आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । ५६४
ह्वै झमेला हमपर तुमपर कैसी करैं कनौजीराय ॥
ऐसी सुनिकै लाखनि बोले मानो साँच बनाफरराय ६५
होनी ह्वैहै सो ह्वैहै अब याही ठीक लेउ ठहराय ॥
मृत्यु आयगै जब रावणकै तब वनवासगये रघुराय ६६
कोऊ रक्षा तब कीन्ह्यो ना जब मुनिपिया समुन्दरजाय ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव सम्बन्धी इनसेऔर कौन अधिकाय ६७
बिपति समुन्दर पर जब आई तब सबगये तुरत अलगाय ॥
त्यहिते सम्मत अब याही है भुरहीं कूच देउ करवाय ६८
मर्जी होई नारायण की होई स्वई बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ६६
सम्मत ठीकौ अब याही है दिल्ली चलैं तड़ाकाधाय ॥
मर्जी याही नारायण की अनरथरूप परै दिखलाय १००
इतना कहिकै लाखनि ऊदन सोये द्वऊ सेजपर जाय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों भंडागड़ानिशाकोआय १०१
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भांय १०२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौं तुम यश सों रहौ सदा भरपूर १०३
पूरण कीन्ह्यो अब याहींते चन्दन बाग केरि सबगाथ ॥
वन्दन करिकै पितु माताके दूनों धरौं चरणपर माथ १०४
पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १०५
इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारा-
यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुधकृपा-
शंकरसूनुपं०ललिताप्रसादकृतचंदनवाटिका युद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥