आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हखण्ड । ३५८
देश देश में कीनलड़ाई संकटपरा आजदिन आय ४६
जयचंदराजा कनउजवाला सोई एक मित्र दिखराय ॥
दूसर कोऊ अस छत्री ना जो विपदामें होय सहाय ४७
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥
चलिकै रहिये अब कनउजमें साँची कही लहूरूवाभाय ४८
हमहूँ चाहत रहें कनउज को तुमहूँ दीन स्वई बतलाय ॥
यह मनभाई भल देवा के दशहरिपुरै पहुँचे आय ४६
बड़े प्रेमसों द्यावलिदौरी पूँछी कुशल दुवारेआय ॥
आल्हाबोले तब द्यावलिते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ५०
मोहिं निकारयो परिमालिकने अनुचितअनुचितकसमखवाय॥
आजु न रहिबे हम दशहरिपुर माता साँच दीन बतलाय ५१
द्यावलिबोली फिरि आल्हाते काहे कह्यो चँदेलेराय ॥
बात बताओ जो पूरी तुम तौ फिरि कूच देयँ करवाय ५२
इतना सुनिकै आल्हाठाकुर सबियाँ कथा गये तहँगाय ॥
हाल जानिकै द्यावलि माता महलनहुकुमदीनफरमाय ५३
सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों होवैं बेगितयार ॥
मोहिं निकारयो परिमालिक ने कीन्ह्योतनको नाहिंविचार ५४
इतना सुनिकै बाँदी दौरी महलन खबरि जनाईजाय ॥
सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों गईं सनाकालाय ५५
होश छूटिगे ठकुरानिन के यहुका रंग भंग भो आय ॥
तबतो गाथा सब आल्हाकी बाँदी तहाँ दीन समुझाय ५६
तब ठकुरानी मनसानी सब अपनो हर्ष शोक बिसराय ॥
डोलामँगवायो चऊदन ने सोऊ गयो तहाँपरआय ५७
कई तयारी फिरि जल्दी सों सबदिन कूच दीन करवाय ॥