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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

को बदलने में बड़ी सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, तथापि हम तो केवल अपने
समय की आवश्यकता की उपज हैं।
मैं तो यह भी कहूँगा कि साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स, वास्तव में इस विचार
को जन्म देने वाला नहीं था। असल में यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने ही एक विशेष
प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति उत्पन्न किये थे। उनमें मार्क्स भी एक था। हाँ, अपने
स्थान पर मार्क्स भी निस्सन्देह कुछ सीमा तक समय के चक्र को एक विशेष प्रकार
की गति देने में आवश्यक सहायक सिद्ध हुआ है।
मैंने (और आपने भी) इस देश में समाजवाद और साम्यवाद के विचारों को
जन्म नहीं दिया, वरन यह तो हमारे ऊपर हमारे समय एवं परिस्थिति के प्रभाव का
परिणाम है। निस्सन्देह हमने इन विचारों का प्रचार करने के लिए कुछ साधारण एवं
तुच्छ कार्य अवश्य किया है, इसलिए मैं कहता हूँ कि जब हमने इस प्रकार एक
कठिन कार्य को हाथ में ले ही लिया है, तो हमें उसे जारी रखना चाहिए और आगे
बढ़ना चाहिए। विपत्तियों से बचने के लिए आत्महत्या कर लेने से जनता का
मार्गदर्शन नहीं होगा, वरन यह तो एक प्रतिक्रियावादी कार्य होगा।
जेल के नियमों के अनुसार जीवन की निराशाओं, दबाव और हिंसा के असीम
परीक्षायुक्त वातावरण का विरोध करते हुए हम कार्य करते रहे। जिस समय हम
अपना कार्य करते थे, उस समय नाना प्रकार से हमें कठिनाइयों का निशाना बनाया
जाता था। यहाँ तक कि जो लोग अपनेआप को महान क्रान्तिकारी कहने का गौरव
अनुभव करते थे, वे भी हमको छोड़ गये। क्या ये परिस्थितियाँ असीम परीक्षायुक्त
न थीं? फिर अपने आन्दोलन एवं प्रयासों को जारी रखने के लिए हमारे पास क्या
कारण और तर्क था?
क्या स्वयं यही तर्क हमारे विचारों को शक्ति नहीं देता है? और क्या ऐसे
क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं के उदाहरण हमारे सामने नहीं हैं, जो जेलों से दण्ड भोगकर
लौटे और अब भी कार्य कर रहे हैं? यदि बाकुनिन ने आपके समान सोच-विचार
किया होता, तो वह प्रारम्भ में ही आत्महत्या कर लेता। आज आपको असंख्य ऐसे
क्रान्तिकारी दिखायी देते हैं, जो रूसी राज्य में उत्तरदायी पदों पर विराजमान हैं और
जिन्होंने अपने जीवन का अधिकतर भाग दण्ड भोगते हुए जेलों में बिताया है। मनुष्य
को अपने विश्वासों पर दृढ़तापूर्वक अडिग रहने का प्रयत्न करना चाहिए। कोई नहीं
कह सकता कि भविष्य में क्या घटना होने वाली है।
क्या आपको याद है कि जब हम इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि हमारी
बम-फ़ैक्टरियों में अत्यन्त तीव्र एवं प्रभावकारी विष भी रखा जाना चाहिए, तो
आपने बड़ी दृढ़ता से इसका विरोध किया था। आप इस विचार से ही घृणा करते
थे। आपको इस पर विश्वास नहीं था। फिर अब क्या हुआ? यहाँ तो ऐसी विकट
और जटिल परिस्थितियाँ भी नहीं हैं। मुझे तो इस प्रश्न पर विचार करने में भी घृणा
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 405

होती है। आपको उस मनोवृत्ति से भी घृणा थी, जो आत्महत्या करने की अनुमति
देती है। आप मुझे यह कहने के लिए क्षमा करें कि यदि आपने अपने बन्दी बनाये
जाने के समय ही इन विचारों के अनुकूल कार्य किया होता (अर्थात आपने विष
खाकर उस समय आत्महत्या कर ली होती) तो आपने क्रान्तिकारी कार्य की बहुत
बड़ी सेवा की होती, परन्तु इस समय तो इस कार्य पर विचार करना भी हमारे लिए
हानिकारक है।
एक और विशेष बात, जिस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ,
यह है कि हम लोग ईश्वर, पुनर्जन्म, नरक-स्वर्ग, दण्ड एवं पारितोषिक, अर्थात
भगवान द्वारा किये जाने वाले जीवन के हिसाब आदि में कोई विश्वास नहीं
रखते। अतः हमें जीवन एवं मृत्यु के विषय में भी नितान्त भौतिकवादी रीति से
सोचना चाहिए। एक दिन जब मुझे पहचाने जाने के लिए दिल्ली से यहाँ लाया
गया था, तो गुप्तचर विभाग के कुछ अधिकारियों ने मेरे पिता जी की उपस्थिति
में मुझसे इस विषय पर बातचीत की थी। उन्होंने कहा था कि मैं कोई भेद
खोलने और इस प्रकार अपना जीवन बचाने के लिए तैयार नहीं हूँ, इससे यह
सिद्ध होता है कि मैं जीवन से बहुत दुखी हूँ। उनका तर्क था कि मेरी यह मृत्यु
तो आत्महत्या के समान होगी, परन्तु मैंने उनको उत्तर दिया था कि मेरे जैसे
विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में ही मरना कदापि सहन नहीं कर
सकता। हम तो अपने जीवन का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं।
हम मानवता की अधिक से अधिक सम्भव सेवा करना चाहते हैं। विशेषकर मेरे
जैसा भला मनुष्य, जिसका जीवन किसी भी रूप में दुखी या चिन्तित नहीं है,
किसी समय भी, आत्महत्या करना तो दूर रहा, उसका विचार भी हृदय में लाना
ठीक नहीं समझता। वही बात मैं इस समय आपसे कहना चाहता हूँ।
आशा है कि आप मुझे अनुमति देंगे कि मैं आपको यह बताऊँ कि मैं अपने
बारे में क्या सोचता हूँ। मुझे अपने लिए मृत्युदण्ड सुनाये जाने का अटल विश्वास
है। मुझे किसी प्रकार की पूर्ण क्षमा या नम्र व्यवहार की तनिक भी आशा नहीं है।
यदि कोई क्षमा हुई भी तो पूर्णतः सबके लिए न होगी, वरन वह भी हमारे अतिरिक्त
अन्य लोगों के लिए नितान्त सीमित एवं कई बन्धनों से जकड़ी हुई होगी। हमारे
लिए तो न क्षमा हो सकती है और न वह होगी ही। इस पर भी मेरी इच्छा है कि
हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो और उसके साथ
ही मेरी अभिलाषा यह है कि जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे, तो
हमें फाँसी दे दी जाये। मेरी यह इच्छा है कि यदि कोई सम्मानपूर्ण और उचित
समझौता होना कभी सम्भव हो जाये, तो हमारे जैसे व्यक्तियों का मामला उसके
मार्ग में कोई रुकावट या कठिनाई उत्पन्न करने का कारण न बने। जब देश के भाग्य
का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए। हम
406 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्रान्तिकारी होने के नाते अतीत के समस्त अनुभवों से पूर्णतया अवगत हैं। इसलिए
हम नहीं मान सकते कि हमारे शासकों और विशेषकर अंग्रेज़ जाति की भावनाओं
में इस प्रकार का आश्चर्यजनक परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार का
परिवर्तन क्रान्ति के बिना सम्भव ही नहीं है। क्रान्ति तो केवल सतत कार्य करते
रहने से, प्रयत्नों से, कष्ट सहन करने एवं बलिदानों से ही उत्पन्न की जा सकती
है, और की जायेगी।
जहाँ तक मेरे दृष्टिकोण का सम्बन्ध है, मैं तो केवल उसी दशा में सबके लिए
सुविधाओं और क्षमादान का स्वागत कर सकता हूँ जब उसका प्रभाव स्थायी हो
और देश के लोगों के हृदयों पर हमारी फाँसियों से कुछ अमिट चिह्न अंकित हो
जायें। बस यही; इससे अधिक कुछ नहीं।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 407

क्रान्तिकारी साथी जयदेव के नाम पत्र
24 फ़रवरी, 1930
बेहद ज़रूरी
न. 103/फाँसी कोठरी
केन्द्रीय जेल, लाहौर
मेरे प्रिय जयदेव,
मुझे उम्मीद है कि तुमने 16 दिन के बाद हमारी भूख हड़ताल छोड़ने की बात
सुन ली होगी और तुम अन्दाज़ा लगा सकते हो कि इस समय तुम्हारी मदद की
हमें कितनी ज़रूरत है। हमें कल कुछ सन्तरे मिले, लेकिन कोई मुलाक़ात नहीं हुई।
हमारा मुक़दमा दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया गया है। इसलिए एक टिन
घी और एक 'क्रेवन-ए' सिगरेट का टिन भेजने की तुरन्त कृपा करो। कुछ रसगुल्लों
के साथ कुछ सन्तरों का भी स्वागत है। सिगरेट के बिना दल की हालत ख़राब
है। अब हमारी ज़रूरतों की अनिवार्यता समझ सकते हो।
अग्रिम आभार सहित
सच्ची भावनाओं सहित तुम्हारा
भगतसिंह
408 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जयदेव के नाम एक और पत्र

28 मई, 1930
प्रिय भाई जयदेव,
आज फिर तुम्हें कुछ तकलीफ़ देने के लिए मैं यह ख़त लिख रहा हूँ, उम्मीद
है कि तुम बुरा नहीं मानोगे। कृपया मेरे लिए पैरों का फ़लीट जूता भेजने का प्रबन्ध
करना। 9-10 नम्बर का चल जायेगा। चप्पल से बहुत बेआरामी है। कृपया इन्हें
शुक्रवार या शनिवार को कुलबीर के हाथ भेजने की कोशिश करना, जब वह हमारी
मुलाक़ात के लिए आयेगा। सच में मैं बहुत उदास हूँ कि मुझे तुम्हारे साथ अभी
तक मुलाक़ात की इजाज़त नहीं मिली है। यदि मुक़दमे में यह गतिरोध न आया
होता तो मैंने अधिकारियों से तुम्हारे साथ मुलाक़ात की इजाज़त के लिए बार-बार
आग्रह किया होता। जो भी हो, इस समस्या के सुलझते ही मुलाक़ात की इजाज़त
की फिर कोशिश करूँगा। मुझे उम्मीद है कि तुम जूते अवश्य ही और बिना देर
किए भेज दोगे। इन दिनों मेरे पास एक ही किताब है और वह भी बहुत शुष्क।
देखना अगर हाल में प्रकाशित कुछ दिलचस्प उपन्यास भेज सको। कृपया दोस्तों
को मेरी याद पहुँचाना।
सच्ची भावनाओं के साथ तुम्हारा
भगतसिंह
तारीख़ 26/5/30
लाहौर डाकखाने की मोहर 28/5/30
पता – जयदेव प्रसाद गुप्त द्वारा स. किशन सिंह
ब्रैडले हॉल, लाहौर
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 409

बचपन के दोस्त जयदेव को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 जून, 1930
मेरे प्रिय जयदेव,
'विक्ट्री' जूते और 'किंक' दवात भेजने के लिए मेरी ओर से धन्यवाद
स्वीकारो! आपके शब्दानुसार जैसाकि कुलबीर ने कहा है, मैं यह ख़त कुछ अन्य
चीज़ें मँगवाने के लिए लिख रहा हूँ।
आपका बहुत धन्यवाद होगा अगर आप एक दूसरा जोड़ा कपड़े के जूते श्री
दत्त के लिए भेज सको। लेकिन दुकानदार से उन्हें पूरा न आने की स्थिति में वापसी
की शर्त से लें। मैं इस बारे में अपने पहले ख़त में ही लिख सकता था, लेकिन
उस समय श्री दत्त अच्छे मूड में नहीं थे। मगर मेरे लिए यह बहुत कठिन बात है
कि मैं अकेला ही इन जूतों को पहनूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगली मुलाक़ात
के समय जूतों का एक और जोड़ा यहाँ पड़ा होगा।
कृपया 34 नम्बर छाती की सफ़ेद शेक्सपीयर कालर वाली आधी आस्तीन
वाली खेल शर्ट भेजना। यह भी श्री दत्त के लिए चाहिए। यह न सोचना कि जेल
में होते हुए भी हमने अपना रहन-सहन का ख़र्चीला ढंग नहीं त्यागा। क्योंकि यह
फिर भी आवश्यक ज़रूरतें हैं, विलासिताएँ नहीं। किसी मुलायम कपड़े के बने हुए
दो लँगोट नहाने और वर्जिश करने के लिए भेज दो। और कपड़े धोने के लिए साबुन
की कुछ टिक्की भेज देना। साथ ही थोड़े बादाम और एक स्वान इंक की दवात
भी भेज देना। सरदार जी का क्या हाल है? क्या वे लुधियाना से आ गये हैं?
आजकल कचहरी बन्द रहेगी। मुक़दमा नहीं चल रहा होगा। यदि वे आज अभी तक
वापस नहीं आये तो उनको लाने के लिए किसी को भेज देना। फिर उनके और
मेरे मुक़दमों का फ़ैसला होने वाला है। कहा नहीं जा सकता कि हमें आपस में
मुलाक़ात का भी मौक़ा मिलेगा अथवा नहीं, इसलिए आप उन्हें फ़ौरन बुला लें
ताकि वे इस हफ़्ते के भीतर मुझसे दो मुलाक़ातें कर सकें और अगर यदि वे जल्द
410 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

नहीं आ पा रहे तो कृपया कुलबीर और बहन अमर कौर को मुझसे मुलाक़ात के
लिए कल या फिर परसों भेज दें। मित्रों को मेरी ओर से याद कहें।
साथ ही, क्या आप उर्दू अनुवाद के साथ एक फ़ारसी क़ायदा भेज सकते हो?
आपका,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 411

जयदेव को एक और पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
24 जुलाई, 1930
मेरे प्रिय जयदेव!
कृपया निम्नलिखित किताबें द्वारकानाथ पुस्तकालय से मेरे नाम पर जारी
करवाकर शनिचरवार को कुलबीर के हाथ भेज देना :
मैटीरियेलिज़्म : कार्ल लीब्नेखत
व्हाईमैन फाइट – बी. रसेल
सोवियट्स एट वर्क
कोलेप्स ऑफ़ सेकिण्ड इण्टरनेशनल
लेफ्ट विंग कम्युनिज़्म
म्यूचुअल एण्ड प्रिन्स क्रोपोटकिन
फ़ील्ड्स फ़ेक्ट्रीज एण्ड वर्कशाप्स
सिविल वार इन फ्रांस : मार्क्स
लैण्ड रिवोल्यूशन इन एशिया, और
अप्टन सिंक्लेयर की ‘स्पाई’
कृपया यदि हो सके तो मुझे एक और किताब भेजने का प्रबन्ध करना, जिसका
नाम ‘थ्योरी ऑफ़ हिस्टोरिकल मैटिरियेलिज़्म : बुखारिन’ है। (यह पंजाब पब्लिक
लाइब्रेरी से मिल जायेगी)। और पुस्तकालयाध्यक्ष से यह मालूम करना कि कुछ
किताबें क्या बोर्स्टल जेल में भेजी गयी हैं? उन्हें किताबों की बहुत ज़रूरत है।
उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथों एक सूची भेजी थी, लेकिन उनको अभी
तक किताबें नहीं मिलीं। अगर उनके (पुस्तकालय) पास कोई सूची न हो तो
कृपया लाला फ़िरोज़चन्द से जानकारी ले लेना और उनकी पसन्द के अनुसार कुछ
रोचक किताबें भेज देना। इस रविवार जब मैं वहाँ जाऊँ तो उनके पास किताबें
पहुँची हुई होनी चाहिए। कृपया यह काम किसी भी हालत में कर देना। इसके साथ
ही डार्लिंग की ‘पंजाब पेजेण्ट्री इन प्रॉस्पैरिटी एण्ड डैट’ और इसी तरह की
412 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

एक-दो अन्य किताबें किसान समस्या पर डॉ. आलम के लिए भेज देना।
आशा है तुम इन कष्टों को ज़्यादा महसूस न करोगे। भविष्य के लिए तुम्हें
यक़ीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कभी भी कोई कष्ट न दूँगा। सभी मित्रों को मेरी याद
कहना और लज्जावती जी को मेरी ओर से अभिवादन। उम्मीद है कि अगर दत्त
की बहन आयीं तो वे मुझसे मुलाक़ात करने का कष्ट करेंगी।
आदर के साथ,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 413

बटुकेश्वर दत्त की बहन प्रोमिला को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
17 जुलाई, 1930
प्यारी बहन,
कल बत्तू¹ ने आपको चिट्ठी लिखी थी। आपको यह ख़बर देने के लिए कि
जब तक आपको उसकी दूसरी चिट्ठी न मिले, आप यहाँ न आयें। बत्तू को कल
रात किसी अन्य जेल में भेज दिया गया है। अभी तक हम उसके पड़ाव के बारे
में अनजान हैं। इसलिए मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि आप बनारस से लाहौर के लिए
तब तक न चलें जब तक उसकी चिट्ठी न मिले। उसका बिछोह मेरे लिए भी
असहनीय है। आज भी मैं बड़ी परेशानी महसूस कर रहा हूँ। हर पल बोझिल बन
गया है। सच में ऐसे दोस्त से बिछड़ना जोकि मेरे अपने भाइयों से ज़्यादा प्यारा हो,
बहुत दुखद है। ख़ैर, हमें यह सबकुछ हौसला करके सहना चाहिए। मैं आपसे अर्ज़
करता हूँ कि आप धीरज रखें; कोई चिन्ता न करें।
समय बीतने से कोई अच्छा ही परिणाम निकलेगा।
आपका भाई,
भगतसिंह

  1. बटुकेश्वर दत्त का लाड़ का नाम।
    414 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

छोटे भाई कुलबीर को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
16 सितम्बर, 1930
प्यारे भाई कुलबीर जी,
सत श्री अकाल!
तुम्हें मालूम ही होगा कि उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार मुझसे मुलाक़ातों
पर पाबन्दी लगा दी गयी है। इन स्थितियों में फ़िलहाल मुलाक़ात न हो सकेगी और
मेरा विचार है कि जल्द ही फ़ैसला सुना दिया जायेगा। इसके कुछ दिनों बाद किसी
दूसरी जेल में भेज दिया जायेगा। इसलिए किसी दिन जेल में आकर मेरी किताबें
और काग़ज़ात आदि चीजें ले जाना। मैं बरतन, कपड़े, किताबें और अन्य काग़ज़ात
जेल के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट के दफ़्तर में भेज दूँगा। आकर ले जाना। पता नहीं
क्यों, मेरे मन में बार-बार यह विचार आ रहा है कि इसी हफ़्ते के किसी दिन या
अधिक से अधिक इसी माह में फ़ैसला और चालान हो जायेगा। इन स्थितियों में
अब तो किसी अन्य जेल में मुलाक़ात होगी। यहाँ तो उम्मीद नहीं।
वकील को भेज सको तो भेजना। मैं प्रिवी कौंसिल के सिलसिले में एक
ज़रूरी मशवरा करना चाहता हूँ। माँजी को दिलासा देना, घबराएँ नहीं।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 415

कुलबीर को एक और पत्र

सेण्ट्रल जेल, लाहौर
25 सितम्बर, 1930
प्रिय भाई कुलबीर सिंह जी,
सत श्री अकाल!
मुझे यह जानकर कि एक दिन तुम माँजी को साथ लेकर आये और मुलाक़ात
का आदेश न मिलने से निराश होकर वापस लौट गये, बहुत दुख हुआ। तुम्हें तो
पता चल चुका था कि जेल में मुलाक़ात की इजाज़त नहीं देते। फिर माँजी को
साथ क्यों लाये? मैं जानता हूँ कि इस समय वे बहुत घबरायी हुई हैं, लेकिन इस
घबराहट और परेशानी का क्या फ़ायदा, नुक़सान ज़रूर है, क्योंकि जब से मुझे पता
चला कि वे बहुत रो रही हैं, मैं स्वयं भी बेचैन हो रहा हूँ। घबराने की कोई बात
नहीं, फिर इससे कुछ मिलता भी नहीं। सभी साहस से हालात का मुक़ाबला करें।
आख़िरकार दुनिया में दूसरे लोग भी तो हज़ारों मुसीबतों में फँसे हुए हैं। और फिर
अगर लगातार एक बरस तक मुलाक़ातें करके भी तबीयत नहीं भरी तो और दो-चार
मुलाक़ातों से भी तसल्ली न होगी। मेरा ख़याल है कि फ़ैसले और चालान के बाद
मुलाक़ातों से पाबन्दी हट जायेगी, लेकिन माना कि इसके बावजूद मुलाक़ात की
इजाज़त न मिले तो...इसलिए घबराने से क्या फ़ायदा?
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह
416 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पिता जी के नाम भगतसिंह का पत्र
30 सितम्बर, 1930 को भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल को
एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की माँग की। सरदार किशन
सिंह स्वयं देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे। उन्हें व कुछ
अन्य देशभक्तों को लगता था कि शायद बचाव-पक्ष पेश कर भगतसिंह को फाँसी
के फन्दे से बचाया जा सकता है, लेकिन भगतसिंह और उनके साथी बिल्कुल अलग
नीति पर चल रहे थे। उनके अनुसार, ब्रिटिश सरकार बदला लेने की नीति पर चल
रही है व न्याय सिर्फ़ ढकोसला है। किसी भी तरीक़े से उसे सज़ा देने से रोका नहीं
जा सकता। उनका मानना था कि उनका नाम भारतीय क्रान्ति का प्रतीक बन गया
है और अपनी कुर्बानी से वे जनता में इन्क़लाबी भावनाएँ जगाना चाहते थे। पिता द्वारा
दी गयी अर्ज़ी से भगतसिंह की भावनाओं को ठेस लगी थी, लेकिन अपनी भावनाओं
को नियन्त्रित कर अपने उसूलों पर ज़ोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर, 1930 को यह
पत्र लिखा जो उनके पिता को देर से मिला। 7 अक्टूबर, 1930 को मुक़दमे का
फ़ैसला सुना दिया गया। – स.
4 अक्टूबर, 1930
पूज्य पिता जी,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल
ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा है। यह ख़बर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे
ख़ामोशी से बरदाश्त नहीं कर सका। इस ख़बर ने मेरे भीतर की शान्ति भंग कर
उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियों में और
इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं?
आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान
करता हूँ लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूँ कि आपको मेरे साथ सलाह-मशवरा
किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था। आप जानते हैं कि राजनीतिक
क्षेत्र में मेरे विचार आपसे काफ़ी अलग हैं। मैं आपकी सहमति या असहमति का
ख़याल किये बिना सदा स्वतन्त्रतापूर्वक काम करता रहा हूँ।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 417

मुझे यक़ीन है कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे
यह बात मनवा लेने की कोशिशें करते रहे हैं कि मैं अपना मुक़दमा संजीदगी से
लड़ूँ और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करूँ, लेकिन आपको यह भी मालूम है
कि मैं सदा इसका विरोध करता रहा हूँ। मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा
प्रकट नहीं की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया है।
आप जानते हैं कि हम एक निश्चित नीति के अनुसार मुक़दमा लड़ रहे हैं।
..मेरा हर क़दम इस नीति, मेरे सिद्धान्तों और हमारे कार्यक्रम के अनुरूप होना
चाहिए। आज स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। लेकिन अगर स्थितियाँ इससे कुछ और
भी अलग होतीं तो भी मैं अन्तिम व्यक्ति होता जो बचाव प्रस्तुत करता। इस पूरे
मुक़दमे में मेरे सामने एक ही विचार था और वह यह कि हमारे विरुद्ध जो संगीन
आरोप लगाये गये हैं, बावजूद उनके हम पूर्णतया इस सम्बन्ध में अवहेलना का
व्यवहार करें। मेरा नज़रिय यह रहा है कि सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ऐसी
स्थितियों में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो भी कठोरतम सज़ा दी जाये, वह
उन्हें हँसते-हँसते बरदाश्त करनी चाहिए। इस पूरे मुक़दमे के दौरान हमारी योजना
इसी सिद्धान्त के अनुरूप रही है। हम ऐसा करने में सफल हुए या नहीं, यह फ़ैसला
करना मेरा काम नहीं। हम खुदगर्जी को त्यागकर अपना काम कर रहे हैं।
वायसराय ने लाहौर साज़िश केस आर्डिनेंस जारी करते हुए इसके साथ जो
वक्तव्य दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इस साज़िश के मुजरिम
शान्ति-व्यवस्था को समाप्त करने के प्रयास कर रहे हैं। इससे जो हालात पैदा हुए
उसने हमें यह मौक़ा दिया कि हम जनता के समक्ष यह बात प्रस्तुत करें कि वह
स्वयं देख ले कि शान्ति-व्यवस्था एवं क़ानून समाप्त करने की कोशिशें हम कर
रहे हैं या हमारे विरोधी? इस बात पर मतभेद हो सकते हैं। शायद आप भी उनमें
से एक हों जो इस बात पर मतभेद रखते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि
आप मुझसे सलाह किये बिना मेरी ओर से ऐसे क़दम उठायें। मेरी ज़िन्दगी इतनी
क़ीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हैं। कम से कम मेरे लिए तो इस जीवन की
इतनी क़ीमत नहीं कि इसे सिद्धान्तों को कुर्बान करके बचाया जाये। मेरे अलावा
मेरे और साथी भी हैं जिनके मुक़दमे इतने ही संगीन हैं जितना कि मेरा मुक़दमा।
हमने एक संयुक्त योजना अपनायी है और इस योजना पर हम अन्तिम समय तक
डटे रहेंगे। हमें इस बात की कोई परवाह नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप में इस बात
के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा।
पिता जी, मैं बहुत दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मुझे भय है, आप पर दोषारोपण
करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निन्दा करते हुए मैं कहीं सभ्यता
की सीमाएँ न लाँघ जाऊँ और मेरे शब्द ज़्यादा सख्त़ न हो जायें। लेकिन मैं स्पष्ट
शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार
418 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

करता तो मैं इसे ग़द्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सन्दर्भ में मैं इतना ही
कहूँगा कि यह एक कमज़ोरी है – निचले स्तर की कमज़ोरी।
यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था। मैं यह कहना
चाहता हूँ कि आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप भी इतने
ही देशप्रेमी हैं, जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता है। मैं जानता हूँ कि आपने
अपनी पूरी ज़िन्दगी भारत की आज़ादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़
पर आपने ऐसी कमज़ोरी दिखायी, यह बात मैं समझ नहीं सकता।
अन्त में मैं आपसे, आपके अन्य मित्रों एवं मेरे मुक़दमे में दिलचस्पी लेने वालों
से यह कहना चाहता हूँ कि मैं आपके इस क़दम को नापसन्द करता हूँ। मैं आज
भी अदालत में अपना कोई बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूँ। अगर अदालत
हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकरण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन
को मंज़ूर कर लेती, तो भी मैं कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत न करता।
भूख हड़ताल के दिनों में ट्रिब्यूनल को जो आवेदन पत्र मैंने दिया था और उन
दिनों में जो साक्षात्कार दिया था उन्हें ग़लत अर्थों में समझा गया है और अख़बारों
में यह प्रकाशित कर दिया गया कि मैं अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ,
हालाँकि मैं हमेशा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के विरोध में रहा। आज भी मेरी वही
मान्यता है जो उस समय थी।
बोर्स्टल जेल में बन्दी मेरे साथी इस बात को मेरी ओर से ग़द्दारी और
विश्वासघात ही समझ रहे होंगे। मुझे उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने का
अवसर भी नहीं मिल सकेगा।
मैं चाहूँगा कि इस सम्बन्ध में जो उलझनें पैदा हो गयी हैं, उनके विषय में
जनता को असलियत का पता चल जाये। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि
आप जल्द से जल्द यह चिट्ठी प्रकाशित कर दें।
आपका आज्ञाकारी,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 419

बटुकेश्वर दत्त को भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
अक्टूबर, 1930
प्रिय भाई,
मुझे सज़ा सुना दी गयी है और फाँसी का हुक्म हुआ है। इन कोठरियों में मेरे
अलावा फाँसी का इन्तज़ार करने वाले बहुत-से मुजरिम हैं। ये लोग यही प्रार्थनाएँ
कर रहे हैं कि किसी तरह वे फाँसी से बच जायें। लेकिन उनमें से शायद मैं अकेला
ऐसा आदमी हूँ जो बड़ी बेसब्री से उस दिन का इन्तज़ार कर रहा हूँ जब मुझे अपने
आदर्श के लिए फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने का सौभाग्य मिलेगा। मैं खुशी से फाँसी
के तख़्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा दूँगा कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों के लिए
कितनी वीरता से कुर्बानी दे सकते हैं।
मुझे फाँसी की सज़ा मिली है, मगर तुम्हें उम्रक़ैद। तुम ज़िन्दा रहोगे और
ज़िन्दा रहकर तुम्हें दुनिया को यह दिखा देना है कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों
के लिए सिर्फ़ मर ही नहीं सकते, बल्कि ज़िन्दा रहकर हर तरह की यातनाओं
का मुक़ाबला भी कर सकते हैं। मौत सांसारिक मुसीबतों से छुटकारा पाने का
साधन नहीं बननी चाहिए, बल्कि जो क्रान्तिकारी संयोगवश फाँसी के फन्दे से
बच गये हैं उन्हें ज़िन्दा रहकर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न
सिर्फ़ अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर चढ़ सकते हैं, बल्कि जेलों की अँधेरी
कोठरियों में घुट-घुटकर हद दर्जे के अत्याचारों को भी सहन कर सकते हैं।
तुम्हारा,
भगतसिंह
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सुखदेव का तायाजी के नाम पत्र¹
बोर्स्टल, लाहौर
मान्य ताया जी,
दो पत्र पहले लिख चुका हूँ। कोई उत्तर नहीं मिला।
मैं सुन रहा हूँ मेरे कारण आपको बहुत कुछ मानसिक कष्ट उठाना पड़ रहा
है इसके पूर्व भी इस ख़याल से आपको पत्र द्वारा कहने की चेष्टा की है। अब फिर
वही कह रहा हूँ।
मैं जानता हूँ कि आपको मेरे स्वभाव (मूलपत्र में 'स्वाभाव' लिखा है। – स.
) के कारण बहुत चिन्तित रहना पड़ता है और मैं यह भी चाहता हूँ कि आपकी
यह चिन्ता किसी प्रकार दूर हो जाये। ख़ासकर इन दिनों में जबकि आपके लिए
दूसरे कष्ट काफ़ी इकट्ठा हो रहे हैं। परन्तु एक बात मैं आपसे साफ़ कहना चाहता
हूँ। मुझसे कोई बात सिर्फ़ इसीलिए कि उससे दूसरे खुश होंगे – नहीं हो सकती।
दाढ़ी ही की बात लीजिये। भला इससे आपको इतना दुखी होने की क्या
आवश्यकता थी। जैसे दाढ़ी-मूँछ कटाना एक फ़ैशन है वैसे ही दाढ़ी रखना भी तो
एक फ़ैशन ही है। अब क्या किसी व्यक्ति को इस बारे में भी माता-पिता द्वारा इतना
बाध्य होना पड़ेगा और उसे सर, दाढ़ी और मूँछ के बाल अपने माता-पिता की इच्छा
पर ही रखाने या कटाने चाहिए। तो क्या वे लोग जो दाढ़ी इत्यादि धर्म अथवा
माँ-बाप की ख़ातिर या रूढ़ी को क़ायम रखने की ख़ातिर रखते हैं ऐसा करने में
(justified) हुए न। मैं नहीं समझता कि आप जैसे स्वतन्त्र विचार रखने वाला पुरुष
क्यों अपने पुत्र से ऐसी आशा करता है कि वह मामूली-मामूली बात करने में इस
बात का विचार रखे कि उसके वैसा करने से उसका पिता तो बुरा नहीं मानेगा।
और वह आदमी आज़ाद विचारों वाला ही कैसे हो सकता है जो दूसरे व्यक्ति को
उसके अपनी इच्छानुसार करने पर बुरा समझे जबकि वह बात कोई ऐसी नहीं है
जिसे बुरी दृष्टि से (Morally) देखा जाना चाहिए।
हाँ, एक बात और है, शायद आपका यह विचार होता होगा कि इससे मैं
बदसूरत मालूम होता हूँ और मैं जान-बूझकर अपनी हालत ज़्यादा गन्दी रखना चाहता
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 421

हूँ, जिसे आप अपने पुत्र के लिए अच्छा नहीं समझते। यदि ऐसा है तो मैं आपको
बताना चाहता हूँ कि आपका ऐसा विचार करना भूल है। अपने शरीर की जितनी
फिकर मुझे रहती है और देश तथा धर्म की ख़ातिर अपने शरीर को ख़राब करने
के बरख़िलाफ़ जितना मैं हूँ और शायद ही कोई हो। ऐसी अवस्था में मैं नहीं
समझता कि आपकी नाराज़गी का क्या कारण है।
साथ ही यह बात भी मैं आपके आगे रख देना चाहता हूँ कि मैं इस बात को
बहुत बुरा समझता हूँ कि मैं यह कुछ भी करने में सदा इस बात का ध्यान रखूँ
कि दूसरे क्या विचार करेंगे और न ही मैं यह अच्छा समझता हूँ कि और कोई मेरे
व्यक्तिगत जीवन की बातों में मुझे अपनी इच्छाओं से बाध्य करे। मैं चाहे कोई भी
हो – किसी की ख़ातिर अपना व्यक्तित्व खोना नहीं चाहता और फिर ऐसी-ऐसी
मामूली बातों की ख़ातिर मैं स्वयं इन बातों से तंग हो जाता हूँ।
दूसरा कारण आपके दुखी रहने का है मेरा आजकल का Attitude। ठीक है।
माता-पिता के लिए गौरव की बात यही है कि उनका लड़का उनके लिए नेकनामी
पैदा करे न कि कलंक। माता-पिता की सदा यह इच्छा रहती है कि उनका लड़का
बड़ा नाम कमाये और जीवन के संग्रामों में किसी से भी पीछे न रहे। मैं जानता
हूँ आपकी भी ऐसी ही मानसिक अवस्था है और जब आप देखते हैं कि मैं किसी
बात में भाग नहीं लेता और हमेशा चुप रहता हूँ तो आपको बहुत दुख होता है।
सचमुच, मैं आपसे सच्चे दिल से कहता हूँ, आपको इस बारे में दुखी देखकर मैं
स्वयं बहुत दुखी होता हूँ। और क्या कहूँ, मैंने इस कारण से कितने अपनों को नाराज़
किया है और कितनों की नज़र में बुरा बना हूँ। इतना होने पर भी इस बारे में मैं
कुछ नहीं कहना चाहता और न सफ़ाई देना चाहता हूँ। पर आपसे यह अवश्य कहूँगा
कि आप कभी इन विचारों को लेकर दुखी न हों और मैं क्या करता हूँ और मुझे
क्या करना चाहिए, इन बातों पर कभी विचार ही न करना चाहिए।
क्योंकि आपको यक़ीन करना चाहिए कि मैं आपका पुत्र हूँ। बस यही मेरी
सफ़ाई है। इस पर यक़ीन कीजिये।
क्या मैं आशा कर सकता हूँ कि आप मेरी ओर से निश्चिन्त हो जायेंगे।
आपका पुत्र,
सुखदेव
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सुखदेव का अधूरा पत्र
राष्ट्रीय अभिलेखागार, भारत सरकार, नयी दिल्ली के सौजन्य से प्राप्त सुखदेव
की यह अपूर्ण, अप्रेषित चिट्ठी सुखदेव के बोर्स्टल जेल से, सेण्ट्रल जेल लाहौर में
स्थानान्तरण के समय प्राप्त हुई थी। मूल चिट्ठी पाकिस्तान सरकार के रिकॉर्ड में
है लेकिन इसकी फ़ोटोस्टेट प्रतिलिपि राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध है। – स.
7 अक्टूबर, 1930
बिरादरमन,
देर से कुछ भावनाएँ हृदय में उठ रही थीं जिनको कुछ कारणोंवश अब तक
दबाये हुए था। किन्तु अब अधिक नहीं दबा सकता। दबा सकता ही नहीं वरन
उनको दबाना उचित भी नहीं समझता। कह नहीं सकता मेरे इस प्रकार भाव
प्रकट करने को आप अच्छा समझें या बुरा। इनको कुछ महत्त्व दें या नहीं। ये
आपके अनुकूल हों या नहीं। आप इनसे सहमत हों या नहीं। लेकिन मैं तो वही
कर रहा हूँ जो मुझे उचित मालूम दे रहा है। आप इन्हें ग्रहण करना चाहें करें,
यह आपकी इच्छा है। और यदि आप इसका उत्तर देना चाहें तो बड़ी अच्छी बात
हो। इससे यह लाभ होगा कि मेरे विचार भी कुछ clear हो जायेंगे और मुझे इस
बात की तसल्ली भी हो जायेगी कि जेल की चारदीवारी ने मुझे मेरे ठीक-ठीक
judge कर सकने की शक्ति से वंचित नहीं कर दिया और practical life के field
से अलग हो जाने पर मैं idle और Vain Schemes के सोचने का आदी नहीं हो
गया हूँ।
जब से हम लोग जेल में आये हैं बाहिर का वातावरण बहुत गरम हो रहा है।
जहाँ तक actions का सम्बन्ध है, पत्रों द्वारा पता चलता है कि क़रीब हर एक
province में, ख़ासकर पंजाब और बंगाल में तो हद ही हो गयी है। इस पर
bomb तो एक साधारण-सी बात हो गयी है। बम द्वारा इतने actions हमारे
इतिहास में शायद ही कभी हुए होंगे। इन्हीं actions के बारे में ही मैं यहाँ पर
आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। इस बारे में actions के सम्बन्ध में हमारी अपनी
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policy क्या थी, आपके सम्मुख रखूँगा। इसके पश्चात actions के सम्बन्ध में
अपने विचार कहूँगा।
हम लोग कुछ दो actions कर पाये। एक साण्डर्स मर्डर, दूसरा असेम्बली बम।
इसके अतिरिक्त हमने दो-तीन और actions करने का प्रयत्न किया था यद्यपि
उनमें सफलता प्राप्त नहीं हुई। इनके सम्बन्ध में मैं इतना कह सकता हूँ कि हमारे
actions तीन प्रकार के थे – 1. Propaganda 2. Money 3. Special. इन तीनों
में से हमारा मुख्य ध्यान propaganda के actions की ओर था। बाक़ी दोनों गौण
कहे जा सकते हैं। इससे मेरा अभिप्राय उनकी importance को कम करने का नहीं
है तो भी हमारे लिए हमारी existence का उद्देश्य propaganda के actions करना
ही था। बाक़ी दोनों प्रकार के actions हमारा उद्देश्य नहीं थे, वरन उद्देश्य की पूर्ति
के लिए आवश्यक। इन तीनों को clear करने के लिए 1. Assembly action, 2.
Punjab National Bank Dacoity और 3. जोगेश चटर्जी को छुड़ाने की कोशिश
आप (शायद ‘आज’ – स.) आपके सम्मुख रखता हूँ।
पिछले दो प्रकार के actions को छोड़कर मैं propaganda actions को इस
स्थान पर discuss करना चाहता हूँ। propaganda शब्द से शायद इन actions को
ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता। दरअसल मतलब यह है कि हमारे ये actions
हमारी जनता के भावों के अनुकूल होते थे। उदाहरण के लिए Saunders' murder
को लो। लाला (ला. लाजपत राय) पर लाठियाँ पड़ने से हमने देखा कि देश में
इनके कारण बहुत हलचल है। इस पर Govt. के रवैये ने तेल का काम किया।
लोग बहुत नाराज़ हो गये। जनता का ध्यान revolutionaries की ओर खींचने के
लिए हमारे लिए यह बड़ा अच्छा अवसर था। पहले हमने सोचा था कि एक आदमी
पिस्तौल लेकर जाये और Scott को मारकर वहीं पर अपनेआप को पेश कर दे।
फिर Statement द्वारा यह कह दे कि National insult का बदला जब तक
revolutionaries ज़िन्दा हैं, इसी प्रकार लिया जा सकता है। किन्तु आसपास man-
power कम होने के कारण तीन आदमियों को भेजना ज़्यादा उचित समझा गया।
इसमें भी बचकर निकल जाने की आशा का विचार मुख्य नहीं था। इसकी तो आशा
भी नहीं थी। हमारा विचार यह था कि यदि murder के बाद पुलिस पीछा करे
तो खूब मुक़ाबला किया जाये। जो इस मुक़ाबले में बच जाये और पकड़ा जाये तो
Statement दे दे। इसी विचार से भागकर D.A.V. College boarding की छत पर
चढ़ गये थे। Action के समय यह प्रबन्ध था कि भगतसिंह जो Scott को पहचानता
था, पहली गोली चलाये और राजगुरु थोड़ी दूर पर उसकी हिफ़ाज़त करे। यदि
भगतसिंह पर कोई हमला करे तब राजगुरु उसको रोके। इसके बाद ये दोनों वहाँ
से भागें और चूँकि भागते हुए मुड़कर पीछा करने वालों पर निशाना नहीं लिया जा
सकता इसलिए पण्डित जी को इन दोनों की रक्षा के निमित्त पीछे खड़ा किया था।
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