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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 610

बेलासतीअन्त मैदान। ६०६ ५
तेहा राखे रजपूती का कीन्हे जंग केर श्रृंगार ३४
भाला बरछी दूनों लीन्हे दूनों लिये ढाल तलवार ॥
पाग बैजनी शिरपर धारे कनउज दिल्ही के सरदार ३५
कलँगी सोहैं दोउ पगियन में दोउन हीरा करैं बहार ॥
रूप उजागर सबगुण आगर कनउज दिल्हीके सरदार ३६
तेहेदारी की समता है समता राज काज ब्यवहार ॥
समता वय में नहिं लाखनिकी थोरी उमर केर सरदार ३७
गंगा मामा कुड़हरिवाले तिनते कहा तहाँ ललकार ॥
मारो मारो अब जल्दीते मामा काह लगाई बार ३८
इतना सुनिकै गंगा ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ॥
बीरभुगन्ता तब मारत भा गंगा लीन ढालपरवार ३६
ऐंचि सिरोही गंगामारा तुरतै दीन्ह्यो मूड गिराय ॥
वीरभुगन्ता के जूझतखन धाँधू गयो तड़ाकाआय ४०
धाँधू गंगा का मुर्चाभा अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
दूनों मारैं तलवारी से दूनों लेवैं वार बचाय ४१
कोऊ काहू ते कमती ना दोउ रण परा बरोबरिआय ॥
वार चूकिगे गंगा ठाकुर धाँधू मारा गुर्ज घुमाय ४२
परिगै मस्तक सो गंगा के तुरतै गिरा भरहरा खाय ॥
गिरिगे गंगा जब हाथी पर तुरतै अटा कनौजीराय ४३
लाखनि धाँधू का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागिसरदार ॥
दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ४४
कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ करैं भड़ाभड़ मार ॥
भौंरानँद पर धाँधू ठाकुर लाखनि भूरी पर असवार ४५
दोउ हौदा यकमिल हैगे दोऊ करैं समर ललकार ॥
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