आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हखण्ड । ३७४
उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८
क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥
रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६
कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥
इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७०
नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥
दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१
मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥
सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२
सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥
रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४
जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥
कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५
लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥
धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६
तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥
तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७
समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥
देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८
इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥
जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६
कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥