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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

इसके साथ ही यह विचार हमारे सामने था कि अपने बचने के बजाय उसको मारने
का ज़्यादा ध्यान रखना है। हम यह भी नहीं चाहते थे कि जिस पर गोली चलायी
जाये वह हस्पताल जाकर मरे। इसीलिए राजगुरु द्वारा गोली मार देने के बाद भी
भगतसिंह ने तब तक गोली चलानी बन्द न की जब तक उसे तसल्ली नहीं हो गयी
कि वह मर गया है।
मारकर भाग जाना ही हमारा उद्देश्य नहीं था। हम तो चाहते थे कि देश जान
जाये कि यह political murder है और इस action के करने वाले
revolutionaries हैं न कि मालंगी के साथी, इसलिए हमने उसके बाद posters
लगाये और कुछ posters अख़बार वालों को छापने के लिए भेजे। अफ़सोस, हमारे
नेताओं और अख़बार वालों ने हमें इस सम्बन्ध में कुछ सहायता न की और Govt.
को धोखे में रखने के विचार से देशवासियों को धोखा दिया। हम तो केवल इतना
ही चाहते थे कि वह इसके सम्बन्ध में यह गोल-मोल करके लिख दें कि यह
political murder है और Govt. की policy का ही परिणाम है। ऐसे actions के
लिए वह responsible है। लेकिन उन्होंने जानते-बूझते और मेरे बार-बार कहने के
बावजूद भी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं की। अच्छा हुआ हम पकड़े गये और देश
के सम्मुख सब प्रगट हो गया। मैं तो भाई, अपने पकड़े जाने को सौभाग्य समझता
हूँ। सिर्फ़ इसीलिए इस action की nature को clear कर देने के पश्चात अब मैं
इस policy को (Note : इसी समय पता लगा है कि आज Judgement होगी,
चलना है कि नहीं यह पूछने के लिए ख़ाँ साहिब और बख्शी जी आये थे। हम
सबने इन्कार कर दिया है) रखना चाहता हूँ। हमारा विचार था कि हमारे actions
जनता की desires और Govt. द्वारा grievances के उत्तर में होने चाहिए ताकि
हम लोग जनता को अपने साथ ले सकें और जनता हमारे प्रति सहानुभूति और
सहायता दिखाने के लिए तैयार हो जाये। इसके साथ-साथ हमारा यह विचार था
कि revolutionary ideals और tactics को public में फैलाया जाये और यह
उसके मुख से ज़्यादा अच्छी लगती है जो इनकी ख़ातिर gallows पर खड़ा हो।
तीसरा उद्देश्य यह था कि Govt. से direct टक्कर लेने से हमारी organisation
एक निश्चित programme अपने लिए बना सकेगी।
बाक़ी दो प्रकार के actions के सम्बन्ध में कुछ ज़्यादा नहीं कहना चाहता हूँ।
Money actions के लिए इतना आवश्यक होना चाहिए कि बंगाल वालों की तरह
dacoities में ज़्यादा energy और attention देना ठीक नहीं है। साथ ही
छोटी-छोटी dacoities क़तई लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं। इसलिए हम सबकुछ
देकर भी एक जुआ खेलने को तैयार हो गये थे ताकि अगर बच गये तो अच्छी
तरह से निश्चिन्त होकर अपना काम करते जायेंगे और पैसा की समस्या को हम
एक बार risk लेकर हल करेंगे। साण्डर्स के murder के बाद तो हमें पैसा के लिए
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ज़्यादा चिन्ता भी नहीं करनी पड़ी। साधारण dacoities में जितना धन हमें नहीं
मिलता उतना हम चुपचाप इकट्ठा कर लिया करते थे। आज तो उससे कहीं ज़्यादा
आसानी है। Special actions अनिवार्य होते हैं लेकिन उसी दशा में जब अत्यन्त
आवश्यक हों। हाँ, इनकी संख्या बहुत कम होनी चाहिए।
अब मैं उन actions के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहता हूँ जो हमारे बाद घटित
हुए। वायसराय की ट्रेन को उड़ाने के प्रयत्न के अतिरिक्त बम द्वारा कई actions
हुए हैं। इनमें एक विशेष प्रकार के actions हुए हैं। अर्थात बम रास्ते में रख आयें
या जो actions पंजाब के चार-पाँच शहरों में एक साथ हुए हैं। मुझे समझ में नहीं
आयी कि यह actions किस विचार से किये गये हैं। जहाँ तक मैं अनुभव करता
हूँ जनता में ऐसे actions से विशेष जागृति तो आती नहीं है। यदि terrorise करने
का विचार था तो मैं पूछना चाहता हूँ कि आप लिखें कि इन actions ने इस उद्देश्य
की कहाँ तक पूर्ति की है। इस सम्बन्ध में चिटगाँववाले actions की यहाँ पर प्रशंसा
नहीं करना चाहता।
426 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आवाज़ दबाना दुखदायी है!
सुखदेव के भाई मथुरादास की पुस्तक ‘अमर शहीद सुखदेव’ में प्रकाशित
लेखकीय टिप्पणी के अनुसार सुखदेव ने यह पत्र सम्भवतः चन्द्रशेखर आज़ाद के
नाम लिखा था, जो उन तक पहुँच नहीं पाया। – स.
प्यारे साथी,
अभी-अभी पता चला है कि हमारा वह statement जो हमने 3 तारीख़ को
दिया है अखबार वालों ने नहीं छापा। कारण यह कहा जाता है कि उसमें लीडरों
को criticise किया गया है और उनके इस समझौते को बुरा कहा गया है। उफ़,
कैसी शरम की बात है! भाई, सच पूछो तो हमें सरकार फाँसी नहीं लगा रही। हमारा
गला तो हमारे So-called leaders ही दबा रहे हैं जो हमारी आवाज़ निकलने नहीं
देते। सरकार द्वारा गला दबाना हमारे लिए बुरा सिद्ध नहीं हो सकता। उसको हम
सहन कर सकते हैं लेकिन यह बात हमारे से बरदाश्त नहीं हो सकती कि हमारा
गला हमारे ये स्वार्थी high class leaders दबायें। इसके विरुद्ध हमें लड़ना पड़ेगा।
अपनी struggle को हमें उनसे अलग होकर स्वतन्त्र रूप से चलाना होगा और
सरकार का विरोध करते-करते इन उच्च जाति-नेताओं की पोल भी खोलनी पड़ेगी।
परन्तु दोस्तो, यह कार्य ज़्यादा देरी तक neglect नहीं किया जा सकता। इस
पर हमें विचार करना चाहिए और उसके लिए शीघ्र ही प्रबन्ध करना चाहिए। और
कब तक ऐसा व्यवहार सहते रहोगे। हम क्रान्तिकारियों के प्रति उनके इस प्रकार
neutral relation और हमारी गिरावट के दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि हमारी
कोई स्थायी organisation नहीं है, जो उनके मुक़ाबले में और उनसे अलग अपनी
lines पर काम कर रही हो। दूसरा यह कि जो भी थोड़ा-बहुत scattered element
है उसके हाथ में Press नहीं है जिसके द्वारा वह अपनी आवाज़ जनता तक पहुँचा
सके और जिसके बल पर वह बढ़े, डटकर सरकार तथा इन उच्च जाति-सन्तों का
भलीभाँति विरोध कर सके।
अनेक कारणोंवश हम लोगों को आज तक केवल गुप्त समितियाँ बनाकर ही
काम करते रहना पड़ा है। परन्तु यारो, अब समय आ गया है कि हम इस policy
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का त्याग करें। साधारण जनता हमें और हमारे आदर्शों को मानने लग गयी है। उसकी
सहानुभूति हमारे साथ है। ठीक है, अपने कार्य को successfully चलाने और अपनी
organisation को क़ायम रखने हेतु बहुत कुछ गुप्त रखना पड़ेगा। हमें अपने काम
को गाँधी की lines पर नहीं चलाना है तो भी अब केवल इस जत्थेबन्दी और
गोली-बारूद द्वारा ही काम करना उचित नहीं। अब हमें आगामी struggle के लिए
एक force बनने की ज़रूरत है।
उसके लिए, जैसा मैंने पहले भी लिखा है, खुफ़िया सोसायटी के ढंग पर
पंजाब में एक Central Red Revolutionary Party क़ायम करने की आवश्यकता
है, जिसका मुख्य काम भिन्न-भिन्न local स्थानों पर Revolutionary work और
tactics का प्रचार और अच्छे क्रान्तिकारी worker तथा व्यवस्था होनी चाहिए। इसके
साथ-साथ उस कांग्रेस की नकेल अपने हाथ में रखनी चाहिए। अपने ideas को
legally or illegally दोनों प्रेसों द्वारा बराबर फैलाने की कोशिश करनी चाहिए।
ये सब शायद तुम्हें शेखचिल्ली की बातें जान पड़ती होंगी। लेकिन प्यारे, यह
तो करना ही होगा और शीघ्र करना होगा। मैं नहीं कह सकता इस कांग्रेस में इसी
वक़्त से कोई ऐसा wing तैयार हो जायेगा लेकिन इस कांग्रेस की तैयारी चाहे
कितनी भी मामूली हो उसकी beginning कर देनी चाहिए।
(Important) हमें मरने का दुख नहीं है। अपनी आवाज़ का दबाया जाना हमारे
लिए बहुत कष्टदायक है। मैं चाहता हूँ कि हमारी वह statement तुम सरदार जी
या हमारे वकील से प्राप्त कर एक छोटे-से appealing note के साथ उर्दू, गुरमुखी
और अंग्रेज़ी में लिखवाकर छपने का प्रबन्ध करो।
– सुखदेव
428 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्रान्तिकारी दोस्तों के नाम
सुखदेव का पत्र
प्यारे साथियो!
दो साल का समय हो चुका है जबकि पहले-पहल Long Live Revolution
का आरम्भ हुआ था। यह छोटी-सी आवाज़ आज एक भारी और भयानक रूप
धारण कर चुकी है। हमारे देश का बच्चा-बच्चा इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद चिल्ला रहा
है।
किन्तु क्या यही काफ़ी है? क्या अब हमारे लिए कोई कार्य बाक़ी नहीं रहा?
नहीं। कार्य का आरम्भ तो अभी होना चाहिए। नहीं तो यह इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद भी
गाँधी के ‘स्वराज्य’ की भाँति एक बेमानी चीज़ हो जायेगा, जिसे थोड़े समय बाद
जनता घृणा और नफ़रत की दृष्टि से देखेगी। काफ़ी देर तक हमने पब्लिक के
sentiments को उभारा है। अब समय आ गया है कि हम public को इसका अर्थ
समझाएँ। हम उनके आगे रखें कि Revolution क्या है। उसका masses के साथ
क्या सम्बन्ध है। उसकी क्या आवश्यकता है। और वह क्योंकर Successful की
जा सकती है।
याद रखो इन प्रश्नों को छुपाकर रखना हितकर नहीं होगा। मैं देख रहा हूँ –
लोगों के दिलों में ये प्रश्न उठ रहे हैं। यदि इन प्रश्नों का उत्तर न दिया गया, यदि
गाँधी की तरह इनको vague रखा गया तो सब गुड़गोबर हो जायेगा। आज तक की
सब मेहनत व्यर्थ हो जायेगी। परन्तु इसके साथ ही एक introductory काम और
भी है। यदि तुम्हारी यह धारणा है कि Long Live Revolution कह लेने से तुम
Revolutionary हो गये हो तो यह तुम्हारी भूल है। तुम लोगों में कोई ही होगा जो
वास्तव में Revolutionary कहलाने के योग्य होगा। लेकिन यह कोई शरम की बात
नहीं। अपने इस अभाव को हमें मानना चाहिए और इसे मानकर इसकी पूर्ति करनी
चाहिए। अपनी और सभी साथियों की revolutionary education के प्रबन्ध करने
चाहिए। उसके लिए कार्य आरम्भ करने चाहिए।
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याद रखो, अपनी सफलता इस बात पर निर्भर है कि हमारे workers अपने
revolution ideals, tactics और struggle को ख़ूब समझते हैं। आज के arm
chair politicians और sentimental lectures द्वारा क्रान्ति का कार्य नहीं चलाया
जाना चाहिए। बल्कि ऐसे व्यक्तियों को अपनी Organisation में ही नहीं लेना
चाहिए। क्रान्ति करने के हेतु वे ही व्यक्ति लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं जो Self
sacrificing devotion के हों, जो revolutionary education प्राप्त किये हों और
जीवन में क्रान्ति को profession समझे हों। जो व्यक्ति Revolutionary work को
अपना profession नहीं बना सकता वह एक Sympathiser के सिवा कुछ नहीं
है।
मैं आशा करता हूँ कि समय की आवश्यकता को अनुभव कर आप मेरी इन
बातों पर ध्यान देंगे और जितनी जल्दी हो सके public demand को पूरा करने का
यत्न करेंगे।
(मूल पत्र यहीं समाप्त होता है और अन्तिम अक्षर अस्पष्ट हैं – स.)
430 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कुलबीर के नाम
भगतसिंह का अन्तिम पत्र¹
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 मार्च, 1931
प्रिय कुलबीर सिंह,
तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया। मुलाक़ात के समय तुमने अपने ख़त के
जवाब में कुछ लिख देने के लिए कहा था। कुछ शब्द लिख दूँ, बस। देख, मैंने
किसी के लिए कुछ न किया। तुम्हारे लिए भी कुछ न कर सका। आज तुम सबको
विपदाओं में छोड़कर जा रहा हूँ। तुम्हारी ज़िन्दगी का क्या होगा? गुज़र किस तरह
करोगे? यही सब सोचकर काँप जाता हूँ। लेकिन भाई हौसला रखना। विपदाओं में
भी कभी न घबराना। इसके सिवाय और क्या कह सकता हूँ। अमेरिका जा सकते
तो बहुत अच्छा होता। लेकिन अब तो यह नामुमकिन जान पड़ता है। धीरे-धीरे
हिम्मत से पढ़ लो। अगर कोई काम सीख सको तो बेहतर होगा। लेकिन सबकुछ
पिता जी की सलाह से करना। जहाँ तक सम्भव हो प्यार-मुहब्बत से रहना। इसके
सिवाय और क्या कहूँ? जानता हूँ कि आज तुम्हारे दिल में ग़म का समुद्र ठाठें मार
रहा है। तुम्हारे बारे में सोचकर मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं; लेकिन क्या किया
जा सकता है? हौसला रख मेरे अज़ीज़! मेरे प्यारे भाई, ज़िन्दगी बड़ी सख़्त है और
दुनिया बड़ी बेरहम। लोग भी बहुत बेरहम हैं। सिर्फ़ हिम्मत और प्यार से ही गुज़ारा
हो सकेगा। कुलतार की पढ़ाई की चिन्ता भी तुम्हीं करना। बहुत शर्म आती है और
अफ़सोस के सिवाय मैं कर भी क्या सकता हूँ। साथ वाला ख़त हिन्दी में लिखा
है। ख़त बी.के. की बहन को दे देना। अच्छा नमस्कार अज़ीज़ भाई अलविदा...
रुख़सत।
तुम्हारा शुभाकांक्षी,
भगतसिंह

  1. फाँसी लगने से बीस दिन पूर्व।
    जेल की सलाख़ों के पीछे से / 431

कुलतार के नाम भगतसिंह का
अन्तिम पत्र¹
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 मार्च, 1931
प्यारे कुलतार,
आज तुम्हारी आँखों में आँसू देखकर बहुत दुख पहुँचा। आज तुम्हारी बातों में
बहुत दर्द था। तुम्हारे आँसू मुझसे सहन नहीं होते।
बरखुरदार, हिम्मत से विद्या प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला
रखना, और क्या कहूँ –
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है,
हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चरागे-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवा में रहेगी ख़याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक़ है फ़ानी, रहे रहे न रहे।
अच्छा रुख़सत। खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं। हिम्मत से
रहना। नमस्ते।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह

  1. फाँसी लगने से बीस दिन पूर्व
    432 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

फाँसी से पहले साथियों को
भगतसिंह का अन्तिम पत्र
22 मार्च, 1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं
चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर ज़िन्दा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबन्द
होकर जीना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका है और क्रान्तिकारी दल के
आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित
रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हरगिज़ नहीं हो सकता।
आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया
तो वे ज़ाहिर हो जायेंगी और क्रान्ति का प्रतीक-चिह्न मद्धिम पड़ जायेगा या सम्भवतः
मिट ही जाये। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में
हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश
की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि क्रान्ति
को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए
जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हज़ारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर
सका। अगर स्वतन्त्र, ज़िन्दा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता
और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया।
मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब
तो बड़ी बेताबी से अन्तिम परीक्षा का इन्तज़ार है। कामना है कि यह और नज़दीक
हो जाये।
आपका साथी,
भगतसिंह
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शहीद महावीर सिंह का पिता के नाम पत्र

शहीद महावीर सिंह को लाहौर षड्यन्त्र केस में उम्रक़ैद की सज़ा हुई थी। डॉ.
गया प्रसाद, शिव वर्मा, पण्डित किशोरीलाल, जयदेव कपूर, विजय कपूर सिन्हा और
कमलनाथ तिवारी को भी उम्रक़ैद हुई थी। इन सभी साथियों को सेल्युलर जेल,
अण्डमान भेजा गया था। ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध जेलों के भीतर
भी क्रान्तिकारियों का संघर्ष जारी रहा। महावीर सिंह ने 23 जनवरी, 1933 को
अण्डमान से पिता को यह पत्र लिखा था। - स.
पोर्ट ब्लेयर, अण्डमान
परम पूज्य पिताजी,
आपको पढ़कर आश्चर्य होगा कि उपरोक्त स्थान पर मैं कब आ गया। यही
पहेली हल करने मैं जा रहा हूँ। तारीख़ 19 जनवरी को प्रातःकाल लगभग 11 बजे
जेलर साहब सेण्ट्रल जेल बिलारी आये और कोठरी का दरवाज़ा खोलकर सूचना
दी कि तुम्हारा ट्रांसफर है, पर यह नहीं बताया कि कहाँ को है। पूछने पर केवल
इतना कहा कि शायद पंजाब में नये लाहौर साज़िश केस में गवाही देने के लिए
मद्रास भेजे जाओगे। अस्तु, 19 तारीख़ की शाम को जब मैंने सेण्ट्रल जेल मद्रास
में पैर रखा तो मेरे जीवन-मरण के साथी श्रीयुत भाई कमलनाथ तिवारी के दर्शन

  • लगभग दो वर्ष बाद - हुए और रात को भाई बी.के. दत्त और भाई कुन्दनलाल
    जी की आवाज़ें सुनीं। आप स्वयं ही जान सकते हैं कि मुझे कितनी प्रसन्नता हुई।
    परन्तु अलस्सुबह फिर कुछ निराशा की झलक नज़र आयी जब देखा कि तिवारी
    और भाई दत्त और कुन्दनलाल हमसे पहले पृथक ले जाये गये हैं, परन्तु 15 मिनट
    बाद वह फिर हर्ष में बदल गयी और मोटर लॉरी में हम फिर मिल गये। बहुत दिनों
    का वियोग मिट गया। उस समय तक हम मन की खिचड़ी पका रहे थे और मिलने
    के आनन्द में विह्वल थे, परन्तु यह पता नहीं था कि कहाँ जा रहे हैं। सोचते थे
    शायद पंजाब जावें, बाद में यहाँ आवें। परन्तु हमारी लॉरी बन्दरगाह पर पहुँची और
    विख्यात महाराजा जहाज़ के दर्शन हुए। उस समय समझा कि हम लोग अण्डमान
    अर्थात 'कालापानी' जा रहे हैं। मातृभूमि से तथा बन्धु वर्ग से सदैव के लिए अथवा
    कम से कम 18 साल के लिए पृथक हो रहे हैं। जिस जननी की गोद में पले हैं
    434 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

और धूलि में लोटे हैं उसके दर्शन से भी वंचित हो रहे हैं। आप लोगों के पदारविन्द
की रज से सदैव के लिए दूर हो रहे हैं। ऐसी दशा में प्यारे देश को छोड़ते हुए हृदय
में कितना ही कष्ट हुआ परन्तु साथ ही प्रसन्नता भी हुई, जोकि इसके सम्मुख कुछ
अधिक ही थी। वह थी एक साथ क्रान्तिकारी की दर्शनाभिलाषा – पुण्य पवित्र
तीर्थ स्थान की, जिसको भाई रामरक्खा मल ने अपनी समाधि बनाकर पवित्र किया
है और दूसरे बंगाली तथा सिक्ख वीरों की तपोभूमि रही है। और साथ ही आशा
थी कि हमारे जीवन के बन्धुगण सर्वदा साथ रहेंगे, और भी अनेक अपने कन्धे से
कन्धा सटाने वाले भाइयों के दर्शन होंगे। अस्तु, 23 जनवरी की सन्ध्या को विस्तृत
नील गम्भीर जल-राशि की 850 मील से अधिक लम्बी यात्रा करके हम इस पोर्ट
ब्लेयर की जेल में पहुँचे जहाँ पर अपने वर्तमान साथियों को मिलने के लिए अति
उत्कण्ठित पाया। उनकी वैसी ही दशा हो रही थी जैसी हमारी थी। यहाँ सम्प्रति
लगभग 40बी. क्लास के तथा 24सी. क्लास के राजनीतिक क़ैदी हैं और कुछ लोगों
की निकट भविष्य में आशा भी करते हैं।
हमारी जेल तिमंज़िला है और पास ही कुछ गजों के फ़ासले पर नीलास्व
(जल) राशि गम्भीर गर्जन के साथ किनारे से टक्करें मारती है, जो ऊपर से दीख
पड़ती है। यह द्वीप समूह जंगलों से भरा सुना जाता है जिसमें केवल नंगे रहने वाले
असभ्य लोग रहते हैं, परन्तु खुली हुई जगहों में कुछ भारतीय लोग भी बस गये हैं,
जिनकी भाषा हिन्दुस्तानी है। इन लोगों में से बहुत-से क़ैदी हैं, कुछ सरकारी नौकर
हैं और कुछ तिज़ारती लोग भी हैं। अभी हाल में तो जेल वालों का कुछ ठीक-ठीक
हाल मालूम होता है, लेकिन आगे की कह नहीं सकते। हमारे पुराने साथियों में अभी
हमारे साथ डॉ. गयाप्रसाद, मि. बी.के. दत्त, भाई कुन्दनलाल जी तथा कमलनाथ
तिवारी हैं। बाक़ी तीन साथी मद्रास सूबे में होंगे जोकि शायद अभी भी हंगर स्ट्रायक
पर होंगे। हमारे साथियों में 3/4 से अधिक संख्या बंगाल प्रदेश वालों की है।
पूज्यवर, शायद आप चिन्तित होंगे कि मैंने इतने दिनों से पत्र क्यों नहीं लिखा।
इसका कारण थी घनघोर घटाएँ जो चारों ओर मँडरा रही थीं। तनिक भी शान्ति का
अवसर नहीं देती थीं। इसी कारण मैंने उनमें फँसकर पत्र लिखने का सुयोग न पाया।
अब यह बहुत दिनों बाद पत्र लिख रहा हूँ, जिससे आप शान्ति-लाभ करेंगे। परन्तु
पिताजी, आप शान्ति हर दशा में रखें क्योंकि आप जानते हैं कि हमें कष्टों में आनन्द
और सुख मालूम होता है। अब कुछ इस कारागार में वास करके तथा अपने ध्येय
को सम्मुख रखते हुए कष्ट भी सुख ही प्रतीत होता है और यही है हमारा जीवन
और जहाँ ये बातें इसमें नहीं रहीं तो समझिए कि हम मर गये। इसलिए आप या
हमारी पूज्य बुआ जी तथा माता जी इस बात का ध्यान रखते हुए कभी कोई चिन्ता
न करें और सर्वदा शान्तिपूर्वक आनन्दित रहें।
प्यारे भाई का क्या हाल है, इसकी सूचना मुझे शीघ्र दीजियेगा। उसे केवल
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 435

वैद्य ही बनने का उपदेश न देना, बल्कि साथ ही साथ मनुष्य बनना भी बतलाना।
आजकल मनुष्य वही हो सकता है जिसे वर्तमान वातावरण का ज्ञान हो, जो मनुष्य
के कर्तव्य को जानता ही न हो परन्तु उसका पालन भी करता हो। इसलिए समाज
की धरोहर को आलस्य तथा आरामतलबी तथा स्वार्थपरता में डालकर समाज के
सामने कृतघ्न न साबित हो। इससे शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की
उन्नति करता रहे, क्योंकि दोनों आवश्यक हैं। शारीरिक पुष्टि अन्न तथा व्यायाम
से तथा मानसिक अध्ययन से। उसे आजकल के वातावरण का ज्ञान करने के लिए
समाचारपत्र तथा ऐतिहासिक, साम्पत्तिक तथा राजनीतिक, सामाजिक पुस्तकों का
अवलोकन (अध्ययन) को कहिये। समाज से मेरा मतलब आर्य समाज अथवा अन्य
संकीर्णताव्यंजक समाज नहीं है, परन्तु जन-साधारण का है। क्योंकि ये धार्मिक
समाज मेरे सामने संकीर्ण होने के कारण कोई भी मूल्य नहीं रखते हैं और साथ
ही इस संकीर्णता तथा स्वार्थपरता तथा अन्यायपूर्ण होने के कारण सब धर्मों से दूर
रहना चाहता हूँ और दूसरों को भी ऐसा ही उपदेश देता हूँ। केवल एक बात मानता
हूँ (और) उसको सबसे बढ़कर तथा मनुष्य तथा समाज का (के लिए)
कल्याणकारी समझता हूँ। वह है, “मनुष्य का मनुष्य तथा प्राणी-मात्र के साथ
कर्तव्य – बिना किसी जाति-भेद, रंग-भेद, धर्म तथा धन-भेद के।” यही मेरा
उपदेश बेटी सरोजिनी को है और दूसरे हमारे भाइयों को भी है।
पूज्यवर, आज जब मैं देखता हूँ कि सबकी बहनें समाज की सेवा के लिए
अपने को तन, मन, धन से लगाये हुए हैं, अभागा मैं ही ऐसा हूँ जिसकी ऐसी कोई
बहन नहीं। यद्यपि यह मेरी संकीर्णता है क्योंकि अपने मन के अनुसार दूसरी बहनें
भी अपनी ही हैं और वैसी ही समझता भी हूँ, परन्तु मैं उनकी संख्या में बढ़ती
चाहता हूँ, जिसकी कुछ आशा में अपनी पूजनीय जिया महताब कुँवरि से करता
था। उनका बहुत समय से कोई समाचार नहीं पाया है। यदि हो सके, मेरा
चरण-स्पर्श कहियेगा। श्रीमान दादा जी सरदार सिंह जी को, जो मेरे पहले-पहल
गुरु और आपके शिष्य हैं, सादर प्रणाम कहें। धनराज सिंह का हाल लिखना। चाचा
वर्ग तथा सब माताओं को चरण-स्पर्श, भाइयों को नमस्ते। पूज्य बुआ जी तथा माता
जी को प्रणाम, लली दोनों बहनों को, मुंशी सिंह जी को नमस्कार, भानजे तथा
भतीजों को प्यार। इति शुभम। पत्र शीघ्र भेजियेगा।
पता : महावीर सिंह पी.आई. 68 आपका आज्ञाकारी पुत्र,
सेल्युलर जेल, पोर्टब्लेयर (अण्डमान) महावीर
436 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

X.
विचारों की सान पर
क्रान्ति की तलवार

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हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
का घोषणापत्र
लाहौर कांग्रेस में बाँटे गये इस दस्तावेज़ को भगतसिंह और अन्य साथियों से
विचार-विमर्श के बाद मुख्य रूप से भगवतीचरण वोहरा ने लिखा था। दुर्गा भाभी
और दूसरे क्रान्तिकारी साथियों ने इसे वहाँ वितरित किया। सी.आई.डी. ने इसे ज़ब्त
कर लिया था और उसी के काग़ज़ों से इसकी प्रति मिली।
स्वतन्त्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है। भारत में स्वतन्त्रता का पौधा
फलने के लिए दशकों से क्रान्तिकारी अपना रक्त बहाते रहे हैं। बहुत कम लोग
हैं जो उनके मन में पाले हुए आदर्शों की उच्चता तथा उनके महान बलिदानों पर
प्रश्नचिह्न लगायें, लेकिन उनकी कार्रवाइयाँ गुप्त होने की वजह से उनके वर्तमान
इरादे और नीतियों के बारे में देशवासी अँधेरे में हैं, इसलिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन एसोसिएशन ने यह घोषणापत्र जारी करने की आवश्यकता महसूस
की है।
विदेशियों की गुलामी से भारत की मुक्ति के लिए यह एसोसिएशन सशस्त्र
संगठन द्वारा भारत में क्रान्ति के लिए दृढ़ संकल्प है। गुलाम रखे हुए लोगों की ओर
से स्पष्ट तौर पर विद्रोह से पूर्व गुप्त प्रचार और गुप्त तैयारियाँ होनी आवश्यक हैं।
जब देश क्रान्ति की उस अवस्था में आ जाता है तब विदेशी सरकार के लिए उसे
रोकना कठिन हो जाता है। वह कुछ देर तक तो इसके सामने टिक सकती है,
लेकिन उसका भविष्य सदा के लिए समाप्त हो चुका होता है। मानवीय स्वभाव
भ्रमपूर्ण और यथास्थितिवादी होने के कारण क्रान्ति से एक प्रकार का भय प्रकट
करता है। सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताक़त और विशेष सुविधाएँ माँगने वालों के
लिए भय पैदा करता है। क्रान्ति एक ऐसा करिश्मा है जिसे प्रकृति स्नेह करती है
और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती – न प्रकृति में और न ही इन्सानी
कारोबार में। क्रान्ति निश्चय ही बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की
दरिन्दा मुहिम नहीं है और न ही यहाँ-वहाँ चन्द बम फेंकना और गोलियाँ चलाना
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 439

है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समयोचित न्याय और समता
के सिद्धान्त को ख़त्म करना है। क्रान्ति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं
और न ही सरफ़रोशों का कोई सिद्धान्त है। क्रान्ति ईश्वर-विरोधी हो सकती है
लेकिन मनुष्य-विरोधी नहीं। यह एक पुख़्ता और ज़िन्दा ताक़त है। नये और पुराने
के, जीवन और ज़िन्दा मौत के, रोशनी और अँधेरे के आन्तरिक द्वन्द्व का प्रदर्शन
है, कोई संयोग नहीं है। न कोई संगीतमय एकसारता है और न ही कोई ताल है,
जो क्रान्ति के बिना आयी हो। 'गोलियों का राग' जिसके बारे में कवि गाते आये
हैं, सच्चाई रहित हो जायेगा अगर क्रान्ति को समूची सृष्टि में से ख़त्म कर दिया
जाये। क्रान्ति एक नियम है, क्रान्ति एक आदर्श है और क्रान्ति एक सत्य है।
हमारे देश के नौजवानों ने इस सत्य को पहचान लिया है। उन्होंने बहुत
कठिनाइयाँ सहते हुए यह सबक सीखा है कि क्रान्ति के बिना – अफरा-तफरी,
क़ानूनी गुण्डागर्दी और नफ़रत की जगह, जो आजकल हर ओर फैली हुई है –
व्यवस्था, क़ानूनपरस्ती और प्यार स्थापित नहीं किया जा सकता। हमारी सर्वसम्पन्न
धरती पर किसी को ऐसा विचार नहीं आना चाहिए कि हमारे नौजवान ग़ैर-ज़िम्मेदार
हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि वे कहाँ खड़े हैं। उनसे बढ़कर किसे मालूम है कि
उनकी राह कोई फूलों की सेज नहीं है। समय-समय पर उन्होंने अपने आदर्शों के
लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकायी है। इस कारण किसी के मुँह से यह नहीं निकलना
चाहिए कि नौजवान उतावलेपन में किन्हीं मामूली बातों के पीछे लगे हुए हैं।
यह कोई अच्छी बात नहीं है कि हमारे आदर्शों पर कीचड़ उछाला जाता है।
यह काफ़ी होगा अगर आप जानें कि हमारे विचार बेहद मज़बूत और तेज़-तर्रार हैं
जो न सिर्फ़ हमें आगे बढ़ाये रखते हैं बल्कि फाँसी के तख़्ते पर भी मुस्कुराने की
हिम्मत देते हैं।
आजकल यह फ़ैशन-सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अन्धाधुन्ध और
निरर्थक बात की जाये। महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी
आँच नहीं लाने देना चाहते, लेकिन हम यह दृढ़ता से कहते हैं कि हम देश को
स्वतन्त्र कराने के उनके ढंग को पूर्णतया नामंजूर करते हैं। यदि हम देश में चलाये
जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जागृति में उनकी भागीदारी के लिए
उनको सलाम न करें तो यह हमारे लिए बड़ा नाशुक़्रापन होगा। परन्तु हमारे लिए
महात्मा असम्भवताओं के दार्शनिक हैं। अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन
यह अतीत की चीज़ है। जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ़ अहिंसा के रास्ते से
कभी भी आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते। दुनिया सिर से पाँव तक हथियारों से लैस
है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी है। अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती
हैं, लेकिन हम जो ग़ुलाम क़ौम हैं, हमें ऐसे झूठे सिद्धान्तों के जरिये अपने रास्ते
से नहीं भटकना चाहिए। हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और ग़रीब
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की लूट से भरा हुआ है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने का क्या तुक
है? हम अपने पूरे ज़ोर के साथ कहते हैं कि क़ौम के नौजवान कच्ची नींद के ऐसे
सपनों से रिझाये नहीं जा सकते।
हम हिंसा में विश्वास रखते हैं — अपनेआप में अन्तिम लक्ष्य के रूप में नहीं,
बल्कि एक नेक परिणाम तक पहुँचने के लिए अपनाये गये तौर-तरीक़े के नाते।
अहिंसा के पैरोकार और सावधानी के वकील यह बात तो मानते हैं कि हम अपने
यक़ीन पर चलने और उसके लिए कष्ट सहने के लिए तैयार रहते हैं। तो क्या हमें
इसीलिए अपने साथियों की साझी माँ की बलिवेदी पर कुर्बानियों की गिनती
करानी पड़ेगी? अंग्रेज़ सरकार की जेलों की चारदीवारी के अन्दर रूह कँपा देने और
दिल की धड़कन रोक देने वाले कई दृश्य खेले जा चुके हैं। हमें हमारी आतंकवादी
नीति के कारण कई बार सज़ाएँ हुई हैं। हमारा जवाब है कि क्रान्तिकारियों का मुद्दा
आतंकवाद नहीं होता; तो भी हम यह विश्वास रखते हैं कि आतंकवाद के रास्ते
ही क्रान्ति आ जायेगी। पर इसमें कोई शक नहीं है कि क्रान्तिकारी बिल्कुल दुरुस्त
सोचते हैं कि अंग्रेज़ी सरकार का मुँह मोड़ने के लिए इन तरीक़ों का इस्तेमाल करना
ही कारगर तरीक़ा है। अंग्रेज़ों की सरकार इसलिए चलती है, क्योंकि वे सारे भारत
को भयभीत करने में कामयाब हुए हैं। हम इस सरकारी दहशत का किस तरह
मुक़ाबला करें? सिर्फ़ क्रान्तिकारियों की ओर से मुक़ाबले की दहशत ही उनकी
दहशत को रोकने में कामयाब हो सकती है। समाज में एक लाचारी की गहरी
भावना फैली हुई है। इस ख़तरनाक मायूसी को कैसे दूर किया जाये? सिर्फ़ कुर्बानी
की रूह को जगाकर खोये आत्मविश्वास को जगाया जा सकता है। आतंकवाद का
एक अन्तरराष्ट्रीय पहलू भी है। इंग्लैण्ड के काफ़ी शत्रु हैं जो हमारी ताक़त के पूर्ण
प्रदर्शन से हमारी सहायता करने को तैयार हैं। यह भी एक बड़ा लाभ है।
भारत साम्राज्यवाद के जुवे के नीचे पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज
अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो
मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर
दिया है। भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गम्भीर है। उसके सामने
दोहरा ख़तरा है – विदेशी पूँजीवाद का एक तरफ़ से और भारतीय पूँजीवाद के
धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से। भारतीय पूँजीवाद विदेशी पूँजी के साथ हर
रोज़ बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनीतिक नेताओं का डोमिनियन
(प्रभुतासम्पन्न) का दर्जा स्वीकार करना भी हवा के इसी रुख को स्पष्ट करता
है।
भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से
विश्वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है।
इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएँ अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 441

सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव ख़त्म करने में सहायक साबित हो सकता
है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुख सहने
की तत्परता, उनकी बेख़ौफ़ बहादुरी और लहराती क़ुर्बानी दर्शाती है कि भारत का
भविष्य उनके हाथ में सुरक्षित है। एक अनुभूतिमय घड़ी में देशबन्धु दास ने कहा
था, “नौजवान भारतमाता की शान एवं आशाएँ हैं। आन्दोलन के पीछे उनकी प्रेरणा
है, उनकी कुर्बानी है और उनकी जीत है। आज़ादी की राह पर मशालें लेकर चलने
वाले ये ही हैं। मुक्ति की राह पर ये तीर्थयात्री हैं।”
भारतीय रिपब्लिक के नौजवानो, नहीं सिपाहियो, क़तारबद्ध हो जाओ। आराम
के साथ न खड़े रहो और न ही निरर्थक क़दमताल किये जाओ। लम्बी दरिद्रता को,
जो तुम्हें नाकारा कर रही है, सदा के लिए उतार फेंको। तुम्हारा बहुत ही नेक मिशन
है। देश के हर कोने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रान्ति के लिए,
जिसका आना निश्चित है, लोगों को तैयार करो। फ़र्ज़ के बिगुल की आवाज़ सुनो।
वैसे ही ख़ाली ज़िन्दगी न गँवाओ। बढ़ो, तुम्हारी ज़िन्दगी का हर पल इस तरह के
तरीक़े और तरतीब ढूँढ़ने में लगना चाहिए, कि कैसे अपनी पुरातन धरती की आँखों
में ज्वाला जागे और एक लम्बी अंगड़ाई लेकर वह जाग उठे। अंग्रेज़ साम्राज्य के
ख़िलाफ़ नवयुवकों के उर्वर हृदयों में एक उकसाहट और नफ़रत भर दो, ऐसे बीज
डालो जोकि उगें और बड़े वृक्ष बन जायें क्योंकि इन बीजों को तुम अपने गर्म ख़ून
के जल से सींचोगे। तब एक भयानक भूचाल आयेगा, जो बड़े धमाके से ग़लत
चीज़ों को नष्ट कर देगा और साम्राज्यवाद के महल को कुचलकर धूल में मिला
देगा और यह तबाही महान होगी।
तब, और सिर्फ़ तभी, एक भारतीय क़ौम जागेगी, जो अपने गुणों और शान से
इन्सानियत को हैरान कर देगी। तब चालाक और बलवान सदा से कमज़ोर लोगों
से हैरान रह जायेंगे। तभी व्यक्तिगत मुक्ति भी सुरक्षित होगी और मेहनतकश की
सरदारी और प्रभुसत्ता को सत्कारा जायेगा। हम ऐसी ही क्रान्ति के आने का सन्देश
दे रहे हैं। क्रान्ति अमर रहे!
— करतार सिंह*, अध्यक्ष
(1929) रिपब्लिकन प्रेस, अरहवन, भारत से प्रकाशित।
(*भगतसिंह का छद्म नाम)
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बम का दर्शन

23 दिसम्बर, 1929 को क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ
वायसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गाँधीजी ने इस
घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख 'बम की पूजा' लिखा, जिसमें उन्होंने वायसराय को
देश का शुभचिन्तक और नवयुवकों को आज़ादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले
कहा। इसी के जवाब में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की ओर से
भगवतीचरण वोहरा ने 'बम का दर्शन' लेख लिखा, जिसका शीर्षक 'हिन्दुस्तान
सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र' रखा गया। भगतसिंह ने जेल में
इसे अन्तिम रूप दिया। 26 जनवरी, 1930 को इसे देशभर में बाँटा गया।
हाल ही की घटनाएँ! विशेष रूप से 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल
ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निन्दा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित
किया गया प्रस्ताव तथा ‘यंग इण्डिया' में गाँधीजी द्वारा लिखे गये लेखों से स्पष्ट
हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गाँधीजी से साँठ-गाँठ कर भारतीय
क्रान्तिकारियों के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है। जनता के बीच भाषणों
तथा पत्रों के माध्यम से क्रान्तिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है।
या तो यह जान-बूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय
में गलत प्रचार होता रहा और उन्हें गलत समझा जाता रहा; परन्तु क्रान्तिकारी अपने
सिद्धान्तों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं। बल्कि वे ऐसी
आलोचना का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे इसे इस बात का स्वर्णिम अवसर मानते
हैं कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगों को क्रान्तिकारियों के मूलभूत सिद्धान्तों तथा
उच्चादर्शों को, जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत हैं, समझाने का
अवसर मिलता है। आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने
का अवसर मिलेगा कि क्रान्तिकारी क्या हैं, और उनके विरुद्ध किये गये भ्रमात्मक
प्रचार से उत्पन्न होने वाली ग़लतफ़हमियों से उन्हें बचाया जा सकेगा।
पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन
शब्दों का प्रयोग ही ग़लत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ
अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 443

नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल-प्रयोग, परन्तु
क्रान्तिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है; दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ
समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा
राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपनेआप को कष्ट देकर
आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन सम्भव
हो सकेगा।
एक क्रान्तिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह
उनकी माँग करता है, अपनी उस माँग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक
शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए
अत्यधिक कष्ट सहन करता है, इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए
प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल-प्रयोग भी
करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इन्हें हिंसा
के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना कोष में दिये इस शब्द
के अर्थ के साथ अन्याय होगा। सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। उसकी
स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों? इसके
साथ-साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी क्यों न किया जाये? क्रान्तिकारी
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में
विश्वास करता है, परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल-प्रयोग
को निषिद्ध मानते हैं। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या
अहिंसा, बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपनी उद्देश्य-प्राप्ति के लिए शारीरिक
बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का?
क्रान्तिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतन्त्रता मिलेगी। वे
जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट
है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से
क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन
सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जायें। क्रान्ति पूँजीवाद, वर्गवाद
तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी। यह
राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म
होगा। क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मज़दूर तथा किसानों का
राज्य क़ायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्त्वों को समाप्त कर देगी जो देश
की राजनीतिक शक्ति को हथियाये बैठे हैं।
आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक गुलामी तथा धार्मिक रूढ़िवादी बन्धन
जकड़े हैं और उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है,
क्रान्तिकारी उसी में प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है। नवयुवक जैसे जैसे यह
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