भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
प्रसिद्ध है। 1915 के शहीदों में भी अधिकतर इन्हीं ज़िलों के लोग थे। अब फिर
वहीं पर धूम मची। पुलिस विभाग ने सारी शक्ति ख़र्च कर दी, परन्तु कुछ न बन
पड़ा। जालन्धर से कुछ दूर एक बिल्कुल छोटी-सी नदी है। उसके किनारे एक
गाँव में ‘चौंतासाहब’ नामक गुरुद्वारा है। उसमें श्री कर्म सिंह जी, श्री धन्ना सिंह
जी, श्री उदय सिंह जी तथा श्री अनूप सिंह जी दो-एक और व्यक्तियों के साथ
बैठे थे, चाय बनाने की तैयारियाँ हो रही थीं। बैठे-बैठे श्री धन्ना सिंह ने कहा,
‘बाबा कर्म सिंह जी! हमें यहाँ से अभी इसी वक़्त चल देना चाहिए। मुझे किसी
बुरी घटना होने का-सा आभास हो रहा है।’ 75 वर्ष के बूढ़े कर्म सिंह ने इस
बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। पर श्री धन्ना सिंह अपने साथ 18 वर्षीय
दिलीप सिंह को लेकर चले ही गये। बैठे-बैठे बाबा कर्म सिंह ने श्री अनूप सिंह
की ओर बड़े ग़ौर से देखकर कहा – ‘अनूप सिंह, तुम अच्छे आदमी हो,’ मगर
इसके बाद उन्होंने खुद भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया। बातें अभी हो रही थीं
कि सचमुच ही पुलिस आ धमकी। सारे बम श्री अनूप सिंह के क़ब्ज़े में थे। ये
सब लोग उठकर गाँवों में छिप गये। पुलिस ने लाख सिर मारा, पर विफल रही।
अन्त में पुलिस की ओर से एक घोषणा की गयी। बागियों को निकालो, वरना
गाँव में आग लगा दी जायेगी। पर गाँव वाले विचलित नहीं हुए।
अवस्था को देखकर वे सब खुद ही बाहर निकल पड़े। सारे बम अनूप सिंह
ले भागा और जाकर आत्मसमर्पण कर दिया। शेष चार व्यक्ति वहीं पर घिरे हुए
खड़े थे। पुलिस के अंग्रेज़ कप्तान ने कहा, ‘कर्म सिंह! हथियार छोड़ दो, तुम्हें
माफ़ कर दिया जायेगा।’ वीर ने ललकारकर जवाब दिया – ‘हम अपने देश के
लिए सच्चे क्रान्तिकारी की तरह लड़ते-लड़ते शहीद हो जायेंगे, पर हथियार नहीं
डाल सकते।’ उन्होंने अपने तीनों साथियों को ललकारा। वे सिंह की तरह गरज
उठे। लड़ाई छिड़ गयी। खूब दनादन गोलियाँ चलीं। गोली-बारूद समाप्त होने पर
वे वीर पानी में कूद पड़े और घण्टों गोलियों की वर्षा होते रहने पर ये चारों वीर
स्वर्गधाम सिधार गये।
श्री कर्म सिंह की आयु 75 वर्ष की थी। वह कनाडा में रह चुके थे। उनका
आचरण पवित्र और चरित्र आदर्श था। सरकार ने समझा, बब्बर अकाली ख़त्म हो
गये, परन्तु वे उन्नति कर रहे थे। 18 वर्षीय दिलीप सिंह एक अत्यन्त सुन्दर, सुदृढ़,
हृष्ट-पुष्ट, पर अशिक्षित नवयुवक थे, और उनका डाकुओं का साथ हो गया था।
धन्ना सिंह जी की शिक्षा ने उन्हें डाकुओं से एक सच्चा क्रान्तिकारी बना दिया।
उधर सरदार बन्ता सिंह और वरियाम सिंह आदि कई प्रसिद्ध डाकू डाकेज़नी
छोड़कर इनमें आ मिले।
इन सबमें मृत्यु का डर नहीं था। ये अपने पिछले कुकर्मों को धो डालना चाहते
थे। इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। एक दिन मानहाना नामक गाँव में
104 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
धन्ना सिंह बैठे थे, पुलिस बुला ली गयी। नशे में चूर धन्ना सिंह बैठे ही पकड़
लिये गये। उनका भरा हुआ पिस्तौल छीनकर हाथों में हथकड़ी लगा दी गयी और
उन्हें बाहर लाया गया। बारह साधारण सिपाही और दो अंग्रेज़ ऑफ़िसर उनको घेरकर
खड़े हो गये। ठीक उसी समय धमाके की आवाज़ हुई। धन्ना सिंह जी ने बम चला
दिया था। इससे वे स्वयं भी मरे और साथ ही एक अंग्रेज़ ऑफ़िसर और दस
सिपाही। बाक़ी के लोग बुरी तरह घायल हुए।
इसी तरह मुण्डेर नामक गाँव में बैठे हुए बन्ता सिंह, ज्वाला सिंह आदि कई
लोग घिर गये। ये सब छत पर बैठे हुए थे। गोली चली, कुछ देर तक अच्छी झड़प
होती रही, पर पुलिस ने पम्प से मिट्टी का तेल छिड़ककर घर में आग लगा दी।
फिर भी वरयाम सिंह बच निकले, परन्तु बन्ता सिंह वहीं मारे गये।
अगर इससे पहले की एक-दो अन्य घटनाओं का वर्णन कर दिया जाये तो
अनुचित न होगा। बन्ता सिंह बड़े साहसी पुरुष थे। एक बार, शायद जालन्धर छावनी
जाकर रिसाले में पहरे पर खड़े हुए सिपाही की घोड़ी तथा रायफ़ल वे छीन लाये
थे। इन दिनों, जबकि पुलिस के दस्ते के दस्ते इनकी तलाश में मारे-मारे फिरते
थे, कहीं जंगल में किसी दस्ते से इनकी भेंट हो गयी। सरदार बन्ता सिंह ने फ़ौरन
चुनौती दी – ‘अगर हिम्मत हो तो दो-दो हाथ कर लो,’ परन्तु उस ओर तो थे पैसे
के गुलाम और इस ओर आत्मोत्सर्ग के इच्छुक। तुलना कैसे हो सकती है। सिपाहियों
का दस्ता चुपचाप चला गया।
इन लोगों को पकड़ने के लिए ख़ासतौर से पुलिस नियुक्त की गयी थी। और
उसकी थी यह दशा! खैर, गिरफ्तारियों की भरमार थी। गाँव-गाँव में पुलिस की
ताजीरी चौकियाँ बिठायी जाने लगीं। धीरे-धीरे बब्बर अकालियों का ज़ोर कम होने
लगा। अब तक तो मानो इन्हीं का राज्य था। जहाँ जाते, कुछ लोग हर्ष और चाव
से, कुछ भय और त्रास से इनकी खूब आवभगत करते। सरकार के सहायक एकदम
पस्त हुए बैठे थे। सूर्योदय के पहले सूर्योदय के बाद घर से निकलने का साहस
ही उन्हें न होता था। ये उन दिनों के ‘हीरो’ समझे जाते थे। वे वीर थे और उनकी
पूजा वीर-पूजा समझी जाती थी। परन्तु धीरे-धीरे उनका ज़ोर ख़त्म हो गया। सैकड़ों
पकड़े गये, मुक़दमे शुरू हुए।
वरयाम सिंह अकेले बचे थे। जालन्धर, होशियारपुर में पुलिस का अधिक ज़ोर
देखकर वे दूर लायलपुर में जा रहे थे। वहाँ पर एक दिन बिल्कुल घिर गये, मगर
खूब शान के साथ लड़ते हुए बच निकले, लेकिन बहुत थक गये थे। कोई साथी
भी न था। दशा बड़ी विचित्र थी। एक दिन ढेंसिया नामक गाँव में अपने मामा के
पास गये। शस्त्र बाहर रखे थे। शाम को भोजन करने के बाद अपने शस्त्रों के पास
जा रहे थे कि पुलिस आ पहुँची। फिर घिर गये। अंग्रेज़ नायक ने उन्हें पीछे से जा
पकड़ा। उन्होंने कृपाण से ही उसे बुरी तरह घायल कर दिया। फिर वे नीचे गिर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 105
गये। हथकड़ी पहनाने की सारी चेष्टाएँ विफल हुईं। दो वर्ष के पूर्ण दमन के पश्चात
अकाली जत्थे का अन्त हुआ। उधर मुक़दमा चलने लगा, जिसका परिणाम ऊपर
लिखा जा चुका है। अभी उस दिन इन लोगों ने शीघ्र फाँसी पर चढ़ाये जाने की
इच्छा प्रकट की थी। उनकी वह इच्छा पूरी हो गयी। वे शान्त हो गये।
106 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के वीरों से परिचय
9 अगस्त, 1925 को शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला और उनके
अन्य क्रान्तिकारी साथियों ने क्रान्तिकारी पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य
से लखनऊ के क़रीब काकोरी के पास रेलगाड़ी रोक सरकारी ख़ज़ाना लूटा। इसके
बाद चन्द्रशेखर आज़ाद के अलावा बाक़ी सभी क्रान्तिकारी पकड़े गये। भगतसिंह भी
तब कानपुर निवास के समय हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में भरती हो चुके थे।
‘विद्रोही’ नाम से मई, 1927 में भगतसिंह ने ‘काकोरी के वीरों से परिचय’
शीर्षक लेख पंजाबी में छपवाया। उस लेख के छपते ही भगतसिंह को गिरफ़्तार कर
लिया गया। चारपाई पर हथकड़ी लगे बैठे भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र इसी गिरफ़्तारी
के समय लिया गया। इससे पहले भगतसिंह पंजाब लौटकर शचीन्द्रनाथ सान्याल की
पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ का पंजाबी अनुवाद छपवा चुके थे। – स.
पहले ‘किरती’ (पंजाबी पत्रिका) में काकोरी से सम्बन्धित कुछ लिखा जा चुका
है। आज हम काकोरी षड्यन्त्र और उन वीरों के सम्बन्ध में कुछ लिखेंगे जिन्हें उस
सम्बन्ध में कड़ी सज़ाएँ मिली हैं।
9 अगस्त, 1925 को एक छोटे-से स्टेशन काकोरी से एक पैसेंजर ट्रेन चली।
यह स्टेशन लखनऊ से आठ मील की दूरी पर है। ट्रेन मील-डेढ़ मील चली होगी
कि सेकेण्ड क्लास में बैठे हुए तीन नौजवानों ने गाड़ी रोक ली और दूसरों ने
मिलकर गाड़ी में जा रहा सरकारी ख़ज़ाना लूट लिया। उन्होंने पहले ही ज़ोर से
आवाज़ देकर सभी यात्रियों को समझा दिया था कि वे डरें नहीं, क्योंकि उनका
उद्देश्य यात्रियों को तंग करने का नहीं, सिर्फ़ सरकारी ख़ज़ाना लूटने का है। खैर,
वे गोलियाँ चलाते रहे। वह (कोई यात्री) आदमी गाड़ी से उतर पड़ा और गोली
लग जाने से मर गया।
सरकारी अधिकारी हार्टन, सी.आई.डी. इसकी जाँच में लगा। उसे पहले से ही
यक़ीन हो गया था कि यह डाका क्रान्तिकारी जत्थे का काम है। उसने सभी
सन्दिग्ध व्यक्तियों की छान-बीन शुरू कर दी। इतने में क्रान्तिकारी जत्थे की राज्य
परिषद की एक बैठक मेरठ में होनी तय हुई। सरकार को इसका पता चल गया।
वहाँ ख़ूब छानबीन की गयी।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 107
फिर सितम्बर के अन्त में हार्टन ने गिरफ्तारियों के वारण्ट जारी किये और 26
सितम्बर को बहुत-सी तलाशियाँ ली गयीं और बहुत-से व्यक्ति पकड़ लिये गये।
कुछ नहीं पकड़े गये। उनमें से एक श्री राजेन्द्र लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम केस में
पकड़े गये और वहीं उन्हें दस बरस क़ैद हो गयी। और श्री अशफ़ाक़उल्ला और
शचीन्द्र बख्शी बाद में पकड़े गये, जिन पर अलग मुक़दमा चला।
जज के फ़ैसले से यह पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन दब जाने से
देशभक्त युवकों का शान्ति से विश्वास उठ गया और उन्होंने युगान्तर दल स्थापित
किया। श्री जोगेशचन्द्र चट्टोपाध्याय बंगाल से इस दल का संगठन बनाने यू.पी.
आये और पक्का काम कर सितम्बर, 1924 में लौट गये। उस समय बंगाल में
आर्डिनेंस पास हो चुका था और आप लौटते ही हावड़ा पुल पर पकड़े गये। तलाशी
लेने पर आपकी जेब से एक काग़ज़ मिला, जिस पर यू.पी. की राज्य परिषद की
किसी बैठक का और यू.पी. में अपने दल के संगठन का हाल लिखा हुआ था।
खैर, फिर काम चल पड़ा और काम चलाने की ख़ातिर कई डकैतियाँ भी की गयीं।
जज के विचार में इस दल के नेता हैं — श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल।
श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल का नाम किससे छिपा है। आप ही ‘बन्दी जीवन’
जैसी प्रसिद्ध व शानदार पुस्तक के लेखक हैं। बनारस के निवासी हैं और 1915
के ग़दर आन्दोलन में आपने खूब काम किया था। आप बनारस षड्यन्त्र के नेता
व श्री रासबिहारी जी का दायाँ हाथ थे। तब उम्रक़ैद हुई थी लेकिन 1920 में छूट
गये थे। फिर आप अपने पिछले काम पर ही जुट गये और सन् 1925 के शुरू में
‘दि रेवल्यूशनरी’ परचा एक ही दिन में सारे हिन्दुस्तान में बँटा। उसकी भाषा व
अच्छे विचारों की अंग्रेज़ी अख़बारों ने भी खूब तारीफ़ की थी। आप फ़रवरी में
पकड़े गये। आप पर उस सम्बन्ध में मुक़दमा चलाया गया और आपको दो साल
क़ैद की सज़ा मिली। वहीं से आपको काकोरी के मुक़दमे में घसीट लिया गया।
आप बड़े ज़िन्दादिल हैं। कोर्ट में स्वयं खुश रहना और दूसरों को खुश रखना ही
आपका काम था। आप ने अपना मामला स्वयं लड़ा। जज आपको ही सबका गुरु
कहता है। ‘बन्दी जीवन’ का गुजराती व पंजाबी में अनुवाद हो चुका है।
आप अंग्रेज़ी और बंगाली के उच्च कोटि के लेखक हैं। अब आपको दो
उम्रक़ैद हो गयी है।
आपके साथ आपका छोटा भाई भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी घसीट लिया गया। वह
क़रीब बी.ए. में पढ़ता था। पकड़ा गया और उसे पाँच साल की क़ैद हो गयी।
श्री शचीन्द्र के बाद अत्यन्त प्रसिद्ध वीर श्री रामप्रसाद हैं। आप जैसा सुन्दर,
मज़बूत जवान खोजने से मिलना भी मुश्किल है। बहुत योग्य आदमी है। हिन्दी का
बड़ा लेखक है। आपने ‘कैथराइन’, ‘बोल्शेविकों के काम’, ‘मन की लहर’ आदि
अनेक पुस्तकें लिखीं। आप उर्दू के माने हुए शायर हैं। आपकी उम्र 28 बरस की
108 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
है। पहले 1919 में मैनपुरी षड्यन्त्र में आपके वारण्ट निकले और आपके गुरु श्री
गेंदालाल जी आदि पकड़े गये, लेकिन आप नेपाल की ओर चले गये और वहाँ बड़ी
मुश्किलें सहन कर गुज़ारा करते रहे। पूरा दिन हल चलाना, कुदाल चलाना,
मेहनत-मशक़्कत करना और रात में सिर्फ़ डेढ़ आना पाना, जिससे पेटभर रोटी भी
नहीं खा सकते थे। कई बार तो घास तक खाना पड़ा। लेकिन मज़ा यह, फिर भी
बैठकर कविता लिखना, और भारतमाता की याद और प्रेम में आँसू बहाने और गीत
गाने। ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध-विद्या में बड़े कुशल हैं और
आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर
को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर
जवान, ऐसा योग्य और उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना मुश्किल
है।
तीसरे वीर श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी हैं। 24 वर्ष का अत्यन्त सुन्दर जवान
एम.ए., बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। जज कहता है कि यह
युगान्तर दल का एक मज़बूत स्तम्भ है। आप गाड़ी रोकने वालों में थे। बाहर से
था – कमज़ोर सूखा-सा। कलकत्ते के पास दक्षिणेश्वर बम फ़ैक्टरी में पकड़ा गया,
वहीं दस साल क़ैद हुई। खुशी में मोटा होने लगा। काकोरी के मुक़दमे में तो शरीर
ख़ूब भर गया था और अब फाँसी की सज़ा हो गयी है।
वीर रोशन सिंह को भी फाँसी की सज़ा हुई है। आप पहले पुलिस की मदद
करते थे और बहुत-से डकैत आपने पकड़वाये थे। आप भी फँस गये। लेकिन कोई
डकैत तो नहीं है। जज भी कहता है, यह नौजवान सच्चे देशसेवक थे! अच्छा! इस
वीर को भी बार-बार नमस्कार।
इसके बाद श्री मन्मथनाथ गुप्त की बारी है। आप काशी विद्यापीठ के बी.ए.
के विद्यार्थी थे। 18 बरस की उम्र है। बंगाली, गुजराती, मराठी, उड़िया, हिन्दी,
अंग्रेज़ी और फ़्रेंच आदि अनेक भाषाएँ आपने सीख ली थीं। जज ने आपको भी
डकैतियों में शामिल कर 14 साल की सख़्त सज़ा दी है। आप बड़े निर्भय हैं और
यह सज़ा सुनकर हँस दिये। आजकल जेल में भूख हड़ताल किये बैठे हैं। आपसे
गैर-सरकारी सदस्य ने जेल में आकर पूछा कि खाना क्यों नहीं खाते, तो आपने
उत्तर दिया कि हम मनुष्य हैं। हमारे साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार होना चाहिए। मैं नहीं
समझता कि इस पशुओं जैसे व्यवहार को सहन कर मैं 14 साल तक जी सकूँगा।
तिल-तिल कर मरने से एक बार मर जाना अच्छा है। आप पहले असहयोग में भी
जेल जा चुके हैं।
अब जिस नौजवान का ज़िक्र होगा उसे यदि हम महापुरुष कह दें तो कुछ झूठ
न होगा। वह वीर श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी हैं। आप कोमिल्ला (ढाका) के रहने वाले
हैं। वह बी.ए. में फ़िलासफ़ी के विद्यार्थी थे। प्रोफेसर आप पर बहुत खुश थे और
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 109
कहते थे कि लड़का बड़ा होनहार है। लेकिन आपने कॉलेज तो क्या, पूरी दुनिया
की फ़िलासफ़ी पर लात मार दी और सबकुछ छोड़कर युगान्तर दल में जा मिले।
आपको डिफेंस ऑफ़ इण्डिया एक्ट के अनुसार गिरफ़्तार किया गया और
अकथनीय व असहनीय कष्ट दिये गये। एक दिन आपके सर पर पाखाना डाल
दिया गया और चार दिन तक कोठरी में बन्द रखा गया। मुँह धोने तक के लिए
पानी नहीं दिया गया और बुरी तरह मार-मारकर पूरा बदन ज़ख़्मी कर दिया गया।
लेकिन आपके पास चुप से अधिक क्या रखा था।
1920 में छूटे तो एक मामूली कार्यकर्ता की तरह कांग्रेस में काम करते रहे।
घर से ग़रीब हैं, लेकिन अपना घर तबाह करके भी दुनिया में सेवा होती है। आप
1923 में यू.पी. आये और फिर ‘युगान्तर’ दल की नींव रखी। 1924 में बंगाल लौट
गये और पकड़े गये। पहले आपको आर्डिनेंस के तहत पकड़ा था, फिर यहाँ काकोरी
लाया गया। आपको दस बरस क़ैद हुई है। बेहद ख़ूबसूरत नौजवान हैं। जज ने
आपकी बड़ी तारीफ़ की है।
श्री गोविन्द चरणकार उर्फ़ डी.एन. चौधरी लखनऊ से पकड़े गये थे। आप
बहुत पुराने क्रान्तिकारी हैं। 1918 या 1919 में ढाका में पुलिस आपको पकड़ने
आयी। आपने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया और गोलियों में से लड़ते-लड़ाते
भाग निकले, लेकिन गोलियाँ ख़त्म हो चुकी थीं और आप घायल हो गये थे। पकड़े
गये, कालापानी मिला। 1922 में बहुत बीमार हो गये थे, तब छोड़े गये। 1925 में
फिर पकड़े गये और अब 10 साल क़ैद हो गयी है।
अब श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य सम्बन्धी कुछ लिखेंगे। आप भी बनारस के
रहने वाले थे। बनारस षड्यन्त्र के समय आपकी उम्र 16 बरस की थी, पकड़े
गये। लेकिन कुछ प्रमाणित न होने से छूट गये और फिर नज़रबन्द कर
बुन्देलखण्ड में रखे गये। आप हिन्दी के बड़े प्रसिद्ध लेखक हैं। कानपुर के
‘प्रताप’ जैसे प्रसिद्ध अख़बार के सहायक सम्पादक थे। आप बनारस से पकड़े
गये और अब आपको सात साल क़ैद हुई है। आप बहुत सुन्दर गाते हैं। जेल में
आप योगाभ्यास करते थे।
श्री राजकुमार कानपुर के रहने वाले हैं। आप बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में
बी.ए. में पढ़ते थे। पकड़े गये। आपके कमरे से दो रायफ़लें निकलीं। बहुत सुन्दर
गाने वाले और देखने में भी आप काफ़ी सुन्दर हैं। जोशीले बहुत हैं। श्री दामोदर
स्वरूप जब बहुत बीमार होने पर भी कोर्ट में बुलाये गये तो आपको जोश आ गया
और आपने जज को ख़ूब सुनायी। जज ने कहा कि फ़ैसले के समय तुम्हें इसका
मज़ा चखाया जायेगा। वीर युवक को दस साल की सज़ा हो गयी! जीवन एक तरह
से तबाह हो गया, लेकिन आप हँस दिये। धन्य हैं ये वीर और इन्हें जन्म देने वाली
वीर माताएँ।
110 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
श्री विष्णु शरण दुबलिस मेरठ के रहने वाले हैं। वैश्य अनाथालय के अधीक्षक
थे। बी.ए. में असहयोग कर दिया गया था और मेरठ को उन्होंने दूसरा बारदोली बना
दिया था। सिविल नाफ़रमानी के लिए तैयार हो गये थे। बड़े सुन्दर वक्ता थे। आपके
घर युगान्तरकारियों की बैठक हुई थी। आपको सात साल की सज़ा हो गयी है।
श्री रामदुलारे को भी 7 साल की सज़ा हुई है। आप कानपुर निवासी थे।
स्काउट मास्टर, कांग्रेस के जोशीले सेवक थे।
6 अप्रैल को फ़ैसला सुनाया गया, उस दिन सभी वीर गाते आये थे –
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है!
सज़ाएँ लापरवाही से सुनीं और हँस दिये। उसके बाद दुख की घड़ी आ गयी।
जिन वीरों ने एक साथ समुद्र में किश्तियाँ डाली थीं, उनके ही अलग होने का
पल आ गया। “क्रान्तिकारी लोगों में जो अगाध और गम्भीर प्रेम होता है, उसे
साधारण दुनियादार आदमी अनुभव नहीं कर सकते,” श्री रासबिहारी के इस वाक्य
का अर्थ भी हम लोग नहीं समझ सकते। जिन लोगों ने ‘सिर रख तली प्रेम की
गली' में पैर रख दिया हो, उनकी महिमा को हमारे जैसे निकृष्ट आदमी क्या समझ
सकते हैं? उनका परस्पर प्रेम कितना गहन होता है, उसे हम सपने में भी नहीं जान
सकते। डेढ़ साल से अपने जीवन के अन्धकारमय भविष्य के इन्तज़ार में मिलकर
बैठे थे। वह पल आया, तीन को फाँसी, एक को उम्रक़ैद, एक को 14 बरस क़ैद,
4 को दस बरस क़ैद व बाक़ियों को 5 से 10 साल की सख़्त क़ैद सुनाकर जज
उन्हें उपदेश देने लगा, “आप सच्चे सेवक और त्यागी हो। लेकिन ग़लत रास्ते पर
चले हो।” ग़रीब भारत में ही सच्चे देशभक्तों का यह हाल होता है। जज उन्हें अपने
कामों पर पुनर्विचार करने की बात कह चलता बना और फिर...फिर क्या हुआ?
क्या पूछते हैं? जुदाई के पल बड़े बुरे होते हैं। जिन्हें फाँसी की सज़ा मिल गयी,
जिन्हें उम्रभर के लिए जेल में बन्द कर दिया गया, उनके दिलों का हाल हम नहीं
समझ सकते। क़दम-क़दम पर रोने वाले हिन्दुस्तानी, यों ही थर-थर काँपने लग
जाने वाले कायर हिन्दुस्तानी, उन्हें क्या समझ सकते हैं? छोटों ने बड़ों के पैरों पर
झुककर नमस्कार किया। उन्होंने छोटों को आशीर्वाद दिया, ज़ोर से गले मिले और
आह भरकर रह गये। भेज दिये गये। जाते हुए श्री रामप्रसाद जी ने बड़े दर्दनाक
लहजे में कहा –
दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं।
यह कहकर वह लम्बी, बड़ी दूर की यात्रा पर चले गये। दरवाज़े से निकलते
समय उस अदालत के बड़े भारी रैंकन थियेटर हाल की भयावह चुप्पी की एक
आह भरकर तोड़ते हुए उन्होंने फिर कहा –
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 111
हाय, हम जिस पर भी तैयार थे मर जाने को।
जीते जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।
हम लोग एक आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया। हमें
आग नहीं लग उठती, हम तड़प नहीं उठते, हम इतना मुर्दे हो गये हैं। आज वे
भूख-हड़ताल कर बैठे हैं और तड़प रहे हैं और हम चुपचाप सब तमाशा देख रहे
हैं। ईश्वर उन्हें बल व शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों
के बलिदान रंग लायें।
लेखक
'विद्रोही'
112 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के शहीदों की
फाँसी के हालात
जनवरी, 1928 के ‘किरती’ में भगतसिंह ने एक और लेख काकोरी के शहीदों
के बारे में ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा। – स.
‘किरती’ के पाठकों को पहले किसी अंक में हम काकोरी के मुक़दमे के हालात
बता चुके हैं। अब इन चार वीरों को फाँसी दिये जाने का हाल बताते हैं।
17 दिसम्बर, 1927 को श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी को गोण्डा जेल में फाँसी दी
गयी और 19 दिसम्बर, 1927 को श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर जेल में,
श्री अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद जेल में और श्री रोशन सिंह जी को इलाहाबाद
जेल में फाँसी चढ़ा दिया गया।
इस मुक़दमे के सेशन जज मि. हेमिल्टन ने फैसला देते हुए कहा था कि
ये नौजवान देशभक्त हैं और इन्होंने अपने किसी लाभ के लिए कुछ भी नहीं
किया और यदि ये नौजवान अपने किये पर पश्चाताप करें तो उनकी सज़ाओं में
रियायत की जा सकती है। उन चारों वीरों द्वारा इस आशय की घोषणा भी हुई,
लेकिन उन्हें फाँसी दिये बग़ैर डायन नौकरशाही को चैन कैसे पड़ता। अपील में
बहुत-से लोगों की सज़ाएँ बढ़ा दी गयीं। फिर न तो गवर्नर और न ही वायसराय
ने उनकी जवानी की ओर ध्यान दिया और प्रिवी कौंसिल ने उनकी अपील सुनने
से पहले ही ख़ारिज कर दी। यू.पी. कौंसिल के बहुत-से सदस्यों, असेम्बली और
कौंसिल और स्टेट के बहुत-से सदस्यों ने वायसराय को उनकी जवानी पर दया
करने की दरख़्वास्त दी, लेकिन होना क्या था? उनके इतने हाथ-पाँव मारने का
कोई परिणाम न निकला। यू.पी. कौंसिल के स्वराज पार्टी के नेता श्री गोविन्द
वल्लभ पन्त उनके मामले पर बहस के लिए अपना मत वायसराय और लाट
साहिब को भेजने के लिए शोर मचा रहे थे। पहले तो प्रेजिडेण्ट साहिब ही
अनुमति नहीं दे रहे थे, लेकिन बहुत-से सदस्यों ने मिलकर कहा तो सोमवार
को बहस के लिए इजाज़त मिली, लेकिन फिर छोटे अंग्रेज़ अध्यक्ष ने, जो उस
समय अध्यक्ष का काम कर रहा था, सोमवार को कौंसिल की छुट्टी ही कर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 113
दी। होम मेम्बर नवाब छत्तारी के दर पर जा चिल्लाये, लेकिन उनके कानों पर
जूँ तक न सरकी। और कौंसिल में उनके सम्बन्ध में एक शब्द भी न कहा जा
सका और उन्हें फाँसी पर लटका ही दिया गया। इसी क्रोध में नीचता के साथ
रूसी ज़ार और फ़्रांसीसी लुइस बादशाह होनहार युवकों को फाँसी पर
लटका-लटकाकर दिलों की भड़ास निकालते रहे लेकिन उनके राज्यों की नींवें
खोखली हो गयी थीं और उनके तख़्ते पलट गये। इसी ग़लत तरीक़े का आज
फिर इस्तेमाल हो रहा है। देखें यदि इस बार इनकी मुरादें पूरी हों। नीचे हम उन
चारों वीरों के हालात संक्षेप में लिखते हैं, जिससे यह पता चले कि ये अमूल्य
रत्न मौत के सामने खड़े होते हुए भी किस बहादुरी से हँस रहे थे।
श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
आप हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के एम.ए. के छात्र थे। 1925 में कलकत्ते के पास
दक्षिणेश्वर बम फैक्टरी पकड़ी गयी थी, उसमें आप भी पकड़े गये थे और आपको
सात बरस की क़ैद हो गयी थी। वहीं से आपको लखनऊ लाया गया और काकोरी
केस में आपको फाँसी की सज़ा दे दी गयी। आपको बाराबंकी और गोण्डा जेलों
में रखा गया। आप मौत को सामने देख घबराते नहीं थे, बल्कि हमेशा हँसते रहते
थे। आपका स्वभाव बड़ा हँसमुख और निर्भय था। आप मौत का मज़ाक़ उड़ाते रहते
थे। आपके दो पत्र हमारे सामने हैं। एक छह अक्टूबर को तब लिखा था जब
वायसराय ने रहम की दरख्वास्त नामंजूर कर दी थी। आप लिखते हैं —
छह महीने बाराबंकी और गोण्डा की काल-कोठरियों में रहने के बाद आज
मुझे बताया गया है कि एक हफ़्ते के भीतर फाँसी दे दी जायेगी, क्योंकि वायसराय
ने दरख्वास्त नामंजूर कर दी है। अब मैं फ़र्ज़ समझता हूँ कि अपने इन मित्रों का
(यहाँ उनके नाम हैं) धन्यवाद कर जाऊँ जिन्होंने मेरे लिए बहुत-सी कोशिशें कीं।
आप मेरा अन्तिम नमस्कार स्वीकार करें। हमारे लिए मरना-जीना पुराने कपड़े
बदलने से अधिक कुछ भी नहीं (यहाँ जेलवालों ने कुछ काट-छाँट की है, जो
बिल्कुल पढ़ा नहीं जाता) मौत आ रही है, हँसते-हँसते बड़े चाव और खुशी से उसे
ज़ोर से गले लगा लूँगा। जेल के क़ानून अनुसार और कुछ नहीं लिख सकता।
आपको नमस्कार, देश के दर्दमन्दों को नमस्कार, वन्देमातरम!
आपका,
राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
फिर इस पत्र के बाद फाँसी नहीं हो सकी, क्योंकि प्रिवी कौंसिल में अपील
की गयी थी। दूसरा पत्र आपने 14 दिसम्बर को एक मित्र के नाम लिखा था —
कल मुझे पता चला है कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील ख़ारिज कर दी है।
आप लोगों ने हमें बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लगता है कि देश की
114 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बलि-वेदी पर हमारे प्राणों के बलिदान की ही ज़रूरत है। मौत क्या है? जीवन की
दूसरी दिशा के सिवाय कुछ नहीं। जीवन क्या है? मौत की ही दूसरी दिशा का
नाम है। फिर डरने की क्या ज़रूरत है? यह तो प्राकृतिक बात है, उतनी ही
प्राकृतिक जितना कि प्रातः में सूर्योदय। यदि हमारी यह बात सच है कि इतिहास
पलटा खाता है तो मैं समझता हूँ कि हमारा बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा।
मेरा नमस्कार सबको – अन्तिम नमस्कार!
आपका
राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
कितना भोला, कितना सुन्दर और निर्भीकतापूर्ण पत्र है। इनका लेखन कितना
भोला है! फिर इन्हें ही अन्यों से दो दिन पहले ही फाँसी दे दी गयी। फाँसी के
समय आपको हथकड़ी पहनाने का इन्तज़ाम किया जाने लगा तो आपने कहा कि
क्या ज़रूरत है। आप मुझे रास्ता बताते जाओ, मैं स्वयं ही उधर चल पड़ता हूँ। अर्थी
का जलूस निकाला गया और बड़े जोश से अन्तिम संस्कार किया गया। वहीं यादगार
बनाने की सलाह की जा रही है।
श्री रोशन सिंह जी
आपको 19 दिसम्बर को इलाहाबाद में फाँसी दी गयी। उनका एक आख़िरी पत्र
13 दिसम्बर का लिखा हुआ है। आप लिखते हैं –
इस हफ़्ते फाँसी हो जायेगी। ईश्वर के आगे विनती है कि आपके प्रेम का
आपको फल दे। आप मेरे लिए कोई ग़म न करना। मेरी मौत तो खुशी वाली है।
चाहिए तो यह कि कोई बदफैली करके बदनाम होकर न मरे और अन्त समय ईश्वर
याद रहे। सो यही दो बातें हैं। इसलिए कोई ग़म नहीं करना चाहिए। दो साल
बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। ईश्वर-भजन का ख़ूब अवसर मिला। इसलिए
मोह-माया सब टूट गयी। अब कोई चाह बाक़ी न रही। मुझे विश्वास है कि जीवन
की दुख भरी यात्रा ख़त्म करके सुख के स्थान पर जा रहा हूँ। शास्त्रों में लिखा है,
युद्ध में मरने वालों की ऋषियों जैसी रहत (श्रेणी) होती है। (आगे अस्पष्ट है)
'ज़िन्दगी ज़िन्दादिली को जानिये रोशन!' वरना कितने मरे और पैदा होते जाते
हैं। आख़िरी नमस्कार!
श्री रोशन सिंह रायबरेली के काम करने वालों में थे। किसान आन्दोलन में जेल
जा चुके थे। सबको विश्वास था कि हाईकोर्ट से आपकी मौत की सज़ा टूट जायेगी
क्योंकि आपके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं था। लेकिन फिर भी वे अंग्रेज़शाही का
शिकार हो ही गये और फाँसी पर लटका दिये गये। तख़्ते पर खड़े होने के बाद
आपके मुँह से जो आवाज़ निकली, वह यह थी –
'वन्देमातरम्!'
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 115
आपकी अर्थी के जुलूस की इजाज़त नहीं दी गयी। लाश की फ़ोटो लेकर
दोपहर में आपका दाह-संस्कार कर दिया गया।
श्री अशफ़ाक़उल्ला
यह मस्ताना शायर भी हैरान करने वाली खुशी से फाँसी चढ़ा। बड़ा सुन्दर और
लम्बा-चौड़ा जवान था, तगड़ा बहुत था। जेल में कुछ कमज़ोर हो गया था। आपने
मुलाक़ात के समय बताया कि कमज़ोर होने का कारण ग़म नहीं, बल्कि खुदा की
याद में मस्त रहने की ख़ातिर रोटी बहुत कम खाना है। फाँसी से एक दिन पहले
आपकी मुलाक़ात हुई। आप खूब सजे-सँवरे थे। बड़े-बड़े कढ़े हुए केश खूब सजते
थे। बड़ा हँस-हँसकर बातें करते रहे। आपने कहा, कल मेरी शादी होने वाली है।
दूसरे दिन सुबह छह बजे आपको फाँसी दी गयी। कुरान शरीफ़ का बस्ता
लटकाकर हाजियों की तरह वज़ीफ़ा पढ़ते हुए बड़े हौसले से चल पड़े। आगे जाकर
तख्ते पर रस्सी को चूम लिया। वहीं आपने कहा –
“मैंने कभी किसी आदमी के खून से अपने हाथ नहीं रँगे और मेरा इन्साफ़
खुदा के सामने होगा। मेरे ऊपर लगाये सभी इल्ज़ाम ग़लत हैं।” खुदा का नाम लेते
ही रस्सी खींची गयी और वे कूच कर गये। उनके रिश्तेदारों ने बड़ी मिन्नतों-
खुशामदों से उनकी लाश ली और उन्हें शाहजहाँपुर ले आये। लखनऊ स्टेशन पर
मालगाड़ी के एक डिब्बे में उनकी लाश देखने का अवसर कुछ लोगों को मिला।
फाँसी के दस घण्टे बाद भी चेहरे पर वैसी ही रौनक थी। ऐसा लगता था कि अभी
ही सोये हों। लेकिन अशफ़ाक़ तो ऐसी नींद सो गये थे कि जहाँ से वे कभी नहीं
जागेंगे। अशफ़ाक़ शायर थे और उनका शायर उपनाम हसरत था। मरने से पहले
आपने ये दो शेर कहे थे –
‘फ़नाह हैं हम सबके लिए, हम पै कुछ नहीं मौक़ूफ़!
बक़ा है एक फ़कत जाने की ब्रिया के लिए।’
(नाश तो सभी होंगे, कोई हम अकेले थोड़े होंगे। न मरने वाला तो सिर्फ़ एक
परमात्मा है।)
और –
‘तंग आकर हम उनके जुल्म से बेदाद से,
चल दिये सूए अदम ज़िन्दाने फ़ैज़ाबाद से।’
श्री अशफ़ाक़ की ओर से एक माफ़ीनामा छपा था, उसके सम्बन्ध में
श्री रामप्रसाद जी ने अपने आख़िरी एलान में पोज़ीशन साफ़ कर दी है। आपने कहा
है कि अशफ़ाक़ माफ़ीनामा तो क्या, अपील के लिए भी राजी नहीं थे। आपने कहा
था, मैं खुदा के सिवाय किसी के आगे झुकना नहीं चाहता। परन्तु रामप्रसाद के
116 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
एक मिट जाने की हसरत,
अब दिले-बिस्मिल में है!
फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और फिर एक मन्त्र पढ़ना शुरू किया। रस्सी
खींची गयी। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये। आज वह वीर इस संसार में नहीं
है। उसे अंग्रेज़ी सरकार ने अपना ख़ौफ़नाक दुश्मन समझा। आम ख़याल यह है कि
उसका क़सूर यही था कि वह इस गुलाम देश में जन्म लेकर भी एक बड़ा भारी
बोझ बन गया था और लड़ाई की विद्या से खूब परिचित था। आपको मैनपुरी
षड्यन्त्र के नेता श्री गेंदालाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने विशेष तौर पर शिक्षा देकर
तैयार किया था। मैनपुरी के मुक़दमे के समय आप भागकर नेपाल चले गये थे।
अब वही शिक्षा आपकी मृत्यु का एक बड़ा कारण हो गया। 7 बजे आपकी लाश
मिली और बड़ा भारी जुलूस निकला। स्वदेशप्रेम में आपकी माता ने कहा –
“मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुखी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा
ही पुत्र चाहती थी। बोलो श्री रामचन्द्र की जय!”
इत्र-फुलेल और फूलों की वर्षा के बीच उनकी लाश का जुलूस जा रहा था।
दुकानदारों ने उनके ऊपर से पैसे फेंके। 11 बजे आपकी लाश श्मशान भूमि में
पहुँची और अन्तिम-क्रिया समाप्त हुई।
आपके पत्र का आख़िरी हिस्सा आपकी सेवा में प्रस्तुत है –
“मैं खूब सुखी हूँ। 19 तारीख़ को प्रातः जो होना है उसके लिए तैयार हूँ।
परमात्मा काफ़ी शक्ति देंगे। मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिए फिर
जल्द ही जन्म लूँगा। सभी से मेरा नमस्कार कहें। दया कर इतना काम और भी
करना कि मेरी ओर से पण्डित जगतनारायण (सरकारी वकील जिसने इन्हें फाँसी
लगवाने के लिए बहुत ज़ोर लगाया था) को अन्तिम नमस्कार कह देना। उन्हें हमारे
ख़ून से लथपथ रुपयों से चैन की नींद आये। बुढ़ापे में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।”
रामप्रसाद जी की सारी हसरतें दिल ही दिल में रह गयीं। आपने एक
लम्बा-चौड़ा एलान किया है, जिसे संक्षेप में हम दूसरी जगह दे रहे हैं। फाँसी से
दो दिन पहले सी.आई.डी. के मि. हैमिल्टन आप लोगों की मिन्नतें करते रहे कि
आप मौखिक रूप से सब बातें बता दो, आपको पाँच हज़ार रुपया नक़द दे दिया
जायेगा और सरकारी ख़र्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवायी जायेगी।
लेकिन आप कब इन बातों की परवाह करते थे। आप हुकूमतों को ठुकराने वाले
व कभी-कभार जन्म लेने वाले वीरों में से थे। मुक़दमे के दिनों आपसे जज ने पूछा
था, “आपके पास क्या डिग्री है?” तो आपने हँसकर जवाब दिया था, “सम्राट
बनाने वालों को डिग्री की कोई ज़रूरत नहीं होती, क्लाइव के पास भी कोई डिग्री
नहीं थी।” आज वह वीर हमारे बीच नहीं है। आह!!
118 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के शहीदों के लिए
प्रेम के आँसू
जनवरी, 1928 के 'किरती' ने काकोरी के शहीदों सम्बन्धी एक सम्पादकीय
नोट भी प्रकाशित किया। यह भगतसिंह का लिखा हुआ तो नहीं है, लेकिन उनके
साथी भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है। निश्चय ही, यह भी ऐतिहासिक दस्तावेज़
है, जिसे नीचे दिया जा रहा है। – स.
काकोरी केस के चार वीरों को फाँसी पर लटका दिया गया। वे लाड़-प्यार से पले
शूरवीर हँसते-हँसते शहादत प्राप्त कर गये। भारतमाता के चार सुपुत्र अपने शीश देश
और राष्ट्र के नाम अर्पण कर गये। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा, अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया।
वे इस पंच भौतिक शरीर की क़ैद से आज़ाद हो गये और हम गुलामों को अपनी
गुलामी के दुखड़े रोने के लिए पीछे छोड़ गये!!!
जिस देश में देशभक्ति गुनाह समझा जाता हो, जिस देश में आज़ादी की
ख़्वाहिश रखना बग़ावत समझा जाता हो, जहाँ लोककल्याण की सज़ा मौत हो, जहाँ
देशभक्तों की गर्दन में फाँसी का रस्सा डाला जाता हो, उस देश की हालत ख़्याल
में तो भले ही आ जाये, लेकिन बयान नहीं की जा सकती। किसी देश की
अधोगति इससे ज़्यादा क्या हो सकती है। लेकिन जिस देश में यह अन्याय नित्य
प्रति होते हों, जहाँ ऐसे अत्याचार दिन-प्रतिदिन ही होते रहें यदि वहाँ के निवासी
ऐसे-ऐसे अन्यायों, ऐसे अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी तो दूर, आह तक न
भर सकते हों तो उस देश के निवासियों की हालत कैसी होगी?
हिन्दुस्तान गुलाम है। इसकी बागडोर विदेशियों के हाथ है। इससे प्रेम करना
मौत को पुकारना है। इसकी आज़ादी के सपने देखना घर-बार, बाल-बच्चे छोड़कर
जलावतनी की ज़िन्दगी गुज़ारना है। इस महीवाल के प्रेम ने कई सोहनियों को गहरे
समुद्रों में डुबोया। इसके प्रेम ने कई प्रेमियों के दल के दल ख़त्म किये। इसका
प्रेम अगाध है, अथाह है। इसके प्रेमी बेअन्त हैं, असंख्य हैं। न इस प्रेम का स्वर
पता चलता है, न इसके प्रेमियों को ताव आती है। यहाँ तो 'चुप भाई चुप' वाली
बात है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 119
यह ज़ुल्म कब तक रहेगा? इस अन्याय का भाण्डा कब फूटेगा? बेगुनाहों को
कब तक शहीद किया जायेगा? देश-प्रेमियों को कब तक गोली का निशाना बनाया
जायेगा? कब तक इस गुलामी डायन का और मुँह देखना पड़ेगा? आज़ादी देवी के
दर्शन कब तक होंगे? अभी कितनी शहीदियाँ प्राप्त करनी होंगी। अभी और कितनों
को फाँसी पर चढ़ाया जायेगा?
रब्बा! वह दिन कब आयेगा, जब ये शहीदियाँ रंग लायेंगी। ईश्वर, वह दिन कब
देखेंगे जब हमारा बग़ीचा हरा-भरा होगा? यहाँ से पतझड़ का कूच कब होगा? उल्लू
कब तक इस बाग़ में डेरा जमाये बैठे रहेंगे? बुलबुलें किस दिन फिर यहाँ
चहचहायेंगी? ये पिंजरे कब टूटेंगे? आज़ादी कब लौटेगी, उजड़े कब फिर बसेंगे?
लोगो! भारतमाता के चार सुन्दर जवान फाँसी चढ़ा दिये गये। वे नौकरशाही के
डसे, दुश्मनी का शिकार हो गये। कौन बता सकता है कि यदि वे जीवित रहते तो
क्या-क्या नेकी के काम करते, कौन-कौन से परोपकार करते? कौन कह सकता
है कि उनके रहने से संसार पहले से सुन्दर और रहने योग्य न दिखायी देता? वे
वीर थे, आज़ादी के आशिक़ थे। उन्होंने देश और क़ौम की ख़ातिर अपनी जान लुटा
दी। वे अपनी माँओं की कोख को सफल बना गये।
यदि भारतमाता आज़ाद होती तो इनके बलिदानों का मोल पड़ता। यदि आज
हिन्दुस्तान में कुछ जान होती तो ये बलिदान बेकार न होते। हाय! आज़ादी के वीर
चले गये। उन्हें किसी ने न पहचाना, उन्हें किसी ने न कहा, आप शूरवीर हो, आप
बहादुर हो। वह जगह धन्य है, जहाँ आप जन्मे-पले! जहाँ आप खेले। वे राहें धन्य
हैं, जहाँ आप चले, जहाँ आप कूदे-भागे। वीर, मातृभूमि के लाड़ले वीर चले गये!
वे अपना जन्म सफल कर गये!
बातें करनी आसान हैं, बड़कें मारनी आसान हैं। चगल-चगल करना और बात
है, कुर्बानी देना और बात है। परीक्षा अलूणी चट्टान है, इसे चाटना आसान नहीं
है। परीक्षा से बड़े-बड़े तौबा कर उठे थे। परीक्षा के आगे कोई ज़िगर वाला ही टिक
सकता है। इन वीरों ने किस हिम्मत, किस बहादुरी से परीक्षा दी है। इनकी बहादुरी
कभी भूल सकती है? धन्य हैं इनके माँ-बाप, जिन्होंने उन्हें जन्म दिया। धन्य हैं
ये स्वयं, जो बलिदान के पुंज, आत्मत्याग की मिसाल हैं।
जब कभी आज़ादी का इतिहास लिखा जायेगा, जब कभी शहीदों का ज़िक्र
होगा, जब कभी भारतमाता के लिए बलिदान करने वालों की चर्चा होगी तो वही
- राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी 2. रामप्रसाद बिस्मिल, 3. रोशन सिंह और 4. अशफ़ाक़उल्ला
का नाम ज़रूर लिया जायेगा। उस समय आने वाली पीढ़ियाँ इन शहीदों के आगे
शीश झुकायेंगी और इन वीरों के बहादुरी भरे क़िस्से सुन-सुन सिर हिलायेंगी। उस
समय ये क़ौम का आदर्श माने जायेंगे, इन बुजुर्गों की पूजा होगी।
आज हम कमज़ोर हैं, निःशक्त हैं। आज हम गिरे हुए हैं, झूठे हैं। आज हम
120 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अपनी दिली भावनाएँ नहीं बता सकते – क्योंकि हम कायर हैं, डरपोक हैं, आज
हमें सच कहने से डर लगता है, क्योंकि क़ानून की तलवार हमारे सिरों पर लटकती
दिखायी देती है। इससे यह नहीं कह सकते, ‘काकोरी के शहीदो! आपने जो किया,
भारतमाता के बन्धन तोड़ने के लिए किया। आपने जो कष्ट उठाये, वह हिन्दुस्तान
को आज़ाद करवाने के लिए उठाये।’ आज हम यह नहीं कह सकते कि ‘आपने
अपने मतानुसार अच्छा किया।’
गुलामों की अवस्था कितनी गिर जाती है। गुलामों में कितनी गिरावट आ जाती
है। दैवी गुण उनमें से किस तरह भाग जाते हैं। वे कितने ढोंगी और पाखण्डी बन
जाते हैं। वे कितने बुज़दिल व कायर बन जाते हैं। वे सच्ची-खरी बातें मुँह पर नहीं
कह सकते। वे दिल में कुछ और रखते हैं और बाहर कुछ और। उनकी हालत
कितनी दयनीय हो जाती है!
इस हालत को सुधारने का एक ही साधन है, इस दुर्दशा को बदलने का
एकमात्र इलाज है, इस दुर्दशा की एक ही दवा है, और वह है आज़ादी। आज़ादी
कुर्बानियों के बग़ैर नहीं मिल सकती। शहीदों की इज़्ज़त करने से, शहीदों के
कारनामे याद करने से कुर्बानी का चाव उमड़ता है। जो क़ौम शहीदों को शहीद
नहीं कह सकती, उसे क्या खाक आज़ाद होना है?
लोगो! देखे हैं आशिक़ सूली पर चढ़ते? वे मौत से मज़ाक़ करते थे। वे मौत
पर हँसते थे, उन्हें मृत्यु का भय नहीं था। वे यार की गली में शीश तली पर रखकर
आये थे। उन्हें डर क्या था, वे तो आये ही मरने थे। मृत्यु का तो वे पहले ही वरण
कर चुके थे, जीवन की आशा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। वे तो गाते थे –
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है।
कहाँ वे और कहाँ हम? वे तो किसी और ही देश के निवासी थे। वे तो ग़रीबों
की आह सुनकर मैदान में उतरे थे। वे तो हिन्दुस्तान से भूख-नंग को दूर करने आये
थे। वे तो मज़दूरों और किसानों का हाल पूछने आये थे। वे तो किसी ऊँचे आदर्श
के पुजारी थे। वे तो किसी ऊँचे स्वप्न की उड़ान में मस्त थे। वे तो वे नज़ारे देखते
थे, जहाँ न भूख है, न नग्नता। जहाँ न ग़रीबी है, न अमीरी। जहाँ न जुल्म है, न
अन्याय। बस जहाँ प्रेम है, एकता है, जहाँ इन्साफ़ है, आज़ादी है, जहाँ सुन्दरता है।
पर हम? हम?...हाय रे!
किसी का आदर्श कमाना, आप खाना और बच्चों को पालना होता है। किसी
का आदर्श स्वयं को ऊँचा उठाने का होता है। किसी का आदर्श ग़रीबों, दुखियों
को लूटकर धन-दौलत इकट्ठा करना होता है, किसी का आदर्श अपने सुन्दर शरीर
को तकलीफ़ से दूर करने का होता है।
किसी का आदर्श कुछ होता है, किसी का कुछ। लेकिन उनका आदर्श देश
था। उनका आदर्श हिन्दुस्तान की आज़ादी था। उनका कोई स्वार्थ नहीं था। उनके
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 121
खाने के लिए, उन्हें ओढ़ने के लिए किसी बात की कमी न थी। वे तो जो कुछ
करते थे, लोक-कल्याण की ख़ातिर, लोक-सेवा के लिए करते थे। वे इतने
बलिदान के पुंज निकले, कि स्वयं को हमारे ऊपर वार दिया। आइये, इन वीरों को
प्रणाम करें।
मातृभूमि के लाड़लो! क्या हुआ यदि डर के मारे आज हम आपका नाम भी
लिखने से घबराते हैं? क्या हुआ जो आज हम दिल की बातें कहने में झिझकते
हैं? क्या हुआ यदि आज हिन्दुस्तान में मुर्दानोशी छायी है और आपका नाम लेने से
ही षड्यन्त्रकारी बन जाते हैं? क्या हुआ यदि कोई हिन्दुस्तानी आपको भला-बुरा
भी कहे, लेकिन समय आयेगा जब आपकी क़द्र होगी, जब आपको शहीद कहा
जायेगा, जिस तरह 1857 के ग़दर को अब 'आज़ादी की जंग' कहा जाता है। समय
सिद्ध कर देता है, समय सच्ची-सच्ची कहलवा देता है, समय किसी का लिहाज़
नहीं करता। उस समय आप अपनी असली शान से चमकेंगे और उस समय
हिन्दुस्तान आप पर बलिहारी जायेगा।
शहीद वीरो! हम कृतघ्न हैं, हम तुम्हारे किये को नहीं जानते। हम कायर हैं,
हम सच-सच नहीं कह सकते। हमें आप माफ़ करो, हमें आप क्षमादान दो। हमें
मौत से भय लगता है, हमारा दिमाग़ सूली का नाम सुनते ही चक्कर खा जाता है।
आप धन्य थे। आपके बड़े जिगर थे कि आपने फाँसी को टिच्च समझा। आपने मौत
के समय मज़ाक़ किये! पर हम? हमें चमड़ी प्यारी है, हमें तो ज़रा-सी तकलीफ़
ही मौत बनकर दिखने लगती है। आज़ादी! आज़ादी का तो नाम सुनते ही हमें
कँपकँपी छिड़ जाती है। हाँ! गुलामी के साथ हमें प्यार है, गुलामी की ठोकरों से
हमें मज़ा आता है! आपकी नस-नस से, रग-रग से आज़ादी की पुकार गूँजती थी
लेकिन हमारी रग-रग से, हमारी नस-नस से, गुलामी की आवाज़ निकलती है।
आपका और हमारा क्या मेल? हमें आप क्षमा करो, आप हमारे केवल यह प्रेम के
अश्रु ही स्वीकार करो।
कहो, धन्य हैं, काकोरी के शहीद...!
122 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शहीदों के जीवन-चरित्र
काकोरी के शहीदों को दिसम्बर, 1927 में फाँसी होने के बाद भगतसिंह ने
अपने साथियों - भगवतीचरण वोहरा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर आदि - से
विचार-विमर्श करते हुए अपने देश के शहीदों व क्रान्तिकारी आन्दोलन सम्बन्धी
जानकारी देने के निरन्तर यत्न शुरू किये। वे स्वयं भी इन आन्दोलनों का गहराई से
अध्ययन कर रहे थे और देशवासियों को जागृत भी कर रहे थे।
फ़रवरी, 1928 में 'चाँद' का 'फाँसी अंक' प्रकाशित हुआ। भारतीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन और शहीदों के जीवन-चरित्र सम्बन्धी इस अंक में 'विद्रोही' छद्म नाम
से भगतसिंह ने कई देशभक्तों के जीवन-चरित्र लिखे। यहाँ प्रस्तुत तीन जीवन-चरित्र
वहीं से लिये गये हैं। - स.
सूफ़ी अम्बा प्रसाद
आज भारतवर्ष में कितने लोग उनका नाम जानते हैं? कितने उनकी स्मृति में
शोकातुर होकर आँसू बहाते हैं? कृतघ्न भारत ने कितने ही ऐसे रत्न खो दिये और
क्षणभर के लिए भी दुख अनुभव नहीं किया।
वे सच्चे देशभक्त थे। उनके हृदय में देश के लिए दर्द था। वे भारत की
प्रतिष्ठा देखना चाहते थे, भारत को उन्नति के शिखर पर पहुँचाना चाहते थे, तो भी
आज भारत के बहुत कम लोग उनका नाम जानते हैं। उनकी क़दर भी की तो ईरान
ने, आज यहाँ आका सूफ़ी का नाम सर्वप्रिय हो रहा है।
सूफ़ी जी का जन्म 1858 में मुरादाबाद में हुआ था। आपका दाहिना हाथ जन्म
से ही कटा था। आप हँसी में कहा करते थे - अरे भाई! हमने सत्तावन में अंग्रेज़ों
के विरुद्ध युद्ध किया। हाथ कट गया। मृत्यु हो गयी। पुनर्जन्म हुआ, हाथ कटे का
कटा आ गया!
आपने मुरादाबाद, बरेली और जालन्धर आदि कई शहरों में शिक्षा पायी।
एफ़.ए. पास करने के पश्चात आपने वकालत पढ़ी, परन्तु की नहीं। आप उर्दू के
प्रभावशाली लेखक थे। आपने यही काम सँभाला।
सन् 1890 में आपने मुरादाबाद से जाम्युल इलूक नामक उर्दू साप्ताहिक पत्र
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 123