भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै। पहले 1919 में मैनपुरी षड्यन्त्र में आपके वारण्ट निकले और आपके गुरु श्री
गेंदालाल जी आदि पकड़े गये, लेकिन आप नेपाल की ओर चले गये और वहाँ बड़ी
मुश्किलें सहन कर गुज़ारा करते रहे। पूरा दिन हल चलाना, कुदाल चलाना,
मेहनत-मशक़्कत करना और रात में सिर्फ़ डेढ़ आना पाना, जिससे पेटभर रोटी भी
नहीं खा सकते थे। कई बार तो घास तक खाना पड़ा। लेकिन मज़ा यह, फिर भी
बैठकर कविता लिखना, और भारतमाता की याद और प्रेम में आँसू बहाने और गीत
गाने। ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध-विद्या में बड़े कुशल हैं और
आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर
को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर
जवान, ऐसा योग्य और उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना मुश्किल
है।
तीसरे वीर श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी हैं। 24 वर्ष का अत्यन्त सुन्दर जवान
एम.ए., बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। जज कहता है कि यह
युगान्तर दल का एक मज़बूत स्तम्भ है। आप गाड़ी रोकने वालों में थे। बाहर से
था – कमज़ोर सूखा-सा। कलकत्ते के पास दक्षिणेश्वर बम फ़ैक्टरी में पकड़ा गया,
वहीं दस साल क़ैद हुई। खुशी में मोटा होने लगा। काकोरी के मुक़दमे में तो शरीर
ख़ूब भर गया था और अब फाँसी की सज़ा हो गयी है।
वीर रोशन सिंह को भी फाँसी की सज़ा हुई है। आप पहले पुलिस की मदद
करते थे और बहुत-से डकैत आपने पकड़वाये थे। आप भी फँस गये। लेकिन कोई
डकैत तो नहीं है। जज भी कहता है, यह नौजवान सच्चे देशसेवक थे! अच्छा! इस
वीर को भी बार-बार नमस्कार।
इसके बाद श्री मन्मथनाथ गुप्त की बारी है। आप काशी विद्यापीठ के बी.ए.
के विद्यार्थी थे। 18 बरस की उम्र है। बंगाली, गुजराती, मराठी, उड़िया, हिन्दी,
अंग्रेज़ी और फ़्रेंच आदि अनेक भाषाएँ आपने सीख ली थीं। जज ने आपको भी
डकैतियों में शामिल कर 14 साल की सख़्त सज़ा दी है। आप बड़े निर्भय हैं और
यह सज़ा सुनकर हँस दिये। आजकल जेल में भूख हड़ताल किये बैठे हैं। आपसे
गैर-सरकारी सदस्य ने जेल में आकर पूछा कि खाना क्यों नहीं खाते, तो आपने
उत्तर दिया कि हम मनुष्य हैं। हमारे साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार होना चाहिए। मैं नहीं
समझता कि इस पशुओं जैसे व्यवहार को सहन कर मैं 14 साल तक जी सकूँगा।
तिल-तिल कर मरने से एक बार मर जाना अच्छा है। आप पहले असहयोग में भी
जेल जा चुके हैं।
अब जिस नौजवान का ज़िक्र होगा उसे यदि हम महापुरुष कह दें तो कुछ झूठ
न होगा। वह वीर श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी हैं। आप कोमिल्ला (ढाका) के रहने वाले
हैं। वह बी.ए. में फ़िलासफ़ी के विद्यार्थी थे। प्रोफेसर आप पर बहुत खुश थे और
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 109