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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 788 में से

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पृष्ठ 423

पिता जी के नाम भगतसिंह का पत्र
30 सितम्बर, 1930 को भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल को
एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की माँग की। सरदार किशन
सिंह स्वयं देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे। उन्हें व कुछ
अन्य देशभक्तों को लगता था कि शायद बचाव-पक्ष पेश कर भगतसिंह को फाँसी
के फन्दे से बचाया जा सकता है, लेकिन भगतसिंह और उनके साथी बिल्कुल अलग
नीति पर चल रहे थे। उनके अनुसार, ब्रिटिश सरकार बदला लेने की नीति पर चल
रही है व न्याय सिर्फ़ ढकोसला है। किसी भी तरीक़े से उसे सज़ा देने से रोका नहीं
जा सकता। उनका मानना था कि उनका नाम भारतीय क्रान्ति का प्रतीक बन गया
है और अपनी कुर्बानी से वे जनता में इन्क़लाबी भावनाएँ जगाना चाहते थे। पिता द्वारा
दी गयी अर्ज़ी से भगतसिंह की भावनाओं को ठेस लगी थी, लेकिन अपनी भावनाओं
को नियन्त्रित कर अपने उसूलों पर ज़ोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर, 1930 को यह
पत्र लिखा जो उनके पिता को देर से मिला। 7 अक्टूबर, 1930 को मुक़दमे का
फ़ैसला सुना दिया गया। – स.
4 अक्टूबर, 1930
पूज्य पिता जी,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल
ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा है। यह ख़बर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे
ख़ामोशी से बरदाश्त नहीं कर सका। इस ख़बर ने मेरे भीतर की शान्ति भंग कर
उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियों में और
इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं?
आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान
करता हूँ लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूँ कि आपको मेरे साथ सलाह-मशवरा
किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था। आप जानते हैं कि राजनीतिक
क्षेत्र में मेरे विचार आपसे काफ़ी अलग हैं। मैं आपकी सहमति या असहमति का
ख़याल किये बिना सदा स्वतन्त्रतापूर्वक काम करता रहा हूँ।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 417