भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished788 पृष्ठ
पृष्ठ 257, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 257
जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहुँचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन
यदि धर्म के पक्ष वालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में
अन्धेर हो जायेगा, पाप बढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।
रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर
बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये हैं -
- Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना,
चोरी न करना, ग़रीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वग़ैरा। - Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना
आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्ज़ी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न
करता है। - Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वग़ैरा। मतलब यह कि पहले
हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार
से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो
झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने
चाहिए। दूसरा फ़िलासफ़ी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि
Philosophy is the outcome of Human weakness, यानी फ़िलासफ़ी आदमी
की कमज़ोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं।
जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग़ लड़ाना शुरू कर दिया और खास-खास
निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फ़िलासफ़ी बड़ी ज़रूरी चीज़ है, क्योंकि इसके
बग़ैर उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी
ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई
और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है।
आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन
'मसला-ए-तनासुक' पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में
लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग़ को, बुद्धि को, सोचने-
समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद
भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान
शरीफ़ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति
(Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फ़िलासफ़ी हर
व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फ़िलासफ़ी
मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।
अब आती है तीसरी बात - रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजा वाले दिन, सरस्वती
की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है। उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी
ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 251