आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अनुपलम्भवादः ४७
नास्य श्लाघामकलितगुणः पोपयन् प्रीतये नः,
कोऽन्धैश्चित्रस्तुतिशतविधौ शिल्पिनः स्यात् प्रकर्षः ?
निन्दामेव प्रथयतु जनः, किन्तु दोषान्निरूप्य,
प्रेक्षांस्तथ्यस्खलितकथनं प्रीणयेदेव भूयः ॥२॥
इति श्रीमदाचार्योदयनकृत आत्मतत्वविवेकः सम्पूर्णः ॥
गुणरहित जनोंसे की गयी भी बड़ाई,
नहिं कथमपि होगी प्रीतिदा लेशतोऽपि ।
शतविध बहुअन्धोंसे स्तुता भी, गुणीकी,
सुभग छवि, बढ़ाती कीर्ति क्या स्वल्पतोऽपि ? ॥२॥
मनुजगण बढ़ावे मात्र निन्दा, परन्तु,
त्रुटि यदि इसमे हो तो उसे, ही दिखाकर ।
यदि अवगुण सच है, तो बताना बुधोंको—
अतिशय वह होगा सर्वदा ही सुखाकर ॥३॥
इति न्यायवेदान्तसाङ्ख्ययोगाचार्य श्रीकेदारनाथत्रिपाठिप्रणीतः
आत्मतत्त्वविवेकस्य सविवेचनानुवादः
सम्पूर्णः ।
- श्रीकृष्णार्पणमस्तु *