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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 788 में से

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पृष्ठ 699

विचारों का प्रचारक कहा।<sup>16</sup>
जेल में भगतसिंह ने अपने क्रान्तिकारी साथियों के साथ ही नहीं, बल्कि ग़दर
पार्टी के बहुत से सदस्यों के साथ भी सम्पर्क स्थापित किये, जो प्रथम विश्वयुद्ध
के दिनों से जेल में बन्द थे। राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की समस्याओं पर उन्होंने ग़दर
पार्टी वालों से लम्बी बातें कीं। जी. देवल ने ग़दर पार्टी के सदस्यों के साथ
भगतसिंह के सम्बन्धों के बारे में एक लेख लिखा है।<sup>17</sup> जेल में वह ग़दर पार्टी के
एक नेता सोहन सिंह भकना से मिले, जो कालान्तर में भारत में कम्युनिस्ट
आन्दोलन के एक प्रमुख नेता बने।<sup>18</sup>
भगतसिंह अपने साथियों को सलाह देते थे कि वे मार्क्सवाद का अध्ययन करें।
उदाहरण के लिए, उन्होंने मार्क्स की ‘पूँजी’ के अध्ययन की आवश्यकता पर ज़ोर
दिया। जयदेव प्रसाद गुप्त को 24 जुलाई, 1930 को लिखे पत्र में उन्होंने अपने लिए
किताबें मँगवायी थीं और कहा था कि अपने साथियों के लिए किताबों की सूची
पहले भेज चुके हैं और विनती की थी कि उनका यह अनुरोध जल्दी पूरा किया
जाये, क्योंकि उन्हें किताबों की सख्त तंगी है।<sup>19</sup>
इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि जो साथी सौभाग्यवश जेल जाने से बच
गये, उनके साथ भी भगतसिंह ने सम्पर्क बनाये रखे। अपनी कालकोठरी से भी वह
1929 में लाहौर में हुई नौजवान भारत सभा की कांग्रेस को एक महत्त्वपूर्ण सन्देश
भेजने में सफल रहे। अपनी क्रान्तिकारी पुस्तिकाओं की, जिनमें ‘बम का दर्शन’
भी था, पाण्डुलिपियाँ उन्होंने जेल से बाहर भिजवा दीं। फाँसी पर चढ़ने से कुछ
दिन पहले ही उन्होंने युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम अपनी घोषणा
लिखी और बाहर भिजवायी, जिसे उनकी अन्तिम इच्छा और वसीयतनामा कहा जा
सकता है।<sup>20*</sup>
जेल में उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं : ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद का आदर्श’
और ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’। दुर्भाग्यवश, इन पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ
नहीं बची रहीं, हालाँकि उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक पत्र बचे रहे। इन पत्रों
से भगतसिंह के इस आत्ममूल्यांकन की पुष्टि होती है कि वह समाजवादी विचारों
का प्रचारक हैं और इस बात की भी कि उन्होंने अपने साथियों की मार्क्सवादी रुख
अपनाने में मदद करने की कोशिश की।
सुखदेव को, जिन्हें भगतसिंह के साथ ही फाँसी दी गयी, उनका एक पत्र
प्रकाशित हुआ है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि भगतसिंह इस सच्चाई को
समझने लगे थे कि भारत में व्याप्त परिस्थितियों में समाजवाद एक तर्कसंगत रास्ता
है। इससे यह भी पता चलता है कि भगतसिंह भारत के सामाजिक जीवन पर अपने
प्रभाव को समझते थे।
उन्होंने लिखा कि अपने साथियों के साथ उन्होंने (राजनीतिक) वातावरण को
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 693