भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
हमारे विरोध का कारण तो न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम की ओर से पास किया
बहुमत का आदेश और उसके बाद हमारे साथ हुआ दुर्व्यवहार था। न्यायाधीश
कोल्डस्ट्रीम और न्यायाधीश हैमिल्टन का हम सम्मान करते हैं, जैसाकि एक
मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का किया जाना चाहिए। हमारा रोष एक विशेष आदेश
के विरोध में था जिसके कारण ट्रिब्यूनल, जोकि उस आदेश के लिए
ज़िम्मेदार है, के अध्यक्ष से क्षमा माँगने की माँग की गयी थी। अध्यक्ष को
हटा देने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि अब जज हैमिल्टन, जो उस
आदेश में शरीक थे, न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम के स्थान पर अध्यक्षता कर रहे
हैं। हम तो केवल यह कह सकते हैं कि बदली हुई स्थितियों ने अब ज़ख़्म
पर नमक छिड़कने का ही काम किया है।
आपके,
भगतसिंह
25 जून, 1930 बी.के. दत्त
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 385
राजनीतिक मामलों की पैरवी पर
23 दिसम्बर, 1930 को पंजाब के गवर्नर सर ज़्याफ़्रेडी पर क्रान्तिकारी युवक
हरिकृष्ण ने गोली चलायी और उसे घायल कर दिया। हरिकृष्ण पकड़ा गया और
उस पर केस चला। लेकिन वकील की सलाह पर हरिकृष्ण जिस तरह केस की पैरवी
कर रहा था, भगतसिंह उसके तरीक़े से असहमत थे। इसलिए उन्होंने अपने एक साथी
को जेल से दो पत्र जोकि जून, 1931 में लाहौर से प्रकाशित 'पीपुल्स' नामक अंग्रेज़ी
साप्ताहिक में छपा था, नीचे दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि हरिकृष्ण को 9
जून, 1931 को फाँसी दी गयी। – स.
मुझे यह जानकर बहुत अफ़सोस है कि इस सम्बन्ध में मेरा पहला पत्र समय पर
अपने ठिकाने नहीं पहुँच सका और इसलिए उससे कोई फ़ायदा न हो सका, या
यह कि वह उस उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा, जिसके लिए वह लिखा गया
था। इसलिए मैं आमतौर पर यह पत्र राजनीतिक मुक़दमों में पैरवी के सवाल के
बारे में और ख़ासतौर पर क्रान्तिकारी मुक़दमे के बारे में अपने विचारों को प्रकट
करने के लिए लिख रहा हूँ। पहले पत्र में विचारे गये ख़ास-ख़ास नुकतों के अलावा
इसका एक और मक़सद भी होगा, और वह यह कि मैं घटनाओं से गुज़र जाने के
बाद समझदार नहीं बन रहा हूँ।
ख़ैर, मैंने उस ख़त में यह लिखा था कि वकील पैरवी के लिए जो दलीलें
दे रहा था, उन्हें माना न जाये, पर बावजूद आपके और मेरे विरोध के उन्हें मान
लिया गया है।
बावजूद इसके हम अधिक रोशनी में इस बात पर विचार कर सकते हैं और
पैरवी से सम्बन्धित आगामी नीति के बारे में ठोस विचार बना सकते हैं।
आप यह जानते ही हैं कि मैं कभी भी हमारे राजनीतिक बन्दियों की बचाव
वाली पैरवी करने का समर्थक नहीं रहा, परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उचित
संघर्ष की ख़ूबसूरती बिल्कुल ही बिगाड़ दी जाये। इस पर विशेष ध्यान की
आवश्यकता है कि ख़ूबसूरती शब्द यहाँ अवास्तविक शक्ल में प्रयोग नहीं किया
गया है और इसका उस उद्देश्य से सम्बन्ध है, जिसने कि एक ख़ास कार्रवाई के
लिए हरिकृष्ण को प्रेरित किया। जब मैं यह जानता हूँ कि सब राजनीतिक बन्दियों
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को अपनी पैरवी स्वयं करनी चाहिए, तो यह कुछ विशेष मान्यताओं के साथ कहता
हूँ। मेरा मतलब सिर्फ़ एक ही बात से साफ़ हो सकता है।
एक मनुष्य एक ही विशेष मक़सद को सामने रखकर काम नहीं करता।
उसकी गिरफ़्तारी के बाद उसके काम का राजनीतिक महत्त्व समाप्त नहीं होना
चाहिए और काम की अपेक्षा मरने की तैयारी ही ज़्यादा ज़रूरी नहीं बन जानी
चाहिए। हम इसे उदाहरण की मदद से और साफ़ करें। हरिकृष्ण गवर्नर को गोली
मारने के लिए आये। मैं इस कार्रवाई का नैतिक पक्ष नहीं लेना चाहता। मैं सिर्फ़
इस केस के राजनीतिक पहलू पर विचार करना चाहता हूँ। गोली मारने वाला व्यक्ति
गिरफ़्तार कर लिया गया। दुर्भाग्य से पुलिस-कर्मचारी इस कार्रवाई में मर गया। अब
पैरवी का सवाल सामने आता है। जब गवर्नर बच गया तो हरिकृष्ण के केस में बड़ा
सुन्दर बयान आ सकता था; अर्थात असली तथ्यों का बयान, जैसाकि हमारे केस
में नीचे की अदालत में दिया गया था। इस प्रकार यह क़ानूनी मक़सद को भी पूरा
कर देता और कार्य के उद्देश्य को भी ऊपर उठाता, पर वकील की कोशिश और
क़ाबिलियत सब-इंस्पेक्टर की मौत के बारे में दलीलें देने में उलझी रही। उसे यह
कहकर क्या मिला कि हरिकृष्ण सिर्फ़ गवर्नर को ज़ख़्मी करना चाहता था, मारना
नहीं चाहता था? इसी तरह की दूसरी बातें थीं। क्या कोई समझदार एक क्षण के
लिए भी ऐसी बात की उम्मीद कर सकता है? क्या इस दलील की कोई क़ानूनी
क़ीमत थी? बिल्कुल कोई क़ीमत नहीं, तो फिर गवर्नर पर गोली चलाने के विशेष
कार्य की ही नहीं, बल्कि सारी क्रान्तिकारी लहर की ख़ूबसूरती ख़राब करने से
क्या फ़ायदा था?
प्रतिवाद तथा भावनाएँ ज़्यादा देर तक नहीं चल सकतीं। क्रान्तिकारी दल के
द्वारा सरकार को बहुत समय पहले चेतावनी दी जा चुकी। इसके लिए क्रान्तिकारी
दल को भारत ने बेहद इज़्ज़त दी थी और क्रान्ति की लहर सही स्वरूप में आरम्भ
हो गयी थी। वायसराय की गाड़ी पर बम फेंकने का कार्य एक चेतावनी नहीं था;
भले ही वह असफल रहा। चटगाँव की घटनाएँ न चेतावनी थीं और न केवल
विरोध-प्रदर्शन। इसी तरह हरिकृष्ण का एक्शन अपनेआप में क्रान्तिकारी संघर्ष का
एक हिस्सा था, चेतावनी बिल्कुल नहीं। कार्रवाई की असफलता के बाद अभियुक्त
इस चीज़ को खिलाड़ी की तरह ले सकता है। मक़सद पूरा होने पर सम्भव है
भाग्यवश गवर्नर के बच जाने से हरिकृष्ण प्रसन्न हुआ हो। व्यक्तिगत रूप में किसी
को मारने से कोई लाभ भी नहीं। इन कार्यों का राजनीतिक महत्त्व होता है, ये वह
वातावरण और सोचने का ढंग बनाने में मदद करते हैं जोकि आख़िरी संघर्ष के लिए
बहुत ज़रूरी है। इतना ही पर्याप्त है। व्यक्तिगत कार्य लोगों की सहानुभूति जीतने
के लिए होते हैं। हम कभी-कभी इनको अपने कार्यों के द्वारा प्रोपेगेण्डा का नाम
दे देते हैं।
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इस विचार की रोशनी में क्रान्तिकारी मुक़दमों की पैरवी होनी चाहिए। यह एक
आम समझ वाला नियम है कि संघर्ष करने वाली सभी पार्टियाँ प्राप्त अधिक करना
चाहती हैं और खोना कम। कोई भी जनरल ऐसी युद्धनीति नहीं अपना सकता जिसमें
उसे सोचे हुए लाभ से अधिक बलिदान देना पड़े। मुझसे अधिक कोई भी हरिकृष्ण
के अमूल्य जीवन को बचाने के लिए बेताब नहीं होगा, पर मैं आपको बताना चाहता
हूँ कि जो चीज़ उसकी ज़िन्दगी को अनमोल बनाती है उसे आँख से ओझल नहीं
करना चाहिए। किसी भी क़ीमत पर जीवन को बचाना ही हमारी नीति नहीं है। यह
कांग्रेस की नीति हो सकती है, यह आरामकुर्सियों वाले राजनीतिज्ञों की नीति हो
सकती है, परन्तु यह हमारी नीति नहीं है। बचाव-नीति (डिफ़ेंस पालिसी)
अधिकतर अभियुक्त के अपने सोचने के ढंग पर आधारित होती है, पर यदि
अभियुक्त न सिर्फ़ निडर हो, बल्कि हमेशा की तरह जोशीला भी रहे तो जिस कार्य
के लिए उसने अपनी ज़िन्दगी का ख़तरा मोल लिया उसे बयान में पहले लिया
जाना चाहिए और व्यक्तिगत मसलों को बाद में। इसके बाद भी एक तरह की
उलझन भरी स्थिति हो सकती है क्योंकि कुछ ऐसे केस हो सकते हैं जिनमें
स्थानीय महत्त्व के होने पर भी कार्रवाई (एक्शन) का आम महत्त्व न हो। वहाँ
अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने में अभियुक्त को भावुक नहीं होना चाहिए।
निर्मलकान्त राय का मशहूर मुक़दमा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, परन्तु इस
तरह के राजनीतिक महत्त्व के केस में व्यक्तिगत पहलू को राजनीतिक पहलू से
अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आप मेरा निष्पक्ष मत प्रस्तुत केस के
बारे में पूछना चाहते हैं तो मैं साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ कि यह ऐतिहासिक
महत्त्व की राजनीतिक हत्या बिल्कुल नहीं है।
यहाँ मैं एक बात अवश्य बताना चाहता हूँ कि इस केस का गला घोंटने वाले
लोग – जिन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया है और उसके बाद जो समझदार
बन गये हैं, लेकिन अपने कन्धों पर उत्तरदायित्व लेने का हौसला नहीं कर पा रहे
हैं – हमारे नौजवान साथी के चमत्कारी चरित्र के सौन्दर्य को नीचा दिखाने की
कोशिश कर रहे हैं। मैंने उन्हें यह कहते सुना है कि हरिकृष्ण बहादुरी से सामना
करने में काँप गया है यह एक हद दर्जे का शर्मनाक झूठ है। मुझे उस जैसा हौसले
वाला नौजवान कभी कोई नहीं मिला। लोगों को हमारे ऊपर मेहरबानी करनी चाहिए।
हौसला पस्त करने और नीचा दिखाने से तो अच्छा है कि वे हमारी तरफ़ ध्यान
ही न दें।
वकीलों को उन नौजवानों की ज़िन्दगियाँ, यहाँ तक कि मौतों को ख़राब करने
में इतने आत्महीन विशेषज्ञ (बेज़मीरे एक्सपर्ट) नहीं होना चाहिए, जो दुखी जनता
की मुक्ति के पवित्र काम में अपना आपा न्योछावर करने के लिए आते हैं। मुझे
यह जानकर सचमुच बहुत दुख होता है कि धीरे-धीरे हम राजनीतिक कार्यकर्ताओं
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की एक नयी अफ़सरशाही बना रहे हैं। यह बात ठीक नहीं है तो भला एक वकील
किसी राजनीतिक मुक़दमे में यक़ीन न आने वाली फ़ीस क्यों माँगे, जैसाकि इस
केस में फ़ीस दी गयी है।
राजद्रोह के केसों में मैं वह हद बता सकता हूँ जिस तक हम पैरवी की इजाज़त
दे सकते हैं। गत वर्ष जब एक साथी पर समाजवादी भाषण देने का मुक़दमा चला
और उसे ग़लत ढंग पर लड़ा गया तो हमें केवल हैरानगी ही हुई थी। ऐसे केसों
में हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और
स्वतन्त्र भाषण का अधिकार माँगना चाहिए, परन्तु कहाँ यह बात और कहाँ यह
कहना कि हमने कुछ कहा ही नहीं! हम इस तरह अपने ही आन्दोलन के हितों
के विरुद्ध जाते हैं। कांग्रेस को मौजूदा आन्दोलन में बिना मुक़दमों की पैरवी किये
जेल जाने से नुक़सान पहुँचा है। मेरे विचार में यह एक ग़लती थी।
ख़ैर, मेरा ख़याल है कि आप मेरा यह पत्र पिछले पत्र के साथ पढ़ेंगे और
राजनीतिक मुक़दमों की पैरवी के बारे में मेरे विचारों से अच्छी तरह परिचित हो
जायेंगे। हरिकृष्ण के केस में मेरे ख़याल में जल्दी से जल्दी हाईकोर्ट में अपील कर
देनी चाहिए और उसको बचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए। मुझे आशा है कि
मेरे ये दोनों पत्र प्रत्येक बात आपको बता देंगे, जो मैं आपको बताना चाहता हूँ।
आपका
भगतसिंह
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गाँधीजी के नाम
सुखदेव की खुली चिट्ठी
गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गयी
थी जो गाँधीजी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’ 30 अप्रैल, 1931 के अंक में
प्रकाशित हुई थी। — स.
परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की
सफलता के बाद आपने क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल अपना आन्दोलन
बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आज़मा देखने का आख़िरी मौक़ा
देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं। वस्तुतः किसी आन्दोलन को बन्द करना
केवल आदर्श या भावना से होने वाला काम नहीं है। भिन्न-भिन्न अवसरों की
आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए
विवश करता है।
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए
भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अन्तिम समझौता
न होगा। मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ
गये होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई
यह न मानेगा कि हम मंज़िले-मकसूद पर पहुँच गये हैं। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक
न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव
से बँधी हुई है। उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ़
कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के
लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा
विश्राम है। इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की
कल्पना की जा सकती है और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है।
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्तें
ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआओं का है। लाहौर वाले प्रस्ताव के
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रहते हुए भी आपने फ़िलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो
भी वह प्रस्ताव तो क़ायम ही है। इसी तरह ‘हिन्दुस्तानी सोशियलिस्ट रिपब्लिकन
पार्टी’ के नाम से ही साफ़ पता चलता है कि क्रान्तिकारियों का आदर्श
समाज-सत्तावादी प्रजातन्त्र की स्थापना करना है। यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नहीं
है। उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने
के लिए बँधे हुए हैं। परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे
अपनी युद्धनीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे। क्रान्तिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौक़ों
पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है। कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी
केवल आन्दोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन
जाता है। ऐसी दशा में क्रान्तिकारियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए
विशेष कारण होने चाहिए। परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया।
निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रान्तिकारी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं
सकता।
आपके समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया है, और
फलस्वरूप आपके सब क़ैदी रिहा हुए हैं। पर क्रान्तिकारी क़ैदियों का क्या? 1915
ई. से जेलों में पड़े हुए ग़दर-पक्ष के बीसों क़ैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर
भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं। मार्शल लॉ के बीसों क़ैदी आज भी ज़िन्दा क़ब्रों
में दफ़नाये पड़े हैं। यही हाल बब्बर अकाली क़ैदियों का है। देवगढ़, काकोरी,
मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यन्त्र के क़ैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बन्द
पड़े हुए बहुतेरे क़ैदियों में से कुछ हैं। लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता
और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यन्त्र के मामले चल रहे हैं।
बहुसंख्यक क्रान्तिवादी भागते फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं। सचमुच आधी
दर्जन से अधिक क़ैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं। इन सबका क्या?
लाहौर षड्यन्त्र केस के सज़ायाफ़्ता तीन क़ैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गये हैं और
जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रान्तिवादी दल
का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं। उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न
नहीं है। सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने
से ही अधिक लाभ होने की आशा है।
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते
हैं। वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है। ऐसी
दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को
कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके
दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है। यदि ऐसी बात नहीं
है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रान्तिकारियों के पास
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जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते। अपना आन्दोलन बन्द करने
के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धि की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए
था। मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं
कि क्रान्तिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनन्द मानने वाले हैं। मैं आपको
कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक इसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से
पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो ज़िम्मेदारी अपने
माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख़याल होता है। और, क्रान्ति के कार्य में दूसरे
किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्त्व का मानते हैं,
हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा
और कोई चारा उनके लिए नहीं है।
उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने
आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें
कुचल डाला जाये। अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता
है। ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी
भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रान्तिकारियों को कुचल डालने
में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी।
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्रान्तिकारी नेताओं
से बातचीत कीजिये – उनमें से कई जेलों में हैं – और उनके साथ सुलह कीजिये
या ये सब प्रार्थनाएँ बन्द रखिये। कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से कोई एक
रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिये। अगर आप उनकी मदद न
कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें। उन्हें अलग रहने दें। वे अपनी
हिफ़ाज़त आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं। वे जानते हैं कि भावी राजनीतिक
युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रान्तिकारी पक्ष को ही मिलने वाला है। लोकसमूह उनके
आस-पास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जनसमूह को अपने
झण्डे तले, समाज-सत्ता प्रजातन्त्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे।
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका
दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी
तफ़सीलवार चर्चा कर लीजिये।
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार
सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे।
आपका,
अनेकों में से एक
392 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
IX.
क्रान्तिकारी जीवन की तस्वीर :
पत्रों के आईने में
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मित्र अमरचन्द को लिखा
भगतसिंह का पत्र
भगतसिंह ने यह पत्र अपने मित्र अमरचन्द को 1927 में लिखा था जो उस समय
अमेरिका में पढ़ रहे थे। – स.
प्यारे भाई अमरचन्द जी,
नमस्ते।
अर्ज़ है कि इस दफ़ा अचानक माँ के बीमार होने पर इधर आया और आपकी
मोहतरिमा वाल्दा (आदरणीया माँ) के दर्शन हुए। आपका ख़त पढ़ा। इनके लिए
यह ख़त लिखा। साथ ही दो-चार अल्फ़ाज़ लिखने का मौक़ा मिल गया। क्या
लिखूँ, करम सिंह विलायत गया है, उसका पता भेजा जा रहा है। अभी तो उसने
लिखा है कि लॉ पढ़ेगा, मगर कैसे चल रहा है, सो खुदा जाने, ख़र्च बहुत ज़्यादा
हो रहा है।
भाई, हमारी मुमालिक गैर (विदेश) में जाकर तालीम हासिल करने की
ख़्वाहिश खूब पायमाल (बरबाद) हुई। अच्छा, तुम्हीं लोगों को सब मुबारक़, कभी
मौक़ा मिले तो कोई अच्छी-अच्छी कुतब (पुस्तकें) भेजने की तकलीफ़ उठाना।
आख़िर अमेरिका में लिट्रेचर तो बहुत है। ख़ैर, अभी तो अपनी तालीम में बुरी तरह
फँसे हुए हो।
सानफ़्रांसिस्को वग़ैरह की तरफ़ से सरदारजी (अजीत सिंह जी) का शायद
कुछ पता मिल सके। कोशिश करना। कम अज़ कम ज़िन्दगी का यक़ीन तो हो
जाये। मैं अभी लाहौर जा रहा हूँ। कभी मौक़ा मिले तो ख़त तहरीर फ़रमाइयेगा। पता
सूत्र मण्डी लाहौर होगा। और क्या लिखूँ? कुछ लिखने को नहीं है। मेरा हाल भी
खूब है। बारहा (कई बार) मुसायब (मुसीबतों) का शिकार होना पड़ा। आख़िर
केस वापस ले लिया गया। बादवाँ (बाद में) फिर गिरफ़्तार हुआ। साठ हज़ार की
जमानत पर रिहा हूँ। अभी तक कोई मुक़दमा मेरे ख़िलाफ़ तैयार नहीं हो सका और
ईश्वर ने चाहा तो हो भी नहीं सकेगा। आज एक बरस होने को आया, मगर जमानत
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 395
वापस नहीं ली गयी। जिस तरह ईश्वर को मंजूर होगा। ख़्वाहमख़्वाह तंग करते
**हैं।**¹ भाई, ख़ूब दिल लगाकर तालीम हासिल करते चले जाओ।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
अपने मुताल्लिक और क्या लिखूँ, ख़्वाहमख़्वाह शक का शिकार बना हुआ
हूँ। मेरी डाक रुकती है। ख़तूत (पत्र) खोल लिये जाते हैं। न जाने मैं कैसे इस क़दर
शक की निगाह से देखा जाने लगा। ख़ैर भाई, आख़िर सच्चाई सतह पर आयेगी
और इसी की फतह होगी।
1 काले अक्षरों में दिये शब्द लिखकर काट दिये गये हैं। – स.
396 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सुखदेव के नाम
भगतसिंह का पत्र
मार्च, 1929 में पब्लिक सेफ़्टी बिल को असेम्बली में भारतीय सदस्यों द्वारा रद्द
करने पर दोबारा लाया गया। यद्यपि बिल मतगणना से पास नहीं हो सकता था, तो
भी वायसराय उसे आर्डिनेंस द्वारा लागू करना चाहते थे। राष्ट्रीय नेता एक बार फिर
ब्रिटिश सरकार की ताक़त के सामने लाचारी और अप्रभावी होने की स्थिति पेश कर
रहे थे। ऐसे समय पर भगतसिंह ने सुझाव दिया कि असेम्बली हॉल में बम का धमाका
किया जाये और क्रान्तिकारी पार्टी के विचारों से जनता को शिक्षित किया जाये। इसके
लिए दो साथियों – शिव वर्मा और जयदेव कपूर को चुना गया। सुखदेव उस मीटिंग
में नहीं थे। जब उन्हें इस फ़ैसले की जानकारी हुई तो उन्होंने भगतसिंह से कुछ ऐसे
सवाल किये कि पार्टी की मीटिंग दोबारा बुलायी गयी। इस मीटिंग में भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त को असेम्बली हॉल में बम का धमाका करने के लिए चुना गया। 8
अप्रैल, 1929 को हॉल में बम का धमाका किया गया।
सुखदेव और भगतसिंह में काफ़ी घनिष्ठता थी और बमकाण्ड में जाने वाले
व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ ग़लतफ़हमी भी हुई। उसी ग़लतफ़हमी को दूर करने
के लिए भगतसिंह ने सुखदेव को एक पत्र लिखा। नीचे उद्धृत यह पत्र 11 अप्रैल,
1929 को सुखदेव की गिरफ़्तारी के समय उनसे बरामद हुआ और मुक़दमे की
कार्रवाई का हिस्सा बन गया। – स.
प्रिय भाई,
जब तक तुम्हें यह ख़त मिलेगा, मैं दूर मंज़िल की ओर जा चुका होऊँगा। मेरा
यक़ीन कर, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित्त अपने आख़िरी सफ़र के लिए तैयार हूँ।
अपनी ज़िन्दगी की सारी खुशियों और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल में एक बात
आज तक चुभती रही। वह यह कि मुझे भाई ने ग़लत समझा और मुझ पर कमज़ोरी
का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया। आज मैं पहले से कहीं ज़्यादा पूरी तरह से
सन्तुष्ट हूँ। मैं आज भी महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नहीं, बस
ग़लतफ़हमी थी। ग़लत शक था। मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 397
गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमज़ोरी माना गया। लेकिन आज
मैं महसूस कर रहा हूँ कि कोई ग़लतफ़हमी नहीं, मैं कमज़ोर नहीं, अपनों में से
किसी से भी कमज़ोर नहीं।
भाई मेरे, मैं साफ़ दिल से विदा लूँगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूँगा। इसमें
तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी। ध्यान रहे, तुम्हें जल्दबाज़ी से कोई क़दम नहीं उठाना
चाहिए। सोच-समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना। अवसर पा लेने की
जल्दबाज़ी न करना। जनता के प्रति जो तुम्हारा फ़र्ज़ है उसे निभाते हुए काम को
सावधानीपूर्वक करते रहना। सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि शास्त्री मुझे
पहले से अधिक अच्छा लग रहा है। मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता, बशर्ते
कि वह साफ़गोई से अपनेआप को एक अँधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए
सहमत हो। उसे साथियों के नज़दीक आने दो ताकि वह उनके आचार-विचार का
अध्ययन कर सके। यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफ़ी लाभदायक और
मूल्यवान सिद्ध होगा। लेकिन जल्दबाज़ी न करना। तुम स्वयं अच्छे पारखी हो। जिस
तरह जँचे, देख लेना। आ मेरे भाई, अब हम खुशियाँ मना लें।
खैर, मैं कह सकता हूँ कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किये
बिना नहीं रहा जाता। मैं पुरज़ोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर
जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, लेकिन वक्त आने पर मैं सबकुछ कुर्बान
कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है। ये वस्तुएँ मनुष्य की राह में कभी भी
अवरोध नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह इन्सान हो। जल्द ही तुम्हें इसका प्रमाण
मिल जायेगा। किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय
होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इन्सान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका
जवाब मैं आज देता हूँ – हाँ वह मेजिनी था, तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने
पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालने वाली हार का दुख और दिवंगत
साथियों की याद – यह सब वह बरदाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता
या खुदकशी कर लेता। लेकिन प्रेमिका के एक पत्र से वह दूसरों जितना ही नहीं,
बल्कि सबसे अधिक मज़बूत हो गया।
जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का सम्बन्ध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह
अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नहीं और यह पशुवृत्ति नहीं बल्कि मधुर
मानवीय भावना है। प्यार सदैव मानव चरित्र को ऊँचा करता है, कभी भी नीचा
नहीं दिखाता बशर्ते कि प्यार प्यार हो। इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी
पागल नहीं कहा जा सकता है जैसाकि हम फ़िल्मों में देखते हैं – वे सदैव
पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी भी सृजित नहीं किया जा
सकता। यह अपने ही आप आता है – कब, कोई कह नहीं सकता?
मैं यह कह सकता हूँ कि नौजवान युवक-युवती आपस में प्यार कर सकते
398 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं। अपनी पवित्रता
क़ायम रखे रह सकते हैं। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने प्यार को
मानवीय कमज़ोरी कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नहीं कहा था,
जहाँ तक कि बौद्धिक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते हैं पर वह सबसे उच्च आदर्श
स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओं पर नियन्त्रण पा लेगा।
जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनायेगा। एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति
से प्यार की मैंने निन्दा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर। मनुष्य के पास
प्यार की एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित
न करके सर्वव्यापी बना दे।
मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफ़ी स्पष्ट कर दिया है। हाँ, एक बात मैं
तुम्हें ख़ासतौर पर बताना चाहता हूँ कि बावजूद क्रान्तिकारी विचारों के हम नैतिकता
सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नहीं अपना सके। क्रान्तिकारी बातें करके
इस कमज़ोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन
में हम तुरन्त ही थर-थर काँपना शुरू कर देते हैं।
मैं तुमसे अर्ज़ करूँगा कि यह कमज़ोरी त्याग दो। अपने मन में बिना कोई ग़लत
भावना लाये अत्यन्त नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूँ कि तुममें जो
अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा-सा कम कर दो। जो पीछे रहेंगे और मेरी जैसी बीमारी
का शिकार होंगे, उनसे बेरुख़ी का व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दों
को न बढ़ाना, क्योंकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की ज़रूरत है। क्या मैं यह आशा रखूँ
कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे,
उनको इसकी बहुत ज़रूरत है। तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब
तक कि स्वयं इस चीज़ का शिकार न बनो। लेकिन मैं यह सबकुछ क्यों लिख
रहा हूँ? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिल
खोल दिया है।
तुम्हारी सफलताओं और जीवन के लिए शुभकामनाओं के साथ।
तुम्हारा,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 399
पिता के नाम भगतसिंह का पत्र
यह पत्र भगतसिंह ने असेम्बली हॉल में बम फेंकने के बाद दिल्ली जेल से अपने
पिता जी को लिखा था। – स.
दिल्ली जेल, 26 अप्रैल, 1929
पूज्य पिता जी,
अर्ज़ यह है कि हम लोग 22 अप्रैल को पुलिस की हवालात में दिल्ली जेल
में तब्दील कर दिये गये हैं। लगभग एक महीने में सारा नाटक समाप्त हो जायेगा।
ज़्यादा चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं। मुझे पता चला था कि आप यहाँ आये थे
और किसी वकील आदि से बातचीत की थी, लेकिन कोई इन्तज़ाम न हो सका।
परसों मुझे कपड़े मिल गये थे। जिस दिन आप आयेंगे अब मुलाक़ात हो जायेगी।
वकील आदि की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है। हाँ, एक-दो नुत्तों पर थोड़ा-सा
मशवरा लेना चाहता हूँ, लेकिन वे कोई ख़ास महत्त्व नहीं रखते। आप बिना वजह
ज़्यादा कष्ट न करें। अगर आप मिलने आयें तो अकेले ही आना। बेबे जी (माँ)
को साथ न लाना। ख़ामख़ाह में वे रो पड़ेंगी और मुझे भी कुछ तकलीफ़ ज़रूर
होगी। घर के सब हालात आपसे मुलाक़ात पर मालूम हो जायेंगे। हाँ, अगर सम्भव
हो तो ‘गीता रहस्य’, ‘नेपोलियन की जीवनगाथा’ जो आपको मेरी किताबों में से
मिल जायेंगी और अंग्रेज़ी के कुछ अच्छे उपन्यास लेते आना। बेबे जी (माँ),
मामी जी, माता जी और चाची जी को चरणस्पर्श। कुलबीर सिंह, कुलतार सिंह
को नमस्ते। बापू जी को चरणस्पर्श। इस समय पुलिस हवालात और जेल में हमसे
बहुत अच्छा व्यवहार हो रहा है। आप किसी क़िस्म की फ़िक्र न करना। मुझे
आपका पता नहीं मालूम, इसलिए इस पते पर लिख रहा हूँ।
आपका आज्ञाकारी,
भगतसिंह
400 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सुखदेव को भूख हड़ताल के दौरान
भगतसिंह का एक और पत्र
भूख हड़ताल शुरू होने के बाद भारतीय जनता की चेतना में भगतसिंह व
बटुकेश्वर दत्त गहरे उतरते गये। भगतसिंह के शब्दों में 'हमारा कष्ट सहना फलीभूत
हुआ। सारे देश में एक जन-आन्दोलन छिड़ गया। हम अपने लक्ष्य में सफल रहे।'
13 सितम्बर, 1929 को यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद
हो गये। जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था तो हर
बड़े शहर के स्टेशन पर लाखों की भीड़ उनके अन्तिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़ती
थी। कलकत्ता में 4 लाख लोग उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुए।
इन दिनों भगतसिंह अपने किन विचारों के माध्यम से अपनी सारी लड़ाई लड़
रहे थे, इसका स्पष्ट पता उस पत्र में चलता है, जो उन्होंने सुखदेव के साथ चल
रहे विचार-संघर्ष के सन्दर्भ में लिखा था। खेद है कि सुखदेव के जिस पत्र के उत्तर
में भगतसिंह ने यह महत्त्वपूर्ण ख़त लिखा था, वह आज उपलब्ध नहीं है। फिर भी
विचार और बहस के अन्तर्गत आने वाले प्रायः सभी बिन्दु यहाँ स्पष्ट हैं। – स.
कष्टों से भागना कायरता है
प्रिय भाई,
मैंने आपके पत्र को कई बार ध्यानपूर्वक पढ़ा। मैं अनुभव करता हूँ कि बदली
हुई परिस्थितियों ने हम पर अलग-अलग प्रभाव डाला है। जिन बातों से जेल के
बाहर घृणा करते थे, वे आपके लिए अब अनिवार्य हो चुकी हैं। इसी प्रकार मैं जेल
से बाहर जिन बातों का विशेष रूप से समर्थन करता था, वे अब मेरे लिए विशेष
महत्त्व नहीं रखतीं। उदाहरणार्थ, मैं व्यक्तिगत प्रेम को विशेष रूप से मानने वाला
था, परन्तु अब इस भावना का मेरे हृदय एवं मस्तिष्क में कोई विशेष स्थान नहीं
रहा। बाहर आप इसके कड़े विरोधी थे, परन्तु इस सम्बन्ध में अब आपके विचारों
में भारी परिवर्तन एवं क्रान्ति आ चुकी है। आप इसे मानव-जीवन का एक अत्यन्त
आवश्यक एवं अनिवार्य अंग अनुभव करते हैं और अनुभूति से आपको एक प्रकार
का आनन्द भी प्राप्त हुआ है।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 401
आपको याद होगा कि एक दिन मैंने आत्महत्या के विषय में आपसे चर्चा की
थी। तब मैंने आपको बताया था, कई परिस्थितियों में आत्महत्या उचित हो सकती
है, परन्तु आपने मेरे इस दृष्टिकोण का विरोध किया था। मुझे उस चर्चा का समय
एवं स्थान भली प्रकार याद है। हमारी यह बात शहंशाही कुटिया में शाम के समय
हुई थी। आपने मज़ाक़ के रूप में हँसते हुए कहा था कि इस प्रकार की कायरता
का कार्य कभी उचित नहीं माना जा सकता। आपने कहा था कि इस प्रकार का
कार्य भयानक और घृणित है, परन्तु इस विषय पर भी मैं देखता हूँ कि आपकी
राय बिल्कुल बदल चुकी है। अब आप उसे कुछ अवस्थाओं में न केवल उचित,
वरन अनिवार्य एवं आवश्यक अनुभव करते हैं। मेरी इस विषय में अब वही राय
है, जो पहले आपकी थी, अर्थात् आत्महत्या एक घृणित अपराध है, यह पूर्णतः
कायरता का कार्य है। क्रान्तिकारी का तो कहना ही क्या, कोई भी मनुष्य ऐसे कार्य
को उचित नहीं ठहरा सकता।
आप कहते हैं कि आप यह नहीं समझ सके कि केवल कष्ट-सहन करने से
आप अपने देश की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं। आप जैसे व्यक्ति की ओर
से ऐसा प्रश्न करना बड़े आश्चर्य की बात है; क्योंकि नौजवान भारत सभा के ध्येय
‘सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना’ को हमने सोच-समझकर
कितना प्यार किया था। मैं यह समझता हूँ कि आपने अधिक से अधिक सम्भव
सेवा की। अब वह समय है कि जो कुछ आपने किया है, उसके लिए कष्ट उठायें।
दूसरी बात यह है कि यही वह अवसर है, जब आपको सारी जनता का नेतृत्व करना
है।
मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है, जैसेकि हमने
लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेंकने का कार्य किया था। कार्य करने के पश्चात
उसका परिणाम और उसका फल भोगने की बारी आती है। क्या आपका यह विचार
है कि यदि हमने दया के लिए गिड़गिड़ाते हुए दण्ड से बचने का प्रयत्न किया
होता, तो हमारा यह कार्य उचित होता? नहीं, इसका प्रभाव लोगों पर उल्टा होता।
अब हम अपने लक्ष्य में पूर्णतया सफल हुए हैं।
बन्दी होने के समय हमारी संस्था के राजनीतिक बन्दियों की दशा अत्यन्त
दयनीय थी। हमने उसे सुधारने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मैं आपको पूरी
गम्भीरता से बताता हूँ कि हमें यह विश्वास था कि हम बहुत कम समय के भीतर
ही मर जायेंगे। हमें उपवास की स्थिति में कृत्रिम रीति से भोजन दिये जाने का न
तो ज्ञान ही था, न हमें यह विचार सूझता ही था। हम तो मृत्यु के लिए तैयार थे।
क्या आपका यह अभिप्राय है कि हम आत्महत्या करना चाहते थे? नहीं, प्रयत्नशील
होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं
कही जा सकती। हमारे मित्र (श्री यतीन्द्रनाथ दास) की मृत्यु तो स्पृहणीय है। क्या
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आप इसे आत्महत्या कहेंगे? हमारा कष्ट सहन करना फलीभूत हुआ। समस्त देश
में एक विराट और सर्वव्यापी आन्दोलन शुरू हो गया। हम अपने लक्ष्य में सफल
हुए। इस प्रकार के संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है।
इसके अतिरिक्त हममें से जिन लोगों को यह विश्वास है कि उनको
मृत्युदण्ड दिया जायेगा, उनको धैर्यपूर्वक उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब
यह सज़ा सुनायी जायेगी और तत्पश्चात उन्हें फाँसी दी जायेगी। यह मृत्यु भी
सुन्दर होगी, परन्तु आत्महत्या करना, केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने
जीवन को समाप्त कर देना, तो कायरता है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि
विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं। मैं और आप, वरन मैं कहूँगा,
हममें से किसी ने भी किंचित कष्ट सहन नहीं किया है। हमारे जीवन का यह
भाग तो अभी आरम्भ होता है।
आपको यह याद होगा कि अनेक बार इस विषय पर हमने बातचीत की है
कि रूसी साहित्य में प्रत्येक स्थान पर जो वास्तविकता मिलती है, वह हमारे
साहित्य में कदापि नहीं दिखायी देती। हम उनकी कहानियों में कष्टों और दुखदायी
स्थितियों को बहुत पसन्द करते हैं, परन्तु कष्ट-सहन की उस भावना को अपने
भीतर अनुभव नहीं करते। हम उनके उन्माद और उनके चरित्र की असाधारण
ऊँचाइयों के प्रशंसक हैं, परन्तु इसके कारणों पर सोच-विचार करने की कभी चिन्ता
नहीं करते। मैं कहूँगा कि केवल विपत्तियाँ सहन करने के उल्लेख ने ही उन
कहानियों में सहृदयता, दर्द की गहरी टीस और उनके चरित्र तथा साहित्य में ऊँचाई
उत्पन्न की है। हमारी दशा उस समय दयनीय और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम
अपने जीवन में अकारण ही रहस्यवाद प्रविष्ट कर लेते हैं, यद्यपि इसके लिए कोई
प्राकृतिक या ठोस आधार नहीं होता। हमारे जैसे व्यक्तियों को, जो प्रत्येक दृष्टि से
क्रान्तिकारी होने का गर्व करते हैं, सदैव हर प्रकार से उन विपत्तियों, चिन्ताओं, दुखों
और कष्टों को सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए जिनको हम स्वयं आरम्भ
किये संघर्ष के द्वारा आमन्त्रित करते हैं एवं जिनके कारण हम अपनेआप को
क्रान्तिकारी कहते हैं।
मैं आपको बताना चाहता हूँ कि जेलों में और केवल जेलों में ही कोई व्यक्ति
अपराध एवं पाप जैसे महान सामाजिक विषय का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का अवसर
पा सकता है। मैंने इस विषय का कुछ साहित्य पढ़ा है और जेलें ही ऐसे विषयों
का स्वाध्याय करने के सबसे अधिक उपयुक्त स्थान हैं। स्वाध्याय का सर्वश्रेष्ठ भाग
है : स्वयं कष्टों को सहना।
आप भली प्रकार जानते हैं कि रूस में राजनीतिक बन्दियों का बन्दीगृहों में
विपत्तियाँ सहन करना ही ज़ारशाही का तख़्ता उलटने के पश्चात उनके द्वारा जेलों
के प्रबन्ध में क्रान्ति लाये जाने का सबसे बड़ा कारण था। क्या भारत को ऐसे
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व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं है, जो इस विषय से पूर्णतया परिचित हों और इस
समस्या का निजी अनुभव रखते हों। केवल यह कह देना कि दूसरा कोई इस काम
को कर लेगा या इस कार्य को करने के लिए बहुत लोग हैं, किसी प्रकार भी उचित
नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार जो लोग क्रान्तिकारी क्षेत्र के कार्यों का भार दूसरे
लोगों पर छोड़ने को अप्रतिष्ठापूर्ण एवं घृणित समझते हैं, उन्हें पूरी लगन के साथ
वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर देना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे उन
विधियों का उल्लंघन करें, परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि
अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता। इस प्रकार
का आन्दोलन क्रान्ति के कार्यकाल को बहुत सीमा तक कम कर देगा। जितने
आन्दोलन अब तक आरम्भ हुए हैं, उन सबसे पृथक रहने के लिए आपने जो तर्क
दिये हैं, मैं उन्हें समझने में असमर्थ हूँ। कुछ मित्र ऐसे हैं, जो या तो मूर्ख हैं या
नासमझ। वे आपके इस व्यवहार को (जिसे वे स्वयं कहते हैं कि हमें किंचित भी
नहीं समझ सकते, क्योंकि आप उनसे बहुत ऊँचे और उनकी समझ से बहुत परे
हैं) अनोखा और अद्भुत समझते हैं।
वास्तव में यदि आप यह अनुभव करते हैं कि बन्दीगृह का जीवन वास्तव में
अपमानपूर्ण है, तो आप उसके विरुद्ध आन्दोलन करके उसे सुधारने का प्रयास क्यों
नहीं करते? सम्भवतया आप यह कहेंगे कि यह संघर्ष सफल नहीं हो सकता, परन्तु
यह तो वही तर्क है, जिसकी आड़ लेकर साधारणतया निर्बल लोग प्रत्येक
आन्दोलन से बचना चाहते हैं। यह वह उत्तर है, जिसे हम उन लोगों से सुनते रहे
हैं, जो जेल से बाहर क्रान्तिकारी प्रयत्नों में सम्मिलित होने से जान बचाना चाहते
थे। क्या आज यही उत्तर मैं आपके मुख से सुनूँगा? कुछ मुट्ठीभर कार्यकर्ताओं के
आधार पर संगठित हमारी पार्टी अपने लक्ष्यों और आदर्शों की तुलना में क्या कर
सकती थी? क्या हम इससे यह निष्कर्ष निकालें कि हमने इस काम के प्रारम्भ
करने में नितान्त भूल की है? नहीं, इस प्रकार का परिणाम निकालना उचित नहीं
होगा। इससे तो उस व्यक्ति की भीतरी निर्बलता प्रकट होती है; जो इस प्रकार
सोचता है।
आगे चलकर आप लिखते हैं कि चौदह वर्ष तक बन्दीगृह के कष्टों से भरपूर
जीवन बिताने के पश्चात किसी व्यक्ति से यह आशा नहीं की जा सकती कि उस
समय भी उसके विचार वही होंगे, जो जेल से पूर्व थे, क्योंकि जेल का वातावरण
उसके समस्त विचारों को रौंदकर रख देगा। क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ कि क्या
जेल से बाहर का वातावरण हमारे विचारों के अनुकूल था? फिर भी असफलताओं
के कारण क्या हम उसे छोड़ सकते थे? क्या आपका आशय यह है कि यदि हम
इस क्षेत्र में न उतरे होते, तो कोई भी क्रान्तिकारी कार्य कदापि नहीं हुआ होता?
यदि ऐसा है तो आप भूल कर रहे हैं। यद्यपि यह ठीक है कि हम भी वातावरण
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