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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

[Header] ८ आल्हखण्ड । ५६२

सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि बनाफरराय ॥
सूखो चन्दन हम कनउज ते स्वामिनि आजु देयँ मँगवाय ७१
पै नहिं जावैं अब दिल्ली को तुम ते साँच देयँ बतलाय ॥
इतना सुनिकै बेला बोली साँची कहौ बनाफरराय ७२
मंशा तुम्हारी पूरण ह्वैगै जूझै समर चँदेलेराय ॥
हम पर मोहे तुम ऊदन थे ताते डारे कन्त मराय ७३
चहौ एकन्त भोग जो करनो सोहै कठिन बनाफरराय ॥
परपति भोगै अब बेला ना चहुतनधज्जीधज्जीउड़िजाय ७४
भल चतुराई तुम सीखी थी कीन्ही खूब समय पर भाय ॥
पूर मनोरथ तब होई ना मानो साँच बनाफरराय ७५
राज पाट अरु तनु धनकारण हम नहिं सकैं धर्मको टारि ॥
सतयुग त्रेता अरु द्वापरके करिबे धर्म यहां अनुहारि ७६
चन्दनखम्भा की तुम लावौ की अब लेउ शाप विकराल ॥
झूठ न यामें कछु जानो तुम बेटा देशराजके लाल ७७
इतना सुनिकै डरे बनाफर तब फिरि कहा कनौजीराय ॥
ह्वै तुम बेटी महराजा की काछी बात रहिउ बतलाय ७८
ऐस बनाफर नहिं ऊदनहैं जो रण डारै कन्त मराय ॥
मौत आयगै चन्देले कै उनकै बुद्धिगयी बौराय ७६
भरी कचहरी परिमालिक की बीरा लीन्ह्यनि हाथउँड़ाय ॥
बीरालेती जो ब्रह्मा ना ऊदन बिदा लेतिकरवाय ८०
बढ़िहा राजा परिमालिकहैं घटिहा बंश बीर चौहान ॥
घाटि न करतीं जो ब्रह्माते जीतत कौन समरमैदान ८१
चंदन जितनो तुम बतलावौ तितनो देयँ आज मँगवाय ॥
पगिया अरझी नहिं दिल्ली में अनहक प्राण गँवावैं जायँ ८२

चन्दनबागकेरेमैदान । ५६३ ह
इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच कनौजीराय ॥
प्राणपियारे जो तुम्हरे हैं तौ तुम कूचदेउ करवाय ८३
तेहा राखौ रजपूती का चन्दनखम्भ देउ मँगवाय ॥
नहीं जनाना बनि मोहबे, ते जावो लौटि कनौजीराय ८४
शाप मैं देहौं अब ऊदन का तुमते साँच देयँ बतलाय ॥
मोहबा दिल्ली दुउ शहरनमें परिहैं राँड़ राँड़ दिखलाय ८५
इतना सुनिकै लाखनि बोले बेला साँच देयँ बतलाय ॥
बहुत झमेला ते मतलब ना चन्दन देब वही मँगवाय ८६
तौ तौ लड़का रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरो मुड़वाय ॥
सुनि कै बातें लखराना की बेला बड़ी खुशी है जाय ८७
तबै बनाफर उदयसिंहजी तहँते कूच दीन करवाय ॥
फिरि यह बोले लखराना ते मानो कही कनौजीराय ८८
मृत्यु रूप यह बेला रानी दीन्ह्यसि बोलि दुऊकुलभाय ॥
नाश करनके हित यह बेला चन्दनखम्भ रही मँगवाय ८६
नहीं तो मतलब का खम्भाते जब हम और देयँ मँगवाय ॥
अपन रँड़ापा ते चाहति है सब संसार राँड़ द्वै जाय ६०
प्राण आपने हम मल्हना को दीन्हे व्याह नेगमें भाय ॥
सो अब विरिया चलिआई है बेला मृत्यु बहाना आय ६१
कयहू समुझाये ते समुझै ना बेला विपति बोलि हरियाय ॥
जियत पिथौरा के द्वैहैं ना की हम खम्भलेयँ उखराय ६२
दुखित पिथौरा अब दुनियामा मरिगे सात पूत रणआय ॥
पुत्र न एको अब पृथ्वी के जो अवलम्बपरै दिखलाय ६३
बिना पुत्रके गति नहिं होवे वेद औ शास्त्र रहे बतलाय ॥
अगमा मल्हना दुउ रानिनकी बेला नाशिदीन करवाय ६४
३८

१० आल्हखण्ड । ५६४
ह्वै झमेला हमपर तुमपर कैसी करैं कनौजीराय ॥
ऐसी सुनिकै लाखनि बोले मानो साँच बनाफरराय ६५
होनी ह्वैहै सो ह्वैहै अब याही ठीक लेउ ठहराय ॥
मृत्यु आयगै जब रावणकै तब वनवासगये रघुराय ६६
कोऊ रक्षा तब कीन्ह्यो ना जब मुनिपिया समुन्दरजाय ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव सम्बन्धी इनसेऔर कौन अधिकाय ६७
बिपति समुन्दर पर जब आई तब सबगये तुरत अलगाय ॥
त्यहिते सम्मत अब याही है भुरहीं कूच देउ करवाय ६८
मर्जी होई नारायण की होई स्वई बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ६६
सम्मत ठीकौ अब याही है दिल्ली चलैं तड़ाकाधाय ॥
मर्जी याही नारायण की अनरथरूप परै दिखलाय १००
इतना कहिकै लाखनि ऊदन सोये द्वऊ सेजपर जाय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों भंडागड़ानिशाकोआय १०१
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भांय १०२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौं तुम यश सों रहौ सदा भरपूर १०३
पूरण कीन्ह्यो अब याहींते चन्दन बाग केरि सबगाथ ॥
वन्दन करिकै पितु माताके दूनों धरौं चरणपर माथ १०४
पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १०५
इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारा-
यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुधकृपा-
शंकरसूनुपं०ललिताप्रसादकृतचंदनवाटिका युद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
चन्दनखम्भाकायुद्धवर्णन ॥
सवैया ॥
सोहत मुण्डनमाल हिये अरु भाल में चन्द्र बिराजत नीके ।
शूल औ शक्ति कृपाण लिये डमरू कर सोहत शम्भुबलीके ॥
खातहैं भंग धरे शिरगंग सो नंग फिरैं अरधंग सतीके ।
जंग जुरे न टरैं ललिते हम ध्यावत चर्ण हैं शम्भु यतीके १
सुमिरन ॥
विपत्ति विदारण जगतारण के दूनों धरौं चरणपर माथ ॥
पूर मनोरथ तुम्हहीं करिहौ स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १
वल्कल धारे जटा सँवारे मारे बली बीर दशमाथ ॥
सो हैं स्वामी अवधपुरी के लीन्हे धनुषत्राण प्रभु हाथ २
अक्षत चन्दन औ पुष्पन सों मानस पूजन परम उदार ॥
सो मैं करिकै रघुनन्दन का जावा चहौं जगत के पार ३
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धहौ स्वामी र... ... ... ॥

२ आल्हखण्ड । ५६६
कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४
छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥
सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १
अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥
धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २
इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥
सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३
झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४
देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५
रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥
पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६
तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥
पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७
तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥
बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८
भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥
धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६
सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥
१०

चन्दनखम्भाकामंदान । ५६७ ३
भा खलभल्ला औ हल्ला तब लोगन दीन्ह्यो लागलगाय ॥
मुर्चाबन्दी दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ बीर समुहाय ११
मारन लागे तलवारी सों दूनों तरफ बरोबरि आय ॥
अपने अपने सब मुर्चनमा ज्वाननदीन्हे ज्वान गिराय १२
औ ललकारैं फिरि फिरि मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
लिहे जँजीरें हाथी मारैं घोड़ा मारैं टाप चलाय १३
दाँतन काटैं फिरि फिरि डाटैं चाटैं रक्त भूत बैताल ॥
मारि लहाशन के भुइँ पाटैं ल्वाटैं समरशूर त्यहिकाल १४
ह्वातैं लागीं तहँ श्वानन की ज्वानन खूब कीन तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १५
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
खट खट खट खट तेगा बोलै ऊना चलै बिलाइतिक्यार १६
भाला बरछी तीर तमंचा कहुँ कहुँ कड़ाबीनकी मार ॥
छुरी कटारी कउ कउ मारैं कउ कउ बीर रहे ललकार १७
कउ मुखफारैं नखन बिदारैं डारैं चीरि फारि मैदान ॥
कोऊ हारै नहिं काहू सों ज्वाननकीन घोर घमसान १८
परशूठाकुर लाखनि दिशि को अंगद नृपतिग्वालियरक्यार ॥
मुर्चाबन्दी भै दूनन कै दूनों लड़न लागि सरदार १६
अंगद मारै तलवारी सों परशू लेय ढालपर वार ॥
परशू मारै तलवारी सों अंगद रोकि लेय त्यहिवार २०
बड़ी लड़ाई भै दूननमा दूनन खूब कीन तलवार ॥
वार चूकिगे अंगद राजा परशू मारिदीन त्यहि वार २१
गिरिगा राजा ग्वालियर का आयो बीर भुगन्ता ज्वान ॥
बीर भुगन्ता के मुर्चा मा परशू खूब कीन मैदान २२

४ आल्हखण्ड । ५६८
वार चूकिगे परशू ठाकुर गस्यो वीर सुगन्ता ज्वान ॥
चन्दन खम्भा के मुर्च्चा मा परशू जूझिगये मैदान २३
ऐंड़ा बेंडा ऊदन मारैं सीधा हनैं कनौजीराय ॥
अगलबगल में जगनायकजी बहु रणशूर ढहावत जायें २४
रानी अगमा के महलन के फाटक ऊपर कनौजीराय ॥
सँग जगनायक ऊदन ठाकुर येऊ गये तड़ाका धाय २५
मुर्च्चाबन्दी है बिसहिनि में तहँ पर गये पिथौराराय ॥
सुनी हकीकति लाखनिराना द्वारे जाय गये बिरझाय २६
बदला लेवे संयोगिनि का तब फिरि धरब अगारी पाँय ॥
लैकै डोला अब अगमा का कनउज शहर देहुँ पहुँचाय २७
तौ तौ लड़िका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरौं मुड़वाय ॥
तब जगनायक बोलन लागे मानो कही कनौजीराय २८
जैसे जानैं हम मल्हना को अगमा तैसि हमारी माय ॥
यह गति नाहीं क्यहु ठाकुरकी डोला आजु लेय निकराय २९
जितनी फौजें चन्देले की सो सब साथ हमारे भाय ॥
हमरो तुम्हरो मुर्च्चा द्वै है साँची सुनो कनौजीराय ३०
यामें संशय कछु परि है ना तुमते ठीक दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें जगनायक की बोला तुरत बनाफरराय ३१
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है भैने सुनो चँदेलेकेर ॥
रतीभान के ये लरिका हैं नाती बेनचकवै केर ३२
घाट बयालिस पिरथी रोंके तब तुम गये हमारे पास ॥
बन्दि छुड़ाई इन मोहबे की काटी तहाँ यमनकी पाश ३३
आजु कनौजी सब लायक हैं हमरे माननीय शिरताज ॥
तुमहूँ प्यारे जगनायक जी विग्रहकेर नहीं कछुकाज ३४

चन्दनखम्भाकामैदान । ५६६
तुम्हरे लाखनि के मुर्चामा कटिहैं पायँ आपने भाय ॥
.होय लड़ाई घर अपने मा दुशमनशोरहोय अधिकाय ३५
हुकुम जो पावैं लखरानाका महलन जायँ तड़ाकाधाय ॥
डोला लावैं हम अगमा का राखैं टेक कनौजिराय ३६
सुनिकै बातैं बघऊदन की लाखनि हुकुम दीन फरमाय ॥
चला बनाफर तब जल्दी सों महलन अटा तड़ाकाजाय ३७
रूप देखिकै बघऊदन का रानी गई सनाका खाय ॥
हाथ मेहरियन पर डार्यो ना मानो कही बनाफरराय ३८
पूत सुपूते ग्वालिवाले कीरति छायरही चहुँओर ॥
महल हमारे जो तुम लूटै कीरतिजाय सबै यहि ठोर ३६
फेंट बँधैया कोउ नाहीं है ना कोउ गहनयोग तलवार ॥
साँची बातैं हमरी मानो ठाकुर उदयसिंह सरदार ४०
सुनिकै बातैं महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
ब्वला बेंदुला का चढ़वैया रानी साँच देयँ बतलाय ४१
जैसे माता मल्हना रानी तैसे आप हमारी माय ॥
यहु महराजा कनउजवाला द्वारे आय गयो बिरझाय ४२
डोला लेबे हम अगमा का तब अब धरब अगारी पाँय ॥
बदला लेबे संयोगिनि का तब छाती का डाह बुताय ४३
तहँ जगनायक खूब बिगरे थे तिनहुन दीन तहाँ समुझाय ॥
अब समुझावत महरानी हैं बाँदी आप देउ पठवाय ४४
यह मनभाई महरानी के सुन्दरि बाँदी लीन बुलाय ॥
कपड़ा गहना सब आपनदै डोला उपर दीन बैठाय ४५
चलिभा डोला रंगमहल ते संगे चले बनाफरराय ॥
जहाँ कनौजी की भूरीथी डोला तहाँ पहुँचा आय ४६

६ आल्हाखण्ड । ६००
देखिकै डोला लाखनिराना तुरतै कूचदीन करवाय ॥
चलिभा डोला जब फाटकते पहुँचा तुरत बजारे आय ४७
ऊदन बोले तब लाखनि ते मानो कही कन्नौजीराय ॥
कऊ दुसरिहा अब तुम्हरो ना डोला आप देउ लौटाय ४८
कीरति गैहैं सब दुनिया मा ओ महराज कन्नौजीराय ॥
इतना सुनिकै लाखनिराना डोला तुरत दीन लौटाय ४६
आयग तिसहिन ते तुरतै तब यहु महराज पिथौराशाय ॥
सुनी हकीकति सबलाखनिकी हाथी तुरत लीन सजवाय ५०
आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि बैठ्यो शम्भु शिवाक्रोध्याय ॥
चौंड़ा धाँधू अगल बगलभे डंका तुरत दीन बजवाय ५१
बाजत डंका अह्तंका के राजन कूच दीनकरवाय ॥
भारी लस्कर महाराजा का पहुँचा समरभूमि में जाय ५२
यहु महाराजा तब गाजाअति राजा गहरूदीन ललकार ॥
मारो मारो ओ रजपूतो हमरे समरशूर सरदार ५३
जान न पावैं मोहबेवाले अब शिरकाटि देउ भुइँडारि ॥
गरूई गाजैं सुनि राजाकी बाजैं घूमि घूमि तलवारि ५४
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी लाल ॥
भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जैं भूत प्रेत बैताल ५५
श्वान शृगालन की बनिआई कागन लागी कारि बजार ॥
गिद्ध औ चील्हनके झुण्डनका मुण्डन उपर लाग दरबार ५६
बहैं लहाशैं तहँ मनइन की तापर चढ़े काग औ कङ्क ॥
उठिउठिलड़ि २ गिरि २ कितन्यो मरिगे समर राव औ रङ्क ५७
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया ठाकुर उदयसिंह निरशंक ॥
मारति आवै रजपूतन को लीन्हे सङ्ग सिपाही बङ्क ५८

भयो सामना फिरि धाँधू का दूनों लड़न लाग सरदार ॥
छोड़ बेंदुला पर ऊदन हैं धाँधू हाथी पर असवार ५९
पैंड़ लगायो रस बेंदुल के हौदा उपर पहुँचा जाय ॥
गुर्ज चलाई तब धाँधू ने ऊदन लैगे वार बचाय ६०
ढाल कि औझड़ ऊदन मारी धाँधू गिरे मूर्च्छा खाय ॥
भागो हाथी जब धाँधू का देवी गयो मरहटाआय ६१
औ ललकारा उदयसिंह को ठाकुर खबरदार है जाय ॥
वार हमारी ते बचिहौना जो बिधि आपुबचायै आय६२
इतना कहिकै देवी मरहटा तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥
ऐंचि कै मारा बघऊदन के ऊदन लीन ढालपर वार ६३
फिरि ललकारा उदयसिंह ने नाहर होउ तुरत हुशियार ॥
यह कहि मारा तलवारी को देवी जूझिगयो त्यहिबार ६४
जूझिग देवी जब खेतन मा चौंड़ा गरु करै ललकार ॥
लडै चौंड़िया रण खेतनमा दूनों हाथ करै तलवार ६५
मीरासय्यद बनरस वाले येऊ घोर करैं घमसान ॥
कोगति बरणै तहँ देवा कै ठाकुर मैनपुरी चौहान ६६
फिरिफिरि मारै औ ललकारै रणमा कठिन करै तलवार ॥
धूरी हथिनी के हौदा ते राजा कनउज का सरदार ६७
हनि हनि मारै रजपूतन का अद्भुत युद्ध करै त्यहिबार ॥
कोगतिवरणै तहँ धाँधू कै हाथी उपर जवान असवार ६८
करि खलभल्ला औ हल्लाअति दूनों हाथ करै तलवार ॥
लड़ै इकल्ला यहू लल्लाअति ठाकुर उदयसिंह सरदार ६६
बड़ी लड़ाई त्यहि समया भै चन्दन खम्भा के मैदान ॥
ना मुह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ७०

८ आल्हखण्ड । ६०२
फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ बड़े लड़ैता ज्वान ॥
ऊंचे खाले कायर भागे छोड़िकै समर भूमि मैदान ७१
शूर सिपाही ईजति वाले आली खानदान के ज्वान ॥
बढ़ि बढ़ि मारैं तलवारी सों अपने धरे गदोरी प्रान ७२
आदि भयङ्कर को चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥
चौड़ा धाँधू को ललकारा चन्दन तुरत लेउ उल्टाय ७३
जान न पावैं मोहवे वाले सबकी कटा देउ करवाय ॥
सुनिकै बातें महाराजा की बोला तहाँ बनाफरराय ७४
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है ओ महराज बीर चौहान ॥
जैसे नौकर चन्देले के तैसे आप करो परमान ७५
नहीं बरोबरि कोउ तुम्हरे है ज्यहिपर आप चढ़े महराज ॥
बेला बेला दुहुँ तरफाते ज्यहिते भये दुःखके साज ७६
हमें पठायो है बेलाने चन्दन लेन हेतु महराज ॥
पहिले बगिया को कटवायो पाछे कीन भयङ्कर काज ७७
सची होई चंदेले सँग राखी दुहूँ कुल न की लाज ॥
हम समुझावा भल बेला को की तुम करो मोहोबे राज ७८
अनरथ भायो मन बेला के खम्भन हेतु दीन पठशाय ॥
ना चढ़िआये जयचँद राजा ना चढ़िये चँदेलेराय ७६
तुम्हें मुनासिब अब याही है राजन कूच देउ करवाय ॥
इतना सुनिकै महाराजा तहँ हाथी तुरत लीन लौटाय ८०
भाग्यो लश्कर फिरि पिरथी का सबदलतितिर बितिर है जाय ॥
लादि कै खम्भा तहँ छकरन में लाखनि कूचदीनकरवाय ८१
पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुंचे आय ॥
खेतलूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ८२

चन्दनखम्भाकामदान । १९०२
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनारायणभाय ८३
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर ८४
माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिसई यह गाथ ॥
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ८५
माथ तुम्हारो है दुनिया मा दूसर नहीं हमारो नाथ ॥
सत्य शपथ यह धर्म कर्म की स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ८६
सुमिरि भवानी शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त ८७
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण-
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतचन्दनखम्भयुद्ध
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
चन्दनखम्भाकामैदान समाप्त ॥
इति ॥

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
बेलाकेसतीहोनेकेसमयकायुद्धवर्णन ॥
सवैया ॥
भक्तन हेतु सबयं तनुधारि सदा बिपदा सुरसाधुहरी ।
हिरणाकश्यप दुःख दियउ तब रूपकियो नरसिंह हरी ॥
प्रह्लाद विभीषण औ हनुमान महानन में इन रेखपरी ।
अँवरीष औ अंगद की समता ललिते जगमें अब कौनकरी १
सुमिरन ॥
तुम्हैं विनायक मैं सुमिरत हौं गणपति गणाध्यक्ष महराज ॥
बिघन हरण लम्बोदर स्वामी पूरणकरो हमारे काज १
हे जगतारण भवभय हारण स्वामी एकदन्त महराज ॥
विपति विदारण सब सुखकारण राखनहार जगतमें लाज २
तुमहीं ब्रह्मा औ विष्णु हौ तुमहीं शम्भु सुरासुर काल ॥
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी शिवाशम्भु के बाल ३

२ आल्हखण्ड । ६०६
तुम्हैं मनावैं औ ध्यावैं हम गावैं सदा तुम्हारी गाथ ॥
यह वरपावैं गणनायक जी दर्शन देयँ मोहिं रघुनाथ ४
छूटि सुमिरनी गणनायक कै शाका सुनो शूरमन केर ॥
सत्ती होई बेला रानी ठानी युद्ध पिथौरा फेर ५
अथ कथाप्रसंग ॥
खम्भ आयगे जब चन्दन के बेला करनलागि अनुमान ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो होय सती अस्थान १
यहै विचारत मन धारत सो आरत हृदय भई अधिकाय ॥
तबलों लाखनि को सँग लैकै आये तहाँ बनाफरराय २
बेला बोली तब ऊदन ते मानो साँच लहुरवाभाय ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो सरादेउ रचवाय ३
इतना सुनिकै ऊदनठाकुर चन्दन तहाँ दीनपहुँचाय ॥
चारि चहद्दी के डाँड़े पर बेला सरादीन रचवाय ४
कनउज मोहवे की फौजें सब ऊदनतुरत लीन सजवाय ॥
सरा रचायो जहँ बेला का सबदल दीन्ह्यों तहाँ टिकाय ५
जितनी रैयति परिमालिक कै देखन हेतु गई सब आय ॥
बेलारानी त्यहि औसर मा भूषण वसन सजे अधिकाय ६
को गति वरणै तहँ बेला कै षोड़श पूरकीन शृंगार ॥
लाश संगलै चन्देले की सरपर गई सती त्यहिबार ७
गाहरिकारा ह्याँ दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥
खबरि पायकै पृथीराज ने अपनी फौज लीन सजवाय ८
को गति वरणै त्यहि समया कै मानो इन्द्र अखाड़े जाय ॥
आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि मनमें शम्भु शिवापद ध्याय ९
चाँड़ा धाँधू वीर भुगन्ता लैकै कूच दीन करवाय ॥

बेलासती अन्तमैदान । ६०७ ३
भारी लश्कर महराजाका गर्जत चला समरको जाय १०
थोड़े अरसा मा महराजा आये सरापास नगच्याय ॥
बाजै बाजा ह्याँ सती के हाहाकार शब्दगा छाय ११
बोला पिथौरा हाथी परते ओ महराज कनौजीराय ॥
बंश चँदेले के जो होवै सो सर देवै आगि लगाय १२
जायँ नगीचे नहिं ऊदन अब हैं अकुलीन बनाफरराय ॥
सुनिकै बातें पृथीराज की बोला तुरत लहुरवाभाय १३
हमै आज्ञा है बेला कै की सरदेवो आगिलगाय ॥
इतना कहिकै उदयसिंह ने दीन्ह्यो चितातुरतदँदकाय १४
यह गति दीख्यो पृथीराजने तुरतै हुक्म दीन फरमाय ॥
जान न पावैं मोहेबे वाले सब के देवो मूंड़ गिराय १५
हुकुम पायकै पृथीराज का चौंड़ा धाँधू उठे रिसाय ॥
बीर भुगन्ता गर्जन लाग्यो मारन लाग तड़ाका धाय १६
सय्यद देवा ऊदन ठाकुर इनहुन खैंचिलीन तलवार ॥
को गति वरणै त्यहि समया कै लागी होन भड़ामड़मार १७
हौदा हौदा यकमिल ह्वैगे घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥
पहिया रथ के रथमा भिड़िगे तीरन भिड़िगे तीर्रकमान १८
मर मर मर मर ढालैं बोलैं खन खन तूण बाण चिल्लायँ ॥
सन् सन् सन् सन् गोली बरसें कायर भागैं समर पराय १६
घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥
झलझलझलझलझीलम झलकैं नीलम रंग परै दिखराय २०
चम् चम् चम् चम् तेगा चमकैं दमकैं छुरी कटारी भाय ॥
कोगति वरणै त्यहि समया कै अद्भुत समर कहानाजाय २१
फिरैं भुशुण्डा बिन मुण्डा के रुण्डा करैं खूब तलवार ॥

४ आल्हखण्ड । ६०८
मुण्डन केरे मुड़ धौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार २०
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥
कायर भागे समर भूमि ते अपने डारि डारि हथियार २३
भूरा सय्यद का मुर्चा भा दूनों लड़न लागि सरदार ॥
दूनों मारैं तलवारी सों दूनों लेयँ ढाल पर वार २४
उसरिन उसरिन दूनों खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ॥
वार चूकिया भूरा जबहीं सय्यद हना तुरत तलवारि २५
मूड़ बिसानी सो भूरा के तुरतै गिरा भरहराखाय ॥
भूरा जूझयो जब खेतन में आयो तुरत भुगन्ता धाय २६
सो ललकारयो फिरि सय्यदको अब रण सावधान है जाय ॥
धोखे भूरा के भूल्यो ना अबहीं यमपुर देउँ दिखाय २७
इतना कहिकै वीर भुगन्ता तुरतै लीन्ह्यो तीर चढ़ाय ॥
खैंचि कमानिया ते मारत भा सय्यद लैगे वार बचाय २८
घोड़ बढ़ायो फिरि सय्यद ने लैकै गुर्ज पहुंच्यो जाय ॥
वीर भुगन्ता को ललकारा क्षत्री खबरदार है जाय २६
वार हमारी ते बचि है ना दोजख अबै देउँ पहुँचाय ॥
इतना कहिकै क्रोधिन हैकै सय्यद मारयो गुर्ज घुमाय ३०
वार बचाई वीर भुगन्ता फिरित्यहिखैंचिली न तलवार ॥
ऐँचि कै मारा वीर भुगन्ता जूझयो बनरस का सरदार ३१
सय्यद जूझयो जब मुर्चा में तब चढ़ि अयो कनौजीराय ॥
गंगा ठाकुर तिन पाछे करि आगे गयो तड़ाकाधाय ३२
वीर भुगन्ता औ गंगा का परिगासमर बरोबरि आय ॥
लखै पिथौरा औ कनौजिया अद्भुतसमर कहा ना जाय ३३
आदिभयङ्कर पर पिरथी है लाखनि भूरी पर असवार ॥

बेलासतीअन्त मैदान। ६०६ ५
तेहा राखे रजपूती का कीन्हे जंग केर श्रृंगार ३४
भाला बरछी दूनों लीन्हे दूनों लिये ढाल तलवार ॥
पाग बैजनी शिरपर धारे कनउज दिल्ही के सरदार ३५
कलँगी सोहैं दोउ पगियन में दोउन हीरा करैं बहार ॥
रूप उजागर सबगुण आगर कनउज दिल्हीके सरदार ३६
तेहेदारी की समता है समता राज काज ब्यवहार ॥
समता वय में नहिं लाखनिकी थोरी उमर केर सरदार ३७
गंगा मामा कुड़हरिवाले तिनते कहा तहाँ ललकार ॥
मारो मारो अब जल्दीते मामा काह लगाई बार ३८
इतना सुनिकै गंगा ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ॥
बीरभुगन्ता तब मारत भा गंगा लीन ढालपरवार ३६
ऐंचि सिरोही गंगामारा तुरतै दीन्ह्यो मूड गिराय ॥
वीरभुगन्ता के जूझतखन धाँधू गयो तड़ाकाआय ४०
धाँधू गंगा का मुर्चाभा अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
दूनों मारैं तलवारी से दूनों लेवैं वार बचाय ४१
कोऊ काहू ते कमती ना दोउ रण परा बरोबरिआय ॥
वार चूकिगे गंगा ठाकुर धाँधू मारा गुर्ज घुमाय ४२
परिगै मस्तक सो गंगा के तुरतै गिरा भरहरा खाय ॥
गिरिगे गंगा जब हाथी पर तुरतै अटा कनौजीराय ४३
लाखनि धाँधू का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागिसरदार ॥
दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ४४
कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ करैं भड़ाभड़ मार ॥
भौंरानँद पर धाँधू ठाकुर लाखनि भूरी पर असवार ४५
दोउ हौदा यकमिल हैगे दोऊ करैं समर ललकार ॥
११

६ आल्हखण्ड । ६१०
छुरी कटारी भाला बरछी होवै कड़ाबीन की मार ४६
तीर तमंचा गुर्ज चलावैं दोऊ समर शूर त्यहि बार ॥
वार चूकिगे धाँधू ठाकुर मारा कनउज के सरदार ४७
धाँधू जूझ्यो जब मुर्चा में आयो तुरत पिथौगराय ॥
आदिभयङ्करज्यहि दिशिदावै त्यहिदिशिहटतफौजसब जाय ४८
को गति बरणै पृथीराज की नाहर समरथनी चौहान ॥
ज्यहि दिशि दाबै समर भूमिमें त्यहिदिशिहोतजात मैदान ४६
सुफना बोल्यो हाँ लाखनि ते ओ महराज कनौजीराय ॥
आदिभयङ्कर दाबे आवै यहु महराज पिथौराराय ५०
कोऊ सहायक अब तुम्हरो ना स्वामी आप एक यहिकाल ॥
इत उत फिरिकै चहुँदिशि देखा नहिंकोउदेखिपरै महिपाल ५१
करै आतमा की रक्षा नर धन औ स्त्री संग बिहाय ॥
धन सों स्त्री की रक्षा कर यह मर्याद नीति की आय ५२
त्यहिते तुमका समुझाइत है ओ महराज कनौजीराय ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ५३
कहा न माना चंदेलेका हटका मातु हमारी आय ॥
अब नहिं भागैं हम मुर्चा ते चहु तन धजी २ उड़िजाय ५४
रही न देही रामचन्द्र कै रहिनहिं गये कृष्ण महराज ॥
यशै इकेलै बाकी रहिगा सो कस तजैं समरमें लाज ५५
रही न देही क्यहु मानुष की सबजग नाशवान दिखलाय ॥
त्यहिते हाथी जहँ पिरथी का सुफना चलौ तहाँपर धाय ५६
प्राण निछावरि रण करि देबे तौ यशरही जगत में छाय ॥
जो अब भागैं समर भूमि ते कायर कहैं लोक सबगाय ५७
सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥

[Header] बेलासती अन्त मैदान । ६११ ७

आवत देख्यो लखराना को बोल्यो तुरत पिथौराराय ५८
आवो आवो लाखनिराना हमरे संग मिलौ तुम आय ॥
हमरी सरवरि को तुमहीं हौ ओ महराज कनौजीराय ५६
नीच बनाफर उदयसिंह है तासँग काहगयो बौराय ॥
सोलह रानिन के इकलौता नाहक प्राण गँवायो आय ६०
अबै मामिला कछु बिगरा ना मानो कही कनौजीराय ॥
हमै सोच है इक कनउज का की निर्वंश राज है जाय ६१
बृद्ध चँदेले जयचँदराजा मानो कही कनौजीराय ॥
सात पुत्र रण खेतन जूझे हमखोवंश नाश भय आय ६२
अस नहिं चाहें जस हम हैंगे मानो कही कनौजीराय ॥
उमिरि तुम्हारी अतियोरी है कच्ची बुद्धि गयो बौराय ६३
दोष हमारो सब कोउ दैहें बालक हना पिथौराराय ॥
त्यहिते तुमका समुझाइत है कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६४
हमरी तुम्हरी कछु अटनस ना जो रण प्राण गँवावो आय ॥
काह बिगारा हम जयचँद का कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६५
सुखनहिंदेख्यो कछु दुनियाका नाहक प्राण गँवावो आय ॥
अब नहिंकैहैं कछुलाखनिहम कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६६
ताहर नाहर की समता हौ कच्ची बुद्धि गयो बौराय ॥
जो नहिं आवो हमरे दल में तौ अब कूच जाउकरवाय ६७
पारस पैहौ जो दल ऐहौ कनउज गये प्राण रहिजायँ ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही पिथौराराय ६८
तुम्हरी बातें सब साँची हैं सो हम जानि दीन विमराय ॥
पै अब बदला संयोगिनि का लेबे समर भूमि में आय ६६
यामें संशय कछु नाहीं है मानो साँच पिथौराराय ॥