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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 788 में से

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की लूट से भरा हुआ है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने का क्या तुक
है? हम अपने पूरे ज़ोर के साथ कहते हैं कि क़ौम के नौजवान कच्ची नींद के ऐसे
सपनों से रिझाये नहीं जा सकते।
हम हिंसा में विश्वास रखते हैं — अपनेआप में अन्तिम लक्ष्य के रूप में नहीं,
बल्कि एक नेक परिणाम तक पहुँचने के लिए अपनाये गये तौर-तरीक़े के नाते।
अहिंसा के पैरोकार और सावधानी के वकील यह बात तो मानते हैं कि हम अपने
यक़ीन पर चलने और उसके लिए कष्ट सहने के लिए तैयार रहते हैं। तो क्या हमें
इसीलिए अपने साथियों की साझी माँ की बलिवेदी पर कुर्बानियों की गिनती
करानी पड़ेगी? अंग्रेज़ सरकार की जेलों की चारदीवारी के अन्दर रूह कँपा देने और
दिल की धड़कन रोक देने वाले कई दृश्य खेले जा चुके हैं। हमें हमारी आतंकवादी
नीति के कारण कई बार सज़ाएँ हुई हैं। हमारा जवाब है कि क्रान्तिकारियों का मुद्दा
आतंकवाद नहीं होता; तो भी हम यह विश्वास रखते हैं कि आतंकवाद के रास्ते
ही क्रान्ति आ जायेगी। पर इसमें कोई शक नहीं है कि क्रान्तिकारी बिल्कुल दुरुस्त
सोचते हैं कि अंग्रेज़ी सरकार का मुँह मोड़ने के लिए इन तरीक़ों का इस्तेमाल करना
ही कारगर तरीक़ा है। अंग्रेज़ों की सरकार इसलिए चलती है, क्योंकि वे सारे भारत
को भयभीत करने में कामयाब हुए हैं। हम इस सरकारी दहशत का किस तरह
मुक़ाबला करें? सिर्फ़ क्रान्तिकारियों की ओर से मुक़ाबले की दहशत ही उनकी
दहशत को रोकने में कामयाब हो सकती है। समाज में एक लाचारी की गहरी
भावना फैली हुई है। इस ख़तरनाक मायूसी को कैसे दूर किया जाये? सिर्फ़ कुर्बानी
की रूह को जगाकर खोये आत्मविश्वास को जगाया जा सकता है। आतंकवाद का
एक अन्तरराष्ट्रीय पहलू भी है। इंग्लैण्ड के काफ़ी शत्रु हैं जो हमारी ताक़त के पूर्ण
प्रदर्शन से हमारी सहायता करने को तैयार हैं। यह भी एक बड़ा लाभ है।
भारत साम्राज्यवाद के जुवे के नीचे पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज
अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो
मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर
दिया है। भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गम्भीर है। उसके सामने
दोहरा ख़तरा है – विदेशी पूँजीवाद का एक तरफ़ से और भारतीय पूँजीवाद के
धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से। भारतीय पूँजीवाद विदेशी पूँजी के साथ हर
रोज़ बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनीतिक नेताओं का डोमिनियन
(प्रभुतासम्पन्न) का दर्जा स्वीकार करना भी हवा के इसी रुख को स्पष्ट करता
है।
भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से
विश्वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है।
इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएँ अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 441