सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 612

[Header] बेलासती अन्त मैदान । ६११ ७

आवत देख्यो लखराना को बोल्यो तुरत पिथौराराय ५८
आवो आवो लाखनिराना हमरे संग मिलौ तुम आय ॥
हमरी सरवरि को तुमहीं हौ ओ महराज कनौजीराय ५६
नीच बनाफर उदयसिंह है तासँग काहगयो बौराय ॥
सोलह रानिन के इकलौता नाहक प्राण गँवायो आय ६०
अबै मामिला कछु बिगरा ना मानो कही कनौजीराय ॥
हमै सोच है इक कनउज का की निर्वंश राज है जाय ६१
बृद्ध चँदेले जयचँदराजा मानो कही कनौजीराय ॥
सात पुत्र रण खेतन जूझे हमखोवंश नाश भय आय ६२
अस नहिं चाहें जस हम हैंगे मानो कही कनौजीराय ॥
उमिरि तुम्हारी अतियोरी है कच्ची बुद्धि गयो बौराय ६३
दोष हमारो सब कोउ दैहें बालक हना पिथौराराय ॥
त्यहिते तुमका समुझाइत है कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६४
हमरी तुम्हरी कछु अटनस ना जो रण प्राण गँवावो आय ॥
काह बिगारा हम जयचँद का कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६५
सुखनहिंदेख्यो कछु दुनियाका नाहक प्राण गँवावो आय ॥
अब नहिंकैहैं कछुलाखनिहम कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६६
ताहर नाहर की समता हौ कच्ची बुद्धि गयो बौराय ॥
जो नहिं आवो हमरे दल में तौ अब कूच जाउकरवाय ६७
पारस पैहौ जो दल ऐहौ कनउज गये प्राण रहिजायँ ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही पिथौराराय ६८
तुम्हरी बातें सब साँची हैं सो हम जानि दीन विमराय ॥
पै अब बदला संयोगिनि का लेबे समर भूमि में आय ६६
यामें संशय कछु नाहीं है मानो साँच पिथौराराय ॥