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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 611

६ आल्हखण्ड । ६१०
छुरी कटारी भाला बरछी होवै कड़ाबीन की मार ४६
तीर तमंचा गुर्ज चलावैं दोऊ समर शूर त्यहि बार ॥
वार चूकिगे धाँधू ठाकुर मारा कनउज के सरदार ४७
धाँधू जूझ्यो जब मुर्चा में आयो तुरत पिथौगराय ॥
आदिभयङ्करज्यहि दिशिदावै त्यहिदिशिहटतफौजसब जाय ४८
को गति बरणै पृथीराज की नाहर समरथनी चौहान ॥
ज्यहि दिशि दाबै समर भूमिमें त्यहिदिशिहोतजात मैदान ४६
सुफना बोल्यो हाँ लाखनि ते ओ महराज कनौजीराय ॥
आदिभयङ्कर दाबे आवै यहु महराज पिथौराराय ५०
कोऊ सहायक अब तुम्हरो ना स्वामी आप एक यहिकाल ॥
इत उत फिरिकै चहुँदिशि देखा नहिंकोउदेखिपरै महिपाल ५१
करै आतमा की रक्षा नर धन औ स्त्री संग बिहाय ॥
धन सों स्त्री की रक्षा कर यह मर्याद नीति की आय ५२
त्यहिते तुमका समुझाइत है ओ महराज कनौजीराय ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ५३
कहा न माना चंदेलेका हटका मातु हमारी आय ॥
अब नहिं भागैं हम मुर्चा ते चहु तन धजी २ उड़िजाय ५४
रही न देही रामचन्द्र कै रहिनहिं गये कृष्ण महराज ॥
यशै इकेलै बाकी रहिगा सो कस तजैं समरमें लाज ५५
रही न देही क्यहु मानुष की सबजग नाशवान दिखलाय ॥
त्यहिते हाथी जहँ पिरथी का सुफना चलौ तहाँपर धाय ५६
प्राण निछावरि रण करि देबे तौ यशरही जगत में छाय ॥
जो अब भागैं समर भूमि ते कायर कहैं लोक सबगाय ५७
सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥