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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 788 में से

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पृष्ठ 111

धन्ना सिंह बैठे थे, पुलिस बुला ली गयी। नशे में चूर धन्ना सिंह बैठे ही पकड़
लिये गये। उनका भरा हुआ पिस्तौल छीनकर हाथों में हथकड़ी लगा दी गयी और
उन्हें बाहर लाया गया। बारह साधारण सिपाही और दो अंग्रेज़ ऑफ़िसर उनको घेरकर
खड़े हो गये। ठीक उसी समय धमाके की आवाज़ हुई। धन्ना सिंह जी ने बम चला
दिया था। इससे वे स्वयं भी मरे और साथ ही एक अंग्रेज़ ऑफ़िसर और दस
सिपाही। बाक़ी के लोग बुरी तरह घायल हुए।
इसी तरह मुण्डेर नामक गाँव में बैठे हुए बन्ता सिंह, ज्वाला सिंह आदि कई
लोग घिर गये। ये सब छत पर बैठे हुए थे। गोली चली, कुछ देर तक अच्छी झड़प
होती रही, पर पुलिस ने पम्प से मिट्टी का तेल छिड़ककर घर में आग लगा दी।
फिर भी वरयाम सिंह बच निकले, परन्तु बन्ता सिंह वहीं मारे गये।
अगर इससे पहले की एक-दो अन्य घटनाओं का वर्णन कर दिया जाये तो
अनुचित न होगा। बन्ता सिंह बड़े साहसी पुरुष थे। एक बार, शायद जालन्धर छावनी
जाकर रिसाले में पहरे पर खड़े हुए सिपाही की घोड़ी तथा रायफ़ल वे छीन लाये
थे। इन दिनों, जबकि पुलिस के दस्ते के दस्ते इनकी तलाश में मारे-मारे फिरते
थे, कहीं जंगल में किसी दस्ते से इनकी भेंट हो गयी। सरदार बन्ता सिंह ने फ़ौरन
चुनौती दी – ‘अगर हिम्मत हो तो दो-दो हाथ कर लो,’ परन्तु उस ओर तो थे पैसे
के गुलाम और इस ओर आत्मोत्सर्ग के इच्छुक। तुलना कैसे हो सकती है। सिपाहियों
का दस्ता चुपचाप चला गया।
इन लोगों को पकड़ने के लिए ख़ासतौर से पुलिस नियुक्त की गयी थी। और
उसकी थी यह दशा! खैर, गिरफ्तारियों की भरमार थी। गाँव-गाँव में पुलिस की
ताजीरी चौकियाँ बिठायी जाने लगीं। धीरे-धीरे बब्बर अकालियों का ज़ोर कम होने
लगा। अब तक तो मानो इन्हीं का राज्य था। जहाँ जाते, कुछ लोग हर्ष और चाव
से, कुछ भय और त्रास से इनकी खूब आवभगत करते। सरकार के सहायक एकदम
पस्त हुए बैठे थे। सूर्योदय के पहले सूर्योदय के बाद घर से निकलने का साहस
ही उन्हें न होता था। ये उन दिनों के ‘हीरो’ समझे जाते थे। वे वीर थे और उनकी
पूजा वीर-पूजा समझी जाती थी। परन्तु धीरे-धीरे उनका ज़ोर ख़त्म हो गया। सैकड़ों
पकड़े गये, मुक़दमे शुरू हुए।
वरयाम सिंह अकेले बचे थे। जालन्धर, होशियारपुर में पुलिस का अधिक ज़ोर
देखकर वे दूर लायलपुर में जा रहे थे। वहाँ पर एक दिन बिल्कुल घिर गये, मगर
खूब शान के साथ लड़ते हुए बच निकले, लेकिन बहुत थक गये थे। कोई साथी
भी न था। दशा बड़ी विचित्र थी। एक दिन ढेंसिया नामक गाँव में अपने मामा के
पास गये। शस्त्र बाहर रखे थे। शाम को भोजन करने के बाद अपने शस्त्रों के पास
जा रहे थे कि पुलिस आ पहुँची। फिर घिर गये। अंग्रेज़ नायक ने उन्हें पीछे से जा
पकड़ा। उन्होंने कृपाण से ही उसे बुरी तरह घायल कर दिया। फिर वे नीचे गिर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 105