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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

अनुपलब्धवादः ४६३
नापि शक्यम्, न हि तन्निर्वर्त्यं नित्यत्वात् । नापि
विकार्यम्, अपरिणामित्वात् । नापि संस्कार्यम्, अनाधेया-
तिशयत्वात् । न प्राप्यम्, नित्यसम्बन्धवत्त्वात् ।
न ज्ञेयम्, ज्ञानस्यापि नित्यत्वात् । अनित्यत्वे वा
शरीरादिकारणापाये तदनुत्पत्तेः । उत्पत्तौ वा तेषामकारण-
त्वप्रसङ्गात् । तथा च सर्वः सर्वदर्शी स्यात्, आत्ममनः-
संयोगादेः सर्वत्राविशेषात् ।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष शक्य ( साध्य ) भी नहीं है । क्योंकि
शक्यका क्या अर्थ है ? उत्पाद्य या विकार्य या सस्कार्य या प्राप्य अथवा
ज्ञेय । यदि शक्यका अर्थ उत्पाद्य लें तो वह उत्पाद्य नहीं हो सकता,
क्योंकि नित्य है । नित्य सुख विकार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह
अपरिणामी है । सस्कार्य ( सस्कारद्वारा कुछ अतिशय लानेयोग्य )
भी वह नहीं है, जैसा कि “व्रीहीन् प्रोक्षति” यहाँ प्रोक्षणद्वारा व्रीहिका
सस्कार होता है—क्योंकि नित्य सुख अनाधेयातिशयरूप है । अत
उसमें सस्कारद्वारा किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं किया जा
सकता है ! नित्यसुखको प्राप्य भी नहीं कह सकते, जैसा कि नित्य भी
वेद अध्ययनद्वारा प्राप्त किया जाता है—क्योंकि नित्य होनेसे सदा
प्राप्त ही है ।
ऐसे ही नित्य सुखवादी वेदान्तियोंके यहाँ ज्ञान भी नित्य ही होता
है । अत ज्ञान और सुख दोनोंके नित्य होनेसे उपासनादि विधियोंसे
नित्य सुखको ज्ञेय कहना भी ठीक नहीं है ।
यदि कहो कि—ज्ञान अनित्य है—तो मुक्तिदशामे शरीरादि ज्ञान
साधनोंके अभावमे नित्यसुखका ज्ञान ही नहीं उत्पन्न हो सकता है ।
यदि उस कालमें शरीरादि कारणोंके अभावमे भी सुखज्ञानकी उत्पत्ति
मानो तो ज्ञानोत्पत्ति के प्रति शरीरादि अहेतु हो जायगा । अर्थात् बिना
शरीरेन्द्रियादिके भी ज्ञान पैदा होने लगेगा । ऐसी स्थितिमें सब सर्वज्ञ
हो जायेंगे । क्योकि ज्ञानका कारण जो आत्मा और मनका सयोग है,
वह सबमे समानरूपसे है ।

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४६४ आत्मतत्त्वविवेके

ज्ञानज्ञेययोर्नित्यत्वेऽपि तत्सम्बन्धो जन्यते, स च षट्-
पदार्थव्यतिरेकादुत्पन्नोऽपि न निवर्तते ध्वंसवदिति चेत्, न,
भावाभावयोः प्रकारान्तराभावात् ।
तत्र स नाभावः, प्रतियोग्यनुपपत्तेः। भावत्वे त्ववश्यमुत्पन्नो
निवर्त्तेत, उपाध्यन्तराभावात् । अविद्याविध्वंसनमेव तत्प्राप्ति-
रिति चेत्, अत्र न नो विवादः । न ह्येकविंशतिप्रभेदभिन्न-
दुःखव्यतिरिक्ता अविद्या नाम । तद्विध्वंसनञ्च पुरुषार्थ
इति प्रतिपादनादिति ।
दुरन्तं च तत्, तदभिसन्धेः सुखसंस्कारसहकारितया
तदुद्भवे विशिष्टसुखाभिलाषिणो वैषयिकेऽपि प्रवृत्तिसंभवात् ।

यदि कहो कि—ज्ञान और सुखरूप ज्ञेय इन दोनोंके नित्य होनेपर
भी उनका सम्बन्ध उत्पन्न होता है। अतः वह उपासनादि विधियोंके
द्वारा साध्य है। तथा वह सम्बन्ध उत्पत्तिशाली होनेपर भी द्रव्यादि
षट् पदार्थोंसे भिन्न होनेके कारण विनष्ट नहीं होता है। जैसे, ध्वंस
उत्पत्तिमान् होनेपर भी विनष्ट नहीं होता—तो ऐसा नहीं हो सकता है।
क्योंकि भाव और अभावके अतिरिक्त पदार्थोंका कोई दूसरा प्रकार ही
नहीं होता है। उसमें वह सम्बन्ध अभावरूप नहीं है। कारण, निष्प्र-
प्रतियोगिक अभाव होता ही नहीं है। यदि वह सम्बन्ध भावरूप हो तो
उत्पन्न होनेके कारण वह अवश्य विनष्ट हो जायगा। क्योंकि उत्पन्न
वस्तुके विनाशो होनेमे भावत्व ही उपाधि है, अन्य नहीं। यदि कहो
कि—अविद्याका ध्वंस होना ही नित्यज्ञान और नित्यसुखका सम्बन्ध
है—तो इसमें हमारा कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इक्कीस प्रकारोंमें
विभक्त दुःखके अलावे कोई अविद्या नहीं है तथा इन दुःखोंका विध्वंस
ही पुरुषार्थ (मोक्ष) है, यह न्यायमे प्रतिपादित किया गया है।
अर्थात् न्यायसम्मत दुःखध्वंस ही अन्ततोगत्वा मोक्षका स्वरूप सिद्ध
होता है।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष दुरन्त अर्थात् परिणाममें दोषपूर्ण भी है।
क्योंकि सुखकी कामनासे पूर्वमें प्राप्त सुखोंके संस्कारोंकी सहायता पाकर

अनुपलम्भवादः ४६५
“अलाभे मत्तकाशिन्या दृष्टा तिर्यक्षु कामिता” इत्युदा-
हरणादिति ।
स्यादेतत्, आत्मा तु किं स्वप्रकाशसुखस्वभावोऽन्यथा
वेति पृच्छामः । श्राद्धोऽसि चेदुपनिषदः पृच्छ । मध्यस्थोऽसि
चेत्, अनुभवं पृच्छ ।
नैयायिकोऽसि चेत्, न वैषयिकसुखज्ञानस्वभाव इति
सुखसंस्कारके उद्बुद्ध होनेपर पूर्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट सुखकी अभिलाषा
करनेवाले व्यक्तिको उस उत्कृष्ट सुखके नहीं मिलनेपर निम्नकोटिके
वैषयिक सुखमें ही प्रवृत्ति होने लगेगी, जो कि मोक्षका विरोधी है ।
क्योंकि “मत्तकाशिनी (सुन्दरी स्त्री) की अप्राप्तिमें तिर्यग्योनियों
के प्रति भी कामवासना देखी जाती है” ऐसा उदाहरण है । अर्थात्
मोक्षको सुखरूप माननेमें उत्तरोत्तर बन्धन ही बढ़ता जायगा तथा
मुक्ति असंभव हो जायगी ।
आत्माका स्वरूप
“अस्तु, आत्मा क्या स्वप्रकाश-सुखस्वभाव है ? यह हम पूछते हैं ।
आशय यह है कि आत्मा यदि स्वप्रकाश-सुखस्वभाववाला हो तो
उसमें दुःखकी संभावना ही कहाँ है कि आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति मोक्ष-
का स्वरूप हो” । इसका उत्तर यह है कि यदि श्रद्धालु रूपमें पूछते हो
तो उपनिषदोंको पूछो । अर्थात् उपनिषदोंमें आत्माका प्रतिपादन ज्ञान
और सुखसे भिन्नरूपमें ही किया गया है । जहाँ कहीं सुखज्ञान-
स्वभावत्वका प्रतिपादन है, उसका दूसरा तात्पर्य बताया जा चुका है ।
यदि मध्यस्थके रूपमें अर्थात् न्याय और आगमका अपक्षपाती होकर
पूछते हो तो अपने अनुभवको पूछो । अर्थात् “अहं सुखी, अहं जाने”
इत्यादि अनुभवसे आत्मा सुख और ज्ञानसे युक्त प्रतीत होता है न कि
सुख और ज्ञानरूप । यदि वैसा होता तो “अहं ज्ञानम् अहं सुखम्”
ऐसा अनुभव होता ।
यदि नैयायिकके रूपमें अर्थात् आत्माका स्वरूप न्यायद्वारा जानने-
की रुचिसे पूछते हो तो यही निर्णय करो कि आत्मा वैषयिक-सुख और
३०

४६६ आत्मतत्त्वविवेके
निश्चिनुयाः । तदतिरिक्ते तु सुखज्ञानव्यवहारे बीजाभावात्
तद्व्यवहाराभावः । अनुग्रहाभिष्वङ्गेन्द्रियप्रसादादिलक्षणं
हि कार्यं तद्व्यवहारबीजम्, अर्थप्रवणत्वं स्मृतिसंस्कारादिकार्यं
ज्ञानव्यवहारादिबीजं लोके, तयोश्चाभाव आत्मनीति ।
तस्मात्—
श्रुतेः श्रुत्वाऽत्मानं तदनु समनुक्रान्तवपुषो
विनिश्चित्य न्यायादथ विहतहेयव्यतिकरम् ।
ज्ञानस्वरूप नहीं है । एव वैषयिक सुख और ज्ञानसे अतिरिक्त आत्मा-
में तो सुख और ज्ञानके व्यवहारमे, जैसा कि वेदान्ती मानते हैं, कोई
बीज नहीं है । इसलिये वेदान्तादि सम्मत किसी भिन्न प्रकारके सुख
और ज्ञानका व्यवहार आत्मामे नहीं हो सकता है । क्योंकि अनुग्रह,
अभिष्वङ्ग ( संश्लेष ) तथा इन्द्रियोंकी प्रफुल्लता आदि कार्य ही सुख-
व्यवहारका बीज है । अर्थात् जिससे अनुग्रह आदि कार्य उत्पन्न होते
हैं, वही सुख है । वेदान्तादिसम्मत सुखसे तो अनुग्रहादिकार्य होता ही
नहीं है, इसलिये उसे सुख नहीं कह सकते । एव अर्थप्रवणता (विषय-
की ओर प्रवृत्ति ), स्मृति तथा सस्कार आदि कार्य ज्ञानव्यवहारका बीज
है । अर्थात् जो अर्थाभिमुखी प्रवृत्ति तथा स्मृति सस्कार आदिका
जनक है, वही ज्ञान है । आपका अभिमत ज्ञान ज्ञान नहीं है । एव
मुक्तावस्थामें आत्मामे उन दोनों ( सुख और ज्ञान ) का अभाव है ।
अर्थात् आगम, अनुभव और न्यायके बलसे यही सिद्ध होता है कि
आत्मा स्वप्रकाश सुख ज्ञानस्वरूप नहीं है । क्योंकि वैषयिक सुख और
ज्ञानके अतिरिक्त अन्य प्रकारका सुख और ज्ञान न्यायविरुद्ध होनेसे
है ही नहीं । और मुक्तावस्थ आत्मामे वैषयिक सुख और ज्ञानका
सर्वथा अभाव है । अत दुःखका आत्यन्तिक नाश ही मुक्ति है—यह
सिद्धान्त है । इसलिये—
अयि मानवो ! यदि चाहते ससार बन्धन भञ्जना,
तो वेदसे होगा प्रथम “आत्मा कीदृश है” जानना ।
वेदानुगामी न्यायसे फिर साधु निश्चित कर उसे,
संसर्ग दसविध-हेयका, विध्वस्त हो, फिर नहि फँसे ।

अनुपलब्धवादः ४६७
उपासीत श्रद्धाशमदमविरामैकविभवो
भवोच्छित्त्यै चित्तप्रणिधिविहितैर्योगविधिभिः ॥
उपास्यमाने च तस्मिन् प्रथमं बहिरर्था एव भासन्ते,
यानाश्रित्य कर्ममीमांसोपसंहारः चार्वाकसमुत्थानञ्च । तत्प्रति-
तच शमन दम-वैराग्य श्रद्धामात्र धन ले, चित्तकी
स्थिति हेतु यौगिक रीतियोंसे कर उपासा आत्मकी।
अर्थात् श्रुतिद्वारा आत्मतत्त्वका श्रवण कर वेदाविरुद्ध युक्तियोंसे "आत्मा
शरीरेन्द्रियादिसे भिन्न, ज्ञानसुखादि गुणवाला तथा नित्य एव विभु है"
ऐसा सम्यक् निश्चयात्मक मनन करे। तदनन्तर जिसमें शरीर इन्द्रिय-
विषय बुद्धि मन प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल और दुःखरूप दस प्रकारके
हेयोंका तादात्म्यादि सम्बन्ध विध्वस्त हो चुका है, ऐसे आत्मामें श्रद्धा-
शम दम तथा वैराग्यसे युक्त होकर आसन प्राणायाम आदि पातञ्जल-
शास्त्रोक्त योगविधियोंसे चित्तको स्थिर करते हुए संसार (आवागमन)
के आत्यन्तिक नाशरूप मोक्षके लिये उसकी उपासना (निदिध्यासन)
करे।
उस आत्माकी उपासना किये जानेकी दशामें प्रथम प्रथम बाह्य
पदार्थ ही भासित होते हैं, जिनका आश्रयण कर जैमिनि प्रणीत कर्म-
मीमांसादर्शनका उपसंहार हो जाता है। अर्थात् उद्देश्यपूर्ण हो जानेसे
उसका विराम हो जाता है। आशय यह है कि जब तक भोगकी
कामना वर्तमान है, तब तक ग्राम, पशु तथा हिरण्य आदि पदार्थ ही
मानवोंको अभिलषित होते हैं और उत्कट वासनावश वे ही पहले
भासित होते हैं, आत्मा नहीं भासित होता है। इसलिये उन अभि-
लाषाओंकी सिद्धिके लिये "ग्रामकामो यजेत, चित्रया यजेत पशुकाम,
पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार यागादि कर्मोंके
प्रतिपादनके उद्देश्यसे जैमिनिने कर्ममीमांसाका प्रणयन किया। तथा
अपना उक्त उद्देश्य पूर्ण कर कर्ममीमांसा कृतकृत्य हो गयी। यद्यपि
मुमुक्षुओंके लिये अन्य श्रुतियोंमें उक्त पदार्थ हेय कहे गये हैं, फिर भी
पुरुषेच्छाके अनुरोधसे उन श्रुतियोंका कर्ममीमांसादर्शनमें विचार नहीं
किया गया। एसा नहीं है कि ब्रह्मकाण्डके प्रति जैमिनि महर्षि

४६८ आत्मतत्त्वविवेके
पादनार्थश्च "पराञ्चि खानि" इत्यादि । "तद्धानाय रंप
कर्मभ्य" इत्यादि ।
अथार्थाकारः, यमाश्रित्य त्रैदण्डिकमतोपसंहारो योगा-
चारसमुत्थानञ्च । तत्प्रतिपादनार्थम् "आत्मैवेदं सर्वम्"
इत्यादि । तद्धानार्थम् 'अगन्धरसम्, इत्यादि ।
उदासीन थे । यहाँ उपसंहारशब्दसे कर्मकाण्डके विषयमे कर्ममीमांसाका
प्रामाण्य सूचित होता है ।
यहीं से चार्वाकमतका उत्थान भी होता है । अर्थात् वाह्यपदार्थोंको
ही लेकर बृहस्पतिने भी चार्वाकदर्शनका निर्माण किया और प्रत्यक्षाति-
रिक्त वस्तुको अप्रमाण कह दिया । बृहस्पतिके वैसा प्रतिपादन करनेमे
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्"
इत्यादि श्रुति मूल है । यहाँ उत्थानशब्दसे चार्वाकमतका उत्थान ही
भर होता है, उसका उपसंहार नहीं हुआ है । अत इसके प्रतिपादक
आचार्य बृहस्पतिका भी इसमे अन्तिम तात्पर्य नहीं था । इसलिये
चार्वाकशास्त्र अप्रमाण होनेसे शास्त्राभास है—यह बात सूचित होती
है । इसीलिये इस मतके निषेधके लिये "कर्मणा मृत्युमृषयो निषेदु
प्रजावन्तो द्रविणमीहमाना । अथापरे ऋषयो मनीषिण परं कर्मभ्योऽ
मृतत्वमानशु " इत्यादि श्रुतियाँ हैं ।
इसके बाद ध्यानक्रमसे अर्थाकार आत्मा भासित होता है और योगा-
चारमतका समुत्थान होता है । इसके प्रतिपादनमे "आत्मैवेद सर्वम्"
इत्यादिश्रुति मूल है । अर्थात् संज्ञा रूपादि पञ्चस्कन्धात्मक यह विश्व
आत्मा ही है । यहाँ आत्माशब्दसे 'विज्ञान' अर्थ लेकर विज्ञानवादी
योगाचार व्यामोहमे पड़ गया । तथा भास्करमतानुयायी त्रिदण्डियोंके
मतका—सब पदार्थ आत्माका ही आकार है, अतः आत्मा ही वस्तुत
ध्येय है—ऐसा मानते हुए उपसंहार हुआ है । योगाचारमतके निषेधके
लिये "अगन्धरसम्" इत्यादिश्रुति वाक्य है । अर्थात् आत्मा या
विज्ञान गन्धरसादि विषयोंसे भिन्न वस्तु है । त्रिदण्डिमतका तो मुख्य
अभिप्राय आत्माको वास्तविक ध्येय बतलानेमे है, न कि उसे अर्थाकार
बतलानेमें ।

अथार्थाभावः, यमाश्रित्य वेदान्तद्वारमात्रोपसंहारः शून्य-
नैरात्म्यसमुत्थानं च। तत्प्रतिपादनार्थम् "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि। तद्घानाथम् ‘अन्धं तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि।
ततो विवेको यमाश्रित्य साङ्ख्यमतोपसंहारः शक्तिसत्त्व-
समुत्थानञ्च। तत्प्रतिपादनार्थम् "प्रकृतेः परस्तात्" इत्यादि।
इसके बाद अर्थका भी अभाव भासित होता है, जिसका आश्रयण
कर वेदान्तके द्वारमात्रका ही उपसहार हुआ। अर्थात् अर्थाभाव सिद्ध
होनेपर ही उसके द्वारा अद्वैतकी सिद्धि होगी, इसलिये वह वेदान्तका
द्वार हुआ। एव अर्थाभावका आश्रयण कर ही शून्यवाद या नैरात्म्य-
वादका समुत्थान हुआ। अर्थात् जगत्प्रपञ्चके मिथ्यात्वज्ञानसे ही
आत्माको भी प्रपञ्चान्तर्गत होनेसे मिथ्या मानते हुए शून्यवादीयोंने शून्य
नैरात्म्यवादका सिद्धान्त बना लिया। इन दोनोंका मूल "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। किन्तु उक्त श्रुतिवाक्यका गलत
अभिप्राय लगानेवाले नैरात्म्यवादियोंके निषेधके लिये "अन्धं तमः प्रवि-
शन्ति ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। यहाँ "आत्म-
हनः" का अर्थ है "आत्माको अस्वीकार करने वाले"। यहाँ भी
बृहस्पतिका अभिप्राय पाखण्डियोंका प्रतारणमात्र है, न कि उन्हें वस्तुत
नैरात्म्यवाद अभिप्रेत है।
इसके बाद ध्यानक्रमसे बाह्य अर्थसे (अनात्मासे) आत्माका विवेक
भासित होता है। अर्थात् सर्वथा आत्मातिरिक्त वस्तुके अभावकी
अवस्था अभी तक नहीं आनेसे बाह्यवस्तुका बिना विरोध किये उससे
आत्माका विवेक (भेद) भासित होता है। जिसका आश्रयण कर सांख्य
मतका उपसहार हुआ। अर्थात् प्रकृति पुरुषके विवेकके अभिप्रायसे
ही कपिलमुनिने सांख्यसूत्रोंका प्रणयन किया। एवं उक्त विवेकका आश्र-
यण कर ही शक्ति (प्रकृति) और सत्त्व (महान् या बुद्धि) का समुत्थान
हुआ। अर्थात् सांख्यमतानुयायियोंने आत्माकी निर्लेपता सिद्ध करनेके
लिये सुखादिके आश्रयके रूपमें महत् या बुद्धितत्त्वको तथा जगत्के मूल
कारणके रूपमें प्रकृतिको स्वीकार किया। इनका मूल "सभी वस्तुओंको

४७० आत्मतत्त्वविवेके
तद्धानाय "नान्यत् सत्" इत्यादि ।
ततः केवल आत्मा प्रकाशते, यमाश्रित्याद्वैतमतोपसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह"
इति । तद्धानार्थम् "नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि । ततः
समस्तसंस्काराभिभवात् केवलोऽपि न विकल्प्यते, यमाश्रित्य
चरमवेदान्तोपसंहारः । तत्प्रतिपादनार्थम् "न पश्यतीत्याहु-
उत्पन्न करनेवाली प्रकृति है तथा पुरुष उस प्रकृतिसे परे निर्लेप एव
कूटस्थ नित्य है' इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाली 'वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं तमस परस्तात्' इत्यादि श्रुति है। यहाँ 'तमस'
का अर्थ है 'प्रकृतिसे' । उक्त मतके निषेधके लिये "नान्यत् सत्"
इत्यादि श्रुति वाक्य है । अर्थात् प्रकृति पुरुषविवेकावस्था भी हेय ही
है । क्योंकि 'प्रकृति से भिन्न पुरुष है" इस भेदज्ञानमे प्रतियोगि-
रूपमें प्रकृति आदि भी भासित होती है, जब कि "नान्यत् सत्" इत्यादि
श्रुतिके अनुसार आत्माकी उपासनावस्थामें किसी अन्यकी सत्ताका भान
अभिप्रेत नहीं है ।
उसके बाद प्रकृति विविक्तत्वरूप विशेषणका भी परित्याग कर केवल
आत्मा ही स्वरूपत भासित होता है । जिसका आश्रयण कर "एकमेवा
द्वितीयम् ब्रह्म" इस अद्वैतमतका उपसहार होता है । इस केवल
आत्माके प्रतिपादनका मूल "न पश्यतीत्याहु एकी भवति, न जिघ्रती-
त्याहु एकीभवति' इत्यादि श्रुतिवाक्य है । इस अवस्थाके भी त्यागके
लिए "नाद्वैतं भवति नापि द्वैतम्' इत्यादि श्रुतिवचन है । क्योंकि
इसमे भी आत्माको अद्रष्टा आदि कहा है, जो न्यायविरुद्ध है । तथा
इसमे भी उपासनाकालमें द्वैताद्वैतका विचार वर्तमान रहता है, जब कि
"नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि श्रुतिको द्वैताद्वैत विचारसे रहित मनसे
केवल आत्माका साक्षात्कार अभिप्रेत है ।
इसके बाद ध्यान प्रकर्षकी चरम सीमा पर पहुँचे हुए शुद्धान
योगीको सम्पूर्ण संस्कारोंका अभिभव हो जानेके कारण अर्थात् वासना
सहित मिथ्याज्ञानका उन्मूलन हो जानेसे केवल आत्माका भी सविकल्पक
भान नहीं होता है । अर्थात् सभी विशेषणोंसे रहित केवल आत्माका

अनुपलम्भवादः ४७१

रेकी भवति” इत्यादि । सा चावस्था न हेया, मोक्षनगर-
गोपुरायमाणत्वात् ।
निर्वाणं तु तस्याः स्वयमेव, यमाश्रित्य न्यायदर्शनो-
पसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'अथ यो निष्काम आत्मकामः स
ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव
निर्विकल्पकमात्र ही भान होता है। जिसका आश्रयण कर चरम
वेदान्तका उपसहार होता है। क्योंकि उसमें “स्वप्रकाश चिद्रूप आत्मा ही
मुक्ति है” ऐसा प्रतिपादन किया गया है। उस अवस्थाके प्रतिपादनके
लिए “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” यह श्रुति वाक्य है।
अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति तभी तक है, जब तक ध्यानपरिपाक काष्ठापर
नहीं पहुंचा रहता है तथा सधर्मक वस्तुमे ही मनकी भी प्रवृत्ति होनेसे
निर्धर्मक आत्माका बोध करानेमे मन भी असमर्थ हो जाता है। यह
अवस्था पूर्व अवस्थाओंकी तरह हेय नहीं है। क्योंकि वह अवस्था
मोक्षरूप नगरमे प्रवेश पानेके लिए द्वारभूत है। अर्थात् वह मोक्षके
अत्यन्त निकटकी अवस्था है।
उस निर्विकल्पक भानकी भी अवस्थासे छुटकारा तो अपने आप ही
हो जाता है। जैसे इन्धनको नष्ट कर अग्नि भी अपने आप ही नष्ट
हो जाती है। अर्थात् आत्मगत सम्पूर्ण वैशेषिक-गुणोंका उच्छेद ही
मोक्ष है। इसलिए मुक्तिदशामे निर्विकल्पक भान भी नहीं रहता तथा
उसके नाशके लिए किसी अन्य विरोधी गुणकी अपेक्षा नहीं होती है।
बल्कि अदृष्टनाशविशिष्ट कालसे ही उस निर्विकल्पक भानका नाश हो
जाता है। इसी अवस्थाका आश्रयण कर न्यायदर्शनका उपसंहार
होता है। अर्थात् मुक्तिकी इसी अवस्थामें न्यायदर्शनका तात्पर्य है।
उसके प्रतिपादनके लिये “अथ यो निष्काम आत्मकाम आप्तकाम,
स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव समवलीयन्ते”
इत्यादि वेदवाक्य मूलभूत हैं। यहाँ निष्कामका अर्थ है “विषयोंके
प्रति उपेक्षाभाव रखनेवाला”। आत्मकामशब्दका अर्थ है “आत्म-

समवलीयन्ते" इत्यादीनि ।
तस्मादभ्यासकामोऽप्यपदद्वाराणि विहाय द्वारैरेव प्रवि-
शेत्, यतो मार्गविमार्गसंमोहमाशङ्कमानैरुच्यते "लक्ष्येण
धनुषा योग" इति ।
बहुतरपरतन्त्र प्रान्तरध्वान्तभीत-
स्तिमितपथिकरक्षासार्थवाहेन यत्नात् ।
तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानां
व्यतिहतिमवधूय व्यञ्जितं वर्त्म मुक्तेः ॥ १ ।

विषयक मनन एव साक्षात्कारमें संलग्न"। आप्तकाम वह है, जिसने
आत्मविषयक साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है। ऐसा व्यक्ति "ब्रह्म व
सन्' अर्थात् ब्रह्मके समान निरञ्जन होकर 'ब्रह्म व समभ्येति" अर्थात्
केवलात्मा बन जाता है या कैवल्य प्राप्त कर जाता है। उसके प्राण
उत्क्रमण नहीं करते किन्तु उस आत्मामें ही लीन हो जाते हैं। अर्थात्
वह व्यक्ति जीवन मरणसे रहित हो जाता है।

इसलिये मोक्षनगरमे प्रवेश पानेके लिए अभ्यासकी कामना
करनेवाला व्यक्ति भी चार्वाकादि मतरूप अपद्वारोंका परित्यागकर कर्म-
मीमांसाप्रभृति द्वारोंसे ही प्रवेश करे। क्योंकि मार्ग और विमार्गके
सम्बन्धमे लोगोंको भ्रम हो जानेकी आशङ्का करते हुए आचार्योंने उससे
बचनेके लिए कहा है कि लक्ष्यके साथ धनुषका (धनुर्बाणका) संयोग
कदाचित् ही होता है। यदि होता भी है तो तभी, जब कि लक्ष्य तक
पहुंचा सकनेवाला धनुषका मार्ग ठीक हो ॥

परशास्त्र अनेक घन मार्गगत अज्ञानरूप-
अतिघोर तमसे भीत निष्क्रिय पांथजनके प्राणके-
रक्षार्थ, उदयन मार्गदर्शकने, हटा व्याघातको-
श्रुति-न्याय आलोकसे सुझाया मुक्तिके शुभ पथको ॥१॥

अनुपलम्भवादः ४७
नास्य श्लाघामकलितगुणः पोपयन् प्रीतये नः,
कोऽन्धैश्चित्रस्तुतिशतविधौ शिल्पिनः स्यात् प्रकर्षः ?
निन्दामेव प्रथयतु जनः, किन्तु दोषान्निरूप्य,
प्रेक्षांस्तथ्यस्खलितकथनं प्रीणयेदेव भूयः ॥२॥
इति श्रीमदाचार्योदयनकृत आत्मतत्वविवेकः सम्पूर्णः ॥
गुणरहित जनोंसे की गयी भी बड़ाई,
नहिं कथमपि होगी प्रीतिदा लेशतोऽपि ।
शतविध बहुअन्धोंसे स्तुता भी, गुणीकी,
सुभग छवि, बढ़ाती कीर्ति क्या स्वल्पतोऽपि ? ॥२॥
मनुजगण बढ़ावे मात्र निन्दा, परन्तु,
त्रुटि यदि इसमे हो तो उसे, ही दिखाकर ।
यदि अवगुण सच है, तो बताना बुधोंको—
अतिशय वह होगा सर्वदा ही सुखाकर ॥३॥
इति न्यायवेदान्तसाङ्ख्ययोगाचार्य श्रीकेदारनाथत्रिपाठिप्रणीतः
आत्मतत्त्वविवेकस्य सविवेचनानुवादः
सम्पूर्णः ।

  • श्रीकृष्णार्पणमस्तु *

परिशिष्टम्
आत्मतत्त्वविवेकस्थपूर्वपक्षसन्दर्भस्थलानि
आत्मतत्त्वविवेक पृ० ४
यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरः,
सन्तश्च भावा इमे,
सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः,
सिद्धेषु सिद्धा न सा।
नाप्येकैव विधाऽन्यदापि परकृन्—
नैव क्रिया वा भवेत्,
द्विधाऽपि क्षणभङ्गसङ्गतिरतं
साध्ये च विश्राम्यति ॥
ज्ञानश्रीमित्रनिबन्धावली क्षणभङ्गाध्याय, पृ० १ श्लोक २
सामर्थ्यं हि करणत्वं वा योग्यता वा...व्यावृत्तिभेदादयमदोषः।
आ०त०वि० पृ० ६
समर्थव्यवहारयोग्यताजननयोर्भिन्नव्यावृत्तिकतया साध्याविशिष्टत्वं
हेतोरिति दूषणमनवकाशम्
ज्ञा० मि० नि० पृ० १२
आ० त० वि० पृ० १२—कथ करणाकरणे ? ...
कार्याणि हि विलम्बन्ते कारणसन्निधानतः ।
समर्थहेतुसद्भावे क्षेपस्तेषां तु किं कृत ॥
ज्ञा० मि० नि० पृ० १७ तथा तत्त्वसङ्ग्रहः पृ० ३९५
आ० त० वि० पृ० १२—उथापि योऽय सहकारि
तस्य च भावस्य यादृशश्चरमक्षणेऽक्षेपक्रियाधर्मो स्वभावः, तादृश
एव चेत् प्रथमक्षणेऽपि, तदैव गीर्वाणशापशतेनापि नापहस्तयितुं
शक्तः।
ज्ञा० मि० नि० पृ० १९

४७६ आत्मतत्त्वविवेके
आ० त० वि० पृ० १५७—मिथ सम्भिन्नाकारा---
पररूप स्वरूपेण
प्र० वा० स्वा० अ० प० श्लो० ६८
आ० त० वि० पृ० १५८
एकप्रत्यवमर्शस्य हेतुत्वाद्धीरभेदिनी ।
एकधीहेतुभावेन व्यक्तीनामप्यभिन्नता ॥
प्र० वा० स्वा० अ० परि० श्लो० १०९
आ० त० वि० पृ० १६७
न याति न च तत्रासीत्
प्र० वा० स्वा० अ० परि० श्लो० १५२
आ० त० वि० पृ० १७०—नापि ज्ञानतो बाधकम्
न तस्माज्जातिसिद्धिरध्यक्षात्
नाप्यनुमानात्
शब्दैस्तावन्मुख्यमाख्यायतेऽर्थ
ज्ञा० मि० नि० अपोहप्रकरणम् पृ० २२१–२०२
आ० त० वि० पृ० १७४
धर्मस्य कस्यचिदपि वस्तुनि मानसिद्धा ।
ज्ञा० मि० नि० पृ० ८९
रत्नकीर्तिनि० पृ० ८८
आ० त० वि० पृ० १७६—तस्माच्छब्दैः कि वाच्यम्
यदा तु शब्दै कि वाच्यमित्यनुयोग तदा ।
ज्ञा० मि० नि० अपोहप्रकरणम् पृ० २३२
आ० त० वि० पृ० १७८—सहोपलम्भनियम
दर्शनोपाधिरहितस्याग्रहात् तद्ग्रहे ग्रहात् ।
दर्शन नीलनिर्भास नार्थो बाह्योऽस्ति केवलम् ॥
प्र० वा० प्र० परि० श्लो० ३३५
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो
ज्ञा० मि० नि० पृ० ५६९
आ० त० वि० पृ० १७९–१८०—बाह्यस्यैव विरुद्धधर्माध्यासादूभयम्
र० की० नि० चित्राद्वैतप्रकाशवादः पृ० १३६

परिशिष्टम् ४७७
आ० त० वि० पृ० १८६
चित्रैकव्यवहारोऽपि भेदापोहपरो मतः ।
एकानेकवियुक्तो हि प्रकाशः केवलोऽत्र सन् ॥
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम् पृ० ३६३
आ० त० वि० पृ० १९१—चित्राकारमिति चेत्
र० की० नि० चित्राद्वैतप्रकाशवादः पृ० १३६
आ० त० वि० पृ० १९२—१९३
यदि स्वरूपमाकाराः
मिथस्तथापि
अलीकमन्यत्वेऽपीदम्
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम्
आ० त० वि० पृ० १९५—स्वस्य वेदनमिति न्याय व्यापारनिबन्धनः ˙
उत्पादमात्रेऽतिशयान्तरे वा ।
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम् पृ० ३५९
आ० त० वि० पृ० १९६—न तत् कस्यचित् , किन्तु वेदनमात्रम्
इयमेवात्मसंवित्तिरस्य याऽजडता
ज्ञा० मि० नि० ( साकारसिद्धिशास्त्रम् ) पृ० ४७१
आ० त० वि० पृ० १९९—बहिरन्तरुभयथाऽपि ॰॰॰
प्रकाशमानं नीलादि जड वा अजड वा ˙
ज्ञा० मि० नि० पृ० ३५०
आ० त० वि० पृ० २०३—अस्तु तर्हि तृतीया ॰॰
वेद्यवेदकयो रूप नियत यदि लक्षितम् ।
तदुपादानपर्यन्ते. सामग्रीशक्तिरुच्यताम् ॥
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम् पृ० ३५२
आ० त० वि० पृ० २०७–२०८—न तु स्वमपि विचारासहमित्यहेयमेव ॰॰ ˙
हेयहीनस्य का मुक्तिः,
केन वाप्युपदिश्यते । ( बौद्धकारिका )
आ० त० वि० पृ० २०९—एवं ज्ञातु निर्वक्तुं वा न शक्यते—
बुद्ध्या विविच्यमानानां स्वभावो नावधार्यते । ( बौद्धकारिका )

४७८ आत्मतत्त्वविवेके
आ० त० वि० पृ० २१५—प्रकाशस्य सतः
ज्ञायते ऽनेनेति ज्ञान जानातीति वेति विकल्पजातस्य निरासः कृतः ।
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम् पृ० ३४६
आ० त० वि पृ० २१५—सामग्रीशक्तिरेवोत्तरम्
सामग्रीशक्तिरुत्तरमिति ।
ज्ञा० मि० नि० अद्वैतविन्दुप्रकरणम् पृ० ३५२
आ० त० वि० पृ० २१९—वासनावशाद् विशेषा स्फुरन्ति*
तस्मात् वासना
ज्ञा० मि० नि० अपोहप्रकरणम् पृ० २२०
आ० त० वि०० पृ० २२०—न ग्राह्यभेदभवधूय
नाकारभेदमवधूय
ज्ञा० मि० नि० साकारसिद्धिशास्त्रम् पृ० ३८६
आ० त० वि० पृ० २३४—नैद् स्थूलम् ( अवयविनिषेध )
अणव एव हि विशिष्टोत्पन्ना द्रव्यद्वय वा संयोगशून्यं तत्तद्बुद्धि-
साधनम् इति किमवयव्यादिना । तस्मादवयवी संयोगाद्यश्च
सवृत्तिसन्त इति ।
ज्ञा० मि० नि० क्षणभङ्गाध्यायः पृ० ७
आ० त० वि० पृ० २६२—न हि तदेक रूपम्
ज्ञा० मि० नि० साकारसिद्धिशास्त्रम् पृ० ४५५
आ० त० वि० पृ० २६५—अस्तु तर्हि परमाणुविवृत्ते सर्वविलोप
न परीक्षाक्षमञ्चाणु कुत कस्य कदा भिदा ।
ज्ञा० मि० नि० साकारसङ्ग्रहसूत्रम् पृ० ५७१
आ० त० वि० पृ० २७०—षट्केन युगपद्योगात्
षट्केन युगपद्योगात् ,
परमाणोः षडंशता ।
दिग्देशभेदतश्छाया—
वृतिभ्या चापि चांशता ॥
( बौद्धकारिका )

परिशिष्टम् ४७९
आ० त० वि० पृ० ३२६—नाप्यसम एव सहोपलम्भनियमः ...
सहोपलम्भनियमात्
ज्ञा० मि० नि० पृ० ५६९
आ० त० वि० पृ० ३३७—अशाब्दत्वात्
शाब्दादिविकल्पा व्यावृत्तिमात्रविषयतया अवस्तुका भवन्तीति
बौद्धमतम् ।
आ० त० वि० पृ० ३४६
अभ्रान्तिसमतैकावसायः प्रकृतिविक्रिये ।
ततो हेतुबलस्योपादानोपादेयलक्षणम् ॥ (बौद्धकारिका)
आ० त० वि० पृ० ३९१
दृश्यश्चेद् व्यतिरेकसिद्धिम न सा
कार्यत्वस्य विपक्षवृत्तिहतये
ज्ञा० मि० नि० पृ० २८५
आ० त० वि० पृ० ३९७—शरीरस्य च नोपाधित्वम्
कर्तुरपि करादिव्यापारमात्रेण...
ज्ञा० मि० नि० पृ० २५८
आ० त० वि० पृ० ४२०—एकत्वे प्रमाणाभावः
एकत्वे सिद्धे साध्यमशेषमाकृष्यते, न च तन्निश्चये किञ्चन्
निबन्धनमस्ति ।
ज्ञा० मि० नि० पृ० २६९
पन्ना उलटिये