आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
२ आल्हखण्ड । ३५४
तैसे कीरति यदुनन्दन की द्वापर फैलिगई अधिकाय ॥
सूर औ मीराबाई कलियुग पायो स्वाद भूमिमें आय ४
ललिते चक्खन को ललचायो गायो आल्हा छन्द बनाय ॥
कहौं निकासी अब आल्हा कै सुमिरन देवनको बिसराय ५
अथ कथाप्रसंग ॥
एक समइया की बातैं हैं यारो मानो कही हमार ॥
लिल्ही घोड़ीपर चढ़ि बैठो माहिल उरई का सरदार १
तिकृतिकृतिकृतिकूटिटुईहाँकत दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥
लागिकचहरी दिल्लीपति की जिनका कही पिथौराराय २
आवत दीख्यो तिन माहिलका अपने पास लीन बैठाय ॥
बड़ी खातिरी करि माहिल कै पूँछन लाग पिथौराराय ३
काहे आये उरई वाले आपन हाल देउ बतलाय ॥
इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो पिथौराराय ४
मलखे सुलखे आल्हा ऊदन इनका दीखे देश डेराय ॥
आज बनाफर की समता को ठाकुर आन नहीं दिखलाय ५
चार चौहदी के डाँड़े पर मलखे किलालीन बनवाय ॥
जो कछु चाहैं आल्हा ऊदन सो सब करिकै देयँ दिखाय ६
कौन दूसरिहा है आल्हा का सम्मुख बात करै जो जाय ॥
मान न रहिगे क्यहु नरेश के चारो बढ़े बनाफरराय ७
हमका मानैं भल मामा करि खातिर करैं रोज अधिकाय ॥
हमहूं जानत हैं ब्रह्मा सम राजन साँच दीन बतलाय ८
अधिक पियारे पै तिनते तुम मानो कही पिथौराराय ॥
तुम्हें लरिकईं सों जानत हौं सीधो सादो आप स्वभाव ६
तिनकी धरती का स्वामी मैं त्यहिका पास लियो बैठाय ॥
आल्हानिकासी । ३५५ २
तुम अस राजा को दुनियामें ज्यहितेप्रीतकरौअधिकाय १०
इतना सुनिकै पिरथी बोले माहिल उरई के सरदार ॥
यतन बताओ यहि समया में जासों जायँ बनाफर हार ११
इतना सुनिकै माहिल बोले मानो कही पिथौराशय ॥
पाँच बछेड़ा मोहबे वाले तिनका आप लेउ मँगवाय १२
बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि पाँच ॥
उड़न बछेड़ा ये पाँचों हैं इनबल लड़ैं बनाफर साँच १३
पाँचो घोड़न के पाये ते साँचो विजय होय महराज ॥
जीति न पैहौ तिन पाँचो ते साँचोसाँच पाँच शिरताज १४
इतना सुनिकै पिरथीपतिने तुरतै लीन्ही कलम उठाय ॥
लिखिकै चिट्ठी परिमालिकको औ माहिलको दीनसुनार १५
सुनिकै चिट्ठी पिरथीपतिकै माहिल बड़ा खुशी हैजाय ॥
तुरतै धावन को बुलवायो पिरथी चिट्ठी दीन पठाय १६
लैके चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥
जहाँ कचहरी परिमालिक कै धावन तहाँ पहुँचा जाय १७
कीन दण्डवत महराजा को चिट्ठी फेरि दीन पकराय ॥
लैके चिट्ठी पृथीराज की आँकुइआँकुनजरिकैजाय १८
तुरत बुलायो निज धावन को की आल्हा को लाउ बुलाय ॥
इतना सुनिकै धावन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय १६
तुम्हें बुलावत महराजा हैं यह आल्हा ते कह्यो सुनाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा ऊदन पहुँचे नगर मोहोबे आय २०
जहाँ कचहरी परिमालिक की दोनों गये बनाफरराय ॥
हाथ जोरिकै आल्हा ऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय २१
आल्हा बोले परिमालिक ते राजन् साँच देउ बतलाय ॥
१ आल्हखण्ड । ३५६
कौनसी विपदा तुमपर आई जो सेवकको लीन बुलाय २१
इतना सुनिकै राजा बोले साँची सुनो बनाफरराय ॥
बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि भाय २३
पाँचो घोड़ा पिरथी माँगे, सो अब दीन चही पहुँचाय ॥
चिट्ठी आई महराजा की धावन बैठ बनाफरराय २४
इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥
अपने घोड़ा हम देबे ना चहु चढ़िआवै पिथौराराय २५
लड़ि भिड़ि लेबे हम पिरथी ते देबे समरभूमि समुझाय ॥
जियत न पाई कोउ घोड़नको साँची सुनो चँदेलेराय २६
इतना सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥
रारि मिटावो दै घोड़न को यामें भलापरै दिखलाय २७
घोड़ा अइहैं नहिं दिल्ली को मोहबा तुरत लेउँ लुटवाय ॥
ऐसी चिट्ठी पृथीराज की सो पढ़िलेउ बनाफरराय २८
घोड़ा पैहैं जो पिरथी, ना मोहवा तुरत गाँसिहैं आय ॥
कितन्यो घोड़ा लड़ि मरिहैं ऐसे पाँच देउ पठवाय २९
अंकुश विषका तुम गाड़ो ना मानो कही बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३०
काह हकीकति है पिरथी कै मोहवानगर मँझावें आय ॥
दतिया जीति उरैछा जीत्यों जीत्यो सेतुबंधलों जाय ३१
जीति पेशावर मुलतानाली बूँदी थर थर थर्राय ॥
राज्य कमायूंका लै लीन्ह्यों झंडाअटक दिह्योंगड़वाय ३२
जितनी तिरिया हैं मेवात में संध्या समय नित्त पछितायें ॥
काह हकीकति है पिरथी कै दिल्ली काल्हिलेउँ लुटवाय ३३
एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ें पिथौरा आय ॥
आल्हानिकासी । ३५७ ५
मैं हनिडारों तलवारी सों साँची सुनो चँदेलेराय ३४
सुनिकै बातें बघऊदन की जरि बरि गये रजापरिमल ॥
दशहरि पुरवाको खाली करु बेटा देशराज के लाल ३५
गऊ रक्त सम जल तू जानै भोजन गऊ माँस अनुमान ॥
करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संग समान ३६
होउ पातकी तुम कलियुग में जो नहिं करो बचन परमान ॥
इतना सुनिकै आल्हा ऊदन तुरतै चले वहाँ ते ज्वान ३७
अपने अपने फिरि घोड़नपर दूनों भाय भये असवार ॥
तुरतै रूपन को बुलवायो बोले उदयसिंह सरदार ३८
बा हजार जो हमरी फौजैं तिनमाँ खबरि सुनायोजाय ॥
करैं तयारी सब नर नाहर अबहीं कूच देयँ करवाय ३६
इतना सुनिकै रुपना चलिभा सबका खबरि सुनाई जाय ॥
इक हरकारा को पठवायो औ देवा को लीन बुलाय ४०
हाल बतायो आल्हा ठाकुर जो कछु कह्यो चँदेलेराय ॥
इतना सुनिकै देवा बोला दादा साँच देयँ बतलाय ४१
हमहूं रहिबे ना मोहबे मा साथै चलैं तुम्हारे भाय ॥
सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरावनिजकोजाय ४२
यह नहिं चहिये परिमालिकको ऐसे समय निकोरैंभाय ॥
लिखी गोसइयाँ की को मेटै साथै चलब बनाफरराय ४३
कौन देशमें अब चलि बसिहौ हमको साँच देउ बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये देवाकी बोले तुरत बनाफरराय ४४
बैरी हमरे सब राजा हैं जावैं कौन देशकोभाय ॥
तुमहूँ ऊदन सम्मत करिकै ठीहा ठीक देउ ठहराय ४५
इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ॥
६ आल्हखण्ड । ३५८
देश देश में कीनलड़ाई संकटपरा आजदिन आय ४६
जयचंदराजा कनउजवाला सोई एक मित्र दिखराय ॥
दूसर कोऊ अस छत्री ना जो विपदामें होय सहाय ४७
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥
चलिकै रहिये अब कनउजमें साँची कही लहूरूवाभाय ४८
हमहूँ चाहत रहें कनउज को तुमहूँ दीन स्वई बतलाय ॥
यह मनभाई भल देवा के दशहरिपुरै पहुँचे आय ४६
बड़े प्रेमसों द्यावलिदौरी पूँछी कुशल दुवारेआय ॥
आल्हाबोले तब द्यावलिते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ५०
मोहिं निकारयो परिमालिकने अनुचितअनुचितकसमखवाय॥
आजु न रहिबे हम दशहरिपुर माता साँच दीन बतलाय ५१
द्यावलिबोली फिरि आल्हाते काहे कह्यो चँदेलेराय ॥
बात बताओ जो पूरी तुम तौ फिरि कूच देयँ करवाय ५२
इतना सुनिकै आल्हाठाकुर सबियाँ कथा गये तहँगाय ॥
हाल जानिकै द्यावलि माता महलनहुकुमदीनफरमाय ५३
सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों होवैं बेगितयार ॥
मोहिं निकारयो परिमालिक ने कीन्ह्योतनको नाहिंविचार ५४
इतना सुनिकै बाँदी दौरी महलन खबरि जनाईजाय ॥
सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों गईं सनाकालाय ५५
होश छूटिगे ठकुरानिन के यहुका रंग भंग भो आय ॥
तबतो गाथा सब आल्हाकी बाँदी तहाँ दीन समुझाय ५६
तब ठकुरानी मनसानी सब अपनो हर्ष शोक बिसराय ॥
डोलामँगवायो चऊदन ने सोऊ गयो तहाँपरआय ५७
कई तयारी फिरि जल्दी सों सबदिन कूच दीन करवाय ॥
आल्हानिकासी । ३५६
बाजे डंका अदहंतंका के हाहाकार शब्दगा छाय ५८
आगे आल्हा हैं पपिहापर ऊदन बेंदुलपर असवार ॥
हंसामनि घोड़े के ऊपर इन्दल आल्हाकेर कुमार ५९
आय कै पहुँचे सब मोहबे में मल्हना महल पहुँचे जाय ॥
बड़ी खुशाली सों महरानी आदरभावकीन अधिकाय ६०
खबरि पायकै सब रानी फिरि मल्हना महल पहुँचीं आय ॥
रोवनलागीं सब रानी तहँ दारुण बिपतिकहीना जाय६१
मल्हनाबोली फिरि आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय ॥
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जो अब कूचदेउ करवाय ६२
घाटि न जाना हम ब्रह्मासों चारो आय बनाफरराय ॥
कहा न मानो अब काहूको बैठो धाम आपने जाय ६३
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
अब नहिं रहिबे हम मोहबे माँ माता साँचदीन बतलाय ६४
गऊरक्त सम जलको जानै भोजन गऊमाँस सममान ॥
करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संगसमान ६५
ऐसी बातें महराजा की माता काहगई बौराय ॥
जो हम बिलमैं अब मोहबेमाँ तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ६६
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राखो हमें फेरि जो माय ॥
दर्शन द्वैगे सब मातन के अब हम कूच द्यहूँ करवाय६७
इतना कहिकै ऊदन ठाकुर डोला तुरत लीन मँगवाय ॥
औ ललकारा फिरि माता का अब तुम कूच देउ करवाय ६८
सुनि सुनि बातें उदयसिंह की मल्हना बार बार पछिताय ॥
तुरतै धावन को बुलवायो सिरसागढ़ै दीन पठवाय ६९
लागि कचहरी मलखाने कै धावन वहाँ पहुँचा जाय ॥
कही हकीकति सब आल्हाकी धावन हाथ जोरि शिर नाय ७०
सुनिकै बातें धावन मुख की मलखे घोड़ी लीन मँगाय ॥
मल्हना केरे फिरि महलन ते आल्हा कूच दीन करवाय ७१
बाजे डंका अहतंका के कनउज चले बनाफरराय ॥
ब्याकुल रैयत भै गोहबे कै काहू धीर धरा ना जाय ७२
भोजन कीन्ह्यो कोउ तादिनना सोवन रात दीन बिसराय ॥
जहँ तहँ गाथा बघऊदन की घर घर रहे नारिनर गाय ७३
चढ़ा कबूतरी पर मलखाने मारग मिला तुरतही आय ॥
कुशल पूँछिकै आल्हा ठाकुर आपनिकुशलदीन बतलाय ७४
जो कछु भाषा परिमालिक ने आल्हा सत्य सत्य गे गाय ॥
मलखे बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ७५
चलिकै रहिये तुम सिरसा में करिहै काह चँदेलोराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ७६
अब नहिं टिकिहैं हम सिरसा में चहु तुम कोटिनकरो उपाय ॥
राज्य छोड़िकै परिमालिक की जयचँद पुरी जायँ हम भाय ७७
जब सुधिआवै नृप बातन कै तब मन पीर होय अधिकाय ॥
बात के मारे जो मरिहै ना मरिहै काह लात के घाय ७८
आज तो घोड़ा पिरथी मांगा काल्हिको तिरिया लेत मँगाय ॥
यहु मर्दाना को बाना ना आपन घोड़ देयँ पठवाय ७६
इतना सुनिकै मलखे बोले मानो कही बनाफरराय ॥
सयन चिरैया ना घर छोड़ै नाव निजराव निजको जाय ८०
अस गति नाहीं है पिरथी की तुम्हरे घोड़ लेयँ मँगवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले फेरि बचन समुझाय ८१
लिखी विधाता की मिटिहैना सिरसा लौटिजाउ मलखान ॥
आल्हानिकासी । ३६१ ६
काह हकीकतिहै मानुष के सुख दुख देनहार भगवान ८२
बातें सुनिकै ये आल्हा की मलखे ठीक लीन ठहराय ॥
क्यहु समुझायेते मनिहैं ना आल्हाउदयसिंह दोउ भाय ८३
मिला भेंट करि सब काहू सों मलखे कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुंचे सिरसागढ़ में महलन खबरि बताई जाय ८४
नदी बेतवा को उतरत भे दूनों भाय बनाफरराय ॥
ढाई दिनके फिरि अर्सा में झावर गये बनाफर आय ८५
बिजुली चमकै कउँधा लपकै कहुँ कहुँ मेघ रहे गहराय ॥
मेढ़ुक बोलैं चौगिर्दा ते वीछी साँपनकी अधिकाय ८६
नचैं मुरैला कहुँ जंगल में झींगुर कहुं करैं झनकार ॥
किह्यो बसेरा तटयमुना के नाहर उदयसिंह त्यहिबार ८७
बनी रसोई रजपूतन की सबहिन जेंव लीन ज्यौनार ॥
भोर भुरहरे मुर्गा बोलत उतरे घाट कालपी क्यार ८८
तहँते चलिकै परडुल पहुंचे दूनों भाय बनाफरराय ॥
दिना द्वैक रहि त्यहि थान में तहँते कूच दीन करवाय ८९
जायकै पहुँचे अस .... में जहँ पानीको कष्टाय ॥
इन्दल बेंदुल दोउ प्यासे भे इनके ..... । ११०
रहा न बीरा तहँ पानन का जो बनाफरराय ॥
ताकि व्यविरया इन्दल बेंदुल पानी .... ल्हुरवाभाय ११५
आधा पानी आधी माटी जाब तिन्हैं लीन लुटवाय ॥
हाय मुसीबत अस परिगैहै सेहुको अन्नदीन छिरकाय ११६
सुनवाँ रोई त्यहि समया में बुताफलहू दीन चलाय ॥
फाटै छाती नहिं द्यावलि कै चिं वापू रहे मचाय ११७
आल्हा सोचैं त्यहि समया में ऊदन छप्पर दीन गिराइ ॥
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
१२ आल्हखण्ड । ३६४
तेलि तँबोली कलवारन की दुर्गति भई तहांपर आय ११८
लैलै टेंटुवा बनियां चलिभे मनमें बार बार पछिताय ॥
हाय रुपैया बैरी द्वैगा ह्वाँ अबगई प्राणपर आय ११६
भा खलभल्ला औ हल्ला अति पहुंचे बहुत राज दरबार ॥
रोय रोयकै बनियाँ बोलै राजन मानो कही हमार १२०
अजयपाल औ रतीभान भे एकते एक शूर सरदार ॥
ऐसि दुर्दशा भै कबहूंना जैसी भई आय यहिवार १२१
ऊदन आये मोहबे वाले तिन सब लीन बजारलुटाय ॥
इतना सुनिकै जयचँद राजा लाखनिरानालीनबुलाय १२२
कहि समुझावा लखराना को तोपन आगिदेउ लगवाये ॥
सुनिकै बातें महराजा की लाखनिचला शीशकोनाय १२३
सवैया ॥
चर्खन में सब तोप चढ़ाय औ फौज तयार कियो लखराना ।
बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावन को गहराना ॥
विज्जु छटासों कटा करवे कहँ चमकत खड्ग तहाँ मरदाना ।
मौहर बाजत हाव किये लखिते यह भाव न जात बखाना १२४
भई तयारी समरभूमि की छत्रिनबांधि लीन हथियार ॥
मीराताल्हन बनरस वाला पहुंचा तबै राजदरबार १२५
किह्यो बन्दगी महराजा को औ यह हाल कह्योसमुझाय ॥
गरि मचायो नहिं कनउज में आल्हाऊदन लेउ बसाय १२६
मोर्चा फेरा इन पिरथी त द्वारे हाथी दीन पछार ॥
बड़े लड़ैया द्यावलिवाले इनसे हारि गई तलवार १२७
जयचंद बोले तब सय्यद ते नाहर बनरस के सरदार ॥
[Header] आल्हानिकासी। ३६५ १३
जौंरा भौंरा दुइ हाथिन को हमरे द्वारे देयँ पछार १२८
खता माफ करि हम आल्हाकै औ कनउज माँ लेंय बसाय ॥
इतना सुनिकै सय्यद् बोले धावन पठै लेउ बुलवाय १२६
तब महराजा कनउज वाला तुरतै धावन दीन पठाय ॥
खबरि सुनाई त्यहि आल्हा को तुमको राजा रहे बुलाय १३०
मीरासय्यद् तहँ बैठे हैं तिनहिन हमें दीन पठवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हाऊदन दोऊ भाय बनाफरराय १३१
अपनी अपनी असवारिनचढ़ि तहँते कूच दीन करवाय ॥
जौंरा भौंरा मस्ता हाथी जयचंद द्वारेदीन ढिलाय १३२
आल्हा ऊदन दोऊ भाई पहुंचे तुरत द्वारपर आय ॥
जयचंद बोले तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय १३३
हथी पछारो जो द्वारे पर तौ तकसीर माफ द्वैजाय ॥
इतना सुनिकै उदयसिंहने मनमांसुमिरिशारदामाय १३४
ताकिकै मस्तक इक हाथी के भाला हना लघुरवा भाय ॥
पैठिग भांला त्यहि हाथी के तुरतै गिरा पछारा खाय १३५
दन्त पकारकै फिरि दूसरे के ऊदन दीन्ह्यो द्वार लिटाय ॥
देखि वीरता उदयसिंह की जयचंद बहुतगयो हर्षाय १३६
बाँह पकरिकै फिरि आल्हा कै औ दरबार पहुँचा जाय ॥
कीनि खातिरी भल ऊदन की खालीमहलदीनकरवाय १३७
लै कै लश्कर तब कनउज मां बसिगे तहां बनाफरराय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाकोआय १३८
परे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १३६
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥
१४ · आल्हखण्ड । ३६६
मान्त्रिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४०
माथ नवावौं पितु अपनेको ह्याँ ते करौं तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १४१
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयाग
नारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भवद्वुकृपाशङ्करसूनु पं०ललिताप्रसादकृत आल्हा
कन्नौजवासवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
आल्हा निकासी सम्पूर्ण ॥
इति ॥
अथ आल्हाखण्ड ॥
लाखनिका विवाह अथवा बूँदी की लड़ाई ॥
सवैया ॥
फूलन कारिखै हमदन कै दशस्यन्दन के सुत को यश गावैं ।
र्तना सुनिकै ॐ रघुनन्दन बन्दन कै अतिही सुखपावैं ॥
कहा आयो चरण सदा प्रभुकी करणी बरणी नहिं जावै ।
क्षेम संदेश नप करियो ललिते पदपङ्कज नित्त मनावै १
सुमिरन ॥
फूलमती कनउज की देवी जिनयशप्रकटआजयहिकाल॥
करैं मनोरथ पूरण सबके ध्यावैं जवान वृद्ध चहुकाल १
हैं महरानी सब सुखदानी रक्षाकरैं बिकट कलिकाल ॥
अवलम्बा तिनअम्बाका लाखनि ब्याह बखानों हाल २
सहाई अब माई तुम जाते चलाजाउँ भवपार ॥
बूड़े भवसागर में माता तुम्हीं निवाहन हार ३
पार लगायो जस ऊदन का तैसे पारकरो यहिबार ॥
माता भ्राता अरु ताता ये स्वारथ मित्र सबै संसार ४
२ आल्हखण्ड । ३६वां
साँचौँ माता अरु त्राता तुम धाता सृष्टि माँझ यहिकाल ॥
लखियै ऐसे नर दुर्बल को माता जानु आपनो बाल ५
छूटि सुमिरनी गै देवीकै लाखनिब्याहसुनोयहिकाल ॥
गंगाधर बूँदी का राजा ता घर ब्याह होयगो हाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
कुसुमा बेटी गंगाधरकी राजा बूँदी का सरदार ॥
खेलत देखा सो बेटी का यौवन जानिपरा त्यहिबार १
लाग विचारन मन अपने मा बेटी ब्याहन के अनुसार ॥
नव अरु आठ दशै वर्षनमा ज्योतिपशास्त्रदीनअधिकार २
फिरि तौ गिनती ना कन्याकी यह मन कीन्ह्यो खूब विचार ॥
म्वती जवाहर दो बेटाथे तिनका बोलिलीन त्यहिबार ३
हाल बतावा मन अपने का राजा बार [बार समझाय] ॥
घरवर नीको जहँ तुम देखो त्यहिघर टीका [दीजो जाय]
एक मोहोवे तुम जायो ना तहँपर रहें [बनाफर राय] ॥
जाति बनाफर की हीनी है हल्ला देश दे[श महँ] काय ५
इतना कहिकै महराजा ने सबियाँ सामा दीन मँगाय ॥
चला जवाहर तब बूँदी ते राजै बार बार शिरनाय ६
तीनिलाख को टीका लै कै दील्लीशहर पहुँचा जाय ॥
हाल जानिकै पृथीराज ने टीका तुरत दीन लौटाय ७
चौरीगढ़ में वीरशाह घर पहुंचा फेरि जवाहरजाय ॥
सोऊ जादूकी शंका ते टीका तुरत दीन लौटाय ८
तहँतेचलिकै फिरिविसहिनगा जहँपर बसैं बिसेनेराय ॥
लागि कचहरी गजराजा की शोभा कही बूत ना जाय ६
सोने सिंहासनपर सोहत है राजा बिसहिन का सरदार ॥
लाखनिका विवाह । ३६६ ३
दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को, राजा पढ़नलाग त्यहिबार १०
पढ़िकै चिट्ठी गंगाधरकै टीका तुरत दीन लौटाय ॥
तबै जबाहिर मन खिसियाने पहुँचे फेरि कनौजै जाय ११
लागि कचहरी तहँ जयचँदकै भारी लाग राज दरबार ॥
आल्हा ऊदन तहँ बैठे हैं बैठे बड़े बड़े सरदार १२
दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को जयचँद आँकु आँकु पढ़िलीन ॥
पढ़िकै चिट्ठी वापस दीन्ह्यो हाँहूँ कछू नहीं नृप कीन १३
तबै जबाहिर यह बोलत भा दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥
लाखनि काँरे हैं तुम्हरे घर यह हम आयनपताल गाय १४
आयसु पावैं महाराजा को तौ हम टीका देयँ चढ़ाय ॥
इतना सुनिकै जयचँद बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय १५
ब्याह न करिबे हम तुम्हरे घर डाँपर जादू को अधिकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १६
टीका आयो घर तुम्हरे है राजन लीजै आप चढ़ाय ॥
कौन दुसरिहा नृप तुम्हरो है ज्यहिभयकरौ कनौजीराय १७
औरो बोले त्यहि समया मा साँची कहौ बनाफरराय ॥
सम्मत सब का जयचँद लै कै तब पण्डितते कहा सुनाय १८
देखो साइति यहि समया मा टीका लीनजाय चढ़वाय ॥
सुनिकै वातैं महाराजा की पंडित साइति दीन बताय १९
पाख अँधरिया तिथि तेरसिऔ फागुन मास सुनो महराज ॥
भौरिन केरी शुभ साइति है ह्वैहैं सुफल आपके काज २०
पै यहि बिरिया शुभ साइति में टीका आप लेउ चढ़वाय ॥
इतना सुनिकै महराजा ने महलन खबरिदीन पठवाय २१
खबरि पायके महरानी ने चौका तुरत लीन लिपवाय ॥
२४
४ आल्हखण्ड । ३७०
चौक पुराई गजमोतिन सों चन्दन पीढ़ा दीन डराय २१
तापर बैठे लखराना जब गावन लगीं सुहागिल आय ॥
द्यो जवाहिर गंगाधर का तहँ पर टीका दीन चढ़ाय २३
बीरा दीन्ह्यो जब लाखनि को सम्मुख छींक भई तब आय ॥
रानी तिलका त्यहि समया में बोली राजै वचन सुनाय २४
ब्याह न करिबे हम बूँदी मा टीका आप देयँ लौटाय ॥
परम पियारे लखराना के बीरा लेत छींकमै आय २५
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कछु होवै इनके जीका हमरो लीन्ह्यो मूडकटाय २६
टीका फेरयो महरानी ना जान्यो शकुन छींककामाय ॥
सो सवरमा यहि मानुष का पौवन नाक गिगवतजाय २७
यहिकी छींकनका अशकुन ना माता भरम देउ बिसराय ॥
राजा बोले फिरि रानी ते साँची कहै बनाफरराय २८
जो अस हालत सबहोती ना टीका तुरत देत लौटाय ॥
इतना सुनिकै तिलका रानी अपनो भरमदीन विसराय २६
फेरि जवाहिर सब नेगिन को सुवरण कड़ा दीन पहिराय ॥
जितनी सामारह टीका की सो आँगनमा दीन धराय ३०
राजाजयचंद उन नेगिन का सुवरण कड़ा दीन पहिराय ।
साल दुसाला मोहनमाला इनहून दीन तहाँपर आय ३१
बड़ी खुशानी दुहुँ तरफाके नेगिन मनै भई अधिकाय ।
विदामँगिकै चला जवाहिर बूँदी शहर पहूँचा जाय ३२
हाल बतायो महराजा का जाविधि टीका भयो चढ़ाय ॥
भई खुशहाली गंगाधर के फूले अंग न सके समाय ३३
नामी राजा कनउज वाले बेटा कीनकाज खुबजाय ॥
लाखनिका बिवाह । ३७१ ५
भई तयारी ह्वाँ ब्याहे की फागुन मास पहूँचा आय ३४
न्यवत पठावा सब राजन को राजा कनउज के सरदार ॥
पावत चिट्ठी के राजा सब कनउज आयगये त्यहिबार ३५
तेल औ मायन नहखुरआदिक ब्याहन कुँवाँक्यार व्यवहार ॥
नेग चार सब पूरन ह्वैगे लागे सजन शूर सरदार ३६
झीलमबखतर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को राजा जयचंद भये तयार ३७
आल्हा बैठे पचशब्दापर ऊदन बेंदुल पर असवार ॥
गंगापाँवर कुड़हरि दाला मामा लाखनि का सरदार ३८
सूरज राजा परहुल वाला सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥
सिर्गी घोड़े की पीठि पर सय्यद बनरस का सरदार ३६
पूंजि गोबर्द्धनि संदोहिनि अरु लाखनि फूलमती त्यहिबार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को पलकी ऊपर भये असवार ४०
बाजे डङ्का अहतक के बारालाख फौज तैयार ॥
आगे हलका भा हाथिन का पाछे चलन लागि असवार ४१
चले सिपाही त्यहि पीछेसों रब्बाचले पवन की चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ४२
गर्द उड़ानी अति मारग में लोपे अन्धकार सों भान ॥
हाथी चिघरैं घोड़ा हींसैं घूमत जावैं लाल निशान ४३
भयो कलाहल अति मारग में जंगल जीव गये थर्राय ॥
उनइस दिन के फिरि अर्सा में बूँदी पास गये नगच्याय ४४
चार कोस जब बूँदी रहिगै जयचंद तम्बू दीन गड़ाय ॥
गड़िगे तम्बू सब राजन के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ४५
अपने अपने सब तम्बुन में राजा नृत्य रहे करवाय ॥
६ आल्हाखण्ड । ३७२
गमकैं तबला सब तम्बुन में सावन यथा मेघ गहरायँ ४६
ओढ़े सारी काशमीर की धारी शिरन सोहनी भाय ॥
बनी मोहनी अति मूरति है मूरति वरण नहीं कछु जाय ४७
ऊदन बोले तब रूपन ते ऐपनवारी दे पहुँचाय ॥
रूपनबारी तब बोलत भा दोऊ हाथ जोरि शिरंनाय ४८
ऐपनवारी बारी लैके आपन मूड़ कटावै जाय ॥
आये बारी बहु कनउज के ऐपनवारी देउ पठाय ४६
बातें सुनिकै ये रूपन की बोला फेरि बनाफरराय ॥
बाना राखै रजपूती का बारी कौन बतावै भाय ५०
इतना सुनिकै रूपन बोले बेंदुल घोड़ देउ मँगवाय ॥
सुनिकै बातें उदयसिंह ने बेंदुल बाग दीन पकराय ५१
ऐपनवारी बारी लैके बेंदुल उपर भयो असवार ॥
सवापहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाजाय नृपति के द्वार ५२
सवैया ॥
देखिकै रूपनि को दरवानि कहा इमि बानि सो बेगि सुनाई।
कौनसो देश बसौ क्यहिग्राम औ कौनसोकाज गये तुम आई॥
जायकहाँ नृपसों चलिकै भलिकै निजहाल जो देउ बताई।
बानि सुन्यो ललिते जब रूपनि बोलि उठ्यो तब मोदबढ़ाई ५३
ऐपनवारी बारी लावा राजै खबरि सुनावो जाय ॥
हमें पठावा आल्हा ऊंदन ब्याहनअये कन्नौजीराय ५४
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की राजा गये दुआरे आय ५५
द्वारे आगे जब गंगाधर रूपन बोला शीश नवाय ॥
लाखनिका विवाह । ३७३ ७
ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६
आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥
ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७
कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥
इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८
रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥
दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६
कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥
बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६०
इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥
जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१
इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२
प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥
धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३
टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥
जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४
का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥
बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५
दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥
देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६
क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७
मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥
८ आल्हखण्ड । ३७४
उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८
क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥
रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६
कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥
इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७०
नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥
दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१
मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥
सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२
सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥
रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४
जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥
कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५
लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥
धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६
तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥
तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७
समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥
देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८
इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥
जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६
कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
लाखनिका विवाह । ३७५
देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८०
नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१
ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥
इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२
जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥
बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३
बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥
संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४
आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥
झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५
बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥
रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६
धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७
बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥
जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥
भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६
लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥
मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६०
चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥
नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१
तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥