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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 597

२ आल्हखण्ड । ५६६
कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४
छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥
सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १
अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥
धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २
इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥
सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३
झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४
देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५
रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥
पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६
तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥
पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७
तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥
बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८
भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥
धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६
सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥
१०