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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

२ आल्हखण्ड । ६०६
तुम्हैं मनावैं औ ध्यावैं हम गावैं सदा तुम्हारी गाथ ॥
यह वरपावैं गणनायक जी दर्शन देयँ मोहिं रघुनाथ ४
छूटि सुमिरनी गणनायक कै शाका सुनो शूरमन केर ॥
सत्ती होई बेला रानी ठानी युद्ध पिथौरा फेर ५
अथ कथाप्रसंग ॥
खम्भ आयगे जब चन्दन के बेला करनलागि अनुमान ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो होय सती अस्थान १
यहै विचारत मन धारत सो आरत हृदय भई अधिकाय ॥
तबलों लाखनि को सँग लैकै आये तहाँ बनाफरराय २
बेला बोली तब ऊदन ते मानो साँच लहुरवाभाय ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो सरादेउ रचवाय ३
इतना सुनिकै ऊदनठाकुर चन्दन तहाँ दीनपहुँचाय ॥
चारि चहद्दी के डाँड़े पर बेला सरादीन रचवाय ४
कनउज मोहवे की फौजें सब ऊदनतुरत लीन सजवाय ॥
सरा रचायो जहँ बेला का सबदल दीन्ह्यों तहाँ टिकाय ५
जितनी रैयति परिमालिक कै देखन हेतु गई सब आय ॥
बेलारानी त्यहि औसर मा भूषण वसन सजे अधिकाय ६
को गति वरणै तहँ बेला कै षोड़श पूरकीन शृंगार ॥
लाश संगलै चन्देले की सरपर गई सती त्यहिबार ७
गाहरिकारा ह्याँ दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥
खबरि पायकै पृथीराज ने अपनी फौज लीन सजवाय ८
को गति वरणै त्यहि समया कै मानो इन्द्र अखाड़े जाय ॥
आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि मनमें शम्भु शिवापद ध्याय ९
चाँड़ा धाँधू वीर भुगन्ता लैकै कूच दीन करवाय ॥