की अप्रकाशित रचनाओं में वह भूमिका ध्यान देने योग्य है, जो
उन्होंने ग़दर पार्टी के लाला रामशरण की यूटोपियाई रचना 'स्वप्नलोक'
(ड्रीमलैण्ड) के लिए 15 जनवरी, 1931 को लिखी थी। यह पुस्तक तो नहीं छपी,
लेकिन इसकी भूमिका भगतसिंह के परिवारवालों ने सँभालकर रखी हुई है।²⁴ इस
भूमिका की अन्तर्वस्तु पुस्तक के विषय से कहीं अधिक व्यापक है : भगतसिंह
ने घनीभूत रूप में अपने विचार व्यक्त करने के लिए तथा अपने साथियों को सलाह
देने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया।
भूमिका इस कथन से आरम्भ होती है कि भारत के राजनीतिक आन्दोलन का
कोई सुस्पष्ट आदर्श नहीं है और इस दृष्टि से क्रान्तिकारी आन्दोलन भी कोई
अपवाद नहीं है। केवल ग़दर पार्टी ने ही अपना आदर्श स्पष्टतः निरूपित किया था
: शासन के गणतन्त्रीय रूप का समर्थन किया था। भगतसिंह ने लिखा कि यह
साफ़-साफ़ समझना चाहिए कि क्रान्ति का अर्थ उथल-पुथल या खूनी युद्धमात्र
नहीं है। क्रान्ति का आशय अनिवार्यतः एक ऐसे कार्यक्रम को लागू करना है, जो
नये तथा अधिक अच्छे आधार पर समाज का पुनर्गठन करे। उन्होंने कहा कि न
केवल वामपन्थी कांग्रेसी, बल्कि राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रतिनिधि भी
“क्रान्तिकारी” कहलाने के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि संघर्ष के उग्र उपायों को
मानना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं है।
लाला रामशरण की पुस्तक की चर्चा करते हुए भगतसिंह ने लिखा कि लेखक
उस दर्शन के विवेचन से शुरू करता है, जिसे वह बंगाल और पंजाब के सारे
क्रान्तिकारी आन्दोलन का आधार मानता है। उन्होंने कहा कि वह लेखक से सहमत
नहीं है, क्योंकि लेखक संसार की प्रयोजनपरक और अधिभूतवादी व्याख्या करता
है, जबकि वह स्वयं भौतिकवादी हैं। उन्होंने ईश्वर में विश्वास और रहस्यवाद के
लिए लेखक की आलोचना की, अलग-अलग धर्मों में सामंजस्य बिठाने के लेखक
के प्रयासों को अस्वीकार किया और इस प्रश्न पर अपना रुख मार्क्स के शब्दों में
व्यक्त किया : “धर्म जनता के लिए अफ़ीम है।”
लेखक द्वारा चित्रित भावी समाज का विश्लेषण करते हुए भगतसिंह ने
सामाजिक प्रगति में यूटोपियाई सिद्धान्तों की उपयोगी भूमिका को स्वीकार किया
: “सेंट-सिमों, फूरिये और राबर्ट ओवेन और उनके सिद्धान्तों के बिना मार्क्स का
वैज्ञानिक समाजवाद निरूपित नहीं हो सकता था।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया
कि भावी समाज कम्युनिस्ट समाज होगा, जिसके निर्माण के लिए वह और उनके
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 695