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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

चन्दनखम्भाकामदान । १९०२
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनारायणभाय ८३
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर ८४
माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिसई यह गाथ ॥
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ८५
माथ तुम्हारो है दुनिया मा दूसर नहीं हमारो नाथ ॥
सत्य शपथ यह धर्म कर्म की स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ८६
सुमिरि भवानी शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त ८७
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण-
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतचन्दनखम्भयुद्ध
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
चन्दनखम्भाकामैदान समाप्त ॥
इति ॥