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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

२ आल्हखण्ड । ३६वां
साँचौँ माता अरु त्राता तुम धाता सृष्टि माँझ यहिकाल ॥
लखियै ऐसे नर दुर्बल को माता जानु आपनो बाल ५
छूटि सुमिरनी गै देवीकै लाखनिब्याहसुनोयहिकाल ॥
गंगाधर बूँदी का राजा ता घर ब्याह होयगो हाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
कुसुमा बेटी गंगाधरकी राजा बूँदी का सरदार ॥
खेलत देखा सो बेटी का यौवन जानिपरा त्यहिबार १
लाग विचारन मन अपने मा बेटी ब्याहन के अनुसार ॥
नव अरु आठ दशै वर्षनमा ज्योतिपशास्त्रदीनअधिकार २
फिरि तौ गिनती ना कन्याकी यह मन कीन्ह्यो खूब विचार ॥
म्वती जवाहर दो बेटाथे तिनका बोलिलीन त्यहिबार ३
हाल बतावा मन अपने का राजा बार [बार समझाय] ॥
घरवर नीको जहँ तुम देखो त्यहिघर टीका [दीजो जाय]
एक मोहोवे तुम जायो ना तहँपर रहें [बनाफर राय] ॥
जाति बनाफर की हीनी है हल्ला देश दे[श महँ] काय ५
इतना कहिकै महराजा ने सबियाँ सामा दीन मँगाय ॥
चला जवाहर तब बूँदी ते राजै बार बार शिरनाय ६
तीनिलाख को टीका लै कै दील्लीशहर पहुँचा जाय ॥
हाल जानिकै पृथीराज ने टीका तुरत दीन लौटाय ७
चौरीगढ़ में वीरशाह घर पहुंचा फेरि जवाहरजाय ॥
सोऊ जादूकी शंका ते टीका तुरत दीन लौटाय ८
तहँतेचलिकै फिरिविसहिनगा जहँपर बसैं बिसेनेराय ॥
लागि कचहरी गजराजा की शोभा कही बूत ना जाय ६
सोने सिंहासनपर सोहत है राजा बिसहिन का सरदार ॥