भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 253, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाम दुनिया को सुख व आराम देने वाले हों। किसी को दुख देना आतंक है, लेकिन
दुख देने वाले ज़ालिम का खुरा-खोज मिटाना पुण्य है। ज़ालिम कंस जब जुल्म की
तलवार पकड़ देवकी के घर में जा घुसता है, उसका उस समय का काम घृणित
आतंक है, लेकिन जब इसी ज़ालिम के पंजे से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए
श्रीकृष्ण तलवार लेकर उसके दरबार में घुस जाते हैं और तलवार से उसका सिर
गर्दन से अलग कर देते हैं, उस समय की उनकी यह कार्रवाई अभिनन्दनीय है।
दोनों तलवारें हैं, दोनों हथियार हैं, दोनों कामों में बल-प्रयोग किया गया है, लेकिन
एक काम जुल्मों से भरा है, इसलिए उसे आतंक कहा जायेगा और दूसरा काम नेक
है, वह एक ज़ालिम और अत्याचारी की हस्ती को, ग़लत अक्षर की तरह, मिटाकर
लोगों पर परोपकार करना है, इसलिए वह नेक काम सम्माननीय है। पर यदि हमारी
मौजूदा फ़िलासफ़ी के हिसाब से देखा जाये तो दोनों ही काम आतंकवादी और
घृणित हैं। लोगों को दुख देने वाला ज़ालिम भी आतंकवादी, और लोगों को ज़ालिम
के पंजे से छुटकारा दिलाने वाला भी आतंकवादी! यदि हमारे देश में यही स्थिति
रही तो अच्छे-बुरे की पहचान कैसे होगी और सम्माननीय कामों और घृणित कामों
के फ़र्क़ का कैसे पता चलेगा?
यदि इतना जान लिया जाये कि ताक़त का ग़लत इस्तेमाल अर्थात ग़रीबों,
अनाथों को सताना आतंक कहलाता है और इन सबको रोकना अच्छे काम समझा
जाता है तो सारे भ्रम दूर हो सकते हैं। चोर, डाकू और हत्यारे जब हथियारों का
इस्तेमाल करते हैं तो वे आतंक करते हैं (That force being aggressively used
become violence), लेकिन जब घर का मालिक समय पाकर उस डाकू या हत्यारे
की छाती में छुरी घोंप देता है या उस डाकू को कोई न्यायप्रिय शासक फाँसी की
सज़ा देता है तो वह अच्छा काम होता है। इसीलिए हिन्दू धर्मशास्त्र के कर्ता मनु
जी लिखते हैं –
ज़ालिम, हत्यारे, अपराधी को ख़ुफ़िया ढंग से या खुले मैदान चुनौती देकर या
किसी और ढंग से छापा मारकर जान से मार डालने वाले दिलेर इन्सान पापी या
गुनाहगार नहीं, बल्कि सम्माननीय इन्सान कहलाता है। पुराने से पुराने और नये से
नये क़ानून के अनुसार आत्मरक्षा में किये बल-प्रयोग को कभी भी आतंक के नाम
से नहीं पुकारा गया। यहाँ तक कि हिन्दू दण्ड-विधान में भी उसे आतंक
(Violence) नहीं कहा गया। आतंक फैलाना दण्डनीय है, लेकिन आत्मरक्षा में
बल-प्रयोग क़ानूनी ताक़त समझी जाती है।
ठीक वही बात राजनीति की है। इटली पर इस देश की इच्छा के विरुद्ध
आस्ट्रिया सिर्फ़ तलवार के ज़ोर से राज करता था, इसलिए इटली को ज़बरदस्ती
अधीन रखने का उसका काम आतंक था, घृणित था और ख़त्म करने योग्य था।
लेकिन जब गैरीबाल्डी और मैजिनी ने इसके ख़िलाफ़ तलवार उठायी और उस
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 247