आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्दनखम्भाकामैदान । ५६६
तुम्हरे लाखनि के मुर्चामा कटिहैं पायँ आपने भाय ॥
.होय लड़ाई घर अपने मा दुशमनशोरहोय अधिकाय ३५
हुकुम जो पावैं लखरानाका महलन जायँ तड़ाकाधाय ॥
डोला लावैं हम अगमा का राखैं टेक कनौजिराय ३६
सुनिकै बातैं बघऊदन की लाखनि हुकुम दीन फरमाय ॥
चला बनाफर तब जल्दी सों महलन अटा तड़ाकाजाय ३७
रूप देखिकै बघऊदन का रानी गई सनाका खाय ॥
हाथ मेहरियन पर डार्यो ना मानो कही बनाफरराय ३८
पूत सुपूते ग्वालिवाले कीरति छायरही चहुँओर ॥
महल हमारे जो तुम लूटै कीरतिजाय सबै यहि ठोर ३६
फेंट बँधैया कोउ नाहीं है ना कोउ गहनयोग तलवार ॥
साँची बातैं हमरी मानो ठाकुर उदयसिंह सरदार ४०
सुनिकै बातैं महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
ब्वला बेंदुला का चढ़वैया रानी साँच देयँ बतलाय ४१
जैसे माता मल्हना रानी तैसे आप हमारी माय ॥
यहु महराजा कनउजवाला द्वारे आय गयो बिरझाय ४२
डोला लेबे हम अगमा का तब अब धरब अगारी पाँय ॥
बदला लेबे संयोगिनि का तब छाती का डाह बुताय ४३
तहँ जगनायक खूब बिगरे थे तिनहुन दीन तहाँ समुझाय ॥
अब समुझावत महरानी हैं बाँदी आप देउ पठवाय ४४
यह मनभाई महरानी के सुन्दरि बाँदी लीन बुलाय ॥
कपड़ा गहना सब आपनदै डोला उपर दीन बैठाय ४५
चलिभा डोला रंगमहल ते संगे चले बनाफरराय ॥
जहाँ कनौजी की भूरीथी डोला तहाँ पहुँचा आय ४६