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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 788 में से

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प्रसिद्ध है। 1915 के शहीदों में भी अधिकतर इन्हीं ज़िलों के लोग थे। अब फिर
वहीं पर धूम मची। पुलिस विभाग ने सारी शक्ति ख़र्च कर दी, परन्तु कुछ न बन
पड़ा। जालन्धर से कुछ दूर एक बिल्कुल छोटी-सी नदी है। उसके किनारे एक
गाँव में ‘चौंतासाहब’ नामक गुरुद्वारा है। उसमें श्री कर्म सिंह जी, श्री धन्ना सिंह
जी, श्री उदय सिंह जी तथा श्री अनूप सिंह जी दो-एक और व्यक्तियों के साथ
बैठे थे, चाय बनाने की तैयारियाँ हो रही थीं। बैठे-बैठे श्री धन्ना सिंह ने कहा,
‘बाबा कर्म सिंह जी! हमें यहाँ से अभी इसी वक़्त चल देना चाहिए। मुझे किसी
बुरी घटना होने का-सा आभास हो रहा है।’ 75 वर्ष के बूढ़े कर्म सिंह ने इस
बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। पर श्री धन्ना सिंह अपने साथ 18 वर्षीय
दिलीप सिंह को लेकर चले ही गये। बैठे-बैठे बाबा कर्म सिंह ने श्री अनूप सिंह
की ओर बड़े ग़ौर से देखकर कहा – ‘अनूप सिंह, तुम अच्छे आदमी हो,’ मगर
इसके बाद उन्होंने खुद भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया। बातें अभी हो रही थीं
कि सचमुच ही पुलिस आ धमकी। सारे बम श्री अनूप सिंह के क़ब्ज़े में थे। ये
सब लोग उठकर गाँवों में छिप गये। पुलिस ने लाख सिर मारा, पर विफल रही।
अन्त में पुलिस की ओर से एक घोषणा की गयी। बागियों को निकालो, वरना
गाँव में आग लगा दी जायेगी। पर गाँव वाले विचलित नहीं हुए।
अवस्था को देखकर वे सब खुद ही बाहर निकल पड़े। सारे बम अनूप सिंह
ले भागा और जाकर आत्मसमर्पण कर दिया। शेष चार व्यक्ति वहीं पर घिरे हुए
खड़े थे। पुलिस के अंग्रेज़ कप्तान ने कहा, ‘कर्म सिंह! हथियार छोड़ दो, तुम्हें
माफ़ कर दिया जायेगा।’ वीर ने ललकारकर जवाब दिया – ‘हम अपने देश के
लिए सच्चे क्रान्तिकारी की तरह लड़ते-लड़ते शहीद हो जायेंगे, पर हथियार नहीं
डाल सकते।’ उन्होंने अपने तीनों साथियों को ललकारा। वे सिंह की तरह गरज
उठे। लड़ाई छिड़ गयी। खूब दनादन गोलियाँ चलीं। गोली-बारूद समाप्त होने पर
वे वीर पानी में कूद पड़े और घण्टों गोलियों की वर्षा होते रहने पर ये चारों वीर
स्वर्गधाम सिधार गये।
श्री कर्म सिंह की आयु 75 वर्ष की थी। वह कनाडा में रह चुके थे। उनका
आचरण पवित्र और चरित्र आदर्श था। सरकार ने समझा, बब्बर अकाली ख़त्म हो
गये, परन्तु वे उन्नति कर रहे थे। 18 वर्षीय दिलीप सिंह एक अत्यन्त सुन्दर, सुदृढ़,
हृष्ट-पुष्ट, पर अशिक्षित नवयुवक थे, और उनका डाकुओं का साथ हो गया था।
धन्ना सिंह जी की शिक्षा ने उन्हें डाकुओं से एक सच्चा क्रान्तिकारी बना दिया।
उधर सरदार बन्ता सिंह और वरियाम सिंह आदि कई प्रसिद्ध डाकू डाकेज़नी
छोड़कर इनमें आ मिले।
इन सबमें मृत्यु का डर नहीं था। ये अपने पिछले कुकर्मों को धो डालना चाहते
थे। इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। एक दिन मानहाना नामक गाँव में
104 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़