भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 704, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिये जाने से कुछ घण्टे पहले ही उनसे मिले थे। यह थे प्राणनाथ मेहता, भगतसिंह
के मित्र और वकील। उन्होंने मुझे बताया :
“उन दिनों मैं डायरी रखता था (अपने काम के लिए भी मुझे इसकी ज़रूरत
होती थी)। बदक़िस्मती से 1947 में पार्टिशन के वक़्त मुझे लाहौर छोड़ना पड़ा,
मेरे काग़ज़ात वहीं रह गये, कुछ पता नहीं उनका क्या हुआ।
“बहरहाल डायरियाँ तो खो गयी हैं, मगर उन दिनों की घटनाओं ने मेरे दिमाग़
पर इतनी गहरी छाप छोड़ी है कि उसे न वक़्त मिटा सका है, न कोई दूसरी
घटनाएँ...
“23 मार्च, 1931 को मुझे वह किताब मिल गयी, जो भगतसिंह ने मँगवायी
थी। मैं उससे मिलने गया। जेल के गेट पर मुझे बताया गया कि भगतसिंह और
उसके दोस्तों ने किसी से भी मिलने से इन्कार कर दिया है। वजह यह थी कि
जेल के अधिकारियों ने क़रीबी रिश्तेदारों को छोड़कर और किसी से मिलने पर
पाबन्दी लगा दी थी। इसके विरोध में भगतसिंह और उसके साथियों ने कहा कि
वे किसी से भी नहीं मिलेंगे।
“कुछ करना चाहिए था। मैं जेल के अधिकारियों से मिलने गया। उनमें एक
मि. पुरी नेक इन्सान निकला। उसने मुझे सलाह दी कि तीन क़ैदियों के वकील
के नाते मैं अर्जी दूँ कि मुझे उनकी आख़िरी इच्छा लिखने के लिए उनसे मिलना
है। फिर उसने मुझे भगतसिंह की कालकोठरी में ही उससे मिलने की इजाज़त दे
दी। थोड़ी देर बाद राजगुरू और सुखदेव को भी वहाँ लाया गया।
“उस वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि लाहौर जेल के इन तीन क़ैदियों से यह
मेरी आख़िरी मुलाक़ात है, कि दो घण्टे बाद इन्हें फाँसी दे दी जायेगी।
“भगतसिंह ने मुझसे पूछा कि मैं किताब लाया हूँ या नहीं। मैंने उसे किताब
दी, तो वह बड़ा खुश हुआ। किताब लेते हुए बोला : ‘आज रात को ही इसे ख़त्म
कर दूँगा, इससे पहले कि वे...’ उस बेचारे को क्या पता था कि वह किताब आख़िर
तक कभी नहीं पढ़ पायेगा।”
मैंने प्राणनाथ मेहता से पूछा कि उन्हें उस किताब का नाम याद है, जो वह
भगतसिंह के लिए ले गये थे। उनका जवाब था : “सच पूछें, तो मुझे याद नहीं
कि यह लेनिन के बारे में किताब थी, या लेनिन की। एक छोटी-सी किताब थी।
..अगले दिन जेल के सन्तरी ने मुझे बताया कि जब भगतसिंह को लिवाने आये थे,
तो वह यह किताब पढ़ रहा था। बाद में भगतसिंह मेरे लिए जो चीज़ें छोड़ गये
थे, उनके साथ मुझे वह किताब भी मिली।”
“शायद उसी सन्तरी ने,” मेहता ने आगे कहा, “भगतसिंह के रिश्तेदारों को
उनके अन्तिम क्षणों के बारे में बताया।”
वीरेन्द्र सिन्धू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतसिंह प्राणनाथ मेहता की
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