भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
कुछ को क़ैद कर दिया और बात ख़त्म हुई।
लेकिन झटपट अगले ही बरस 1915 में फिर पंजाब में ग़दर की तैयारियाँ
नज़र आती थीं। तब दो बातें थीं – एक तो लड़ाई छिड़ गयी (प्रथम महायुद्ध –
अनु.); दूसरे, सरकार ने कामागाटामारूवालों पर अत्याचार किया। वे भी अमेरिका
से, बेचारे विचार ही लेकर आये थे। लेकिन पंजाब में रहने वाले कितने लोगों ने
उनका साथ दिया? सिवाय 1907 के कुछ आदमियों के कितने लोग थे उनके
साथ? ख़ैर, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप में क्रान्तिकारी विचारों के विकास
व प्रचार का कुछ वर्णन करने का यत्न किया है और यदि मुझे समय मिला तो
एक लम्बा लेख लिखकर अन्य देशों के विस्तृत हाल समेत इसका वर्णन करने का
यत्न करूँगा।
(एक अख़बार से)
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 235
तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र
जनवरी, 1928 में जब शहीद भगतसिंह के दो लेख 'किरती' में छपे तो उनके
साथ एक लेख 'तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र' नाम से भी छपा। इसके लेखक का नाम
नहीं दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ सरकार किस तरह के तरीक़े इस्तेमाल कर क्रान्तिकारी
आन्दोलन के ख़िलाफ़ प्रचार करती थी, यह लेख इस सम्बन्ध में अच्छी जानकारी
देता है। – स.
अख़बार पढ़ने-सुनने वाले लोग इस बात से परिचित हैं कि ऐसी ख़बरें अक्सर
छपती ही रहती हैं कि हिन्द में आज फ़लाँ जगह अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़
षड्यन्त्र का पता पुलिस ने लगाया है। और फ़लाँ स्थान पर षड्यन्त्र का मुक़दमा
चलाया गया है। आज फ़लाँ जगह षड्यन्त्रकारियों को फाँसी दी गयी है। अभी ही
एक ख़बर छपी है कि एक ऐसे षड्यन्त्र का मुक़दमा चलने वाला है जिसमें चारों
उत्तरी प्रान्त लपेटे जायेंगे। ऐसी ख़बरें पढ़कर आम भोले-भाले लोग इन षड्यन्त्रों
सम्बन्धी अपने दिल में बड़े बुरे विचार रखने लगते हैं। वास्तव में उन्हें इन षड्यन्त्रों
से सम्बन्धी कोई जानकारी नहीं होती, जिससे इस विषय पर प्रकाश डालना ज़रूरी
है। जिस तरह रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने की वास्तविकता से
कोई इन्कार नहीं कर सकता, उसी तरह की वास्तविकता इस कथन में है कि
हिन्दुस्तान इस गुलामी को उतारकर आज़ाद हो जायेगा। यह बात अलग है कि इस
मनोरथ को पूरा करने में समय कम या ज़्यादा लगे, और मूल्य भी महँगा ही देना
पड़े। यही वास्तविकता मज़दूर वर्ग सम्बन्धी है कि आज वह भी पूँजीपतियों की
गुलामी का जुआ उतारकर ही रहेगा।
आज़ादी के आन्दोलन दुनिया में न कभी रुके हैं और न रुक सकते हैं, लेकिन
इन्हें रोकने के लिए क़ौमों और मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के विरोधियों ने जो-जो
हथियार इस्तेमाल किये हैं, वे साक्षात रूप में इतिहास में मौजूद हैं और इन्हें अच्छी
तरह समझने के लिए हिन्दुस्तान का मौजूदा इतिहास ही काफ़ी है।
जब आज़ादी का कोई आन्दोलन सफल तरीक़ों पर चलता दिखायी दे तो इसे
असफल करने के लिए इसके सेवकों पर सबसे बड़े आरोप जो लगाये जाते हैं, वे
यह होते हैं – 1. कि ये षड्यन्त्र कर रहे हैं, और 2. ये धर्म-विरोधी हैं। इस लेख
236 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
में इन दोनों विषयों पर विचार करने का यत्न करना है ताकि आम जनता को इनकी
तह तक पहुँचने का अवसर मिले और यह पता चल सके कि सही मायनों में
षड्यन्त्र करने वाला और धर्मों का विरोधी कौन होता है और किस तरह दुनिया का
भला करने वालों को षड्यन्त्रकारी और अधर्मी कहा जाता है। वास्तव में
षड्यन्त्रकारी और अधर्मी तो ये स्वयं होते हैं।
गुप्त तख़्तापलट आन्दोलन
वर्तमान सरकार यह हल्ला करती नहीं थकती कि हिन्दुस्तान में गुप्त तख़्तापलट
आन्दोलन क़ायम है। इस आन्दोलन के अस्तित्व को प्रकट करने के लिए कहीं न
कहीं से टूटे-फूटे पिस्तौल और बम आदि अपने खुशामदियों के माध्यम से पकड़ने
का ढोंग रच लेती है और कहीं किसी अधिकारी पर कोई खाली जाने वाला हमला
ही करवाया जाता है और कभी रेलपटरी के पेंच ढीले किये जाते हैं, जबकि लाट
साहिब आदि को गुज़रना हो। यह सब ऐसी बातें हैं, जिन्हें गुप्त तख़्तापलट षड्यन्त्र
या आन्दोलन आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस समय यह सबकुछ पुलिस
की ओर से हो रहा है, जिसका सबूत इस बात से मिलता है कि बताये गये तख़्ता
पलटने वालों की इस कार्रवाई से नुक़सान कहाँ तक होता है? बंगाल को इस समय
सरकार इस आन्दोलन का घर बता रही है। पिछले कुछ सालों में चाहे बंगाल पुलिस
ने कितनी ही जगहों से टूटे-फूटे हथियार आदि पकड़े और कई बार सरकारी
अधिकारियों पर हमलों की साज़िश का अस्तित्व भी बताया, लेकिन आज तक वहाँ
किसी भी सरकारी अधिकारी की या कोई राजनीतिक मृत्यु नहीं हुई, जिससे यह
सिद्ध होता है कि यह सबकुछ पुलिस के आदमी ही करते हैं। यदि तख़्ता पलटने
वाले किसी सरकारी अधिकारी की जान लेने के लिए तैयार हो जायें तो क्या वे
उसे सूखा जाने देंगे? यदि तख़्ता पलटने वाले हथियार आदि रखें तो क्या इस तरह
के टूटे-फूटे ही रखें, जिनके बारे में बंगाल पुलिस भी अपनी गवाहियों में बता चुकी
है कि ये हथियार चलाने वालों के लिए ही ज़्यादा ख़तरनाक हैं और जिस पर चलाये
जाते हैं उसके लिए कम! यदि तख़्ता पलटने वाले गाड़ियाँ उलटने का यत्न करें
तो क्या इसमें सफल न हों? ये सब ऐसी बातें हैं जो सिद्ध करती हैं कि यह सबकुछ
आज़ादी के उपासकों को कुचलने के लिए पुलिस-कर्मचारियों की ओर से किया
जाता है।
हमें इस बात से इन्कार नहीं कि हिन्दुस्तान में तख़्ता पलटने का आन्दोलन है,
लेकिन हमारा कहना है कि इस समय जो हो रहा है वह पुलिस की ओर से है
और इतिहास बताता है कि जब भी कोई तख़्ता पलटने का काम शुरू करते हैं,
वे अपने वार कम ही खाली जाने देते हैं। और सरकार को भी यह निश्चय रखना
चाहिए कि ऐसे लोगों को (जिनका धर्म-ईमान ही देश की आज़ादी हो और जो
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 237
बाक़ी सब तरीक़ों से निराश होकर आज़ादी के लिए इस तरीक़े पर भरोसा रखने
लगें) दबाने में वह कभी भी सफल नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही सख़्तियाँ
करे और कितनी ही चालें चले और न ही आज तक कोई सरकार इसमें सफल
हुई है। इन आन्दोलनों को समाप्त करने का सही तरीक़ा तो यही है कि उन लोगों
की माँग पूरी की जाये, ताकि वे शान्त हों।
ऊपर जो बताया गया है यह केवल हमारा अपना ही ख़याल नहीं, बल्कि
इसकी पुष्टि बंगाल आर्डिनेंस सम्बन्धी कई ज़िम्मेदार सज्जनों के भाषणों और उनके
बयानों से होती है। इन्हीं सज्जनों के सवालों का उत्तर सरकार की ओर से सिवाय
चुप के कुछ नहीं मिला। नीचे हम अपने विचारों की पुष्टि के लिए कुछ उद्धरण
दे रहे हैं जिनसे स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा कि सरकार कैसे हिन्दुस्तान को गुलाम रखने
के लिए कमीनी चालें चल रही है।
श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस को, जोकि कलकत्ता नगर सभा के चीफ़ एग्ज़्यूक्टिव
ऑफ़िसर थे और जिन्हें तख़्ता पलट करने का अपराधी कहकर बंगाल आर्डिनेंस
के अनुसार जेल में बन्द किया गया था, अब ख़राब सेहत के कारण रिहा किया
गया है। आपने बंगाल आर्डिनेंस के सम्बन्ध में अभी एक बयान प्रकाशित करवाया
है, जिसमें आप लिखते हैं –
“बंगाली राजनीतिक नज़रबन्दों को और देर तक जेलों में बन्द रखने की कोई
सन्तोषजनक वजह न होने के कारण पुलिस ने अब बम और टूटे हुए पिस्तौल
पकड़ने शुरू कर दिये हैं, ताकि सिद्ध किया जा सके कि तख़्तापलट आन्दोलन
अभी तक मौजूद है। वास्तव में पिछले कुछ सालों में जब भी कभी बंगाली
राजबन्दियों की रिहाई की चर्चा चली है और जब भी कभी असेम्बली या बंगाल
कौंसिल में नज़रबन्दों के सवाल पर विचार करने के लिए बैठक हुई है तो पुलिस
के हाथों में खेलने वाले कुछ लोग अपने पास से हथियार लेकर झट गिरफ़्तारी के
लिए पुलिस के आगे पेश हो जाते रहे हैं और फ़ौरन ही कथित बम-कारख़ानों का
पता पुलिस को लग जाता है। इन कारख़ानों में आमतौर पर कुछ मसाला होता है,
जो हर जगह मिल सकता है। फिर टूटे हुए पिस्तौल, जोकि जिस पर निशाना साधा
जाये उससे ज़्यादा ख़तरनाक उसे चलाने वालों के लिए हो सकते हैं, जैसाकि
दक्षिणेश्वर बम केस में पुलिस के गवाहों ने अपने मुँह से माना कि ये दोनों चीजें
चाहे इस्तेमाल में किसी काम की न हों, लेकिन किसी को अपराधी ठहराने के
लिए काफ़ी होती हैं।
तख़्तापलट षड्यन्त्र साबित करने के लिए शस्त्र क़ानून के अन्तर्गत चलाये गये
साधारण मुक़दमों को पुलिस और एंग्लो-इण्डियन अख़बारों की ओर से
पोलिटिकल मुक़दमे सिद्ध किया जाता है। अभी एक ऐसे पोलिटिकल मुक़दमे में
जो वायदा माफ़ गवाह बना, वह एक पुराना पुलिस एजेण्ट है।
238 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पिछले कुछ सालों में निःसन्देह पुलिस की ओर से मनगढ़न्त तख्तापलट
आन्दोलन बनाने के लिए दलाल (Agent Provocateuors) रखे जाते हैं ताकि
खुफ़िया पुलिस के ख़ास हिस्से (Intelligence Branch) को क़ायम रखने की
ज़रूरत सिद्ध की जा सके, जिन्हें कुछ साल पहले बंगाल की सरकारी ख़र्च कम
करने वाली समिति (Bengal Retrenchment Committee) ने हटाने की सिफ़ारिश
की थी। मैं यह बयान अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी तरह अनुभव कर लिख रहा हूँ
और जो आरोप मैं पुलिस पर लगा रहा हूँ, इनकी जाँच के लिए यदि कोई निष्पक्ष
समिति बनायी जाये और नज़रबन्दों और पब्लिक को यदि इसके सामने गवाहियाँ
देने में कोई बाधा न दी जाये और पूरी छूट हो तो इसके प्रमाण देने को भी मैं
प्रस्तुत हूँ...।
स्वर्गवासी श्रीयुत देशबन्धुदास जी ने भी बंगाल कौंसिल में भाषण देते हुए 23
जनवरी, 1924 को साफ़-साफ़ बताया कि कैसे ऊल-जलूल (सबूत) इकट्ठा कर
बंगाली देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया है और किस प्रकार के निराधार आरोप
लगाये गये हैं। आपने यह भी ज़ाहिर किया कि इस तरह के आन्दोलन दमनकारी
तरीक़ों से दबाये नहीं जा सकते। नीचे आपके द्वारा कौंसिल में दिया गया भाषण
पूरे का पूरा दर्ज है –
“हमें यह शिकायत नहीं है कि सरकार ने इन व्यक्तियों को बग़ैर कोई सूचना
एकत्र किये ही गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन हमारी शिकायत यह है कि इन
सूचनाओं की अच्छी तरह जाँच नहीं की गयी और हमारी इस शिकायत के उत्तर
में एक शब्द भी नहीं कहा। हमें यह बताया गया है कि इस सम्बन्ध में कई
आदमियों ने बयान दिये हैं और यह भी बताया गया है कि जो रिपोर्टें मिली हैं,
सरकार ने उन पर विचार किया है। लेकिन जो कुछ मैं पूछना चाहता हूँ वह यह
है कि कोई सरकारी अधिकारी चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, किसी बयान के
ठीक होने का अनुमान कैसे कर सकता है, जब तक कि बयान देने वाले को सामने
बुलाकर उससे सवाल न किये जायें?
(जब भगतसिंह और उनके साथ भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन की समीक्षा करते हुए लोगों से उसे सांझा कर रहे थे तो भारत की
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ढंग और स्वतन्त्रता-आन्दोलन के दरपेश पैदा रुकावटों के बारे
में चर्चा भी पूरे ज़ोर से चल रही थी। मई, 1928 से सितम्बर, 1928 तक जब
भगतसिंह पूरी तरह ‘किरती’ अख़बार चलाने में व्यस्त थे, उस समय के ये लेख
यहाँ दिये जा रहे हैं। चाहे इनके लेखकों के नामों का पता नहीं, लेकिन ये लेख
शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के तत्कालीन विचारों का प्रतिनिधित्व करते
हैं। इसीलिए इन्हें यहाँ दिया जा रहा है। शहीद भगवतीचरण वोहरा ‘किरती’ अख़बार
से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। – स.)
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 239
हर सम्भव तरीक़े से पूर्ण स्वतन्त्रता
अमृतसर कॉन्फ्रेंस में जिन बातों का बहुत झगड़ा हुआ और बहस हुई, उनमें से एक
सबसे अधिक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि कांग्रेस का उद्देश्य हर सम्भव
तरीक़े से 'अंग्रेज़ी राज से बाहर पूर्ण स्वतन्त्रता' प्राप्त करना हो।
प्रस्ताव पास हो गया और बड़े-बड़े नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफ़े दे दिये और
धमकियाँ देनी शुरू कर दीं और प्रस्ताव पास करने वालों को षड्यन्त्रकारी, नेतागिरी
के भूखे लोग कहा गया। पंजाबभर के अख़बारों ने आसमान सर पर उठा लिया और
हाय-तौबा मचा दी। हमें समझ नहीं आ रहा कि क्या कहर टूट पड़ा।
मद्रास कांग्रेस ने पूर्ण स्वतन्त्रता (Complete Independence) का प्रस्ताव पास
कर दिया था। यहाँ उसने स्पष्ट कर दिया कि आज़ादी, पूर्ण आज़ादी अंग्रेज़ी राज
से बाहर ही हो सकती है। हाँ, यह बात साफ़ है कि मद्रास के प्रस्ताव को (अब)
ज़्यादा ज़ोरदार और निश्चित बना दिया गया है। उस प्रस्ताव पर तो किसी को कोई
ख़ास शिकायत हुई नज़र नहीं आयी थी। झगड़ा सिर्फ़ 'हर सम्भव तरीक़े से' (By
all possible means) (आज़ादी) प्राप्त करने का है। अब तो कांग्रेस कोड में लिखा
हुआ था कि – By all peaceful and legitimate means – सभी शान्तिपूर्ण और
न्यायिक तरीक़ों से स्वराज लिया जाये।
पूरा देश तैयार था। नौजवानों ने गाँव-गाँव में सिविल नाफ़रमानी की तैयारी कर
दी थी। चौरा-चौरी में एक-दो भाड़े के टट्टुओं ने अत्याचार कर दिया या यों कहो
कि कुछ लोगों से करवा दिया। बस पूर्ण शान्ति वाली बात ख़त्म। फिर क्या था,
पूरे देश का बेड़ा गर्क कर दिया। क्या ख़ूब फ़िलासफ़ी है कि शान्तिपूर्ण शब्द का
बहाना लेकर हरामख़ोर ज़मींदारों और ताल्लुकेदारों का पक्ष लिया गया। और
बारदौली रैदलीफ़न में साफ़ कह दिया गया कि हे किसानो, तुम अपने मालिकों
को लगान दे दो।
बस शान्तिपूर्ण के बहाने देश का बेड़ा गर्क कर दिया गया। यातनाओं के झूठे
आरोपों में फँसाये गये लोगों का पक्ष लेने की हिम्मत तक हमें न हुई और कई ग़रीब
वहाँ फाँसी पर चढ़ गये। यह तो अत्याचार हुआ न? इस पूर्वाग्रह को मिटाना बहुत
ज़रूरी था। इस प्रस्ताव के पास होने से लोगों के देखने का दायरा कुछ बढ़ गया है।
दूसरी बात यह है कि क्या हमने क़सम खा रखी है कि यदि शान्तिपूर्ण तरीक़े
240 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
से स्वराज मिलेगा तो लेंगे, अन्यथा हम अंग्रेज़ी राज में ही रहना पसन्द करेंगे? 'हाँ'
कहने वाले अन्धे आदर्शवादी लोगों के साथ हम बात नहीं करना चाहते। जिस
स्वराज के बारे में दुनिया का सबकुछ कुर्बान किया जा सकता है, उसके बारे में
ऐसी बेकार बातों की क्या ज़रूरत है?
हाँ, तीसरा सवाल उठा है कि क्या विद्रोह करके, लड़ाई करके हम
स्वराज ले सकते हैं? आज तो एक ही जवाब मिल सकता है कि नहीं। आज
हम इतने संगठित, सशस्त्र और ताक़तवर नहीं हैं, इसीलिए यह तरीक़ा अभी
असम्भव है। फिर झगड़ा किस बात का? सवाल यह है कि क्या हर क़ौम को
कभी भी बल-प्रयोग का अधिकार है या नहीं? डॉक्टर सत्यपाल जी के शब्दों
में – Have we not a right to employ all possible means to attain our
goal. उसके जवाब में 'ट्रिब्यून' कहता है कि नहीं। (Not a right can either
be legal or moral right) बहुत अच्छा जी! क़ानूनी अधिकार तो नहीं हो
सकता, क्योंकि क़ानून परायों के हाथ में है। पर क्यों जी, सिविल नाफ़रमानी–
सिविल नाफ़रमानी करके आसमान सर पर उठा लेने वाले सज्जन यह नहीं
जानते कि सिविल नाफ़रमानी भी कोई क़ानूनी तौर पर जायज़ (legal right)
नहीं कहला सकती। वह भी स्पष्टतः समय के क़ानून (law) को तोड़ना और
उसका विरोध करना है। किसी भी राज (State) के ख़िलाफ़ किसी तरह की
आवाज़ उठानी कभी भी legal right नहीं कहला सकती। यहाँ नैतिक
अधिकार (Moral right) होता है। यदि सम्भव होने और अत्यन्त ज़रूरी होने
पर भी बल-प्रयोग को Moral right नहीं समझा जाता तो अमेरिका के वीर
वाशिंगटन और पैट्रिक हेनरी, इटली के मैजिनी और गैरीबाल्डी, रूस के लेनिन
आदि आज़ादी दिलाने वालों और अपने सभी बुजुर्गों श्री रामचन्द्र, श्री कृष्ण,
श्री शिवाजी, श्री प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह जी ने कुकर्म किये और वे
सम्माननीय न हुए! यह फ़िलासफ़ी भी कमाल है! सवाल सिर्फ़ यह उठता है
कि जब आज विद्रोह करना भी नहीं और है भी असम्भव तब All possible
means पास करने की ज़रूरत क्यों पड़ गयी? लेकिन जब आज पूर्ण स्वतन्त्रता
का प्रस्ताव पास करते हैं तो क्या आज ही स्वतन्त्रता ले लेते हैं? यह सिर्फ़
ऊँचा आदर्श सामने रखा गया है। इस तरह 'हर सम्भव तरीक़े से' पास करने
से लोगों की तंगदिली दूर कर दी गयी और उनके सामने बड़ा भारी आदर्श
रख दिया गया है।
साथ ही एक और बात भी है। आज कई साल हो गये हैं, जब से कितने ही
वीर 'पूर्ण स्वतन्त्रता, पूर्ण स्वतन्त्रता' की रट लगाये फाँसी पर लटक गये। आज
हमारे समझदार नेताओं को पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा करने की ज़रूरत पड़ी और
वे सबसे गर्म नेता कहाने लगे। और हम किसी भी नौजवान को ताक़त में विश्वास
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 241
रखने पर दुत्कारना शुरू कर देते हैं और उन बेचारे देशभक्तों पर कहर बरपा करते
हैं और कोई परवाह नहीं करते। 1914-15 के मुक़दमों में जो अन्धेरगर्दी हुई, क्या
वे साथी अपनी ही लापरवाही का परिणाम नहीं थे? तब गला फाड़-फाड़कर
काँव-काँव। ये बड़े ख़तरनाक हैं, खूँखार हैं। और जब उन बेचारों का फाँसी लग
जाना, तब भीतर घुस-घुस बातें करना। वे सच्चे देशभक्त थे। 1908 से लोग फाँसी
पर चढ़ते रहे, पर सब अक्लमन्द लोग उन्हें गालियाँ देते रहे। 1925 में विपिनचन्द्र
पाल ने एक लेख लिखा कि It were political assasins who passed their way
to Minto Morely scheme. यानी राजनीतिक हत्यारों की कृपा से ही मिण्टो-मारले
स्कीम मिली थी। और आज काकोरी वाले शहीदों के घरवालों से सहानुभूति प्रकट
करने पर बिगड़ जाने वाला Modern Review भी विपिनचन्द्र पाल की उपरोक्त बात
की ताईद करता हुआ एक बड़े माडरेट एस.आर. दास के एक पत्र में लिखता है
कि इंगलिस्तान को जगाने के लिए और यह बताने के लिए कि हिन्दुस्तान की
स्थिति अच्छी नहीं है, एक बम की ज़रूरत थी – 'A bomb was necessary to
awaken England from Iber sweet dream that all was well with India.'
यदि उन ग़रीबों की ओर, जोकि शान्ति में विश्वास नहीं करते, लेकिन आज़ादी
के लिए हम लोगों से अधिक बलिदान कर सकते हैं, समय पर ध्यान दिया जाये
तो कम से कम उनके साथ अन्धेरगर्दी और जुल्म तो न हुआ करें और उनकी
मुसीबत में कुछ तो कमी हो जाया करे।
एक और भी बात है कि माडरेटों को सदस्य बनाने के लिए खद्दर की शर्त
लगाने पर ज़ोर देने वाले सज्जन यह तो बतायें कि क्या माडरेटों से अधिक बलिदान
करने वाले नौजवानों के लिए कांग्रेस का दर खोलना पाप है? उनको आगे नहीं आने
देना? यह तो हम जानते हैं कि आज़ादी की जंग में इस्तेमाल के लिए हमारे पास
केवल एक ही हथियार है 'सिविल नाफ़रमानी' और वैसा आन्दोलन अधिक
शान्तिपूर्ण होगा ही, लेकिन 'सम्भव' शब्द के आ जाने से किसी को भी कोई
शिकायत नहीं रह जानी चाहिए।
और यदि शब्द कहने से डरते हो कि सरकार आ गला पकड़ेगी तो सुन लो
– "Freedom has to be won inch by inch and whether peaceful or other
methods are employed, the Government of the day will not spare any pains
to crush the movement of independence." यानी सरकार तो शान्तिपूर्ण या
अशान्तिपूर्ण, सभी आन्दोलनों को दबाने की कोशिश करेगी। इसलिए हमें उस
प्रस्ताव से डरना नहीं चाहिए जिसने हमारे काम के दायरे को ज़्यादा खुला कर दिया
और हमारी तंगनज़र को खोल दिया है, बल्कि उसका तो स्वागत करना चाहिए।
किरती/मई, 1928
242 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आतंक के असली अर्थ
अपने समय की विचारधारात्मक बहस में हिस्सा लेते हुए भगतसिंह और उनके
साथियों ने 'आतंक' शब्द के अर्थ समझने की कोशिश की। मई, 1928 के 'किरती'
में यह लेख इसी विषय पर छपा जो बम्बई के अख़बार 'श्रद्धानन्द' से अनूदित था
तथा भगतसिंह और उनके साथियों के उस समय के विचारों का प्रतिनिधित्व करता
है। – स.
पिछले सात-आठ सालों में जिन कुछ शब्दों ने हमारे राजनीतिक जीवन में तूफ़ान
खड़ा किया है और जिनके बारे में बहुत लोगों को ग़लतफ़हमी रही है उनमें सबसे
ज़रूरी शब्द 'आतंक' है। अब तक किसी ने भी गहन विचार कर इस शब्द के अर्थ
समझने के यत्न नहीं किये। इसीलिए आज तक इस शब्द का ग़लत इस्तेमाल होता
रहा है। पूरी क़ौम अपने लक्ष्य को ठीक न समझ पाने के कारण दिन को रात और
रात को दिन समझती हुई ठोकरें खा रही है।
आतंक पर बोलते ही अनुभव होने लगता है कि वह त्याज्य और बुरा शब्द है।
सुनते ही यह विचार पैदा होता है कि वह दुख देने वाला, अत्याचारी,
ज़ोर-ज़बरदस्ती और अन्यायपूर्ण है। जिस काम के साथ 'आतंक' शब्द लग जाये
वही काम पलीत, हानिकर और त्याज्य लगने लगता है। इस हालत में कोई शरीफ़
और नेकदिल इन्सान इससे हमेशा के लिए परे रहने का यत्न करे तो यह एक
स्वाभाविक बात है। आतंक और जुल्म से आशय ताक़त का अयोग्य ढंग से प्रयोग
है। इन दोनों शब्दों से ताक़त के इस्तेमाल की बू तो आती है, लेकिन ताक़त के
इस्तेमाल की एक सीमा है। उसी सीमा का ख़याल न रखते हुए कुछ हंगामाबाज़
लोगों ने 'आतंक' नाम दे दिया है और हिन्दी भाषा में इसकी तुलना में 'अहिंसा'
शब्द ठोंक दिया गया है। इसी कारण आज एक बड़ी ख़तरनाक ग़लतफ़हमी फैली
हुई है।
आतंक में ताक़त का इस्तेमाल भी होता है। इसलिए कुछ घटिया दिमाग़ वालों
ने ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम दे डाला। किसी आदमी को बुरे काम
से रोकने के लिए यही कह देना काफ़ी होता है कि वह काम बहुत बुरा और घृणित
है। ऐसे ही शब्दों में आतंक भी एक है। कांग्रेस के आदेशानुसार हज़ारों इन्सान बिना
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 243
किसी न-नकार के शान्ति की क़समें उठाते चले गये। बात तो ठीक थी। आतंक
का अर्थ ज़ुल्म और ज़बरदस्ती करना है। ऐसा बुरा काम न करने की क़सम खाने
में किसी को क्या उज़्र हो सकता है, लेकिन असली बात यह है कि ज़ुल्म को
नहीं, बल्कि ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम देकर लोगों में ग़लतफ़हमी
फैला दी गयी है। बहुत-से लोग जोकि ताक़त के इस्तेमाल के हक़ में थे, वे आतंक
का पक्ष लेने की हिम्मत न दिखा सके और उन्होंने भी चुपचाप शान्तिपूर्ण
(आन्दोलन) के पक्ष में होने की क़सम उठा ली। इसीलिए अहिंसा (Non-
violence) जैसे शब्दों ने बहुत गड़बड़ी मचा दी। हज़ारों ही काम जो आज तक न
सिर्फ़ जायज़, बल्कि अच्छे माने जाते थे, वह पलक झपकने में ही घृणित माने जाने
लगे। वीरता, हिम्मत, शहादत, बलिदान, सैनिक-कर्तव्य, शस्त्र चलाने की योग्यता,
दिलेरी और अत्याचारियों का सर कुचलने वाली बहादुरी आदि गुण बल-प्रयोग पर
निर्भर थे। अब ये गुण अयोग्यता और नीचता समझे जाने लगे! आतंक शब्द के इन
भ्रामक अर्थों ने क़ौम की समझ पर पानी फेर दिया। नौबत यहाँ तक पहुँची कि
हथौड़े से पत्थर का बुत तोड़ना भी आतंक के दायरे में मान लिया गया और लाठी
पकड़ने तक को आतंक माना गया। तो क्या बुत को हाथों से तोड़ा जाये?
किसी भी शब्द के सुनते ही हर इन्सान के दिल में एक विचित्र ढंग की
भावनाएँ पैदा हो जाती हैं और उसके बाद झटपट एक प्रकार के अर्थ समझ
चुकने के कारण इन्सान उसकी तह तक जाने के लिए अधिक दिमाग़ नहीं
लड़ाता। किसी अजनबी इन्सान के आते ही यदि यह कह दिया जाये कि वह
बड़ा पापी है, लुच्चा है, तो सुनने वाले के दिल में उसके ख़िलाफ़ स्वभावतः
ही एक तरह के घृणित ख़याल उत्पन्न हो जाते हैं। उस आदमी के सम्बन्ध में
अधिक जाँच किये बग़ैर ही राय बना ली जाती है। इसी तरह शब्दों के प्रयोग
सम्बन्धी मामले में कहा जा सकता है। वेदों और पुराणों में इस बात पर ज़ोर दिया
गया है कि जो भी शब्द बोले जायें, उनका सही प्रयोग होना चाहिए, क्योंकि
शाब्दिक भ्रम से देवताओं तक में बड़े-बड़े दंगे हो गये थे और बड़ा भारी
नुक़सान हो गया था। ठीक वही दशा पिछले सात साल से हमारी हो रही है।
ताक़त के योग्य और अयोग्य इस्तेमाल को बिना किसी जाँच-विचार के फ़ौरन
आतंक का फतवा देकर घृणित होने की घोषणा कर दी गयी है।
यदि कोई डाकू कुल्हाड़ी लेकर किसी के घर में आ घुसे तो उसे आतंक (की
कार्यवाही) कहा गया, लेकिन यदि घरवालों ने छुरी का इस्तेमाल कर डाकू को
मार डाला तो उसे भी आतंक (का काम) माना गया। अर्थात जब अपने और अपने
परिवार की रक्षा के लिए ताक़त का योग्य और नेक इरादों से इस्तेमाल किया गया
तब भी उसे आतंक ही कहा गया। रावण ज़ोर-ज़बरदस्ती सीता को उठा ले गया
तो वह आतंक। और सीता को छुड़ाने गये राम ने रावण का सिर काट दिया तो वह
244 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भी आतंक! इटली, अमेरिका, आयरलैण्ड आदि देशों पर कई प्रकार के जुल्म करने
वाले अत्याचारी भी आतंक फैलाने वाले समझे गये और नंगी तलवार पकड़े इन
विदेशी डकैतों का छिपी हुई शमशीर से इलाज करने वालों को भी आतंक (फैलाने
वाले) की उपाधि दी जाती है। गैरीबाल्डी, वाशिंगटन, एमट और डी वलेरा आदि
सभी इसी सूची में डाल दिये गये। क्या इसे इन्साफ़ कहा जा सकता है? आभूषण
चुराने के लिए मासूम बच्चे की गरदन काट देने वाला चोर भी घृणित और उस
पत्थर-दिल चोर को फाँसी पर लटका देने वाला न्यायकारी सम्राट भी आतंकवादी
और घृणित! कृष्ण भी उतना ही पापी, जितना कंस! शूरवीर भीम भी उतना ही
गुनहगार, जितना कि उसकी धर्मात्मा पत्नी का अपमान करने वाला दुःशासन! आह!
कितनी ग़लतफ़हमी है। कितना बड़ा अन्याय है। इसीलिए कुछ सीधे-सादे लोगों ने
अच्छे कामों को भी केवल बल-प्रयोग के कारण अयोग्य और आतंकवादी कह
दिया। साँप डसता है, आदमी उसे मार डालता है। पर दोनों बराबर-बराबर नहीं।
डसना तो साँप की आदत थी और वह इस आदत से मजबूर था, लेकिन इन्सान
ने यह काम जानबूझकर किया, इसलिए उसे अधिक नीच समझा जाना चाहिए!
नौबत यहाँ तक पहुँची कि देश और क़ौम के लिए सशस्त्र हो मैदाने-जंग में शहीद
हो जाने वाले बहादुर भी पापी समझे जाने लगे। शिवाजी, राणा प्रताप और रणजीत
सिंह जी को आतंक फैलाने वाले कहा गया और वे पूजनीय व्यक्तित्व भी घृणा
का शिकार हो गये।
उधर दुनिया के सारे देश शस्त्रधारी हैं। प्रत्येक अपने हथियारों की ताक़त को
बढ़ाता चला जा रहा है। इधर हमारा यह भारतवर्ष है, जिसमें रहने वालों का शस्त्र
पकड़ना पाप समझा जाता है। 'लाठी मत पकड़ो' – यह शिक्षा देने वाले लाठी
देखते ही डरपोक और कायर लोगों की पीठ ठोंकने लगे। देश को गिरी हुई अवस्था
से उठाकर उन्नति के रास्ते पर खड़ा करने वाली शूर-वीरता मटियामेट होने लगी
और ताक़त से डरने वाले दुश्मन राजी-ख़ुशी दिखायी देने लगे। कुछ बिरले ही लोग
थे जो यह दुखद स्थिति न देख सके और उन्होंने इसका खण्डन करना शुरू कर
दिया। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वे स्वयं भी इस गड़बड़ी का शिकार
हो गये और ठोस तर्कों से विरोध प्रकट करना उनके लिए कठिन हो गया। बस
इसी से युग पलटने वाले लोगों ने चिढ़कर यह कहना शुरू कर दिया – हाँ, हाँ,
हम आतंक फैलायेंगे, हम Violence ही करेंगे! जैसे कोई शरीफ़ आदमी अपने अच्छे
काम को गुनाह ठहराये जाते देखकर और फिर तर्कसम्मत उत्तर न दे पाने के कारण
हड़बड़ाकर यही कहना शुरू कर दे – हाँ, हाँ, मैं गुनाह ही करूँगा। ठीक यही
स्थिति इन बेचारे युग पलटने वालों की हो रही है। मद्रास कांग्रेस के अध्यक्ष तक
ने यह कह दिया कि आज यदि हम शान्तिपूर्ण (तरीक़े) के पक्षधर हैं तो इसका
यह अर्थ नहीं है कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। हो सकता है कि हमें कल ही आतंक
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 245
(Violence) के लिए तैयार होना पड़े। दुख तो इस बात का है कि यह 'आतंक'
शब्द घृणित है। यह अपने गुणों व ठीक अर्थों में व्याख्यायित न होने के कारण दूसरों
को अपने पक्ष में नहीं कर सका – अर्थात वे लोग जोकि बल-प्रयोग के पक्ष में
भी हैं, वे भी ज़ालिम या आतंकवादी कहलवाना पसन्द नहीं कर सकते। इस एक
शब्द 'आतंक' के अर्थों के अनर्थ होने के कारण ही कितना भारी नुक़सान हो रहा
है।
पूरी ग़लतफ़हमी की जड़ तो इस एक शब्द 'आतंक' की ग़लत व्याख्या है;
क्योंकि आतंक व ज़ुल्म भी बल-प्रयोग से ही होते हैं, इसलिए बल-प्रयोग से बहुत
सारे अच्छे व बुरे काम होते हैं। ज़ुल्म इनमें से एक है। एक पुरुष चोरी से किसी
के घर में आग लगाता है, वह भी आग लगाने वाला है और दूसरी ओर रसोइया
भी आग जलाता है, लेकिन रसोइया अपराधी नहीं कहला सकता और न ही आग
लगाने का काम बुरा कहा जा सकता है। इसी तरह अपने देश की रक्षा के लिए
या देश की आज़ादी की प्राप्ति के लिए शस्त्र लेकर मैदान में उतरने वाला देशभक्त
जब ज़ालिम और बलशाली की गर्दन तलवार से उतार देता है या ज़ालिम से किसी
मज़लूम का बदला लेता हुआ फाँसी पर चढ़ जाता है, वह या कोई और शूरवीर,
जोकि अपने सगे-सम्बन्धियों, अपनी पत्नी या घर-बार की रक्षा के लिए हथियार
लेकर लुच्चे ज़ालिमों का मुक़ाबला करने के लिए निकलता है, वह बल-प्रयोग
तो ज़रूर करता है, लेकिन आतंक नहीं फैलाता, अर्थात इनके किये काम, आतंक
के कामों में नहीं गिने जा सकते, बल्कि वे अच्छे और नेक कहे जाते हैं।
वह बल-प्रयोग जिससे निर्दोषों को बिना किसी कारण से सताया जाये या
दूसरों को किसी नीच इच्छा से नुक़सान पहुँचाया जाये, केवल ऐसे ही बेहूदा कामों
के लिए (किये गये) बल-प्रयोग को आतंक कहा जा सकता है, लेकिन जब इसी
ताक़त को किसी ग़रीब अनाथ की मदद के लिए या ऐसे ही किसी और काम
के लिए इस्तेमाल किया जाये तो वह आतंक नहीं, बल्कि पुण्य और परोपकार
कहलाता है। या फिर इससे सिद्ध हुआ कि बल-प्रयोग करना कोई ज़ुल्म, अत्याचार
या आतंक नहीं, बल्कि यह बल-प्रयोग करने वाले की नीयत पर निर्भर रहता है।
यदि उसने किसी भले व नेक काम के लिए बल-प्रयोग किया है तो उसे आतंक
का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि उसने अपने व्यक्तिगत हित या
निर्दोषों को दुख देने की ख़ातिर अपने बल का ग़लत प्रयोग किया है तो उसे
निःसन्देह, निर्भय होकर 'आतंकवादी' कहा जा सकता है। आतंक हमेशा ही घृणा
योग्य है। आतंक ताक़त का ऐसा इस्तेमाल है, जिससे बिना अपराध के किसी को
दुख दिया जाये। लेकिन जहाँ ज़ालिमों और गुण्डों की गुण्डई रोकने के लिए
बल-प्रयोग किया जाये, वह आतंक नहीं बल्कि अच्छा व भला काम होता है,
क्योंकि दुनिया के अच्छे कामों की परख की एक ही कसौटी है – यह कि वे
246 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काम दुनिया को सुख व आराम देने वाले हों। किसी को दुख देना आतंक है, लेकिन
दुख देने वाले ज़ालिम का खुरा-खोज मिटाना पुण्य है। ज़ालिम कंस जब जुल्म की
तलवार पकड़ देवकी के घर में जा घुसता है, उसका उस समय का काम घृणित
आतंक है, लेकिन जब इसी ज़ालिम के पंजे से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए
श्रीकृष्ण तलवार लेकर उसके दरबार में घुस जाते हैं और तलवार से उसका सिर
गर्दन से अलग कर देते हैं, उस समय की उनकी यह कार्रवाई अभिनन्दनीय है।
दोनों तलवारें हैं, दोनों हथियार हैं, दोनों कामों में बल-प्रयोग किया गया है, लेकिन
एक काम जुल्मों से भरा है, इसलिए उसे आतंक कहा जायेगा और दूसरा काम नेक
है, वह एक ज़ालिम और अत्याचारी की हस्ती को, ग़लत अक्षर की तरह, मिटाकर
लोगों पर परोपकार करना है, इसलिए वह नेक काम सम्माननीय है। पर यदि हमारी
मौजूदा फ़िलासफ़ी के हिसाब से देखा जाये तो दोनों ही काम आतंकवादी और
घृणित हैं। लोगों को दुख देने वाला ज़ालिम भी आतंकवादी, और लोगों को ज़ालिम
के पंजे से छुटकारा दिलाने वाला भी आतंकवादी! यदि हमारे देश में यही स्थिति
रही तो अच्छे-बुरे की पहचान कैसे होगी और सम्माननीय कामों और घृणित कामों
के फ़र्क़ का कैसे पता चलेगा?
यदि इतना जान लिया जाये कि ताक़त का ग़लत इस्तेमाल अर्थात ग़रीबों,
अनाथों को सताना आतंक कहलाता है और इन सबको रोकना अच्छे काम समझा
जाता है तो सारे भ्रम दूर हो सकते हैं। चोर, डाकू और हत्यारे जब हथियारों का
इस्तेमाल करते हैं तो वे आतंक करते हैं (That force being aggressively used
become violence), लेकिन जब घर का मालिक समय पाकर उस डाकू या हत्यारे
की छाती में छुरी घोंप देता है या उस डाकू को कोई न्यायप्रिय शासक फाँसी की
सज़ा देता है तो वह अच्छा काम होता है। इसीलिए हिन्दू धर्मशास्त्र के कर्ता मनु
जी लिखते हैं –
ज़ालिम, हत्यारे, अपराधी को ख़ुफ़िया ढंग से या खुले मैदान चुनौती देकर या
किसी और ढंग से छापा मारकर जान से मार डालने वाले दिलेर इन्सान पापी या
गुनाहगार नहीं, बल्कि सम्माननीय इन्सान कहलाता है। पुराने से पुराने और नये से
नये क़ानून के अनुसार आत्मरक्षा में किये बल-प्रयोग को कभी भी आतंक के नाम
से नहीं पुकारा गया। यहाँ तक कि हिन्दू दण्ड-विधान में भी उसे आतंक
(Violence) नहीं कहा गया। आतंक फैलाना दण्डनीय है, लेकिन आत्मरक्षा में
बल-प्रयोग क़ानूनी ताक़त समझी जाती है।
ठीक वही बात राजनीति की है। इटली पर इस देश की इच्छा के विरुद्ध
आस्ट्रिया सिर्फ़ तलवार के ज़ोर से राज करता था, इसलिए इटली को ज़बरदस्ती
अधीन रखने का उसका काम आतंक था, घृणित था और ख़त्म करने योग्य था।
लेकिन जब गैरीबाल्डी और मैजिनी ने इसके ख़िलाफ़ तलवार उठायी और उस
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 247
ज़ालिम बादशाहत को उलटा दिया तब उनका यह काम घृणा लायक नहीं, बल्कि
पूजनीय माना गया। ठीक यही बात हम 1857 में हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए
लड़ी लड़ाई के सम्बन्ध में कह सकते हैं, क्योंकि वह हमारे पहले बताये अनुसार
जुल्म या आतंक नहीं था। इस लेख से यह अर्थ निकालना कि हम एक हथियारबन्द
बग़ावत करने की प्रेरणा दे रहे हैं, बिल्कुल झूठ और बेकार होगा। आज हम
हथियारबन्द बग़ावत करने या न करने सम्बन्धी कुछ नहीं लिखते। हथियारबन्द
बग़ावत की प्रौढ़ता या विरोध अलग-अलग देशों के अलग-अलग समाचारों के
कारण होते हैं। जो लोग इस समय हथियारबन्द बग़ावत को कठिन या समयपूर्व
मानते हों, वे ‘आतंक’ शब्द की ओट लेकर उस विचार को ही त्याज्य न बनायें।
इस विचार से ही आतंक शब्द की उक्त व्याख्या की गयी है, ताकि लोग फिर वैसी
ही ख़तरनाक और ठीक न हो सकने वाली भूल न करें।
(‘श्रद्धानन्द’, बम्बई से) किरती/मई, 1928
248 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम
मई, 1928 के 'किरती' में यह लेख छपा। अमृतसर में अप्रैल में राजनीतिक
कॉन्फ़्रेंस और नौजवान सभा की कॉन्फ़्रेंस हुई थी, जिसमें धर्म की समस्या पर शहीद
भगतसिंह और उनके साथियों में जमकर विचार-विमर्श हुआ। यह लेख उसी मसले
पर प्रकाश डालता है। – स.
अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कॉन्फ़्रेंस हुई और साथ ही युवकों
की भी कॉन्फ़्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें
से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु
साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन
संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ
देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और
धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कॉन्फ़्रेंस की विषय
समिति में भी मौलाना ज़फ़र अली साहब के पाँच-सात बार ख़ुदा-ख़ुदा करने पर
अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर ख़ुदा-ख़ुदा न कहें।
आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता (Irreligion) का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर
में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म
के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर
जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।
सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमर
सिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा
ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति
में कोई विघ्न न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की क्या
ज़रूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या
बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी
आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मन्त्र पढ़े जाने
लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता
था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 249
जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतन्त्रता प्रेमी
लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते
हैं।
बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं
बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर
नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतन्त्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गुलामी
का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि – ईश्वर ही
सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है – बच्चे को हमेशा
के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की
भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे
अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो भी हमें नज़र आता है कि धर्म
हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें
पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन
धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग
भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को
जनेऊ तक देने से इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की क़सम
ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिए, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग
यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत ख़ूब! छूत-अछूत
को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव
तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर
आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?
धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को फिर तलवार
के घाट उतार देना चाहिए और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम
क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मन्त्र
पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि
इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे
सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतन्त्रता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ
आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय
कोई मुहम्मद गौरी की तरह – जैसीकि कहावत बतायी जाती है – आज भी हमारे
सामने गायें, सूअर, ग्रन्थ साहिब, वेद-कुरान आदि चीजें खड़ी कर दी जायें, तो हम
क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ
जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं
चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हज़ार पण्डों
की तरह ठाकुरों के आगे लौटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर
250 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहुँचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन
यदि धर्म के पक्ष वालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में
अन्धेर हो जायेगा, पाप बढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।
रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर
बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये हैं -
- Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना,
चोरी न करना, ग़रीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वग़ैरा। - Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना
आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्ज़ी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न
करता है। - Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वग़ैरा। मतलब यह कि पहले
हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार
से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो
झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने
चाहिए। दूसरा फ़िलासफ़ी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि
Philosophy is the outcome of Human weakness, यानी फ़िलासफ़ी आदमी
की कमज़ोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं।
जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग़ लड़ाना शुरू कर दिया और खास-खास
निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फ़िलासफ़ी बड़ी ज़रूरी चीज़ है, क्योंकि इसके
बग़ैर उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी
ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई
और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है।
आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन
'मसला-ए-तनासुक' पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में
लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग़ को, बुद्धि को, सोचने-
समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद
भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान
शरीफ़ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति
(Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फ़िलासफ़ी हर
व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फ़िलासफ़ी
मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।
अब आती है तीसरी बात - रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजा वाले दिन, सरस्वती
की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है। उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी
ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 251
कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिए? नागरिक
आज़ादी का हक़ (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाजा बजाते हुए
भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का
बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल
की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही
फ़िलासफ़ी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion)
बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे
सामने है।
सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को
मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिए।
यदि पहली और दूसरी बात में स्वतन्त्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म
मुबारक है।
लेकिन अलग-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है।
छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली
छोड़कर एक न होंगे, तब तक हममें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए
ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आज़ादी की ओर बढ़ सकते हैं।
हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह
पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमाग़ी
गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।
252 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सत्याग्रह और हड़तालें
जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती'
के सम्पादक मण्डल में थे। उस समय उनके विचारों की झलक इनसे मिल सकती
है। – स.
सत्याग्रह
1928 में हिन्दुस्तान में फिर प्राण धड़कते नज़र आने लगे हैं। एक ओर
हड़तालों का ज़ोर है और दूसरी ओर सत्याग्रह की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं। ये
लक्षण बड़े अच्छे हैं। सबसे बड़ा सत्याग्रह बारदोली (गुजरात प्रान्त) के किसान
कर रहे हैं। तीस सालों के बाद नया बन्दोबस्त किया जाता है और हर बार
ज़मीन का लगान बढ़ा दिया जाता है। इसी तरह इस बार भी बन्दोबस्त हुआ
और मामला बढ़ा दिया गया। लोग बेचारे क्या करें? ग़रीब किसान तो पहले ही
पेट भरकर रोटी नहीं खा सकते और वे पहले से 22 प्रतिशत लगान कहाँ से
दें। सत्याग्रह की तैयारियाँ की गयीं। महात्मा गाँधी ने लाट पंजाब के साथ
पत्र-व्यवहार कर लगान कम करवाने का यत्न किया था, लेकिन जनाब, सिर्फ़
पत्र-व्यवहार से सर झुकाने वाली सरकार यह नहीं है। कुछ असर न हुआ।
सत्याग्रह करना ही पड़ा। गुजरात में पहले भी किसान एक-दो बार बड़ा भारी
सत्याग्रह करके सरकार को हरा चुके हैं। पहले-पहल 1917-18 में बारिश
अधिक होने से फ़सलें ख़राब हो गयी थीं और रुपये में चार आना भी नहीं
हुईं। क़ानून यह था कि रुपये में छह आने से कम फ़सल होने से उस साल
लगान न लिया जाये, अगले वर्ष एक साथ ले लिया जाये। उस साल लोगों ने
जब कहा कि चार आने भी फ़सल नहीं हुई तो सरकार नहीं मानी। फिर
महात्मा गाँधीजी ने काम हाथ में ले लिया। एक सभा की। लोगों को बताया
कि यदि आप लगान देने से इन्कार करोगे तो आपकी जायदाद ज़ब्त हो जायेगी,
क्या आप तैयार हैं? लोग चुपचाप बैठे रहे तो बम्बई के सत्याग्रही नेता इस बात
पर बड़े नाराज़ हुए और चल दिये। लेकिन फिर एक बुड्ढा किसान उठा और
उसने कहा कि हम सबकुछ सहन करेंगे और बाद में सभी लोग यही कहने
लगे। सत्याग्रह शुरू हुआ। सरकार ने भी जायदाद और ज़मीनें ज़ब्त करना शुरू
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 253
कर दिया, लेकिन दो महीने बाद सरकार ने सिर झुका दिया और ज़मींदारों
(?) की शर्त मान ली।
दूसरी बार जब महात्मा जी 1923-24 में जेल में थे तब सत्याग्रह हुआ। पहली
बार 600 गाँवों ने हिस्सा लिया था। इस बार 94 गाँवों का लगान बढ़ाया और इन
गाँवों ने सत्याग्रह किया। उन पर ताजीरी टैक्स लगाया गया था। वहाँ नियम था कि
सूर्यास्त होने पर जायदाद कुर्क नहीं हो सकती थी और किसान सवेरे ही
अपने-अपने घरों को ताले लगाकर चले जाते और पुलिस को कोई गवाह तक न
मिलता। अधिक तंग आकर सरकार ने टैक्स वापस ले लिया। इस बार बारदोली
में सत्याग्रह शुरू हुआ है। बारदोली में 1921-22 में आज़ादी के लिए बड़ा भारी
सत्याग्रह करने की तैयारियाँ की गयी थीं। सब क़िस्मत के खेल! बना-बनाया खेल
बिगड़ गया। खैर, उन पिछली बातों का क्या करना। अब उस इलाके का बन्दोबस्त
सरकार ने किया। बेचारे किसानों की मुसीबत, अच्छा बन्दोबस्त हुआ, 22 प्रतिशत
लगान बढ़ गया! बहुत कहा गया लेकिन सरकार कब मानती है। श्री बल्लभभाई
पटेल के नेतृत्व में काम शुरू हो गया और किसानों ने लगान देने से मना कर दिया।
अब ज़ब्ती अधिकारी और सारे ही अफ़सर बारदोली ताल्लुके की ओर इकट्ठा हुए
हैं। जो उनसे हो सकता है, लोगों को ग़लत रास्ते पर डालने के लिए कर रहे हैं।
जायदाद ज़ब्त की जा रही है, ज़मीनें ज़ब्त करने के हुक्म जारी हो रहे हैं। लेकिन
माल, सामान उठाने के लिए आदमी नहीं मिलते। इस समय काम वहाँ ज़ोरों पर
है, लेकिन एक मजे की बात यह है कि सारा काम बड़ी शान्ति से हो रहा है। वे
अफ़सर जो लोगों को तंग करने आये थे, उनके साथ बड़े प्यार का व्यवहार किया
जाता है। पहले उन्हें रोटी-पानी नहीं मिलता था, अब पटेल ने कहा कि उन्हें रोटी-
पानी ज़रूर दे दिया करो। एक दिन शराब की दुकान से चार टिन कुर्क किये गये,
लेकिन उठाने वाला कोई न मिला। जब अधिकारी ने कहा, 'बड़ी प्यास लगी है,
पानी तो दो,' तो झट एक सेवादार सत्याग्रही ने सोडे की बोतल लाकर पिलायी।
इस तरह काम बड़े ज़ोरों से, पूरी शान्ति से चल रहा है। बड़ी उम्मीद है कि सरकार
को अधिक झुकना पड़ेगा।
दूसरी जगह कानपुर है जहाँ सत्याग्रह होने वाला है। पिछले दिनों कानपुर में
हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। बाद में ताजीरी पुलिस बिठायी गयी। कुछ दिन हुए कि
कानपुर के कौंसिल सदस्य श्री गणेशशंकर जी विद्यार्थी सम्पादक 'प्रताप', कानपुर
को एक पत्र मजिस्ट्रेट से मिला कि अपने दफ़्तर के सभी कर्मचारियों की सूची
और उनका वेतन या पद लिखकर भेजें, क्योंकि तारी ताजीरी टैक्स वसूल किया
जाना है। लेकिन विद्यार्थी जी ने लिख भेजा कि मैं कोई टैक्स देने को तैयार नहीं
हूँ और न ही इस काम में कोई सहायता ही करूँगा, क्योंकि दंगा पुलिस ने करवाया
था। हमें उसका दण्ड नहीं मिलना चाहिए। लोगों ने विद्यार्थी जी से पूछा कि हम
254 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़