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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 788 में से

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पृष्ठ 705

लायी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, जब दरवाज़ा खुला। दहलीज पर अफ़सर खड़ा
था।
“‘सरदार जी,’ उसने कहा। ‘फाँसी लगाने का हुक्म आ गया है। तैयार हो
जाइये।’
“भगतसिंह के दायें हाथ में किताब थी, उससे नज़रें उठाये बिना ही उन्होंने
बायाँ हाथ उठाकर कहा : ‘ठहरिये। यहाँ एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल
रहा है।’
“कुछ पंक्तियाँ और पढ़कर उन्होंने किताब एक तरफ़ रख दी और उठ खड़े
हुए बोले : ‘चलिए!’”
भगतसिंह के क्रान्तिकारी दल में से एक और कर्मठ क्रान्तिकारी निकला, जो
आगे चलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना। यह थे अजय कुमार
घोष।
‘भगतसिंह और उनके साथी’ नामक पुस्तक में अजय घोष ने लिखा कि
भगतसिंह भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अल्पांश के लिए एक उल्का पिण्ड की
तरह चमके और लुप्त होने से पहले वह लाखों लोगों के लिए एक नये भारत की
आत्मा और आशाओं का प्रतीक बन गये, उन लोगों के लिए, जिन्हें मृत्यु का डर
नहीं था, जो साम्राज्यवादी अंकुश को उतार फेंकने और अपने महान देश में एक
स्वतन्त्र राज्य का भवन खड़ा करने के लिए कृतसंकल्प थे।
भगतसिंह और उनके साथियों जैसे निडर क्रान्तिकारियों का बलिदान व्यर्थ नहीं
था। उनके दल के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मुट्ठीभर नौजवान
क्रान्ति नहीं ला सकते, कि बड़े धीरज और परिश्रम के साथ जनसाधारण के बीच
काम करना चाहिए, लोगों को संघर्ष के लिए संगठित करना चाहिए, ठोस
कार्यनीतियाँ तैयार करना, उन पर अमल करना तथा लोगों को सत्ता के अन्तिम
संघर्ष की ओर ले जाना चाहिए।
(1981)
टिप्पणियाँ

  1. अ. व. राइकोव, ‘भगतसिंह और उनकी विचारधारात्मक धरोहर’, ‘नरोदी आज़ीइ ई
    आफ्रीकी’ (‘एशिया और अफ्रीका के जनगण’), अंक 1, 1971 (रूसी में)
  2. ल.व. मित्रोखिन, ‘लेनिन के बारे में भारत’, ‘नाऊका’ (‘विज्ञान’) प्रकाशन, मास्को, 1971,
    पृष्ठ 124-130 (रूसी में)
  3. M. Windmiller and G.D. Overstreet, Communism in India, Berkley, 1959, p. 240
  4. पूरा पत्र परिशिष्ट में देखें
  5. J. Sanyal, Sardar Bhagat Singh, Lahore, 1930, p. 104
    सान्याल की पुस्तक पर औपनिवेशिक अधिकारियों ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। उल्लेखनीय है
    शहीदएआज़म की जेल नोटबुक / 699